सोमवार, 19 मार्च 2018

मैं हाशिए पर के पहाड से बोल रहा हूँ



फ़तेह पर्वत मेरे लिए बचपन से ही आकर्षण का विषय रहा है। जिस टौंस नदी के किनारे मेरा गाँव है उसकी एक सहायक नदी रूपिन फ़तेह पर्वत से होकर आती है। बचपन के दौरान बडे-बूढ़ों से सुनी गयी हिम-मानव येति की काल्पनिक कहानियाँ और पशुपालकों की जीवटता के सच्चे क़िस्से अब भले ही समृति पटल पर धुँधले हो चुके हो लेकिन वे मुझे आज भी रोमांचित करते है। मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि इन किस्से-कहानियों का स्रोत फ़तेह पर्वत का यही क्षेत्र था। 

विश्व पटल पर बह रही नदियाँ पानी ही बहा कर नही लाती, वे आदि काल से सभ्यताओं और संस्कृतियों के एक दूसरे तक पहुँच बनाने का एक माध्यम भी रही है। संपूर्ण हिमालय की तलहटियों से दुरूह तिब्बत की ओर जाने वाले सभी व्यापारिक मार्ग ऐसी ही नदियों की वजह से वजूद में आ पाये थे। आज संचार और परिवहन के अत्याधुनिक साधनों नें दुनिया भर के एक बडे तबके को भले ही बहुत क़रीब ला दिया हो लेकिन एक जमाने में नदियों नें समन्दर और समन्दर ने सारी दुनिया को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया। 



क्योकि फ़तेह पर्वत के लिए एक रोज बाद निकलना था इसलिए ज़रूरी पारिवारिक कारणों के चलते मैने उसी दिन शाम को हरबर्टपुर जाना तय किया। लेकिन हमख्याल मित्रों के आग्रह पर उस रात देहरादून में ही पडाव डाला गया। मित्र रतन सिंह और विजयपाल की प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में किसी नौकरशाह से मुलाक़ात पहले से तय थी इसलिए मैं अल-सुबह ही हरबर्टपुर के लिए निकल पडा। यह पहले से ही तय था कि अगली मुलाक़ात दोपहर के आस पास यमुना पुल पर होगी। रतन सिंह और विजयपाल वाया मसूरी और मैं वाया विकास नगर होते हुए लगभग दो बजे के आस पास यमुना पुल पर फिर एक साथ हो लिए। 



यमुना पुल के मछली भात की शानदार खुराक के बाद जौनसार और जौनपुर की सीमा बनाती यमुना के किनारे-किनारे आगे का सफर शुरू किया गया। सफर के दौरान सडक के दूसरी ओर उपर में जहाँ जौनसार के भव्य गाँव नजर आते हैं वहीं निचले क्षेत्र में बंजर और वीरान हो रहे खेड़े मंज़रों को भी नजर अंदाज़ नही किया जा सकता। इस ओर के क्षेत्र, जहाँ हम सडक के मार्ग से जा रहे थे, जो यमुना पुल के बाद जौनपुर और फिर आगे जाकर रंवाई हो जाता है, उस पूरे क्षेत्र में एक जमाने के खेड़े-मंज़रों ने अब बेतरतीबी और अव्यवस्थित क़स्बों की शक्ल अख़्तियार कर ली है। आधुनिक भारत के अर्द्ध शिक्षित बाज़ार सामाजिक तौर पर व्यक्तिगत नफ़े और सार्वजनिक नुक़सान के जीते जागते उदाहरण है। यमुना घाटी के इन खेड़े-मंज़रों की सीमित खेती बाड़ी में अब अनाज की बजाय कंकरीट के भीमकाय मकान उगाए जा रहे है। यमुनोत्तरी मार्ग पर पडने वाले इन क़स्बों पर जहाँ आपको उगलियों पर गिने जाने वाले ठेकेदारों-साहूकारों की बेतरतीब बनी भव्य अट्टालिकाएं देखने को मिलती है वहीं बडी मात्रा में खेती और पशुपालन से विमुख स्थानीय श्रम जीवियों की भावी पीढ़ियाँ आपको इन बाज़ारों में बेमक़सद भटकती मिल जाएगी। यदि आप साथ के साथ एक नजर बगल में बह रही यमुना पर बनाए रख पाएँ तो कई स्थानों पर लोग डाइनामाइट के भयानक विस्फोटक कर मछलियों का अवैध शिकार करते नजर आ जाएँगे। पिछली बार कंसेरू में हुई गोष्ठी के दौरान जब इस रास्ते से गुज़रते हुए नौगाँव से थोडा पहले गंगाणी के पास नदी में डाइनामाइट का धमाका हुआ तो मैं भी मय साथियों के गाडी को किनारे खड़ा कर तमाशाई भीड का हिस्सा हो गया। थोडी देर में एक युवक हमारे पास आया और एक हाथ में डाइनामाइट की छड़ और दूसरे हाथ में डेटोनेटर लहराते हुए कहने लगा, 
'सौ रूपये में दो फ़ायर, जितनी मछली मिलेगी, आपकी क़िस्मत, नदी में फ़ायर झौंकने और मछली पकड़ने का ज़िम्मा मेरा।' 
डाइनामाइट की छड़ को देख कर मैं सिहर गया। अतीत में घटी एक दुर्घटना याद हो आयी जब इसी तरह से मछली मारने के चक्कर में मेरे एक बचपन के मित्र का हाथ आधी बाज़ू समेत उड़ गया था। मैं उसे अपने अतीत की घटना से अवगत करवाना चाहता था लेकिन वो मुझे अनसुना कर वहाँ खड़े दूसरे लोगो के मुख़ातिब हो गया। 




नौगाँव पहुँचते पहुँचते शाम होने को थी। अब पुरोला की ओर जाने के लिए यमुना पार कर कमल नदी के किनारे किनारे आगे बढ़ना था। हम नौगाँव बाज़ार पार कर नीचे यमुना पर बने पुल पर पहुचे तो नजर यकायक यमुना के रौखड पर गयी जहाँ जमीन को उधेड़ने वाली एक भारी भरकम मशीन मय ट्रैक्टरों और ट्रकों के खनन में जुटी हुई थी। इस खनन के बारे में पता करना बेमानी था क्योकि सरकार पहले ही क़बूल  कर चुकी है कि नदियों की सफ़ाई होते रहनी चाहिए। इसलिए शायद नौगाँव में यमुना के रौखड पर यह सफ़ाई अभियान भी  सरकार की ईच्छानुरूप चल रहा होगा। बहरहाल हम कमल नदी के किनारे आगे बढ़े तो रास्ते में पडने वाले गाँवो के उपजाऊ खेतों में मटर के ताज़ा उगे अंकुर शाम के पटल पर एक और रंग बिखेर रहे थे। पुरोला पार करते-करते धुँधलका हो गया था लेकिन फिर भी लाल चावल के लिए मशहूर रामा सेराँई घाटी के सीढीदार खेतों की दूर तक फैली श्रंखलाएँ, चाँदनी के टिमटिमें उजाले में साफ़ नजर आ रही थी। साफ़ आसमान में चाँद के पुर-शबाब होने पर यह सबकुछ विहंगम लग रहा था। मौके की नज़ाकत सबसे पहले शौक़िया फ़ोटोग्राफ़र मित्र रतन सिंह ने भाँप ली। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरत-फुरत अपना केमरा निकाल लिया। हम भी सडक किनारे बैठ कर तबियत से कुदरत के इस हसीन नज़ारे की नजर फरोशी करने लगे और जितना हो सका, इन नज़ारों को अपने जेहन में समेट लिया और आगे बढ गये। 



रात जरमोला के डाक बंगले में गुज़ारने के बाद अगले रोज आगे का बाकी बचा सफर शुरू किया गया। 

अगला पडाव मोरी था। 

उत्तरकाशी जिले की इस अंतिम तहसील की सीमाएँ जहाँ गृह प्रदेश के जिला देहरादून की त्यूनी तहसील से लगती हुई है वहीं यह तहसील राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल के जिला शिमला और किन्नौर से भी अपनी सीमाएँ साझा करती है। लगे हाथ मोरी में चाय के दौरान हमने ढाबे वाले से लगभग दो किलो वज़नी रैनबो ट्राऊट का सौदा कर डाला। सनद रहे कि समान भौगोलिक परिस्थिति वाले पड़ौसी प्रदेश हिमाचल के मनाली तथा इस ऊँचाई के अन्य क्षेत्रों में ट्राऊट मछली का उत्पादन और शिकार वहाँ की सरकार द्वारा स्थानीय निवासियों के कल्याण हेतु एक परियोजना के तहत किया जा रहा है। लेकिन यहाँ इस तरह की योजनाओं से परहेज़ किया जाता है। मोरी से बिथरी जाने के लिए भाड़े पर जीप का इंतज़ाम किया गया। हर की दून तक पहुँच मार्ग में स्थित होने के कारण मोरी से नैटवाड तक का रास्ता तो थोडा बहुत ठीक है लेकिन नैटवाड से बिथरी तक का रास्ता बस रास्ता भर है। स्थानिकों के हितो की दुहाई देते हुए ठेकेदार जन प्रतिनिधियों के मुनाफ़े को मद्देनज़र रखकर हाल के वर्षों में बनी ये सड़के नव आगंतुकों के लिए एक जोखिम भरा अनुभव हो सकती है लेकिन पर्वत के इन वाशिन्दो के लिए, जो हाल के वर्षों तक इन मैराथन रास्तों को क़दम दर कदम नापते थे, यह नाम मात्र की सड़के किसी वरदान से कम नही है और अब इन सड़कों पर सफर करना इनकी दिनचर्या का एक हिस्सा भर है। 

नैटवाड में भारी भरकम नाश्ता करने के बाद हम बिथरी की ओर हो लिए। गोविन्द वन्य पशु अभयारण्य की सीमा पर स्थापित बैरियर पर खड़े जंगलात के मातहत नें नज़र भर कर हमारी गाडी की जामा तलाशी ली। यहाँ से फ़ारिग़ होकर थोडा आगे बढ़ते ही टोंस का उद्गम स्थल नैटवाड का गाँव आ गया। यह गाँव भले ख़स्ता हाल हो किन्तु ग्राम देवता के मन्दिर का जिर्णोदार तस्सली बख़्श किया गया है। सरसरी तौर पर इस गाँव की स्थिति देख कर इस नतीजे पर बडी आसानी के साथ पहुचा जा सकता है कि जन सरोकारो की बजाय मठों-मस्जिदों और मन्दिरों की खैर ख्वाही को अपना दीनों-ईमान समझने वाले जन प्रतिनिधि समाज को किस ओर लेकर जाना चाहते हैं। 

टौंस के अस्तित्व को अविरल जल राशी प्रदान करने वाली उसकी सहायक नदियाँ रूपिन और शुपिन यहाँ अस्तित्वविहीन हो जाती है। जहाँ शुपिन हर की दून ओर से आती है वहीं रूपिन फ़तेह पर्वत की घाटी से। नैटवाड से हम लोग उबड-खाबड़ सडक पर रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ने लगे। लगभग ५ किलोमीटर के बाद सडक ने रूपिन का किनारा छोड़कर फ़तेह पर्वत पर उपर की और बढ़ना शुरू कर दिया। रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ते हुए जहाँ स्थानीय वातावरण में उगने वाले पेड़ एव वनस्पतियाँ बहुतायत में नजर आ रहे थे वहीं फ़तेह पर्वत पर उपर की ओर बढ़ते हुए एक छत्र चीड नजर आ रहा था। थोडा आगे बढ़ने के बाद इस दुर्गम मार्ग पर गाँव बस्तियों के आस पास को छोड़कर लगभग सारा क्षेत्र जंगल विहीन नजर आता है। लेकिन यह देखकर अच्छा लगा कि आस पास दिखने वाले गाँवो के अधिकतर खेतों में पारम्परिक फसलों की जगह सेब के बाग़ीचे लगाए जा रहे है। नैटवाड से लगभग दो घंटे की रोमांचकारी ड्राइव के बाद हम बिथरी गाँव में थे। दिन के तकरीबन दो बजने को हो रहे थे। आसमान साफ़ था और चटक धूप खिल रही थी लेकिन सडक के किनारे लगे नल का पानी, जो बेमक़सद जमीन पर बह रहा था, बर्फ़ बनकर जम गया था। वातावरण में हल्की धूल मालूम हो रही थी। गाडी से उतरते ही गाँव के नौनिहालों नें बडे कौतूहल के साथ हमारा इस्तक़बाल किया। हमे जिन सज्जन के घर जाना था, उनके बारे में मालूमात की गयी तो पता चला कि वो लकड़ियाँ काटने जंगल गये है। बहरहाल, गाँव के सामुदायिक आँगन में, जो ग्राम देवता के मन्दिर के सामने था, आसन जमा लिए गये। हम में से कुछ लोग जो आस्थावान थे, उन्होंने ग्राम देवता के दर्शन कर भेंट-पूजा की और जो कुछ मेरे जैसे नास्तिक थे वे बिथरी गाँव की प्रकृतिक छटा को निहारने में ध्यानमग्न हो गये। 

थोडी देर में हमारे इर्द गिर्द बच्चो के साथ साथ कुछ युवाओं और बुज़ुर्गों का जमावड़ा लग गया। बावजूद सर्द मौसम के जहाँ कुछ एक गिने चुने युवा आधुनिक जींस और जैकेट पहने नजर आ रहे थे, वहीं बाकी के लोग, जो अपनी दिन चर्या में व्यस्त थे, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग सभी शामिल थे, अपनी पारंपरिक वेशभूषा में देखे जा सकते थे। यहाँ के बाशिन्दों के रहन सहन से आधुनिकता अभी कोसों दूर है। गाँव में सामुदायिक नल के लिए बनी पानी की टंकी और स्कूल की जर्जर सरकारी इमारत के अलावा इस गाँव में सरिए- सीमेंट का इस्तेमाल नगण्य है। पारंपरिक तरीक़ों से बने घर-मकान को देखकर ही इनकी जीवटता और जूझारूपन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे इस ऊँचाई पर मानव सभ्यताओं नें खुद के अस्तित्व को बरक़रार रखा। यह बात दीगर है कि देश और दुनियाँ भर के सेठों के कारख़ानों से उगले जा रहे धुँए और सरकार की साहूकार परस्त नीतियाँ इन ईलाकों को जल्द ही मानव विहीन कर देगी। मामूली से परिचय के बाद ये युवा हम से घुल मिल गये। जब उन्हे पता चला कि हमें अमुक व्यक्ति से मिलना है तो उन्होंने हमे जंगल की ओर ले चलने का सुझाव दे डाला। 

हम ३ बजे के आसपास, लगभग १० हज़ार फ़िट की ऊँचाई पर स्थित इस गाँव से उपर देवदार के जंगल की ओर जा रहे थे। थोड़ी सी चहलक़दमी हमे धार के दूसरी ओर ले गयी। वहाँ का नज़ारा बहुत दिलकश था। हम लोग धार को छोड़ते हुए एक कटोरे के आकार के मैदान, जो एक प्रकृतिक तालाब का अवशेष है, के उस छोर पर विस्मृत होकर खड़े थे जहाँ उपर की ओर भरे पूरे नीले आसमान के अलावा देवदार के हष्ट पुष्ट जंगल से पहले सेब के बाग़ीचों की एक भरपूर श्रंखला विद्यमान थी और नीचे नदी घाटी तक पालतू पेड़ों के जत्थों के बीच नजर आ रहे गाँव और वृक्ष विहीन नंगी ढलाने मौजूद थी। सामने नजर आ रहे रूपिन पास के ग्लेशियरों से होकर आती सर्द किन्तु नम हवा ने दिलो दिमाग़ को तरो ताज़ा कर दिया था। मामूली सी दूरी पर देवदार के पेड़ों की अनुशासित भीड बर्फ़ की सुफ़ैदियों के माध्यम से अपने ईलाके की तसदीक़ कर रही थी। थोडी देर ही सही, हम वहाँ बैठ कर प्रकृति के उस वास्तविक रूप मे शामिल थे जो पहाड पर सृजन के लिए उत्तरदायी है। 

कुछ देर बाद हम नीचे उस इकलौती सडक की ओर उतरने लगे जो आगे मसरी गाँव की ओर बढ़ी जा रही थी। बाग़ बाग़ीचों को देखकर मुझे लग रहा था कि यह स्थानीय वाशिन्दो की मिल्कियत होगी लेकिन फिलहाल में ही मित्र बने एक स्थानीय युवक ने हमे बताया कि यहाँ नजर आ रहे बाग़ानों का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगों का है। ख़रीदारों के बारे में जब मालूमात की गयी तो पता चला कि इस गाँव के अलावा नीचे नदी से लेकर उपर फ़तेह पर्वत की चोटी तक के तमाम राजस्व ग्रामों की कृषि तथा चारागाह ज़मीनों का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगो को बेचा जा चुका है। यह जानकारी स्तब्ध करने वाली थी।
नीचे सडक पर पहुचे तो देखा कि सडक के साथ लगे एक फ़सली रकबे पर जेसीबी ताज़ा कटे बाँज के पेड़ों की जड़ो को जमीन से उखाड़ कर अलग कर रही है। ताज़ा उधेड़ी गयी जमीन पर तकरीबन दो मीटर व्यास तक की मोटाई के उम्र दराज़ बाँझ के कई पेड़ टुकड़ों में कटे यहाँ वहाँ बिखरे पडे थे। हमारे कुछ पूछने से पहले ही यह मालूम हो गया कि यह फ़सली रक़बा क्षेत्र के पूर्व में रह चुके परगना अधिकारी की ख़रीदी हुई मिल्कियत है। यही नही, उत्तरकाशी के जिला अधिकारी रह चुके एक आई ए एस अधिकारी ने भी थोडा सा आगे जाकर सडक से लगता हुआ कई नाली जमीन का एक बेहतरीन टुकड़ा ख़रीद लिया है। 

इन मसले पर और बातचीत हुई तो पता चला कि मोटा मोटी तौर पर फ़तेह पर्वत के इस ईलाके का एक बडा फिसद बाहार से आए व्यापारियों, व्यवसायियों और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों तथा कारकूनो की मिल्कियत हो गया है। सरकार की अनदेखी और प्रशासन की ढुलमुल नीतियों के चलते स्थानीय वाशिन्दों ने फ़तेह पर्वत की सम्रद्धि के प्रतीक पारम्परिक व्यवसाय पशु पालन और खेती बाड़ी से विमुख होकर अपनी ज़मीनें धडाधड औने-पौने में बेचना शुरू कर दिया है। भविष्य में क्या होगा, यह कोई जानना ही नही चाहता। बस, सबको पैसा चाहिए। उत्तरकाशी जिले की मोरी तहसील के अंतर्गत आने वाले, देश के इस पहाडी भू भाग के सीमान्त क्षेत्र की मेहनतकश सभ्यता की वर्तमान पीढी अपनी जमीन से लगभग बे-दखली की कगार पर है। सरकारी महकमों के समर्थन से पैसे और पहुँच वाले रूसूखदार स्थानीय वाशिन्दो की ज़मीनों पर फलोद्यान और अपने लिए अय्याशगाहें विकसित करने में लगे हुए है जबकि स्थानिक प्रत्येक की महत्वकांक्षाएं शहर की ओर मुँह किए खड़ी है। 

दिन भर के थकाऊ सफर के बाद रात में बिथरी गाँव के ज्येन्द्र सिंह के बिना खिड़की के घर पर पडाव डाला गया। रात में दिशा शौच जाने के लिए शौचालय का रास्ता पूछा तो पता चला कि जंगल में होकर आना पड़ेगा।

झाड़ू के साथ देश के प्रधान मन्त्री का प्रसिद्धि पा चुका चित्र पोस्टर के रूप में इस गाँव तक पहुँच चुका है लेकिन लगभग दो सौ से भी ज्यादा परिवारों के गाँव बिथरी में सरकारी स्कूल के अलावा दो और घरों में शौचालय बने हुए है। मंगल अभियान से गौरवान्वित होने वाले देश के इस गाँव ने अभी तक बिजली का बल्ब नही देखा है। अब ऐसे में गाँव वालो के साथ दिल्ली और देहरादून से होने वाली घोषणाओं पर बात करना ही बेमानी लग रहा था। मेहमान के मायने क्या होते है यह इनसे बेहतर कोई और शायद ही परिभाषित कर सकता होगा। बिथरी गाँव के जयेन्द्र सिंह और उसके परिवार की मेहमान नवाजी ने दिल खुश कर दिया। अगले रोज निकलते वक़्त जयेन्द्र सिंह को अपना फोन नंबर देकर उसे दिल्ली आने का निमन्त्रण दिया और पलायन की कगार पर पहुचे कई पहाडो को पार करता हुआ देर रात तक अपने गाँव आ गया। 

बेहतर जीवन यापन के लिए जीवों में पलायन एक प्रकृति सम्मत प्रक्रिया है। स्वास्थ्य पलायन मानव सभ्यताओं के विकास के लिए जरूरी है लेकिन किसी भी क्षेत्र के स्थानीय वाशिन्दो को मामूली लालच और राष्ट्रहित की दुहाई देकर, कभी किसी बाँध परियोजना के लिए तो कभी किसी कारखाने के लिए और कभी फ़तेह पर्वत जैसे क्षेत्रों में रूसूखदारों के व्यक्तिगत हित के लिए, सारे नियम क़ानूनों को ताक पर रख कर उन्हे उनकी पुश्तैनी बसासतों से बेदख़ल करना सरासर अन्याय है। सरकार के इसी रवैये के चलते शहरों के फुटपाथ आबाद रहते है।

भोले भाले और साधारण सोच वाले इंसानों को भारी भरकम कानून और अमीर परस्त नीतियाँ कभी समझ में नही आ सकती। उदाहरण के लिए एक तरफ जहाँ कानून यह बताता है कि दलित की जमीन किसी स्वर्ण के नाम हस्तान्तरित नही हो सकती लेकिन बावजूद इसके बिथरी गाँव सहित पहाड पर दलितों की पुश्तैनी और पट्टों के तहत हासिल जमीनों की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। एक ओर कानून गंगा और उसके जैसी अनेकों नदियों के किनारों पर मानकों के तहत पर्यटन के व्यवसाय के माध्यम से रोज़ी रोटी कमाने वाले हज़ारों कामगारों को पर्यावरण का हवाला देकर उन्हे बेरोज़गार कर देता है लेकिन वहीं दिल्ली में कल्चर फ़ेस्ट के नाम पर गंध की गाद से बजबजाती मृत प्राय यमुना के किनारे पर स्वयंभू आर्ट आफ लिविंग के रवि शंकर को उसके राजनीतिक रूसूख के दम पर ३५ लाख लोगो की भीड एकत्र करने की छूट दी जाती है। इसमे कोई दो राय नही है कि देश के जन साधारण के लिए उसका क्षणिक लाभ सर्वोपरि होता है जिसे कानून के तहत नियन्त्रित किया जाना चाहिए लेकिन दुख तब होता है जब सरकार और प्रशासन में शामिल दूर दृष्टाओं की सोच कानून को दरकिनार कर आम जनता के बजाय उनके निजी हितो तक सीमित हो जाती है। 

-सुभाष तराण

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

एक चिट्ठी बावर जौनसार और देवघार के युवाओं के नाम

जौनसार बावर और देवघार के युवा साथियों !

आप सभी से एक महत्वपूर्ण विषय पर संवाद करना चाहता हूँ। विषय हमारे समाज, संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज का अपनी संस्कृति, मान्यताओं और परंपराओं के प्रति भावनात्मक लगाव होता है। प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं को सर्वश्रेष्ठ समझता है तथा हमेशा उनके लिए फिक्रमंद रहता है।

बदलते परिवेश के बावजूद भी हर कोई चाहता है कि उसकी और उसके समाज की पहचान बरकरार रहे। लेकिन इन में से बहुत से लोग अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों को नही छोड़ना चाहते। या फिर बदलाव के नाम दूसरी ऐसी बहुत सी कुप्रथाओं को सहर्ष ही स्वीकार कर लेते है जो ताकतवर व्यक्तियों के हित साधती हो। यह किसी एक समाज की नहीं, दुनिया के लगभग सभी समाजों की स्थिति रही है। हम आप यह बात अब बहुत अच्छे से जानते हैं कि दुनिया भर मे वही समाज विकसित हो पाए हैं जिन्होने मनवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखकर धार्मिक तथा सामाजिक रूढियों, कुरितियों और अंध विश्वास को किनारे कर दिया और प्रगतिशीलता को अपनाते हुए सामाजिक बदलावों को आत्मसात किया।

पिछली सदी के छटे दशक तक जौनसार बावर में हमारे लोग भी पहाड़ की अन्य बहुत सी बसासतों की तरह सीमित दायरों में रहते हुए पारंपरिक तौर तरीकों से जीवन यापन के लिए जूझते थे। उनके पास अभिव्यक्ति के लिए व्यवहारिक अनुभव तो थे लेकिन कोई ऐसी लिपि नहीं थी जिसके आधार पर वह अपने अनुभवों को संग्रहित कर अपनी अगली पीढियों को सौंपते। इसी कारण हमारे क्षेत्र में आजादी से पहले शिक्षा दीक्षा की कोई संकल्पना अस्तित्व में नही आ पायी। नतीजन उनका पारंपारिक ज्ञान पिछड़ता चला गया और समय के साथ पुराना पड़ता चला गया। हमारे बाकी हिमालय वासी बंधुओं की तरह ही हमारे लोग भी गजब के मेहनत कश थे जो कि आज भी है। आज भी आप अपने गाँव खेड़ों के आस पास की उनकी कमाईं हुई जमीनें देख सकते हैं और इस बात का सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे पुरखों ने कैसी कैसी दुरूह जगहों को जीवन यापन के लायक बनाया है।

हमारे पुराने लोगों की सम्रद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने उत्पाद को बेचने में अपनी तौहीन समझते थे।  पुराने समय के ऊनी कपड़े बर्तन और रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को देखकर पता चलता है कि हमारा हस्तशिल्प बेजोड़ था।  हमारे क्षेत्र के पुराने  घर आज भी वास्तुकला का अद्वितीय नमूना है। हमारे पुराने गीत बात में दर्शन कूट कूट कर भरा मिलता है। जब क्रूर और निरंकुश मध्यकाल दुनिया के हर कोने में मार काट मचा रहा था तब हमारे लोगों ने पहाड़ पर की अपनी छितरायी बसासतों मे खुद को सुरक्षित बचाए रखा ।  व्यक्तिगत लोभ के लिए आपस की छिटपुट जानलेवा झड़पों के अलावा हमारे इस क्षेत्र के लोगों को कभी किसी प्रकार की मानवीय और प्राकृतिक आपदाओं का सामना नही करना पड़ा। बीती सदियों के दौरान कितने ही लोग भगोड़ों और शरणार्थियों की शक्ल में हमारे पुरखों की शरण में आए, उन्होने शरणागतों को जगह दी और उन्हे अपना बना लिया।

जौनसार बावर और देवघार में हमारे लोग महासू देवताओं के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। महासू बंधु इस क्षेत्र की सभ्यता के प्रतीक है। महासू देवताओं के नाम पर इस क्षेत्र में सदियों से एक अदृश्य सत्ता, जिसकी अपनी एक स्थानीय व्यवस्था है, चली आ रही है। यह व्यवस्था उन्हे अतीत की किसी बेनाम तारीख से विरासत में मिली थी। महासू बंधु इस क्षेत्र में कैसे और कहाँ से आए इस बारे में हमारे पास किंवदंतियों के अलावा कुछ खास नही है लेकिन यह साबित हो चुका है कि एक समय में महासू बंधुओं का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व सतलुज से लेकर यमुना तक फैला था।

हालांकि बाद के समय में धूर्त पुरोहितों और सामंतों की जीते जी अमरत्व प्राप्त करने की महत्वकाँक्षाएं कुछ नये देवताओं को अस्तित्व मे ले आयी। एक जमाने में ऐसे ही धर्म प्रचारकों की बदौलत भारत का हिमालयी क्षेत्र जातिवाद की चपेट में आ गया था।  मध्य भारत के रास्ते पहाड़ में घुसे इस चंट पुरोहित वर्ग ने बड़ी चतुराई के साथ हिमालय के बड़े हिस्से की तरह ही हमारे लोगों को भी जातियों में विभाजित कर डाला। इन लोगों की कुटिल चालों की वजह से पूरे पहाड़ में मुफ्तखोरों का एक ऐसा तबका तैयार हुआ जिसने भारत के बाकी भागों की तरह देवताओं को आगे कर यहाँ के शिल्पकारों और कामागरों का शोषण करना शुरू कर दिया। इससे हमारा क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। बावजूद इसके भी हमारे क्षेत्र के लोगों की महासू देवताओं में श्रद्धा बनी रही।

भारत की आजादी के पहले की डेढ सदी के दौरान जब दुनियां के कुछ देश दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर रहे थे उस वक्त जातिवाद से ग्रसित हमारे लोग न्याय और स्वास्थय के लिए स्थानीय देवताओं के भरोसे पर आश्रित थे। जहाँ बाकी दुनियां का एक हिस्सा उस दौरान शिक्षा के प्रचार प्रसार और समतामूलक समाज की अवधारणा के लिए संघर्ष कर रहा था, ठीक उसी वक्त हमारे पुरख़ों के जैसे दुनिया के तमाम लोग शोषण और अंध विश्वास को अपनी नियति मान कर आगे बढा रहे थे।

अशिक्षा अंध विश्वास की माँ होती है। अपढ लोगों की आस्था का बहुत से चतुर लोगों ने फायदा उठाया। इसी के चलते हिमालय के एक बड़े भाग में देवताओं से सीधे संवाद की सदियों से एक ऐसी व्यवस्था बनी रही जो कि पीड़ित की मनोस्थिति को संतुष्ट करती है। हमारे क्षेत्र में माली, गढवाल में पस्वा, कुमाऊं में डंगरिया, नेपाल में झांकरी और तिब्बत में नेचुंग  इसके जीवंत उदहारण है। वर्तमान दलाई लामा अपनी जीवनी 'फ्रीडम इन एक्साईल' में लिखते हैं कि जब चीन की मुक्ति सेनाओं के तिब्बती जनता पर बढते अत्याचार और तिब्बतियों के हिंसक प्रतिरोध के चलते वह तिब्बत में बने रहने या निर्वासित होने के विचार पर असंमझस में थे तब उन्होने अपने उस नेचुंग यानी दिव्य वक्ता से राय ली थी।  एक समय में जब लोगों के पास हारी बीमारी, न्याय अन्याय से निपटने के कोई तार्किक विकल्प नही थे तब उनके लिए इस तरह के दैवीय आश्वासन जीने की उम्मीद साबित होते थे। लेकिन आज जब संविधान और विज्ञान ने बहुत कुछ परिभाषित कर दिया है तो फिर इन अंध विश्वासों को किसलिए ढोया जाए?

यह बात सर्व विदित है कि दुनियां में समतामूलक समाज की जिस अवधारणा के चलते सामाजिक सौहार्द विकसित हुआ है उसमें शिक्षा का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। नये लोकतांत्रिक भारत की संवैधानिक व्यवस्था के चलते ही हमारे लोगों की अगली पीढियों का शिक्षा से संपर्क संभव हो पाया था। आजाद भारत के शुरूआती दशक में हमारे नीति नियंताओं ने देश में सामाजिक समानता लाने के लिए सदियों से पिछड़े और दमित नागरिकों को आरक्षण देने का फैसला किया। उस वक्त की हमारी सामाजिक स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने हमारे क्षेत्र को भी आरक्षित श्रेणी में डाल दिया था।  इससे हमारे लोगों को बहुत लाभ मिला।  आने वाले समय में हमारे लोग जब पढने लिखने लगे तो उन्होने बेहतर जीवन के लिए रोजगार के नये माध्यमों के जरिए खूब सारी  सुख सुविधाएं जुटाई। ईक्कसवीं सदी के मुहाने पर आते आते दुनियां विज्ञान और तकनीक की बदौलत एक वैश्विक गाँव में तब्दील होने लगी। हमारी नयी पीढी ने विद्यालयों और विश्व विद्यालयों में साहित्य, विज्ञान और मानविकी का अध्य्यन तो किया लेकिन वे अपने पूर्ववर्तियों की तरह अपने सामाजिक दुराग्रहों से निजात नहीं पा सके।

आपने देखा होगा जब भी हमारे क्षेत्र का कोई युवा परीक्षा पास करता है या सरकारी नौकरी पाता है या किसी व्यवसाय के चलते लाभ कमाता है तो वो सीधा सपरिवार मंदिर पहुँच जाता है। मैने सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों को अभिव्यक्त करते देखा है कि फलाने देवता के आशिर्वाद से मुझे फलानी सफलता मिल गयी या फलानी नौकरी मिल गयी है। अरे भई, तुम्हारे बाप दादाओं को भी तो देवताओं का आशिर्वाद प्राप्त था। तुम तो कभी कभार मंदिर जा पाते हो लेकिन तुम्हारे बाप दादा तो अपनी मुश्किल जिंदगी में से समय निकाल कर बैसाख और भादों में नियमित  रुप से अपने आराध्यों के दर पर पूरी रात लगाकर आते थे। अगर देवताओं के बस में किसी का भला करना होता तो पहले उनका भला करते।  तुम्हारे चढावे के कुछ रुपये उनकी खून पसीने की कमाई के आगे कहाँ ठहरते है। अंदाजा लगाईए। उन्हे तो कभी ऐसा सुख नही मिल पाया जैसा हम आप आज पा रहे हैं।  वे बेचारे तो एक रात से दूसरी रात तक खेत, पशुओं और ज़गलों में खटते थे।

भावनाओं के फेर में आकर हम कितने अतार्किक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे द्वारा पढे गये तमाम मानवीय विषय भी हमारी मदद नहीं कर पाते। हमारी बुद्धि हमे यह समझाने में नाकाम हो जाती है कि यदि हमारे गाँव में स्कूल न खुला होता तो क्या हम यह सब हासिल कर पाते? अगर देश में नागरिक प्रत्येक को समान अवसर प्रदान करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था न होती तो क्या हम इस तरह से कामयाब हो पाते जैसे आज है? क्या हम कभी इस बारे में सोचते हैं कि ये सरकारी नौकरी और रोजगार के अवसर कहाँ से आते हैं? हमारे अंध विश्वास के चलते हमारा विवेक हमे यह समझाने में असमर्थ हो जाता है कि हमको मिलने वाले अवसर उस संवैधानिक व्यवस्था की देन है जो आजाद भारत के बाद अस्तित्व में आयी है।

आज जब हमारे लोग पढ लिख कर कामयाब हो गये हैं और अपने क्षेत्र को कुछ लौटाने की स्थिति में तब हम बड़े बड़े मंदिर बनाने पर आमदा है। भौगोलिक रुप से दुरूह हमारे क्षेत्र की प्राथमिकता तो आधुनिक शिक्षालय और अस्पताल होने चाहिए थे लेकिन ऐसा नही हो पाया।  जौनसार बावर से संबध रखने वाला व्यक्ति, वो चाहे पढ लिख कर कारोबारी, नौकरीपेशा हो गया हो या बेहतर जीवन के लिए पलायन कर शहरों मे रहता हो, यह बात अच्छी तरह से जानता है कि अच्छी शिक्षा के लिए सुविधा संपन्न स्कूलों और अनुभवी चिकित्सकों के साथ साथ आधुनिक तथा उच्च तकनीक से लेस अस्पतालों की  मानव जीवन के लिए क्या अहमियत है लेकिन यह सब जानते हुए भी उन मे से ज्यादातर लोग चंदा और चढावा देवताओं और मंदिरों को देते है।

हमारे जैसे ही लोगों के सौजन्य से बिसोई, बुल्हाड़, क्वानूं और लखवाड़ जैसे गाँवों में करोड़ो की लागत लगा कर भव्य मंदिर बनाए गये हैं और इनकी देखादेखी में दूसरे कई गाँवों में भी मंदिर बनाने की तैयारी चल रही है। जबकि वहाँ रह रहे लोगों की हारी बीमारी के समय की दयनीय दशा को देखते हुए इतने पैसे में एक ऐसे अस्पताल की नींव रखी जा सकती थी जो अपने भविष्य में चिकित्सा की उन्नत और आधुनिक सुविधाओं से लेस हो जाता। लेकिन नही साहब, हम तो इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की बजाय अपनी और देश की तरक्की का श्रेय अपने देवताओं को देते हैं। अरे भाई, ये देवता क्या मुगलों और अंग्रेजों के वक्त नही थे? जब ये देवता इतने चमत्कारी है तो फिर इन्होने जेम्स वाट से पहले रेल और राइट बंधुओं से पहले जहाज को हमारे लोगों से क्यों नही ईजाद करवा दिया। अगर ऐसा होता तओ हमारे लोगों को भी नोबेल प्राईज मिलते। क्यों इन्होने अपनी आलौकिक शक्ति से किसी को आजादी के पहले  वैज्ञानिक, डाक्टर, कलक्टर और पुलिस कप्तान नही बनवाया?

अगर हमारे देवता हमारे लोगों का इतना ख्याल रख पाते तो फिर ये गाड़ियां जिन पर चढ कर हम अपने गाँव आते जाते हैं, हमारे पूर्वजों को हम से पहले ही नसीब हो गयी होती। मुझे याद है जब बचपन के दौरान हमारे गाँव में कोई घटना घटती थी तो रिश्तेदारी नातेदारी में खबर देने के लिए आदमियों को भेजा जाता था लेकिन आज यह काम फोन की एक कॉल से संभव हो जाता है। अंदाजा लगाईए कि तकनीक के वर्तमान साधनों ने हमारा कितना श्रम बचा लिया है। लेकिन हमे यह सब सोचने की फुर्सत ही कहाँ है। हम तो अपनी थोड़ी सी स्थिति सुधरते ही अपने जातीय दंभ को पोसने पर आतुर ह़ो जाते हैं। दूसरे जाति और धर्म से संबधित लोगों को संशय की दृष्टि से देखने और कमतर समझने की यह संस्कृति जौनसार बावर की तो बिलकुल नहीं थी। हमे अपनी कामयाबी की बजाय अपनी कमियों पर गौर करना चाहिए। हमारे लोग आज पढ लिख जाने के बाद भी दलितों के साथ जातीय आधार पर छुआछूत का भेदभाव करते हैं जो कि कानूनन् अपराध है। 

आज की तारीख में होना तो यह चाहिए था कि हमारी पढी लिखी युवा पीढी जातिवाद जैसी जघन्य कुरीति के विरोध में समाज के सामने खड़ी होती और कुरितियों को उखाड़ फैंकती। होना तो यह भी चाहिए था कि स्व रोजगार के लिए अपने पुरखों के पारंपरिक संसाधनो को अनुसंधानों के जरिए पुनर्जीवित किया जाता तथा विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल कर उन्हे उन्नत और आधुनिक बनाते हुए जीविकोपार्जन के क्षेत्र में एक नई क्रांति का माहौल बनाया जाता लेकिन हो यह रहा है कि हमारी पढी लिखी युवा पीढी पूरी तरह से सरकारी नौकरियों पर निर्भर होकर राजनीतिक दलों के लिए कच्चा माल बन कर रह गयी है। हमारी समस्याएं क्या है इस बात के अधिकार किसी और के हवाले कर हम जयकारे लगाने में व्यस्त है जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपने जन प्रतिनिधियों से जन सरोकारों को लेकर सवाल जवाब तलब करते लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। हम अपनी समस्याओं की बजाय बिना काम  के मसलों उलझे रहे और हमारी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रही। याद रखिए, हमारी समस्याओं का समाधान केवल हमारे पास हो सकता हैं, कोई और हमारी समस्याओं का समाधान नही कर सकता। यह अंतिम सत्य है। हम इसे नहीं झुठला सकते।

अंत में अपनी बात यह कह कर समाप्त करना चाहुँगा कि आने वाले समय में आपके पास समाज को देखने के लिए सम दृष्टि हो और आप अपने जीवन में बहुत बड़े व्यक्तित्व बने लेकिन, उससे पहले आप एक बढिया इंसान बने।

शुभकामनाओं के साथ
आपका
सुभाष, तराणों की सैंज से