दिल्ली से सुबह साढे नौ बजे चली एयर इंडिया की उड़ान संख़्या 889 भले ही अपने सही समय पर गुवाहटी के लोक प्रिय गोपीनाथ बोरदोलई हवाई अड्डे पर उतर गई थी लेकिन वहाँ से बाहर निकलते-निकलते दिन का पूरा एक बज चुका था। हवाई अड्डे की हद पार करते ही नाम की तख़्ती लिए ख़ड़ा एक व्यक्ति सामने नजर आया तो मैने मुस्कुरा कर उसका इस्तकबाल किया। उसने बड़ी गर्म जोशी के साथ हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया। गाड़ी तक पहुँचने तक हम दोनो एक दूसरे से काफ़ी परिचित हो चुके थे। पेशे से ड्राईवर देब ज्योति गुवाहटी शहर का रहने वाला था। यहाँ के बाद हमारा अगला पड़ाव शिलांग था। देब ज्योति ने बताया कि यहाँ से शिलांग शहर तक पहुँचने में हमे लगभग 3 घंटे का समय लगेगा। बिना देर किए हम लोग हवाई अड़्डे से गुवाहाटी शहर को बाई पास करते हुए शिलांग की ओर दौड़ पड़े। गुवाहाटी शहर की हद खत्म हुई ही नहीं थी कि तभी देब ज्योति नें बताया कि सड़क के दूसरी ओर मेघालय का क्षेत्र शुरु हो चुका है। गुवाहाटी से शिलांग को जोड़ने वाला चार लेन का यह राष्ट्रीय राज मार्ग खानापारा से बर्नीहाट तक असम और मेघालय का सीमांकन भी करता है।
गुवाहाटी
से शिलांग की तरफ़ जाते हुए जोराबाट से पहाड़ शुरु हो जाते है लेकिन यहाँ के पहाड़ भारत
में पड़ने वाले उत्तरी हिमालय के पहाड़ों से भिन्न है। जहाँ उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्र
भुरभूरे और वनस्पति विहीन होते जा रहे हैं वहीं मेघालय की इन पहाड़ियों को देख़ कर ऐसा
लगता है मानो इन्होने सदा बहार जंगलों की हरियाली ओढ रखी हों। मेरे लिए पहाड़ी रास्तों
पर एक अच्छी सड़क पर सफ़र करना किसी सपने के सच होने जैसा है। लगभग एक घंटे चलने के बाद
हल्की भूख महसूस हुई तो देब ज्योति नें सुझाव दिया कि रास्ते में फ़ल खाए जा सकते हैं।
बर्नीहाट से थोड़ा उपर चढने के बाद एक बड़े से मोड़ पर एक फ़ल विक्रेता का खोमचा नजर आया
तो देब ज्योति नें गाड़ी रोक दी। हमने खोमचे वाले से दो जनो के खाने भर के केले, खीरे
और अन्नानास खरीदे। उसनें तल्लीनता के साथ खरीदे गए फ़लों को करीने से काटा और फ़िर तश्तरियों
में सजा कर, नकम, मिर्च और स्थानीय मसालों से बने पेस्ट के साथ हमारे आगे परोस दिया।
| गुवाहटी से शिलांग के रास्ते पर |
जंगल
के बीचों बीच से गुजरती सड़क के किनारे बने इस ख़ोमचे में बैठने की कोई जगह नहीं थी।
इधर उधर नजर दौड़ाई तो खोमचे के पास ही सड़क के बाहरी किनारे पर बने पेराफ़िट्स पर नजर
पड़ी। हमने एक पेराफ़िट पर अखबार बिछाया और ताजा कटे फ़लों की तश्तरियों को बीच में रख
कर उस पर आसन जमा लिए। फ़लों और स्थानीय मसालों की जुगलबंदी अद्भुत थी। इस समय महसूस
हो रही भूख के लिए यह आदर्श भोजन था। फ़लाहार से फ़ारिग होने के बाद हम फ़िर से अपने गंतव्य
की तरफ़ हो लिए। अगले दो घंटों के दौरान मोड़ दर मोड़ पार करते हुए हम लोग पूरब के स्काट
लैंड शिलांग शहर में थे। शिलांग मेघों के घर मेघालय की राजधानी के अलावा पूर्वी
खासी हिल्स जिले का मुख्यालय भी है। उन्नीसवीं सदी के उतरार्द्ध के दौरान अस्तित्व में आया यह पर्वतीय शहर आज की तारीख़ में पेड़ों, पहाड़ों, झीलों, झरनों और गुफ़ाओं
के लिए दुनिया भर में जाना जाता है।
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| शिलांग के पुलिस बाजार की शाम |
शाम
होने को थी। वैसे भी उत्तर पूर्व में शाम थोड़ा पहले ही हो जाती है। लगभग घंटा भर सुस्ताने
के बाद मैं अपने होटल से शिलांग शहर के विख़्यात पुलिस बाजार की सैर हेतु निकल पड़ा।
पर्यटकों की आवाजाही के चलते आजकल पुलिस बाजार में अच्छी खासी भीड़ होती है। पुलिस बाजार
की मुख़्य विशेषता यहाँ का पटरी बाजार है जो कि पूरी तरह से स्थानीय महिलाओं के हवाले
मिलता है। हालांकि यहाँ पर भी तमाम नामी ब्रांडों के बड़े-बड़े शो रुम और दुकाने है,
जिनके मालिकान बाहरी लोग है लेकिन आपको उनके शो रुम और दुकानों के बाहर स्थानीय उत्पाद
तथा रोजमर्रा की वस्तुएं बेचने हेतु कुर्सी या मोढा लिए बैठी स्थानीय महिलाएं नजर आती
हैं जो कि अनायस ही ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। भीड़ भाड़ होने के बावजूद भी यहाँ के
माहौल में मैदानी शहरों वाला शोर नहीं होता। पुलिस बाजार में घुमते हुए मुझे थोड़ी ही
देर हुई थी कि तेज बारीश शुरु हो गई। अंधेरा होने को था लिहाजा मैने छाता ताना और वापिस
होटल आ गया।
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| शिलांग के इसी होटल में दो रात ठहरना हुआ |
सुबह
नींद खुली तो चारों तरफ़ खासा उजाला हो चुका था। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। खिड़की से बाहर
झाँक कर मौसम के मिजाज की टोह ली तो पता चला कि बाहर अभी भी बारीश बदस्तूर जारी है।
क्योंकि कमरे की दीवार पर टंगी घड़ी अभी सुबह के साढे चार ही बजा रही थी लिहाजा मैं
निश्चिंत होकर फ़िर से रजाई में जाकर दुबक गया। दूसरी बार जब नींद खुली तो साढे सात
बज चुके थे। खिड़की के रास्ते कमरे के फ़र्श पर फ़ैला धूप का एक टुकड़ा मौसम के साफ़ होने
की चुगली कर रहा था। बिस्तर से उठ कर बाहर बरामदे में आया तो मौसम के बदले मिजाज से
वाकफ़ियत हुई। चटक धूप में हरे भरे पेड़ों के बीच दूर-दूर तक बिखरा शिलांग शहर नजर आ
रहा था। ऐसा लग रहा था मानों समूचे शिलांग शहर को, उसके जंगलों समेत बारीश नें धो पोंछ
कर धूप के आगे सुखाने को डाल दिया हो।
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| शिलांग पीक से शिलांग शहर का एक दृश्य |
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नाश्ते
से फ़ारिग होने के बाद शिलांग शहर से उपर की ओर लगभग पंद्रह किलो मीटर घुमावदार सड़क
के माध्यम से शिलांग पीक पर पहुँचना हुआ। शिलांग शहर से शिलांग पीक तक के इस छोटे से
सफ़र के दौरान रास्ते में हरे भरे जंगल के बीच जहाँ आलू अनुसंधान केंद्र द्वारा उगाए
गए आलू के खेत नजर आते हैं वहीं सड़क के बाहरी किनारों पर रेड पाईन के कतार बद्ध पेड़
मन को मोह लेते हैं। ऐसा बताते हैं कि शिलांग का नामकरण इसी शिलांग पीक की वजह से हुआ
है। लगभग दो हजार मीटर की ऊँचाई पर स्थित शिलांग पीक को वहाँ की सरकार नें एक पर्यटक
स्थल के रुप में विकसित किया है। शिलांग पीक के व्यू पाईंट से खासी पर्वत श्रंखला की
पूर्वी पहाड़ियों पर पसरा शिलांग शहर साफ़ नजर आ रहा था। यह अप्ने आप में एक विहंगम दृश्य
था। मेजबान बता रहे थे कि मैं खुश किस्मत हूँ अन्यथा मौसम के मिजाज के चलते कई बार
यहां आए पर्यटक शिलांग शहर की एक झलक तक नहीं देख पाते। थोड़ी देर शिलांग व्यू पाँईट
में रुकने के बाद मैं अगले पड़ाव एलिफ़ेंटा फ़ाल की तरफ़ रवाना हो गया।
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| शिलांग का एलिफ़ेंटा फ़ाल |
शिलांग
से लगभग आधे घंटे की दूरी पर, तीन भागों में विभक्त यह झरना उत्तर पूर्व में पर्यटकों
का पसंदीदा पर्यटक स्थल है। घने जंगलों के बीच उतरते इस झरने को मेघालय सरकार नें एक
आधुनिक पर्यटक स्थल की तर्ज पर विकसित किया है। उपर सड़क के पास एक छोटे से बाजार के
अलावा मेघालय पर्यटन विभाग की तरफ़ से यहाँ पर जरुरी जन सुविधाओं की व्यवस्था है। यहाँ
साफ़ सफ़ाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सड़क की हद खत्म होने के बाद झरने के साथ-साथ
नीचे उतरती सीढियाँ है जो पर्यटकों को अंतिम झरने तक ले जाती है। काली चट्टानों के
उपर से कल-कल, छल-छल की मंद-मंद आवाज करते हुए गुजरता सफ़ेद पानी पर्यटकों को रोमांचित
करता है। ऐसा लगता है मानो अंधेरे के उपर दूध बह रहा हो। यहाँ की
एक और विशेषता यह है कि यहाँ खासी जनजाति की पौशाकें मय उनके पारंपारिक हथियारों के
किराए पर पर्यटकों के लिए उपलब्ध है। एलिफ़ेंटा फ़ाल की यादगार के तौर पर पर्यटक इन जनजातीय
पौशाकों में खूब फ़ोटो खिंचवाते है।
वापस
होटल लौटते-लौटते तीन चौथाई दिन गुजर चुका था। हालांकि यहाँ घूमने के लिए अभी भी बहुत
कुछ बाकी था लेकिन मेरे पास यहाँ के लिए बस एक ही दिन था। थोड़ी देर आराम करने के बाद
शाम को मैं फ़िर से शिलांग की सैर के लिए निकल पड़ा। लेकिन जाना कहाँ है, इस बार यह निर्धारित
नहीं किया और यूं ही शिलांग शहर की सड़कों के किनारों को पैदल नापता रहा। इस चहल कदमी
के दौरान मैने अनुभव किया कि शिलांग एक सफ़ाई पसंद शहर है। क्षमता से
ज्यादा वाहनों के भार से दोहरी सड़को पर कैसे यातायात को अनुशासित किया जाता है यह अन्य
पहाड़ी शहरों के व्यस्थापकों को भी यहाँ आकर देखना और सीखना चाहिए। पैदल चलने वालों
के लिए अतिक्रमण रहित फ़ुटपाथ इस शहर की एक और खूबी है। पहाड़ के इस व्यस्तम शहर की प्रशासनिक
व्यवस्था भी एक दम चाक चौबन्द है। काफ़ी देर इधर उधर घूमने के बाद मैं वापिस होटल लौट
आया।
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| शिलांग का एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम |
प्राकृतिक
सौंदर्य से भरपूर शिलांग जिन्दा दिल युवाओं का शहर है। शिलांग को भारत के संगीत की
राजधानी भी कहा जाता है। उत्तर के पर्वतीय पर्यटक स्थल नैनीताल की तरह यहाँ भी बहुत सी
झीलें है। शिलांग शहर से गुवाहटी को उतरते रास्ते में दसवें मील पर 220 वर्ग किलो मीटर में फ़ैली
उमियम झील यहाँ का एक और मुख्य आकर्षण है। शिलांग शहर में मुझे अपने दो दिन के प्रवास के दौरान बहुत कुछ देख़ने और सीख़ने को मिला। हालांकि मैं सन 2010 में भी शिलांग और चेरापूंजी की यात्रा कर चुका हूंँ लेकिन पूरब का यह पहाड़ी राज्य हर बार अपने मिजाज में नयापन लिए रहता है। इसका श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो यहांँ के ख़ासी बाशिंदों को जाता है जिन्होने अपनी जनजातीय परंपराओं के साथ दुनिया की हर जीवन शैली का ख़ुले दिल से स्वागत किया और जो उन्हे ख़ुद के लिए ठीक लगा उसे आत्मसात कर लिया। कुल मिलाकर भारत के उत्तर पूर्व की यह पर्वतीय बसासत विविधताओं के धनी देश भारत के समाज और संस्कृति के एक और बे मिसाल रंग से परिचित करवाती है।
-सुभाष तराण












