सुबह जब में ऑफिस पहुंचा तो चरणदास जी लड्डू का डब्बा हाथ में लिए टहल रहे थे. मैंने पूछा, 'चरणदास जी क्या बात है, आज बडे खुश नजर आ रहे हो?' 'सर, बात ही कुछ ऐसी है, मेरा डी डी ए का फ्लैट निकला है'. चरणदास जी ने मुस्कराते हुए कहा. चरणदास जी आज बहुत खुश थे, हो भी क्यों न, दिल्ली जैसे शहर में अपना मकान होना किसी उपलब्धि से कम नहीं है. 'ये लड्डू लाया हूँ, सब लोग आ जाएं, तो यह लड्डू बांटू', चरणदास जी ने कहा. थोड़ी ही देर में सभी लोग आ गए. चरणदास जी ने अपनी इस ख़ुशी को सभी लोगो में बंटाना शुरू कर दिया. शुरुआत ब्रांच ऑफिसर दुबे से की गई. दुब्बे जी ने डिब्बे से लड्डू उठाते हुए कहा, ' देखो न चरणदास जी, जमाना कितना बदल गया, एक जमाना था जब आप कि बिरादरी वालो को गाँव के बाहर ही घर बनाने कि इज़ाज़त थी, लेकिन अब देखिए, आप का इतनी बढ़िया जगह घर निकला है, सब समय की बात है'. चरणदास जी अनुसूचित जाती से थे, उन्हें यह बात जरा ठीक नहीं लगी, परन्तु उन्होंने महसूस नहीं होने दिया, और कहने लगे, 'बिलकुल सर, जमाना बहुत बदल गया है, मेरे पास कोई एतिहासिक जानकारी तो है नहीं, पर मैंने भी पंचतंत्र से लेकर लेकर मानसरोवर तक की कहानिया जरूर पढ़ी है, पर किसी भी कहानी में ब्राहम्ण को सम्म्पन नही कहा गया है, जिस भी कहानी में ब्राहमण का जिक्र है बस यही है कि एक गाँव में एक गरीब ब्राहमण रहता था', चरणदास जी घाराप्रवाह बोले जा रहे थे, "जमाना बदल गया है सर, इसीलिए तो आप भी अंडर सेक्रेटरी है, नही तो बिलाथ भर कि चोटी और बदन पर धोती बांधे किसी दरवाजे पर कटोरा लिए खड़े होते. दुबे साहब निरुत्तर हो गए. उनका एतिहासिक ज्ञान वीरगति को प्राप्त हो गया था. चरणदास जी किसी विजई योधा कि तरह मेरी तरफ बढे, और बोले, "आप भी लीजिए शर्माजी, लड्डू देसी घी के है". मैंने चुपचाप दो लड्डू उठाए और अपना ध्यान लड्डुओं पर केन्द्रित कर दिया.................
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
सोमवार, 18 जनवरी 2010
दफ्तर नामा
मै पिछले दस वर्षो से सरकारी दफ्तर में नौकरी कर रहा हूँ, पर ये बात मेरी समझ में अबआई की लोग सरकारी नौकरियो को क्यों प्राथमिकता देते है। मै तृतीय श्रेणी का कर्मचारी हूँ, मुझे आज की तारिख में लगभग रुपये २५,०००/- तनख्वाह मिलती है, जबकि मै शायद 2000/-रूपये का भी काम काम नहीं करता हूँ, आप क्या समझते है क्या मुझे आत्मग्लानी होती होगी? बिलकुल नहीं, क्योंकि मुझसे लगभग पांच गुनी तनख्वाह लेने वाले जब धेले का काम नहीं करते, और फक्र से अपने रुतबे का एहसास करवाते है, तो मुझे क्या पड़ी है? पर दुःख की बात तो ये है की ये सारे लोग मेरी तरह ही सोचते है। केवल कुछ ही लोग अपने कार्य के प्रति समर्पित होते है, पर उन लोगो में एक अवगुण होता है, वो चमचा गिरी नहीं कर सकते, जिसके फलस्वरूप उन्हें ऐसी जगह पर स्थान्तरित किया जाता है जहाँ उनका अपने कार्य के प्रति सारा समर्पण स्वाहा हो जाता है। वो ये नहीं जानते कि यहाँ आपके स्वाभाव में लचीलापन और अवसरवादिता होना बहुत जरूरी है। वो कुछ नया करना चाहते है, जबकि हम अभी भी लार्ड मेकाले के बनाए गए फॉर्मेट पर ही टाइप करते है। यहाँ कोई बदलाव कि बात क्यों नहीं करता? क्योंकि ये ऐसा ढांचा है जो ऊपर बैठे नौकरशाहो और राजनीतिज्ञों के लिए फलदायक है नौकरशाहों का एक तबका जो सारे हिंदुस्तान को अपने गिरफ्त में लिए है, राजनीतिज्ञों के काम करता है, और उनके खिलाफ कोई भी बोलना नहीं चाहता, उसका भी एक कारण है, क्योंकि अधिकतर राजनीतिज्ञ अपनी नैतिक और अनैतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए इन लोगो का इस्तेमाल करते है। और ये नौकरशाह बिना किसी लाग लपेट के अलादीन के जिन की तरह इनकी इच्छाएँ पूरी कर लेते है, तो भला इनको इन काम धेनु रूप नौकरशाहो पर क्यों कुद्रष्टि डालनी? यहाँ दफ्तरों में लोग बड़ी बड़ी बाते करते है, पर काम के नाम पर जीरो होते है। ओबामा से लेकर ओसामा तक को यहाँ बैठे बैठे सलाह दे डालते है। तो अब आप ही बताइए, है न सरकारी नौकरी बढिया?
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