मंगलवार, 22 मई 2018

पूरब के पहाड़ों का ख़ूबसूरत शहर शिलांग


 दिल्ली से सुबह साढे नौ बजे चली एयर इंडिया की उड़ान संख़्या 889  भले ही अपने सही समय पर गुवाहटी के लोक प्रिय गोपीनाथ बोरदोलई हवाई अड्डे पर उतर गई थी लेकिन वहाँ से बाहर निकलते-निकलते दिन का पूरा एक बज चुका था। हवाई अड्डे की हद पार करते ही नाम की तख़्ती लिए ख़ड़ा एक व्यक्ति सामने नजर आया तो मैने मुस्कुरा कर उसका इस्तकबाल किया। उसने बड़ी गर्म जोशी के साथ हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया। गाड़ी तक पहुँचने तक हम दोनो एक दूसरे से काफ़ी परिचित हो चुके थे। पेशे से ड्राईवर देब ज्योति गुवाहटी शहर का रहने वाला था। यहाँ के बाद हमारा अगला पड़ाव शिलांग था। देब ज्योति ने बताया कि यहाँ से शिलांग शहर तक पहुँचने में हमे लगभग 3 घंटे का समय लगेगा। बिना देर किए हम लोग हवाई अड़्डे से गुवाहाटी शहर को बाई पास करते हुए शिलांग की ओर दौड़ पड़े। गुवाहाटी शहर की हद खत्म हुई ही नहीं थी कि तभी देब ज्योति नें बताया कि सड़क के दूसरी ओर मेघालय का क्षेत्र शुरु हो चुका है। गुवाहाटी से शिलांग को जोड़ने वाला चार लेन का यह राष्ट्रीय राज मार्ग खानापारा से बर्नीहाट तक असम और मेघालय का सीमांकन भी करता है।



गुवाहाटी से शिलांग की तरफ़ जाते हुए जोराबाट से पहाड़ शुरु हो जाते है लेकिन यहाँ के पहाड़ भारत में पड़ने वाले उत्तरी हिमालय के पहाड़ों से भिन्न है। जहाँ उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्र भुरभूरे और वनस्पति विहीन होते जा रहे हैं वहीं मेघालय की इन पहाड़ियों को देख़ कर ऐसा लगता है मानो इन्होने सदा बहार जंगलों की हरियाली ओढ रखी हों। मेरे लिए पहाड़ी रास्तों पर एक अच्छी सड़क पर सफ़र करना किसी सपने के सच होने जैसा है। लगभग एक घंटे चलने के बाद हल्की भूख महसूस हुई तो देब ज्योति नें सुझाव दिया कि रास्ते में फ़ल खाए जा सकते हैं। बर्नीहाट से थोड़ा उपर चढने के बाद एक बड़े से मोड़ पर एक फ़ल विक्रेता का खोमचा नजर आया तो देब ज्योति नें गाड़ी रोक दी। हमने खोमचे वाले से दो जनो के खाने भर के केले, खीरे और अन्नानास खरीदे। उसनें तल्लीनता के साथ खरीदे गए फ़लों को करीने से काटा और फ़िर तश्तरियों में सजा कर, नकम, मिर्च और स्थानीय मसालों से बने पेस्ट के साथ हमारे आगे परोस दिया।


गुवाहटी से शिलांग के रास्ते पर


जंगल के बीचों बीच से गुजरती सड़क के किनारे बने इस ख़ोमचे में बैठने की कोई जगह नहीं थी। इधर उधर नजर दौड़ाई तो खोमचे के पास ही सड़क के बाहरी किनारे पर बने पेराफ़िट्स पर नजर पड़ी। हमने एक पेराफ़िट पर अखबार बिछाया और ताजा कटे फ़लों की तश्तरियों को बीच में रख कर उस पर आसन जमा लिए। फ़लों और स्थानीय मसालों की जुगलबंदी अद्भुत थी। इस समय महसूस हो रही भूख के लिए यह आदर्श भोजन था। फ़लाहार से फ़ारिग होने के बाद हम फ़िर से अपने गंतव्य की तरफ़ हो लिए। अगले दो घंटों के दौरान मोड़ दर मोड़ पार करते हुए हम लोग पूरब के स्काट लैंड शिलांग शहर में थे। शिलांग मेघों के घर मेघालय की राजधानी के अलावा पूर्वी खासी हिल्स जिले का मुख्यालय भी है। उन्नीसवीं सदी के उतरार्द्ध के दौरान अस्तित्व में आया यह पर्वतीय शहर आज की तारीख़ में पेड़ों, पहाड़ों, झीलों, झरनों और गुफ़ाओं के लिए  दुनिया भर में जाना जाता है। 

शिलांग के पुलिस बाजार की शाम


शाम होने को थी। वैसे भी उत्तर पूर्व में शाम थोड़ा पहले ही हो जाती है। लगभग घंटा भर सुस्ताने के बाद मैं अपने होटल से शिलांग शहर के विख़्यात पुलिस बाजार की सैर हेतु निकल पड़ा। पर्यटकों की आवाजाही के चलते आजकल पुलिस बाजार में अच्छी खासी भीड़ होती है। पुलिस बाजार की मुख़्य विशेषता यहाँ का पटरी बाजार है जो कि पूरी तरह से स्थानीय महिलाओं के हवाले मिलता है। हालांकि यहाँ पर भी तमाम नामी ब्रांडों के बड़े-बड़े शो रुम और दुकाने है, जिनके मालिकान बाहरी लोग है लेकिन आपको उनके शो रुम और दुकानों के बाहर स्थानीय उत्पाद तथा रोजमर्रा की वस्तुएं बेचने हेतु कुर्सी या मोढा लिए बैठी स्थानीय महिलाएं नजर आती हैं जो कि अनायस ही ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। भीड़ भाड़ होने के बावजूद भी यहाँ के माहौल में मैदानी शहरों वाला शोर नहीं होता। पुलिस बाजार में घुमते हुए मुझे थोड़ी ही देर हुई थी कि तेज बारीश शुरु हो गई। अंधेरा होने को था लिहाजा मैने छाता ताना और वापिस होटल आ गया।
शिलांग के इसी होटल में दो रात ठहरना हुआ



सुबह नींद खुली तो चारों तरफ़ खासा उजाला हो चुका था। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। खिड़की से बाहर झाँक कर मौसम के मिजाज की टोह ली तो पता चला कि बाहर अभी भी बारीश बदस्तूर जारी है। क्योंकि कमरे की दीवार पर टंगी घड़ी अभी सुबह के साढे चार ही बजा रही थी लिहाजा मैं निश्चिंत होकर फ़िर से रजाई में जाकर दुबक गया। दूसरी बार जब नींद खुली तो साढे सात बज चुके थे। खिड़की के रास्ते कमरे के फ़र्श पर फ़ैला धूप का एक टुकड़ा मौसम के साफ़ होने की चुगली कर रहा था। बिस्तर से उठ कर बाहर बरामदे में आया तो मौसम के बदले मिजाज से वाकफ़ियत हुई। चटक धूप में हरे भरे पेड़ों के बीच दूर-दूर तक बिखरा शिलांग शहर नजर आ रहा था। ऐसा लग रहा था मानों समूचे शिलांग शहर को, उसके जंगलों समेत बारीश नें धो पोंछ कर धूप के आगे सुखाने को डाल दिया हो। 

शिलांग पीक से शिलांग शहर का एक दृश्य


शिलांग पीक से शिलांग शहर का एक दृश्य
नाश्ते से फ़ारिग होने के बाद शिलांग शहर से उपर की ओर लगभग पंद्रह किलो मीटर घुमावदार सड़क के माध्यम से शिलांग पीक पर पहुँचना हुआ। शिलांग शहर से शिलांग पीक तक के इस छोटे से सफ़र के दौरान रास्ते में हरे भरे जंगल के बीच जहाँ आलू अनुसंधान केंद्र द्वारा उगाए गए आलू के खेत नजर आते हैं वहीं सड़क के बाहरी किनारों पर रेड पाईन के कतार बद्ध पेड़ मन को मोह लेते हैं। ऐसा बताते हैं कि शिलांग का नामकरण इसी शिलांग पीक की वजह से हुआ है। लगभग दो हजार मीटर की ऊँचाई पर स्थित शिलांग पीक को वहाँ की सरकार नें एक पर्यटक स्थल के रुप में विकसित किया है। शिलांग पीक के व्यू पाईंट से खासी पर्वत श्रंखला की पूर्वी पहाड़ियों पर पसरा शिलांग शहर साफ़ नजर आ रहा था। यह अप्ने आप में एक विहंगम दृश्य था। मेजबान बता रहे थे कि मैं खुश किस्मत हूँ अन्यथा मौसम के मिजाज के चलते कई बार यहां आए पर्यटक शिलांग शहर की एक झलक तक नहीं देख पाते। थोड़ी देर शिलांग व्यू पाँईट में रुकने के बाद मैं अगले पड़ाव एलिफ़ेंटा फ़ाल की तरफ़ रवाना हो गया।


शिलांग का एलिफ़ेंटा फ़ाल



शिलांग से लगभग आधे घंटे की दूरी पर, तीन भागों में विभक्त यह झरना उत्तर पूर्व में पर्यटकों का पसंदीदा पर्यटक स्थल है। घने जंगलों के बीच उतरते इस झरने को मेघालय सरकार नें एक आधुनिक पर्यटक स्थल की तर्ज पर विकसित किया है। उपर सड़क के पास एक छोटे से बाजार के अलावा मेघालय पर्यटन विभाग की तरफ़ से यहाँ पर जरुरी जन सुविधाओं की व्यवस्था है। यहाँ साफ़ सफ़ाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सड़क की हद खत्म होने के बाद झरने के साथ-साथ नीचे उतरती सीढियाँ है जो पर्यटकों को अंतिम झरने तक ले जाती है। काली चट्टानों के उपर से कल-कल, छल-छल की मंद-मंद आवाज करते हुए गुजरता सफ़ेद पानी पर्यटकों को रोमांचित करता है। ऐसा लगता है मानो अंधेरे के उपर दूध बह रहा हो।   यहाँ की एक और विशेषता यह है कि यहाँ खासी जनजाति की पौशाकें मय उनके पारंपारिक हथियारों के किराए पर पर्यटकों के लिए उपलब्ध है। एलिफ़ेंटा फ़ाल की यादगार के तौर पर पर्यटक इन जनजातीय पौशाकों में खूब फ़ोटो खिंचवाते है।
वापस होटल लौटते-लौटते तीन चौथाई दिन गुजर चुका था। हालांकि यहाँ घूमने के लिए अभी भी बहुत कुछ बाकी था लेकिन मेरे पास यहाँ के लिए बस एक ही दिन था। थोड़ी देर आराम करने के बाद शाम को मैं फ़िर से शिलांग की सैर के लिए निकल पड़ा। लेकिन जाना कहाँ है, इस बार यह निर्धारित नहीं किया और यूं ही शिलांग शहर की सड़कों के किनारों को पैदल नापता रहा। इस चहल कदमी के दौरान मैने अनुभव किया कि शिलांग एक सफ़ाई पसंद शहर है।   क्षमता से ज्यादा वाहनों के भार से दोहरी सड़को पर कैसे यातायात को अनुशासित किया जाता है यह अन्य पहाड़ी शहरों के व्यस्थापकों को भी यहाँ आकर देखना और सीखना चाहिए। पैदल चलने वालों के लिए अतिक्रमण रहित फ़ुटपाथ इस शहर की एक और खूबी है। पहाड़ के इस व्यस्तम शहर की प्रशासनिक व्यवस्था भी एक दम चाक चौबन्द है। काफ़ी देर इधर उधर घूमने के बाद मैं वापिस होटल लौट आया। 



शिलांग का एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम


प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर शिलांग जिन्दा दिल युवाओं का शहर है। शिलांग को भारत के संगीत की राजधानी भी कहा जाता है। उत्तर के पर्वतीय पर्यटक स्थल नैनीताल की तरह यहाँ भी बहुत सी झीलें है। शिलांग शहर से गुवाहटी को उतरते रास्ते में दसवें मील पर 220 वर्ग किलो मीटर में फ़ैली उमियम झील यहाँ का एक और मुख्य आकर्षण है। शिलांग शहर में मुझे अपने  दो दिन के प्रवास के दौरान बहुत कुछ देख़ने और सीख़ने को मिला।  हालांकि मैं सन 2010 में भी शिलांग और चेरापूंजी की यात्रा कर चुका हूंँ लेकिन पूरब का यह पहाड़ी राज्य हर बार अपने मिजाज में नयापन लिए रहता है। इसका श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो यहांँ के ख़ासी बाशिंदों को जाता है जिन्होने अपनी जनजातीय परंपराओं के साथ दुनिया की हर जीवन शैली का ख़ुले दिल से स्वागत किया और जो उन्हे ख़ुद के लिए ठीक लगा उसे आत्मसात कर लिया। कुल मिलाकर भारत के उत्तर पूर्व की यह पर्वतीय बसासत विविधताओं के धनी देश भारत के समाज और संस्कृति के एक और बे मिसाल रंग से परिचित करवाती है। 

-सुभाष तराण   
        
     










गुरुवार, 17 मई 2018

ग्राम देवता का न्याय


देव भूमि उत्तराख़ण्ड के सुदूर पहाड़ों के एक गाँव की बात है। काँग्रेस राज के दौरान गाँव के दो राजनीतिक रसूख़दारों ने, जो गाँव में पक्ष विपक्ष की अगुवाई करते थे, गाँव सभा के नाम पर सरकारी खर्च के मार्फ़त से हासिल पीने के पानी की एक पाईप लाईन बनाई और दोनो ने मिल कर उस पर कब्जा कर लिया। राजनैतिक प्रतिद्वन्दता के चलते भले ही दोनो एक दूसरे को फ़ूटी आँख़ नहीं सुहाते थे लेकिन इस सरकारी सहायता प्राप्त पाईप लाईन से हासिल पानी के आपस बीच में बंटवारे को लेकर दोनो बहुत ईमानदार थे। उस गाँव के सामर्थ्य विहीन लोग डर, लिहाज और जानकारी के अभाव के चलते उनके इस अवैध कृत्य का प्रतिरोध नहीं कर पाते थे। जबकि राजनीतिक रसूख़दार उस पानी से अपने खेतों और बागीचों को सींच कर किस्म-किस्म के फ़ल और सब्जियाँ पैदा करते और जो पानी बच जाता उसे वे किसी खेतिहर को बेच देते।

एक बार देश के अनेको भागों की तरह गर्मियों के दौरान इस गाँव में भी सूख़े के चलते पीने के पानी की किल्लत हो गयी। गाँव के आम जनों में पानी को लेकर हाहाकार मच गया। दोनों रसूखदारों के अलावा उस गाँव के लोग पीने के पानी को लेकर व्यथित रहने लगे। उसी गाँव में एक कमजोर और लाचार बुढिया भी रहती थी, जिसके दरवाजे के सामने से दोनो में से एक राजनैतिक रसूख़दार के घर की ओर जाने वाली पानी की पाईप लाईन गुजरती थी। पानी की किल्लत के चलते एक दिन बुढिया उस राजनैतिक रसूख़दार के पास गयी और उस से विनती कर कहने लगी कि वृद्धावस्था के चलते वो पानी लेने दूर नहीं जा सकती है। यदि वे कृपा कर उसके दरवाजे के सामने से गुजर रही पानी की पाईप लाईन से दो बाल्टी पीने लायक पानी भरने दें तो वो ग्सेराम देवता से प्रार्थना करेगी कि उसका हमेशा भला होता रहे।

बुढिया की जर्जर हालत और ईश्वर की दुहाई के बावजूद भी राजनीतिक रसूख़दार का दिल नहीं पसीजा। उसने बुढिया को पानी देने से साफ़ इंकार कर दिया। राजनीतिक रसूख़दार की इस निष्ठुरता पर बुढिया को बहुत गहरा आघात पहुँचा। जिस ग्राम देवता और बुढापे का वास्ता देकर बुढिया नें राजनीतिक रसूख़दार से पानी के लिए फ़रियाद की थी उसे वो यूं ही नजर अंदाज कर गया। बुढिया ने पानी के एवज में राजनीतिक रसूख़दार की भलाई हेतु ग्राम देवता का आह्वान किया था । बेचारी बुढिया के पास ले दे कर अब ग्राम देवता का ही भरोसा बचा था। वो रोती बिलख़ती हुई गाँव के मन्दिर की देहरी पर पहुँच गयी। गारे-पत्थर और लकड़ी के मन्दिर में धातु के बने ग्राम देवता के सम्मुख़ बुढिया रो-रो कर उस राजनीतिक रसूख़दार को कोसने लगी।

उसी समय उधर से गुजर रहे सुभाषित नें बुढिया से उसके विलाप का कारण जानना चाहा। बुढिया नें सुभाषित को सारा वृताँत एक साँस में सुना दिया और कहने लगी कि वो ग्राम देवता को भेंट चढा रही है ताकि वो उस राजनीतिक रसूखदार को सबक सिखाएं। बुढिया की बात सुन कर सुभाषित ने उससे पूछा कि वो भेंट स्वरुप ग्राम देवता को क्या चढा रही है। बिना कुछ कहे बुढिया ने अपनी भिंची हुई मुट्ठी खोलते हुए हथेली सुभाषित के सामने कर दी।

हथेली पर रखे एक नए रुपये के सिक्के को देखते हुए सुभाषित ने बुढिया से अगला सवाल किया कि क्या उसे इस बात की जानकारी है कि धातु के जिस ग्राम देवता के आगे वो अपनी फ़रियाद रख रही है उसकी मूर्ती में मढा गया सेर भर चाँदी उसी राजनीतिक रसूख़दार ने दान दिया है जिसने उसे पानी देने से मना किया था। क्या उसे उम्मीद है कि तुम्हारा यह ग्राम देवता सेर भर चाँदी दान करने वाले के खिलाफ़ हो जाएगा और एक रुपये की भेंट चढाने वाले का पक्ष लेगा?

सुभाषित का सवाल सुन कर बुढिया नें अपने आँसू पोंछे, रुपया जेब के हवाले किया और वापिस अपने घर की और चल दी।

गुरुवार, 3 मई 2018

मदारी

डुगडुगी की गड़गड़ाहट हवा में बुलंद हुई तो बाजार की सडक पर गुज़रते राहगीरों का ध्यान अनायस ही उस ओर खिंचता चला गया जहाँ से गड़गड़ाहट की आवाज आ रही थी। डुगडुगी की गड़गड़ाहट का स्रोत एक उम्र दराज़ मदारी था जो एक आठ साला बच्चे तथा दो और मरियल से दिखने वाले युवकों  के साथ सडक किनारे की पटरी पर खडा होकर दिखाए जाने वाले तमाशे की भूमिका बाँध रहा था। मदारी फिलहाल उस आठ साला बच्चे से, जिसे वह जमूरा कह कर संबोधित कर रहा था, डुगडुगी से लय ताल मिलाते हुए सवाल जवाब कर रहा था। जहाँ डुगडुगी की गड़गड़ाहट मदारी और जमूरे की आवाज के उतार चढ़ाव के साथ क़दमताल कर रही थी वहीं मदारी के बाकी दो साथी सामने पटरी पर, जहाँ सडक की हद ख़त्म हो रही थी, चादर के उपर काँच के रंग बिरंगे मर्तबानों को क़रीने से सजाने में मशगूल थे। मदारी नें जमूरे से संवाद जारी रखते हुए अपनी झोली से महाकाली के रौद्र रूप वाली एक तस्वीर निकाली और  उसे बगल में विद्यमान एक दरख़्त के तने पर चस्पा कर दिया। सवाल जवाब की इस फेरहिस्त के दौरान मदारी का हाथ जब अगली बार उस बगल में लटकी झोली से बाहर निकला तो उसके हाथ में मानव मस्तिष्क का एक कंकाल मय दो बिलाथ भर लंबी हड्डियों के साथ था। उसने सावधानी के साथ उन हड्डियों को काली के रौद्र रूप वाली तस्वीर, जो दरख़्त के तने पर चस्पा थी, उसके ठीक नीचे क़रीने से सज़ा कर दिया।

बाजार में यहाँ वहाँ घूमते लोग मदारी, जमूरे के संवाद और डुगडुगी की जुगलबन्दी के चलते जैसे ही उनके इर्द गिर्द बेतरतीब घेरा बनाने लगे, मदारी नें अपनी झोली में एक बार फिर हाथ डाला और इस बार हड्डी और लकड़ी की जुगलबन्दी से बनी छड़ी निकाल कर, इर्द गिर्द  भीड की शक्ल में तब्दील होते लोगों को पीछे धकियाते हुए, उससे अपने बाकी तीनों सहयोगियों के चारों और एक लकीर खैंच कर एक गोल घेरा बना लिया।  सवाल जवाब के दौरान इधर उधर टहलते जमूरे का पैर अचानक उस ताजा खींची लकीर को छू गया। जमूरे का पैर लकीर पर पडते ही महाकाली की तस्वीर के नीचे क़रीने से सज़ा कर रखी गयी इंसानी खोपड़ी और हड्डियों के पास एक मंद विस्फोट हुआ। अचानक में हुए इस मामूली धमाके का ज़ाहिर अंजाम तो मामूली सी चिनगारियाँ और एक पस्त  धुएँ का ग़ुब्बार था लेकिन ये विस्फोट जेहनी तौर पर इक्कट्ठा हो रही भीड को भयभीत कर गया। मदारी नें उस डर को अपने लहजे में लपेट कर तेज़ आवाज से जमूरे को जान के जोखिम की चेतावनी देते हुए उसे खेल ख़त्म होने तक इस लकीर को न लाँघने की चेतावनी के साथ आइंदा से सावधान रहने का फ़रमान सुना दिया। भीड ने, जो थोडी देर पहले कोतहूलवश मदारी और उसके साथियों पर टूट पड़ने को आतुर प्रतीत हो रही थी, धमाके, धुएँ और चिनगारियों के बाद उस लकीर से एक सम्मान जनक दूरी बना कर शान्ति के साथ खड़ी हो गयी। तमाशाई भीड़ भले ही  ख़ड़े होने भर की जगह के लिए एक दूसरे के साथ धक्का मुक्की कर रही थी लेकिन मदारी के कब्जे में इतनी जगह आ चुकी थी कि वे चारों लोग अपने सामान सहित सहूलियत के साथ बेहिचक इधर उधर टहल सकते थे। मरियल से दिखने वाले दोनो युवक अब अपने काम से फ़ारिग़ मालूम पड रहे थे। उनके द्वारा पोटली से निकली अन्तिम वस्तुएं एक गंडासा और एक इमाम दस्ता थी। वे दोनो चुपचाप से उस गोल घेरे के अन्दर एक कोने में जाकर बैठ गए।

जहाँ अभी थोडी देर पहले मदारी और जमूरा अपने सवालों जवाबों में दुनियादारी के तमाम फ़लसफ़ों का ज़िक्र कर रहे थे वहीं अब मदारी जमूरे से सवाल जवाब छोड सामने खडी भीड के मुखातिब हो गया। मदारी की जो बात दुनियादारी के विषयों से शुरू हुई थी वो अब काँच के मर्तबानों में रखी जड़ी बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों पर आ गयी। मदारी के मुताबिक हिमालय के दुरूह पहाडो पर से हासिल की गयी इन जड़ी बूटियों में बडे से बडे असाध्य रोगों को जड़ से ख़त्म करने की ताकत थी। इन जड़ी बुटियों में ताकत केवल रोगों को ख़त्म करने की ही नही, बल्की खोई हुई ताकत हासिल करने की भी ताकत थी। एक सधे हुए हकीम की तरह मदारी नें जरा सी देर में इमाम दस्ते में जड़ी बूटियों को कूट कर कई प्रकार के मिश्रण तैयार कर दिए और उनकी बहुत सी पुडिया बना डाली।  मदारी द्वारा जड़ी बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों की प्रभावशाली प्रस्तुति और उसकी कम कीमत के चलते भीड नें जड़ी बूटी के इस मिश्रण को हाथो हाथ लिया। यह मदारी का ही कमाल था कि उनके चारों ओर खडी भीड पूरी कीमत चुका कर दवा की इन पुड़िया को हासिल करने के लिए अपनी जगह अनुशासित और कतारबद्ध होकर धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। दवा की पुड़िया की एवज में एक माकूल कीमत वसूलते हुए मदारी भीड़ को लगे हाथ मुफ़्त में दुआएं दे भी रहा था।
जड़ी बूटियों से फ़ारिग़ होते ही मदारी नें ताली बजायी तो लकीर के अन्दर कोने में बैठे दोनो मरियल से लड़कों नें काँच के मर्तबान समेटकर पोटली में रखने शुरू कर दिए।

मदारी अपने वक्तव्यों के माध्यम से एक बार फिर भीड को दवा के मसले को पीछे छोड़ दुनियादारी के फ़लसफ़े बताने लगा। वह बात कर ही रहा था कि तभी पेड़ के तने पर चस्पा महाकाली की तस्वीर के नीचे रखी खोपड़ी और हड्डियों के बीच एक ओर मामूली सा विस्फोट हुआ। यह विस्फोट पिछली बार के मुक़ाबले थोडा तेज़ था।  अचानक हुए विस्फोट से हँसते बतियाते मदारी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी। वो तेज़ी से उस ओर पलटा और जमीन पर पडे गंडासे को उठाकर अपनी हथेली में पेवस्त कर दिया। मुट्ठी के अन्दर दबे गंडासे की मूठ से खून की धार बहने लगी। मदारी चेहरे पर दर्दनाक भाव भंगिमाएँ ओढ़ते हुए महाकाली की तस्वीर की ओर बढ़ा और हथेली से निकलते लहू को उन हड़्ड़ियों पर टपका दिया।

लेकिन यह क्या! धुआँ उगलती हड्डियों पर खून की बूँदे टपकते ही उससे आग की लपटें उठने लगी। मदारी ने बिलबिलाते हुए जमूरे का आह्वान किया। मदारी की बौखलाहट और खून टपकने पर लपटें उगलती हड्डियों को देखकर तमाशाई भीड के बीच सन्नाटा पसर गया। लपटों के तेज होने पर मदारी ने रूँधी आवाज में भीड को सुनाते हुए जमूरे से कहने लगा कि तमाशाई भीड के बीच किसी व्यक्ति नें महाकाली के दरबार में विघ्न डाल दिया है लिहाज़ा इस पृथ्वी पर कभी भी प्रलय आ सकती है। एक मंजे हुए कलाकार की तरह संवादों की अदायगी करते हुए जमूरे ने जब इस प्रलय रोकने का उपाय जानना चाहा तो मदारी ने कहा कि अभी के अभी महाकाली के सामने एक इंसानी बलि चढ़ानी होगी। मदारी गिड़गिड़ाते हुए दयनीय भाव के साथ एक बार फ़िर जमूरे से मुखातिब हुआ और कहने लगा कि क्या वह इस ब्रह्माण्ड़ को बचाने के लिए खुद की क़ुर्बानी दे सकता है। अपने नाक ख़ुजाते हुए किसी प्रशिक्षित पालतू की तरह जमूरे नें बिना देर किए हाँ कह दी।
मदारी नें बिना देर किए गंडासा उठाया और उसे जमूरे की गरदन पर रख कर खैंच दिया। जमूरा जमीन पर गिर कर छटपटाने लगा और उसके गरदन के आस पास ख़ून उबलने लगा।

हड़्ड़ियों से उठती लपटें अचानक शान्त होने लगी। भीड़ सतब्ध थी। छटपटाते लड़के की गरदन पर धंसे गंडासे को देखकर भीड़ के बीच में बहुत से लोगों के मुँह से घुटी हुई चीख़ें फ़ूट पड़ी। छटपटाते जमूरे को अपनी आड़ में लेकर अचानक मदारी जोर से चिल्लाया।

'सब लोग अपनी-अपनी मुट्ठियाँ ख़ोल दें, बच्चा आपके लिए तकलीफ़ उठा रहा है'।

भीड़ ने तत्काल से मदारी के हुक्म की तामील की।

मदारी एक बार फ़िर अपनी आवाज में आस पास के भय को मिलाते हुए दहाड़ा,

-क्या आप लोगों की हथेलियों में पसीना आ रहा है? –

भयभीत भीड़ नें मदारी द्वारा उछाले गए सवाल के जवाब में सामुहिक रुप से हाँ में सर हिला दिया। 
मदारी ने भीड़ से मिले मन माफ़िक जवाब की एवज में अपने चेहरे पर उम्मीद की परत ओढते हुए भीड़ के बीच एक ओर जुमला छोड़ा,

'हमे इस नीरीह बालक की जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए',

भीड़ ने कुछ इस तरह से दर्दमन्द आवाज में हामी भरी मानों गंड़ासा उनकी गर्दन में घँसा हुआ हो।

अब भीड़ के हाव भाव देख कर मदारी का लहजा आदेशात्मक हो गया। इस बार किसी जवाब की अपेक्षा किए बिना मदारी ने भीड़ के समक्ष एक चेतावनी के साथ इस जानलेवा समस्या का समाधान परोस दिया।  

-बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बशर्ते आप लोगों की जेब में जो कुछ हो उसे सामने पड़ी चादर पर डाल दिया जाए, वर्ना इस मासूम बच्चे की हत्या आप लोगों के सर होगी।–

दोनो मरियल से युवक, जो अब तक एक कोने में ख़ड़े थे, बिना किसी आदेश के चादर फ़ैला कर सहमी हुई भीड़ के सम्मुख़ हो लिए।

मदारी एक बार फ़िर गरजा

'बच्चे की जान का सवाल है, हम रहमदिल मुल्क के बाशिन्दे है। मुझे उम्मीद है आप बच्चे की जान बचाने के लिए ईमानदारी दिखाएंगे।'

पूरी तरह से मदारी के काबू में डरी सहमी भीड़ दत्त चित होकर दवा ख़रीदने के बाद ख़ीसे में पड़ा बचा हुआ पैसा चादर पर डालने लगी।

यह दौर ख़त्म होने ही था कि अचानक भीड़ के बीच एक आदमी मुँह से ख़ून उलटता हुआ मदारी की ओर लड़ख़ड़ाते हुए बढने लगा। मदारी ने हाथ के इशारे से उसे वहीं रुकने का हुक्म दिया। लड़ख़ड़ाते हुए गिरने को हो रहे उस आदमी ने अपनी जेब में हाथ ड़ाला और एक दस का नोट मदारी की तरफ़ उछाल दिया और वहाँ का वहीं धराशायी हो गया।
मदारी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान फ़ैल गयी। मदारी बैचेन और विकल भीड़ को चेतावनी स्वरुप जमीन पर पड़े आदमी की ओर इशारा करते हुए भीड़ को संबोधित करने लगा।

'देख लिए आपने बेईमानी के नतीजे। यह पहली चेतावनी है। जिसकी जेब में जो कुछ है वो चुपचाप उसे चादर पर डाल दें। दस मिनट का समय दे रहा हूँ। अगर किसी नें कोताही बरती तो उसका हश्र बिलकुल ऐसा ही होगा जैसा इस सामने पड़े आदमी का हुआ है।'

मरियल से दिखने वाले उन युवकों ने एक बार फ़िर भीड़ के सामने चादर फ़ैला दी। मन्त्रमुग्ध भीड़ के बीच से फ़ैली चादर पर सिक्कों और नोटों की बरसात होने लगी।
चादर मय उस पर पड़े रुपयों के एक पोटली की शक्ल में मदारी के हाथ में आ गयी। मदारी ने ख़ेल ख़त्म होने की घोषणा कर दी।जमूरा जो थोड़ी देर पहले जमीन पर पड़ा छटपटा रहा था, उठ कर ख़ड़ा हो गया। जमीन पर ख़ून की उल्टियाँ करते हुए गिरा आदमी उठ कर भीड़ में घुस कर गायब हो गया । सारा बिखरा सामान लपेटने के बाद मदारी, जमूरा और उसके दोनो मरियल से साथी आरक्षित जगह पर भीड़ के सामने पंक्तिवद्ध होकर ख़ड़े हो गए और भीड़ से मुखातिब होते हुए एक नारा लगाया।
"भारत माता की जय"
सहमी हुई भीड़ ने डर और व्याकुलता के बीच अपना बचा ख़ुचा जोश इक्कट्ठा करते हुए एक सामुहिक उद्घोष किया।

"भारत माता की जय।"