सोमवार, 22 मई 2017

सफ़रनामा-अतीत के रास्ते


उस साल फ़रवरी के महीने में चकराता से लोखण्डी तक गाड़ी में, और वहाँ से गाँव तक पैदल का सफ़र काफ़ी रोमाँचकारी रहा। एक पिक-अप गाड़ी वाला, जो चकराता से लोखण्डी जा रहा था, बड़ी मान-मनौव्वल के बाद पीछे ख़ुली ट्राली में बिठाने को राजी हुआ। चटक धूप और बर्फ़ीली हवाओं से दो चार होता हुआ मैं लोखण्डी लगभग 12 बजे दोपहर के आस पास पहुँच गया था। बर्फ़ के कारण त्यूनी चकराता सड़क मार्ग लोखण्डी तक ही खुला था। मुझे पहले से ही मालूम था कि लोखण्डी से गाँव पैदल ही जाना पड़ेगा। वैसे अगर मैं विकासनगर से वाया मीनस अपने गाँव बस या जीप के द्वारा जा सकता था, लेकिन मन गुरबत के वक्त इस्तेमाल किए गए पुराने पैदल रास्तों से होकर जाने का था सो, लोखण्डी का रास्ता पकड़ लिया।

 लोखण्डी आज भी तीन काम चलाऊ होटलों का शहर है। आपको जीने की जरुरत लायक खाने का सामान यहाँ मिल सकता है। मै भी ऐसे ही एक दड़बेनुमा होटल में जा बैठा। होटल में बिस्कुट और चाय का लुत्फ़ लिया और उसके बाद अपने गाँव का रास्ता पकड़ लिया। बर्फ़ के कारण रास्ते की हालात काफ़ी खराब थी। जंगल के बीचों-बीच गुजरता यह पैदल मार्ग बर्फ़ के चलते काफ़ी खतरनाक स्थिति में था।

समय-समय की बात है, जो रास्ता एक समय की मजबूरी थी, आज वो रोमाँच के लिए इस्तेमाल हो रहा था। राह चलते हरे भरे बाँज-देवदार के जंगल के बीचो-बीच बर्फ़ की बेतरतीब फ़ैली चादर कुदरत की मनमोहक कला-कृति के विहंगम दृश्य से रुबरु करवा रही थी।  लोखण्डी से मेरे गाँव का पैदल रास्ता कई सौ सालों से आबाद रहा है। जब परिवहन के साधन नहीं थे तो जरुरी बसत की खरीददारी, जो साल में एक या दो बार होती तथा कोर्ट कचहरी के मामले निपटाने लोग इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करते क्योंकि चकराता एवं कालसी एक जमाने से इस पूरे श्रेत्र के प्रशासनिक तथा व्यवसायिक केन्द्र थे। आप इस रास्ते को हमारे क्षेत्र का सिल्क रूट भी कह सकते हैं। कई-कई दिन चलकर लोग अपनी यात्रायें पूरी करते। सड़कें बनी, गाड़ियां चली और धीरे-धीरे पैदल के यह रास्ते बेमानी होने लगे। लेकिन कुछ गाँव है जो आज भी इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। 
तकरीबन चार घंटे के सफ़र के बाद बर्फ़ और देवदार की जुगलबंदी को पार करते हुए पुनीग लाणी पहुँचा। पुनीग लाणी से मेरे गाँव पहुँचने के दो रास्ते हैं। बस, ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई। किस रास्ते जाऊँ, इसी उधेड़-बुन में अगले दस मिनट निकल गये। ढलान वाले रास्ते में उतरने के रोमाँच के मोह ने मुझे आख़िर इस निर्णय पर पहुँचाया कि मुख्य रास्ता न लेकर वह पगडंडी ली जाय जो सर्दियों के दौरान आबाद रहने वाले बेनाल खड़ के खेड़ों से होकर जाती है। लगभग पंद्रह साल पहले मैं इन रास्तों का बराबर मुसाफ़िर था।
जैसे-जैसे नीचे ढाल में उतरने लगा, बर्फ़ कम होने लगी। लेकिन चीड़ के गिरे हुए सूखे पत्तों ने सफ़र आसान नहीं होने दिया। फ़िर भी मैं लगभग चालीस मिनट के सफ़र के बाद मैं नीचे एक खेड़े के नजदीक पहुँच गया। यह लगभग पांँच बजे के आस पास का समय होगा।
बेनाल खड के ये खेड़े दरअसल सर्दियों में चरवाहों से आबाद रहते है। एक जमाने से इस तरह के खेड़े हमारे श्रेत्र में सर्दियों तथा गर्मियों के समय पशु पालकों के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था का काम करते आए हैं। क्योंकि सर्दियों में जब उंचाई वाले गाँवों की चरागाहें बर्फ़ से ढक जाती हैं तो उस दौरान घाटियों एवं निचले श्रेत्रों में यह खेड़े (मंजरे) इनके पालतूओं के लिए उचित चरगाहों का विकल्प हो जाते हैं।
सूरज पश्चिम के पहाड़ के लगभग छू चुका था। मैं खेड़े के नजदीक पहुँचने को ही था कि तभी कुछ दूरी पर मुझे एक चरवाहा, जो अपनी बकरियों को बस्ती की तरफ़ हांक रहा था, नजर आया। उसने परम्परानुसार दूर से ही आवाज लगाई।
"कहाँ से आ रहे हो?"
मैंने कहा, "विकासनगर से,"
उसने कहा, "कहाँ जा रहे हो?"
मैने कहा, "हटाल।"
उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "वाया मीनस होते हुए क्यों नहीं आये, क्या गाड़ी का भाड़ा नहीं था?"
इतने से वार्तालाप के समाप्त होने तक हम दोनो एक दूसरे के सामने खड़े थे। मैंने उसको बताया  कि मैं इस रास्ते से अपने स्कूल के दिनों मे कई बार आता जाता रहा हूँ। इस रास्ते से गुजरने का बहुत समय से मन था, सो आज फ़िर यह रास्ता पकड़ लिया।
चरवाहे ने अगला सवाल पूछा, "हटाल किसके घर से हो?"
यह पहाड़ों की विषेशता है कि आपको दसियों मील दूर रहने वाले व्यक्ति के लिए आपका परिचय आपका गाँव व परिवार है, जबकि शहर मे आपके पड़ोस में रह रहा व्यक्ति क्या पता आपको जानता ही न हो। यही है हमारा दर्शन। यह हमारी सामाजिक विशेषता है जो आपको इन्ही पहाड़ों मे देखने को मिलेगी। मैंने अपने परिवार का नाम बताया तो उसने मेरे दादा के साथ-साथ मेरे गाँव के पाँच सात लोगों का परिचय दे दिया। उसकी पीठ पर ताजा कटी हरी पत्तियों का गट्ठर लदा था जो वह घर पर रखे बकरी के बच्चों के लिए लाया था। उसने रास्ते के किनारे एक चट्टान पर पीठ में लदा गट्ठर टेकते हुए मुझे भी बैठने को कहा। मैं भी थकान महसूस कर रहा था, सो बैठ गया। परिचय का दौर चला। पता चला कि चरवाहे का नाम तेगसिहं है, और वो अपने मवेशियों के साथ इस बस्ती में ही रहता है। मैंने उसे अपने बारे में बताया। थोड़ी देर की बातचीत मे हम दोनो के बीच काफ़ी आत्मीयता हो गई।  जब चलने को हुआ तो उसने मुझे बताया कि उसके लिए उसके घरवालों ने गाँव से माघ (मरोज) का हिस्सा भेजा है और आज सभी चरवाहों की उसके घर दावत है। यदि मैं भी आज उसकी मेहमान नवाज़ी का लुत्फ़ उठाऊँ जो उसे बड़ी खुशी होगी।
यहाँ से मेरे गाँव का रास्ता लगभग घण्टे का था और मैं दिन के उजाले में अपने गाँव पहुँच सकता था, लेकिन तेगसिंह का निमंत्रण टाल नहीं सका। उसके कई कारण थे, मुझे तेगसिहं की सादगी और मेहमान नवाजी की भावना ने भाव विभोर कर दिया था। मैं भी अब उसको कुछ देना चाहता था। देहरादून में मुझे मेरे एक अजीज ने स्काच की बोतल उपहार स्वरुप दी थी जिसके लिए मुझे अपने अलावा एक और उचित उम्मीदवार मिल गया था। खैर, मैंने उस समय उसे यह बात नहीं बताई और चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल दिया।
तेगसिहं की छानी (अस्थाई घर) दो मंजिला थी। छानी के निचले खण्ड़ के दो कमरे क्रमशः ढोर-डंगरों एवं बकरियों के लिए थे। दूसरी मंजिल के लिए लगभग पत्थर की पाँच सीढियाँ चढने के बाद एक बरामदा, जिसके एक कोने में बकरे की खाल के बने ख़लटों (ख़ाल का बोरों) में रखा अनाज, छत के सहारे के लिए देवदार के मजबूत शहतीरों पर ठुकी कीलों में टंगे चीड़ के पत्तों से बने झाड़ूओं का गट्ठर, रस्सी बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली स्थानीय जूट (भीमल) का पुलिन्दा और बकरी के बालों को कातकर करीने से बनाये गोले जो अब केवल एक विशेष किस्म के बिछौने (खारचे) बनाने के काम आते है, देखें जा सकते थे । बरामदे के बाद एक कमरा था जिसमे एक चौथाई भाग का इस्तेमाल बकरी के बच्चों के लिए बाड़े के रुप में किया गया था। कमरे के एक कोने में चूल्हा, कुछ बरतन, एक रिंगाल की टोकरी में ऊन के गोले, उसके पास रखी दो तकलियाँ, कुछ उनी कपड़े और बिस्तर थे। मैंने वहीं पर अपना झोला एक किनारे रखा और लौट कर तेगसिहं के पास बाहार आ गया जहाँ तेगसिहं बकरी के बच्चों को दूध पिलाने में व्यस्त था।


तेगसिहं ने चारा- पत्तियों के गट्ठर को चार भागों में बाँटकर आँगन में गडे खूँटों पर इस तरकीब से बाँधा कि बकरियों को अलग अलग कर व्यस्त रखा जा सके । बकरी के बच्चों को दूध पिलाना मुश्किल भरा काम है। दिन भर दूर रहने के कारण बकरियां भ्रामक स्थिति में रहती है कि कौन सा बच्चा किसका है। ऐसी परिस्थिति में चरवाहे का हुनर एवं तजुर्बा काम आता है। ऐरा-गैरा तो उलझ कर रह जाए।
अँधेरा होने को था। तेगसिहं अब बकरियों से फ़ारिग हो चुका था। इन श्रेत्रों में चरवाहे अधिकतर अकेले ही रहते हैं। दिन भर मवेशी चराने के बाद वो अपने खाने पीने की व्यवस्था खुद से ही करते हैं। तेगसिहं ने आँगन में रखी जलावन में इस्तेमाल होने वाली लकड़ियाँ उठाई और हम सीढियाँ चढकर कमरे के अंदर चले गये। 
रात का अंधेरा और जाड़ा एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर अपना-अपना परचम फैलाने की होड़ में लगे हुए थे । तेग सिहं ने ढिबरी जलाई।  चूल्हा फ़ूँका गया। मैं जाडे़ के प्रकोप से बचने हेतु चूल्हे के मुहाने पर सिमटा बैठा था। आग जली तो तेगसिहं ने काँसे का भड्डू (बर्तन) चूल्हे पर धर दिया। उसमे कुछ पानी डाला।

"ठण्ड के मौसम में आग ही सबकुछ है"
तेगसिंह ने मुस्कान के साथ आग की तरफ़ इशारा करते हुए कहा
- बचपन में माँ और सर्दियों में आग का सहारा सकून देता है। वह चूल्हे की लकड़ियों को दुरुस्त करते हुए बुदबुदाया।
दिन भर की जद्दोजहद के बाद जहांँ यह चरवाहा खाना बनाने की क़वायद में जुट गया वहीं मैं चूल्हे की लकड़ियों को किसी क्रान्तिकारी की तरह आग में झौंक कर भड़काने की कोशिश में व्यस्त हो गया ।
तेगसिहं ने दीवार पर टंगा टोकरा उतारा और बकरे के सूखे माँस की टुकड़ियाँ एक थाली में निकाल दी। भड़्ड़ू में रखा पानी तब तक उबल चुका था। माँस की टुकड़ियों को खौलते पानी में डालते हुए तेगसिहं पूछने लगा,
- तुम्हारे घर में भी पालते हैं बकरा माघ के लिए?
मैने कहा 'हाँ',
-वैसे हमारे क्षेत्र में लोगों ने माघ मनाना लगभग खत्म ही कर दिया है।
उसने भड़्ड़ू में कड़छी घुमाते हुए कहा।
मैने कहा,
-मेरे पिताजी त्यौहारों के बहुत शौकीन है, वो हमेशा बकरा पालते हैं ।
तेगसिहं बड़ी मासूमियत के साथ कहने लगा,
-दो दिन का जीवन है, जो किया जाय खुशी से खुशी के लिए किया जाय।
उसके बाद वह जीरा, मिर्च, हरे लहसून एवं धनिया के पत्ते सिलबट्टे पर पीसने लगा। यह हरे मसाले वह दिन में पास की बस्ती से तोड़ लाया था। उसने भड़्ड़ू में डली वाला नमक एवं हल्दी ड़ाल दी। लगे हाथ तेगसिहं ने चावल पकाने के लिए बरतन चूल्हे पर चढा दिया और कहने लगा,
-मंडुए के आटे की रोटी खाओगे?
मैने कहा, बिल्कुल, क्यों नहीं, इससे बढियां क्या होगा।
क्योंकि आज तेगसिहं के घर (मगोज) की दावत थी तो थोड़ी देर में उसके घरिया मेहमान चरवाहे भी एक-एक कर पहुँचने लगे। सभी चरवाहों से परिचय हुआ।
सभी के आने के बाद तेगसिहं ने दीवार पर टंगे टोकरे से घर मे बनी शराब का भरा हुआ बर्तन निकाला, सबके आगे गिलास रखे गये। ठीक उसी वक्त मैंने भी अपने बेग में रखी बोतल तेगसिहं के हवाले की तो वे लोग चहक गए। बोतल की बनावट देख एक युवा चरवाहे ने मसखरे अंदाज में कहा,
- यह बोतल तो मुझे चाहिये।
एक और चरवाहे नें तपाक से उसकी बात के जवाब में कहा,
-      तुम्हे बोतल मिल जाएगी, लेकिन खाली होने के बाद।
यह सुनकर सभी लोग ठहाका मार कर हँस पड़े। शराब के जखीरे को एक दराज उम्र के आदमी को थमा तेग सिंहं रोटियां बनाने में जुट गया। बाकी का खाना बनकर तैयार हो चुका था।
मनोरंजन का एक पारम्परिक दौर शुरु हुआ। दिन भर जीवन-यापन के तौर तरीकों से जूझने वाले ये चरवाहे अब तमाम मसलों पर खुल कर राय रखने लगे । गाँव की राजनीति से शुरु हुई बहस श्रेत्र, राज्य होते हुए राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गयी । मैं उन लोगों की बातें सुन रहा था। तभी सुरूर में तर तेगसिहं मुझसे मुखातिब होते हुए बोला,
-      गीत-बात भी जानते हो?
मैंने फ़र्श पर इस्तेमाल तख्ते पर ताल देकर एक पारम्परिक गीत गाना शुरु कर दिया जिसमे कोरस की जरुरत थी।


गुरुवार, 18 मई 2017

–प्रशिक्षण-


बात 1984 के जून या जुलाई महीने की है। 

गर्मी के मौसम के दौरान गाँव के बच्चे, कुछ घर में बता कर और कुछ चोरी छुपे नहाने एवं तैरने हेतु गावं के एक ओर की घाटी में बह रही एक छोटी नदी में जाते थे। मेरे एक बाल सखा थे, भाई मेहरचन्द। हम दोनों में दांत कटी दोस्ती थी। दोनो एक ही कक्षा में पढते थे लेकिन मेहर चन्द मुझ से साल भर बड़े थे तो जहाँ अनुभव की बात आती, मेहर चन्द भाई वहाँ मुझसे इक्कीस होते। शेख चिल्ली और शेख चिल्ली की कहानियों से मेरी वाकफियत मेहर चन्द भाई के माध्यम से ही हुई थी। उनका सुझाव था कि गर्मियों में जहाँ नदी का शीतल जल देह को सुकून पहुंचता है वहीं तैरना अपने आप में एक विशेष हुनर एवं कसरत है। वह एक कुशल तैराक थे। उनके तैराक होने का कारण यह भी था कि उनके परिवार के पास काफी सारी भैंसे थी जिन्हे वो लोग गर्मी के दिनों की दोपहर में गांँव के दूसरी तरफ़ बह रही बड़ी नदी की ओर ले जाते। गर्मी के दौरान परजीवियों से परेशान भैंसों को पानी से बड़ी राहत मिलती है। इसी वजह से मेहर चन्द भाई को इस मामले में बड़ी रियायत थी। वो स्वछंद तरिके से नदी की तरफ़ आ और जा सकते थे। लेकिन मेरे घर से सख्त हिदायत थी कि नदी की तरफ़ जाना तो क्या यदि जाने का सोचा भी गया तो परिणाम वही होंगे जो पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा युवराज विश्वास राव के हुए थे, यानी कि पहले खाल खैंची जाएगी और फ़िर उसमे भूसा भरा जाएगा। 

गाहे बगाहे मेहर चन्द भाई मुझे जल क्रिड़ा के आनन्द का महत्व बताते तो मेरा मन बल्लियों उछल जाता लेकिन पिताजी की चेतावनी याद आते ही मेरी हालत गठबंधन वाली सरकार जैसी हो जाती। एक दिन मेहर चन्द भाई की बातों और उनके हुनर से प्रभावित होकर मैं मुगल शहजादे सलीम की तरह घर वालों की तमाम चेतावनियों को दर-किनार कर उनके साथ छोटी नदी की तरफ़ निकल गया। भाई मेहरचन्द के नेतृत्व में तैराकी सीख़ने का सत्र शुरु हुआ।  लेकिन छोटी नदी में पानी कम होने और पथरीले होने की बजह से मेहर चन्द भाई मुझे तैरना नहीं सिखा पा रहे थे। उनका कहना था कि जब तक पानी  इंसान के डूबने लायक ना हो तब तक इंसान तैरना नहीं सीख सकता। सो, तय यह हुआ कि बगल में जो बड़ी नदी है वहीं जाकर वह मुझे तैरना सिखायेंगे।  

बगल में बह रही नदी टौंस काफ़ी बड़ी है। मेहरचन्द भाई छुट्टी के दौरान अक्सर इसी नदी के किनारे अपनी भैंसों  को लेकर आते रहते थे। गर्मियों के दौरान तेज धूप से पहाड़ों पर जमी बर्फ़ बड़ी तेजी से पिघलने एवं मिट्टी के कटाव के कारण नदी के पानी का स्तर बढा हुआ और मट-मैला होता है।  बड़ी नदी में पहुँचते ही अभ्यास के लिए उचित जगह की तलाश की गई। जगह ऐसी खोजी गई जो नदी की मुख्य धारा से अलग एक चट्टान की आड़ में पानी को एक तालाब का रुप दे रही थी। वहाँ पानी लहरों के रुप मे आता और इसी तरह वापस चला जाता। यहाँ पानी ज्यादा गहरा तो नहीं था लेकिन 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के डूबने के लिए काफ़ी था। एक योग्य प्रशिक्षक की तरह मेहर चन्द भाई ने कई बार प्रयोगात्मक तरीके से चट्टान पर से कूद कर नदी के उस तालाबनुमा हिस्से को आर पार कर तैराकी के प्रति मेरे आत्मविश्वास को लबालब कर दिया। मेहर चन्द भाई के तैरने के तरीके को देख कर मेरे मन में उनके लिए वही भाव थे जो महाभारत काल में अर्जुन के द्रोणाचार्य के लिए रहे होंगे। एक आदर्श गुरु की तरह कुछ आवश्यक निर्देश जारी कर उन्होने मुझे चट्टान पर चढा दिया। डर और रोमाँच के मिले जुले माहौल ने मेरी दशा उस फ़िदाईन के जैसी थी जिसे खुद में बंधा बम फ़ोड़ना था।  भाई मेहर चन्द का ईशारा पाते ही मैनें आँखें बन्द कर छ्लाँग लगा दी।  

पानी में पहुँचते ही मेरा मस्तिष्क मेहर चन्द भाई के सारे दिशा निर्देशों पर अमल कर रहा था, लेकिन एक चूक हो गई। पानी में डूबते ही सांस रोकना भूल गया, नतीजा यह रहा कि पहली बार पानी का फ़ेफ़ड़ों से परिचय होने लगा। तैरना न जानने के कारण डूबते हुए जब नीचे जमीन में मेरे पैर लगते और मैं छटपटाते हुए झटका देकर पानी में से क्षण भर के लिए उपर निकलता तो किनारे खड़ा मेहर चन्द भाई रोते चिल्लाते हुए सुनाई और दिखाई देता। आत्मविश्वास जो कुछ क्षण पहले सर से उपर निकलने को हो रहा था, अब पैरों से भी नीचे प्रतीत होने लगा। हाथ पैरों पर से काबू जाता सा मालूम हो रहा था। जहाँ थोड़ी देर पहले हमारी प्राथमिकतायें तैरना सीखने और सीखाने की थी, वहीं अब जान के लाले पड़ते मालूम हो रहे थे। 

मानो तभी जैसे कोई चमत्कार हुआ। किसी ने मुझे बालों से पकड़ा और पानी से उपर निकाल लिया। यह मेहर चन्द भाई की बड़ी बहन रुक्मणी थी। मेरे होश आते-जाते मालूम हो रहे थे। पानी मेरे फ़ेफ़ड़ों में भर गया था।  किनारे पर मेहर चन्द भाई दहाड़े मार कर रो रहे थे। रुक्मणी बहन मुझे एक बड़े से पत्थर पर लिटा कर मेरे फ़ेफ़ड़ो से पारंपारिक तरीके से पानी निकालने लगी। थोड़ी सी ही देर में सब कुछ सामान्य हो गया। सामान्य इसलिए हो गया था क्योंकि इस बात का किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए कि सुभाष नाम का कोई प्राणी इधर नदी की तरफ़ कभी देखा या सुना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जितने भी इंसान को भावनात्मक रुप से भयादोहन के तरीके हमे मालूम थे, हम दोनों ने रुक्मणी बहन पर इस्तेमाल किए। और अंततः रुक्मणी बहन हमारी इस बात से सहमत हो गई थी  कि यदि वह इस बात का किसी से भी जिक्र करेगी, तो हम दोनों उनके मुँह से यह बात निकलते ही मर चुके होंगे। रुकमणी बहन से भरोसा हासिल हो जाने के बाद हम दोनो के चेहरे पर कुछ ऐसे ही भाव थे जैसे फ़ाँसी की सजा पाए कैदियों के चेहरे पर राष्ट्रपति भवन से सजा माफ़ी का फ़रमान जारी होने के बाद होते है। उस भल-मानस दयालू युवती रुक्मणी बहन की वजह से आज मैं इस दुनिया में हूँ, अन्यथा कभी न पढे जाने वाला इतिहास हो गया होता। दुर्भाग्यवश, उस के कुछ ही दिनों पश्चात रुक्मणी बहन की किसी असाध्य रोग की चपेट मे आने से अकाल मृत्यु हो गयी। जीवन के मुश्किल समय में ईश्वर को तो नहीं हाँ, रुक्मणी बहन को जरुर याद करता हूँ।

सुना है भाई मेहर चन्द अब बड़ी-बड़ी मूँछें रखते हैं और उत्तर प्रदेश सरकार के किसी महकमे में सहायक विकास अधिकारी हो गये हैं। 

मंगलवार, 16 मई 2017

मैं हाशिए पर के पहाड़ से बोल रहा हूंँ


पिछले साल सर्दियों की बात है, देहरादून में गीता दीदी की किताब 'मल्यों की डार' का विमोचन था। उन्होंने बुलावा भेजा था, सो जाना बहुत ज़रूरी था। आनन फ़ानन छुट्टी ली गयी और फिर एक रोज पहले लगभग आधी गुजर चुकी सर्द रात को दिल्ली से देहरादून के लिए बस पकड़ी गयी। देर रात से लेकर सुबह तक के सर्द सफर से जूझने के बाद धूप से सराबोर देहरादून के ख़ुशगवार दिन से मुलाक़ात हुई।
किताब के विमोचन समारोह में शामिल होने के बाद मैं अपने गाँव की ओर निकलना चाहता था लेकिन पहाड पर वीरान होते गाँवो की बसासत के लिए 'पलायन एक चिंतन' को मुहीम के रूप में चलाने वाले मित्र रतन सिंह असवाल और विजयपाल रावत नें जब अगले दिन उत्तरकाशी के सुदूर क्षेत्र फ़तेह पर्वत चलने की पेशकश की तो मैंने तुरंत से हामी भर दी।
फ़तेह पर्वत मेरे लिए बचपन से ही आकर्षण का विषय रहा है। जिस टौंस नदी के किनारे मेरा गाँव है उसकी एक सहायक नदी रूपिन फ़तेह पर्वत से होकर गुज़रती है। बचपन के दौरान बडे-बूढ़ों से सुनी गयी हिम-मानव येति की काल्पनिक कहानियाँ और पशुपालकों की जीवटता के सच्चे क़िस्से अब भले ही समृति पटल पर धुँधले हो चुके हो लेकिन वे मुझे आज भी रोमांचित करते है। मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि इन किस्से-कहानियों का स्रोत फ़तेह पर्वत का यही क्षेत्र था।
विश्व पटल पर बह रही नदियाँ पानी ही बहा कर नही लाती, वे आदी काल से सभ्यताओं और संस्कृतियों के एक दूसरे तक पहुँच बनाने का एक माध्यम भी रही है। संपूर्ण हिमालय की तलहटियों से दुरूह तिब्बत की ओर जाने वाले सभी व्यापारिक मार्ग ऐसी ही नदियों की वजह से वजूद में आ पाये थे। आज संचार और परिवहन के अत्याधुनिक साधनों नें दुनिया भर के एक बडे तबके को भले ही बहुत क़रीब ला दिया हो लेकिन एक जमाने में नदियों नें समन्दर और समन्दर ने सारी दुनिया को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया। 
क्योकि फ़तेह पर्वत के लिए एक रोज बाद निकलना था इसलिए ज़रूरी पारिवारिक कारणों के चलते मैने उसी दिन शाम को हरबर्टपुर जाना तय किया। लेकिन हम ख्याल मित्रों के आग्रह पर उस रात देहरादून में ही पडाव डाला गया। यह मेरा सौभाग्य था कि उस शाम मुझे पलायन एक चिंतन के साथियों के साथ पहाड की जीवन चर्या को लेकर राय शुमारी संभव हो पायी।
क्योकि मित्र रतन सिंह और विजयपाल की प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में किसी नौकरशाह से मुलाक़ात पहले से तय थी इसलिए मैं अल-सुबह ही हरबर्टपुर के लिए निकल पडा। यह पहले से ही तय था कि अगली मुलाक़ात दोपहर के आस पास यमुना पुल पर होगी। रतन सिंह और विजयपाल वाया मसूरी और मैं वाया विकास नगर होते हुए लगभग दो बजे के आस पास यमुना पुल पर फिर एक साथ हो लिए। 
यमुना पुल के मछली भात की शानदार खुराक के बाद जौनसार और जौनपुर की सीमा बनाती यमुना के किनारे-किनारे आगे का सफर शुरू किया गया। सफर के दौरान सडक के दूसरी ओर उपर में जहाँ जौनसार के भव्य गाँव नजर आते हैं वहीं निचले क्षेत्र में बंजर और वीरान हो रहे खेड़े मंज़रों को भी नजर अंदाज़ नही किया जा सकता। इस ओर के क्षेत्र, जहाँ हम सडक के मार्ग से जा रहे थे, जो यमुना पुल के बाद जौनपुर और फिर आगे जाकर रंवाई हो जाता है, उस पूरे क्षेत्र में एक जमाने के खेड़े-मंज़रों ने अब बेतरतीबी और अव्यवस्थित क़स्बों की शक्ल अख़्तियार कर ली है। आधुनिक भारत के अर्द्ध शिक्षित बाज़ार सामाजिक तौर पर व्यक्तिगत नफ़े और सार्वजनिक नुक़सान के जीते जागते उदाहरण है। यमुना घाटी के इन खेड़े-मंज़रों की सीमित खेती बाड़ी में अब अनाज की बजाय कंकरीट के भीमकाय मकान उगाए जा रहे है। यमुनोत्तरी मार्ग पर पडने वाले इन क़स्बों पर जहाँ आपको उगलियों पर गिने जाने वाले ठेकेदारों-साहूकारों की बेतरतीब बनी भव्य अट्टालिकाएं देखने को मिलती है वहीं बडी मात्रा में खेती और पशुपालन से विमुख स्थानीय श्रम जीवियों की भावी पीढ़ियाँ आपको इन बाज़ारों में बेमक़सद भटकती मिल जाएगी। यदि आप साथ के साथ एक नजर बगल में बह रही यमुना पर बनाए रख पाएँ तो कई स्थानों पर लोग डाइनामाइट के भयानक विस्फोटक कर मछलियों का अवैध शिकार करते नजर आ जाएँगे। पिछली बार कंसेरू में हुई गोष्ठी के दौरान जब इस रास्ते से गुज़रते हुए नौगाँव से थोडा पहले गंगाणी के पास नदी में डाइनामाइट का धमाका हुआ तो मैं भी मय साथियों के गाडी को किनारे खड़ा कर तमाशाई भीड का हिस्सा हो गया। थोडी देर में एक युवक हमारे पास आया और एक हाथ में डाइनामाइट की छड़ और दूसरे हाथ में डेटोनेटर लहराते हुए कहने लगा, 
'सौ रूपये में दो फ़ायर, जितनी मछली मिलेगी, आपकी क़िस्मत, नदी में फ़ायर झौंकने और मछली पकड़ने का ज़िम्मा मेरा।' 
डाइनामाइट की छड़ को देख कर मैं सिहर गया। अतीत में घटी एक दुर्घटना याद हो आयी जब इसी तरह से मछली मारने के चक्कर में मेरे एक बचपन के मित्र का हाथ आधी बाज़ू समेत उड़ गया था। मैं उसे अपने अतीत की घटना से अवगत करवाना चाहता था लेकिन वो मुझे अनसुना कर वहाँ खड़े दूसरे लोगो के मुख़ातिब हो गया।
नौगाँव पहुँचते-पहुँचते शाम होने को थी। अब पुरोला की ओर जाने के लिए यमुना पार कर कमल नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ना था। हम नौगाँव बाज़ार पार कर नीचे यमुना पर बने पुल पर पहुचे तो नजर यकायक यमुना के रौखड पर गयी जहाँ जमीन को उधेड़ने वाली एक भारी भरकम मशीन मय ट्रैक्टरों और ट्रकों के खनन में जुटी हुई थी। इस खनन के बारे में पता करना बेमानी था क्योकि सरकार यह क़बूल चुकी है कि नदियों की सफ़ाई होते रहनी चाहिए। इसलिए शायद नौगाँव में यमुना के रौखड पर यह सफ़ाई अभियान भी सरकार के ईच्छानुरूप चल रहा होगा। 

बहरहाल हम कमल नदी के किनारे आगे बढ़े तो रास्ते में पडने वाले गाँवो के उपजाऊ खेतों में मटर के ताज़ा उगे अंकुर शाम के पटल पर एक और रंग बिखेर रहे थे। पुरोला पार करते-करते धुँधलका हो गया था लेकिन फिर भी लाल चावल के लिए मशहूर रामा सेराँई घाटी के सीढीदार खेतों की दूर तक फैली श्रंखलाएँ, चाँदनी के टिमटिमें उजाले में साफ़ नजर आ रही थी। साफ़ आसमान में चाँद के पुर-शबाब होने पर यह सबकुछ विहंगम लग रहा था। मौके की नज़ाकत सबसे पहले शौक़िया फ़ोटोग्राफ़र मित्र रतन सिंह ने भाँप ली। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरत-फुरत अपना केमरा निकाल लिया। हम भी सडक किनारे बैठ कर तबियत से इस नज़ारे की नजर फरोशी करने लगे और जितना हो सका, इन नज़ारों को अपने जेहन में समेट लिया और आगे बढ गये। 

रात जरमोला के डाक बंगले में गुज़ारने के बाद अगले रोज आगे का बाकी बचा सफर शुरू किया गया।
अगला पडाव मोरी था।
उत्तरकाशी जिले की इस अंतिम तहसील की सीमाएँ जहाँ गृह प्रदेश के जिला देहरादून की त्यूनी तहसील से लगती हुई है वहीं यह तहसील राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल के जिला शिमला और किन्नौर से भी अपनी सीमाएँ साझा करती है। लगे हाथ मोरी में चाय के दौरान हमने ढाबे वाले से लगभग दो किलो वज़नी रैनबो ट्राऊट का सौदा कर डाला। सनद रहे कि समान भौगोलिक परिस्थिति वाले पड़ौसी प्रदेश हिमाचल के मनाली तथा इस ऊँचाई के अन्य क्षेत्रों में ट्राऊट मछली का उत्पादन और शिकार वहाँ की सरकार द्वारा स्थानीय निवासियों के कल्याण हेतु एक परियोजना के तहत किया जा रहा है। लेकिन यहाँ इस तरह की योजनाओं से परहेज़ किया जाता है। मोरी से बिथरी जाने के लिए भाड़े पर जीप का इंतज़ाम किया गया। हर की दून तक पहुँच मार्ग में स्थित होने के कारण मोरी से नैटवाड तक का रास्ता तो थोडा बहुत ठीक है लेकिन नैटवाड से बिथरी तक का रास्ता बस रास्ता भर है। स्थानिकों के हितो की दुहाई देते हुए ठेकेदार जन प्रतिनिधियों के मुनाफ़े को मद्देनज़र रखकर हाल के वर्षों में बनी ये सड़के नव आगंतुकों के लिए एक जोखिम भरा अनुभव हो सकती है लेकिन पर्वत के इन वाशिन्दो के लिए, जो हाल के वर्षों तक इन मैराथन रास्तों को क़दम दर कदम नापते थे, यह नाम मात्र की सड़के किसी वरदान से कम नही है और अब इन सड़कों पर सफर करना इनकी दिनचर्या का एक हिस्सा भर है।
नैटवाड में भारी भरकम नाश्ता करने के बाद हम बिथरी की ओर हो लिए। गोविन्द वन्य पशु अभयारण्य की सीमा पर स्थापित बैरियर पर खड़े जंगलात के मातहत नें नज़र भर कर हमारी गाडी की जामा तलाशी ली। यहाँ से फ़ारिग़ होकर थोडा आगे बढ़ते ही टोंस का उद्गम स्थल नैटवाड का गाँव आ गया। यह गाँव भले ख़स्ता हाल हो किन्तु ग्राम देवता के मन्दिर का जिर्णोदार तस्सली बख़्श किया गया है। सरसरी तौर पर इस गाँव की स्थिति देख कर इस नतीजे पर बडी आसानी के साथ पहुचा जा सकता है कि जन सरोकारो की बजाय मठों-मस्जिदों और मन्दिरों की खैर ख्वाही को अपना दीनों-ईमान समझने वाले जन प्रतिनिधि समाज को किस ओर लेकर जाना चाहते हैं।
टोंस के अस्तित्व को अविरल जल राशी प्रदान करने वाली उसकी सहायक नदियाँ रूपिन और शुपिन यहाँ अस्तित्वविहीन हो जाती है। जहाँ शुपिन हर की दून ओर से आती है वहीं रूपिन फ़तेह पर्वत की घाटी से। नैटवाड से हम लोग उबड-खाबड़ सडक पर रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ने लगे। लगभग ५ किलोमीटर के बाद सडक ने रूपिन का किनारा छोड़कर फ़तेह पर्वत पर उपर की और बढ़ना शुरू कर दिया। रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ते हुए जहाँ स्थानीय वातावरण में उगने वाले पेड़ एव वनस्पतियाँ बहुतायत में नजर आ रहे थे वहीं फ़तेह पर्वत पर उपर की ओर बढ़ते हुए एक छत्र चीड नजर आ रहा था। थोडा आगे बढ़ने के बाद इस दुर्गम मार्ग पर गाँव बस्तियों के आस पास को छोड़कर लगभग सारा क्षेत्र जंगल विहीन नजर आता है। लेकिन यह देखकर अच्छा लगा कि आस पास दिखने वाले गाँवो के अधिकतर खेतों में पारम्परिक फसलों की जगह सेब के बाग़ीचे लगाए जा रहे है। नैटवाड से लगभग दो घंटे की रोमांचकारी ड्राइव के बाद हम बिथरी गाँव में थे। 
दिन के तकरीबन दो बजने को हो रहे थे। आसमान साफ़ था और चटक धूप खिल रही थी लेकिन सडक के किनारे लगे नल का पानी, जो बेमक़सद जमीन पर बह रहा था, बर्फ़ बनकर जम गया था। वातावरण में हल्की धूल मालूम हो रही थी। गाडी से उतरते ही गाँव के नौनिहालों नें बडे कौतूहल के साथ हमारा इस्तक़बाल किया। हमे जिन सज्जन के घर जाना था, उनके बारे में मालूमात की गयी तो पता चला कि वो लकड़ियाँ काटने जंगल गये है। बहरहाल, गाँव के सामुदायिक आँगन में, जो ग्राम देवता के मन्दिर के सामने था, आसन जमा लिए गये। हम में से कुछ लोग जो आस्थावान थे, उन्होंने ग्राम देवता के दर्शन कर भेंट-पूजा की और जो कुछ मेरे जैसे नास्तिक थे वे बिथरी गाँव की प्रकृतिक छटा को निहारने में ध्यानमग्न हो गये।
थोडी देर में हमारे इर्द गिर्द बच्चो के साथ साथ कुछ युवाओं और बुज़ुर्गों का जमावड़ा लग गया। बावजूद सर्द मौसम के जहाँ कुछ एक गिने चुने युवा आधुनिक जींस और जैकेट पहने नजर आ रहे थे, वहीं बाकी के लोग, जो अपनी दिन चर्या में व्यस्त थे, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग सभी शामिल थे, अपनी पारंपरिक वेशभूषा में देखे जा सकते थे। यहाँ के बाशिन्दों के रहन सहन से आधुनिकता अभी कोसों दूर है। गाँव में सामुदायिक नल के लिए बनी पानी की टंकी और स्कूल की जर्जर सरकारी इमारत के अलावा इस गाँव में सरिए- सीमेंट का इस्तेमाल नगण्य है। पारंपरिक तरीक़ों से बने घर-मकान को देखकर ही इनकी जीवटता और जूझारूपन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे इस ऊँचाई पर मानव सभ्यताओं नें खुद के अस्तित्व को बरक़रार रखा। यह बात दीगर है कि देश और दुनियाँ भर के सेठों के कारख़ानों से उगले जा रहे धुँए और सरकार की साहूकार परस्त नीतियाँ इन ईलाकों को जल्द ही मानव विहीन कर देगी। मामूली से परिचय के बाद ये युवा हम से घुल मिल गये। जब उन्हे पता चला कि हमें अमुक व्यक्ति से मिलना है तो उन्होंने हमे जंगल की ओर ले चलने का सुझाव दे डाला।
हम 4 बजे के आसपास, लगभग १० हज़ार फ़िट की ऊँचाई पर स्थित इस गाँव से उपर देवदार के जंगल की ओर जा रहे थे। थोड़ी सी चहलक़दमी हमे धार के दूसरी ओर ले गयी। वहाँ का नज़ारा बहुत दिलकश था। हम लोग धार को छोड़ते हुए एक कटोरे के आकार के मैदान, जो एक प्रकृतिक तालाब का अवशेष है, के उस छोर पर विस्मृत होकर खड़े थे जहाँ उपर की ओर भरे पूरे नीले आसमान के अलावा देवदार के हष्ट पुष्ट जंगल से पहले सेब के बाग़ीचों की एक भरपूर श्रंखला विद्यमान थी और नीचे नदी घाटी तक पालतू पेड़ों के जत्थों के बीच नजर आ रहे गाँव और वृक्ष विहीन नंगी ढलाने मौजूद थी। सामने नजर आ रहे रूपिन पास के ग्लेशियरों से होकर आती सर्द किन्तु नम हवा ने दिलो दिमाग़ को तरो ताज़ा कर दिया था। मामूली सी दूरी पर देवदार के पेड़ों की अनुशासित भीड बर्फ़ की सुफ़ैदियों के माध्यम से अपने ईलाके की तसदीक़ कर रही थी। थोडी देर ही सही, हम वहाँ बैठ कर प्रकृति के उस वास्तविक रूप मे शामिल थे जो पहाड पर सृजन के लिए उत्तरदायी है।
कुछ देर बाद हम नीचे उस इकलौती सडक की ओर उतरने लगे जो आगे मसरी गाँव की ओर बढ़ी जा रही थी। बाग़ बाग़ीचों को देखकर मुझे लग रहा था कि यह स्थानीय वाशिन्दो की मिल्कियत होगी लेकिन फिलहाल में ही मित्र बने एक स्थानीय युवक ने हमे बताया कि यहाँ नजर आ रहे बाग़ानों का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगों का है। ख़रीदारों के बारे में जब मालूमात की गयी तो पता चला कि इस गाँव के अलावा नीचे नदी से लेकर उपर फ़तेह पर्वत की चोटी तक के तमाम राजस्व ग्रामों की कृषि तथा चारागाह ज़मीनों का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगो को बेचा जा चुका है। यह जानकारी स्तब्ध करने वाली थी।

नीचे सडक पर पहुचे तो देखा कि सडक के साथ लगे एक फ़सली रकबे पर जेसीबी ताज़ा कटे बाँज के पेड़ों की जड़ो को जमीन से उखाड़ कर अलग कर रही है। ताज़ा उधेड़ी गयी जमीन पर तकरीबन दो मीटर व्यास तक की मोटाई के उम्र दराज़ बाँझ के कई पेड़ टुकड़ों में कटे यहाँ वहाँ बिखरे पडे थे। हमारे कुछ पूछने से पहले ही यह मालूम हो गया कि यह फ़सली रक़बा क्षेत्र के पूर्व में रह चुके परगना अधिकारी की ख़रीदी हुई मिल्कियत है। यही नही, उत्तरकाशी के जिला अधिकारी रह चुके एक आई ए एस अधिकारी ने भी थोडा सा आगे जाकर सडक से लगता हुआ कई नाली जमीन का एक बेहतरीन टुकड़ा ख़रीद लिया है।
इन मसले पर और बातचीत हुई तो पता चला कि मोटा मोटी तौर पर फ़तेह पर्वत के इस ईलाके का एक बडा फिसद बाहार से आए व्यापारियों, व्यवसायियों और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों तथा कारकूनो की मिल्कियत हो गया है। सरकार की अनदेखी और प्रशासन की ढुलमुल नीतियों के चलते स्थानीय वाशिन्दों ने फ़तेह पर्वत की सम्रद्धि के प्रतीक पारम्परिक व्यवसाय पशु पालन और खेती बाड़ी से विमुख होकर अपनी ज़मीनें धडाधड औने-पौने में बेचना शुरू कर दिया है। भविष्य में क्या होगा, यह कोई जानना ही नही चाहता। बस, सबको पैसा चाहिए। उत्तरकाशी जिले की मोरी तहसील के अंतर्गत आने वाले, देश के इस पहाडी भू भाग के सीमान्त क्षेत्र की मेहनतकश सभ्यता की वर्तमान पीढी अपनी जमीन से लगभग बे-दखली की कगार पर है। सरकारी महकमों के समर्थन से पैसे और पहुँच वाले रूसूखदार स्थानीय वाशिन्दो की ज़मीनों पर फलोद्यान और अपने लिए अय्याशगाहें विकसित करने में लगे हुए है जबकि स्थानिक प्रत्येक की महत्वकांक्षाएं शहर की ओर मुँह बाए खड़ी है।
दिन भर के थकाऊ सफर के बाद रात में बिथरी गाँव के ज्येन्द्र सिंह के बिना खिड़की के घर पर पडाव डाला गया। रात में दिशा शौच जाने के लिए शौचालय का रास्ता पूछा तो पता चला कि जंगल में होकर आना पड़ेगा।
झाड़ू के साथ देश के प्रधान मन्त्री का प्रसिद्धि पा चुका चित्र पोस्टर के रूप में इस गाँव तक पहुँच चुका है लेकिन लगभग दो सौ से भी ज्यादा परिवारों के गाँव बिथरी में सरकारी स्कूल के अलावा दो और घरों में शौचालय बने हुए है। मंगल अभियान से गौरवान्वित होने वाले देश के इस गाँव ने अभी तक बिजली का बल्ब नही देखा है। अब ऐसे में गाँव वालो के साथ दिल्ली और देहरादून से होने वाली घोषणाओं पर बात करना ही बेमानी लग रहा था। मेहमान के मायने क्या होते है यह इनसे बेहतर कोई और शायद ही परिभाषित कर सकता होगा। बिथरी गाँव के जयेन्द्र सिंह और उसके परिवार की मेहमान नवाजी ने दिल खुश कर दिया। 
बेहतर जीवन यापन के लिए जीवों में पलायन एक प्रकृति सम्मत प्रक्रिया है। स्वास्थ्य पलायन मानव सभ्यताओं के विकास के लिए जरूरी है लेकिन किसी भी क्षेत्र के स्थानीय वाशिन्दो को मामूली लालच और राष्ट्रहित की दुहाई देकर, कभी किसी बाँध परियोजना के लिए तो कभी किसी कारखाने के लिए और कभी फ़तेह पर्वत जैसे क्षेत्रों में रूसूखदारों के व्यक्तिगत हित के लिए, सारे नियम क़ानूनों को ताक पर रख कर उन्हे उनकी पुश्तैनी बसासतों से बेदख़ल करना सरासर अन्याय है। सरकार के इसी रवैये के चलते शहरों के फुटपाथ आबाद रहते है।

भोले भाले और साधारण सोच वाले इंसानों को भारी भरकम कानून और अमीर परस्त नीतियाँ कभी समझ में नही आ सकती। उदाहरण के लिए एक तरफ जहाँ कानून यह बताता है कि दलित की जमीन किसी स्वर्ण के नाम हस्तान्तरित नही हो सकती लेकिन बावजूद इसके बिथरी गाँव सहित पहाड पर दलितों की पुश्तैनी और पट्टों के तहत हासिल जमीनों की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। एक ओर कानून गंगा और उसके जैसी अनेकों नदियों के किनारों पर मानकों के तहत पर्यटन के व्यवसाय के माध्यम से रोज़ी रोटी कमाने वाले हज़ारों कामगारों को पर्यावरण का हवाला देकर उन्हे बेरोज़गार कर देता है लेकिन वहीं दिल्ली में कल्चर फ़ेस्ट के नाम पर गंध की गाद से बजबजाती मृत प्राय यमुना के किनारे पर स्वयंभू आर्ट आफ लिविंग के रवि शंकर को उसके राजनीतिक रूसूख के दम पर ३५ लाख लोगो की भीड एकत्र करने की छूट दी जाती है। इसमे कोई दो राय नही है कि देश के जन साधारण के लिए उसका क्षणिक लाभ सर्वोपरि होता है जिसे कानून के तहत नियन्त्रित किया जाना चाहिए लेकिन दुख तब होता है जब सरकार और प्रशासन में शामिल दूर दृष्टाओं की सोच कानून को दरकिनार कर आम जनता के बजाय उनके निजी हितो तक सीमित हो जाती है।
अगले रोज निकलते वक़्त जयेन्द्र सिंह को अपना फोन नंबर देकर उसे दिल्ली आने का निमन्त्रण दिया और पलायन की कगार पर पहुचे कई पहाडो को पार करता हुआ देर रात तक अपने गाँव आ गया।

शुक्रवार, 12 मई 2017

जौनसार बावर - बदलते परिवेश में पारंपरिक त्यौहारों और आजिविका की सार्थकता

हर व्यक्ति के जीवन में मेलों ठेलों और त्योहारों का बहुत महत्व होता है। मेले और त्यौहार किसी भी सभ्यता और क्षेत्र के अतीत को जानने का उत्तम साधन होते हैं। पहाड़ा के जीवन में पैर-पैर पर आने वाली मुश्किलों,  तनाव और पीड़ा को भुलाने का साधन भी यही मेले ठेले और बार त्यौहार होते हैं। दुनिया भर के अलग-अलग समाज अपनी क्षेत्रीय मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार प्रत्येक साल के दौरान पड़ने वाली कुछ ख़ास तारीखों को मेलों ठेलों और बार-त्यौहारों का आयोजन करते है। भारत जैसे बड़े देश में साँस्कृतिक, सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं के चलते हर क्षेत्र और समाज के पारंपारिक उत्सव मनाने के अपने-अपने तौर तरीके हैं। हालांकि देश का शहरी क्षेत्र भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुका है जिसकी वजह से यहाँ त्यौहारों का स्वरुप बदल गया है लेकिन ग्रामीण समाज अभी तक इसी बहाने अपने अतीत की मान्यताओं और परंपराओं को निभाते हुए अपने पारंपारिक उत्सवों को मनाने की कोशिश करता है। भले ही रोजी रोटी के लिए विस्थापित होने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का एक बड़ा तबका और उसकी भावी पीढी शहरीकरण के प्रभाव में आकर अपनी जड़ों से कट गयी हो लेकिन बहुत से प्रवासी अभी भी अपने क्षेत्रीय मेलों-ठेलों और तीज-त्यौहारों के माध्यम से अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की कोशिश में रहते है।  

पूरे भारत में दिवाली कार्तिक माह के दौरान पड़ने वाली अमावस्या के दिन मनाई जाती है लेकिन उत्तराख़ण्ड की राजधानी देहरादून के जन-जातीय इलाके जौनसार बावर के बहुत से गावों के साथ-साथ पूरे महासू क्षेत्र, जिसमें हिमाचल के सिरमौर जिले का भी एक बड़ा हिस्सा शामिल है, यह ठीक एक माह बाद मार्गशीष महीने के दौरान पडने वाली अमावस्या के दिन मनाई जाती है। मौसमी विविधताओं और उंचाई वाले इन ईलाकों में फ़सलों की देरी से आमद को भी इस एक माह बाद मनाए जाने वाली दिवाली का एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। इसी महासू क्षेत्र का बाशिन्दा होने के चलते मुझे भी अपने यहाँ मनाए जाने वाले मेलों ठेलों और बारों-त्योहारों का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। हालांकि मेरे अपने गाँव में यह पारंपारिक पर्व अब नहीं मनाया जाता लेकिन मेरे पडौस के गाँव काँड़ोई-भरम के लोग अभी भी तीन दिन तक चलने वाले इस त्यौहार को बड़े चाव और धूमधाम से मनाते हैं। ख़ेती-बाड़ी और पशु पालन जैसे पारंपरिक पेशों से जुड़े  ख़त भरम के सीधे और सरल लोग मेरे पसंदीदा लोगों में से एक है। इनसे मेरे लगाव का एक कारण इनका पारंपरिक त्यौहारों के प्रति लगाव व चाह भी है। जलसा-पसंद कांडोई-भरम के लोगों के बारे मे हमारे क्षेत्र में एक कहावत प्रसिद्ध है कि "कांडोई का नाणसेऊ, होईसे का भूख़ा", जिसका मतलब यह है कि कांडोई के निवासी, जिन्हे नाणसेऊ कहा जाता है, उल्लास के भूखे होते हैं। ऐसे लोगों के साथ किसी मेले, जलसे या त्यौहार में शिरकत करना अपने आप में एक अनूठे और अद्भुत आनन्द की प्राप्ति जैसा है। इसिलिए मैं पिछले कई सालों से बूढी दिवाली के दौरान हर हाल में इन लोगों के बीच होने की कोशिश करता हूँ। दूर शहर में नौकरी करते हुए पहाड़ के पर्वों में शिरकत करना, वो भी तब जब आपके पर्वों और त्यौहारों के लिए आपके दफ्तर की ओर से कोई अवकाश निर्धारित न हो, अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती होती है।

क्योंकि देश भर में मनाए जाने वाली दिवाली का पर्व इस बार 30 अक्टूवर को था तो मेरा अन्दाजा यह था कि हमारे क्षेत्र में मनाएं जाने वाली बूढी दिवाली 30 नवंबर की रात के अन्तिम पहर से शुरु होगी। पिछले कई सालों से  मेरी यह कोशिश रहती है कि अपने दो चार पहाड़ प्रेमी मित्रों को साथ लेकर चला जाए ताकि वो भी हिमालय के इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के इस अनूठे रंग से वाकिफ़ हो सके। इस बार भी कुछ हम ख़्याल दोस्तों से साथ चलने की बात हुई थी। तय यह था कि 29 नवंबर रात को दिल्ली से निकला जाएगा और 30 नवंबर को गाँव पहुँचा जाएगा लेकिन इस तय शुदा कार्यक्रम में तब ख़लल पड़ा जब 27 तारीख़ को एक रिश्तेदार से यह मालूम हुआ कि बूढी दिवाली तो 29 नवंबर की देर रात से शुरु है। अन्तिम समय में मालूम पड़े इस तारीख़ी फ़ेर बदल ने मेरे सारे कार्यक्रम को सांसत में डाल दिया। साथ चलने को राजी हुए दोस्तों से जब एक दिन पहले चलने की बात की तो उन्होने असमर्थता जताई। कोई साथी न होने के बावजूद भी मैने अकेले ही जाने का मन बना लिया ।  क्योंकि मुझे 29 तारीख को दिल्ली में ही एक जरुरी काम था और इस काम से फ़ारिग होते-होते मेरा आधा दिन खर्च हो जाना था। आधे दिन के बाद दिल्ली से कांडोई-भरम, जहाँ मुझे दिवाली के मेले में शामिल होना था, वहाँ पहुँचने के लिए मेरे पास केवल 12 घंटे थे। इतने समय में दिल्ली से कांडोई-भरम का सफ़र तभी संभव था जब आपके पास व्यक्तिगत वाहन हो। या फ़िर कम से कम विकासनगर से कोई व्यक्तिगत वाहन की व्यवस्था हो। दिल्ली से केवल अकेले के लिए वाहन लेकर जाना अपने आप में बहुत बड़े खर्चे का काम है, लिहाजा विकासनगर में एक मित्र  से वाहन उपलब्ध करवाने की गुजारिश की गई।  

29 नवंबर को लगभग 2  दिल्ली से विकासनगर तक पहुँचने के लिए हरियाणा रोड़वेज की बस ली गयी और वाया यमुना नगर होते हुए पाँवटा साहिब का रुख किया गया। पाँवटा साहिब से विकास नगर लगभग 25 किलो मीटर की दूरी पर है। समय के प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए मैंने मित्र से दरख़्वास्त की कि यदि वह वाहन को पाँवटा साहिब पहुँचवा दे तो मेरी मेले में समय रहते पहुँचने की गुंजाईश और ज्यादा बढ जाएगी। नेक दिल मित्र नें हामी भर दी और अपने ड्राईवर से गाड़ी पाँवटा साहिब बस अड्डे पर ख़ड़ी करवा दी। 2 बजे दिल्ली का चलकर तीन बसें बदलते हुए लगभग साढे आठ बजे रात पाँवटा साहिब पहुँचना हो पाया।  

पाँवटा साहिब से बाद बाकी के सफ़र के लिए मेरे सामने एक सशक्त स्पोर्ट्स यूटीलिटी व्हिकल ख़ड़ा था। मेरी बूढी दिवाली के जलसे में शिरकत करने की संभावनाएं अब प्रबल हो गयी थी। रात गहरा रही थी लेकिन जानदार और शानदार वाहन हाथ में आते ही मेरी ख़ुशी और आत्मविश्वास दोनो चरम पर थे।  बिना देर किए मैंनें पाँवटा से आगे की ओर कूच कर लिया। पाँवटा का यमुना पुल पार कर ही रहा था कि तभी मित्र प्रशान्त का फ़ोन आ गया। प्रशान्त और केप्टन चेतन को मेरे आने की ख़बर पहले से थी। पता चला कि अभी वो दोनो पास में ही मेरे रास्ते में पड़ने वाले कस्बे हर्बटपुर के एक रेसंत्रा में बैठे है और मेरा इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली से निकलने के बाद रास्ते भर जल्दबाजी के चलते पानी पीने तक का ख़्याल नही रहा। फ़िल वक्त मेरा प्यास के मारे गला सूख रहा था और मुझे मामूली सी भूख़ भी लग रही थी। अगले बीस मिनट में हर्बटपुर का वह रेस्टोरेंट मेंरे सामने था जहाँ प्रशान्त और केप्टन चेतन मेरा इंतजार कर रहे थे।

अगले एक घंटे के दौरान प्रशान्त और केप्टन चेतन के साथ गपबाजी के अलावा मेरा गला और तबियत दोनो तर हो चुके थे। थोड़ी बहुत जो भूख़ लगी थी वो उस अल्प आहार की भैंट चढ गई जो साथ के साथ परोसा जा रहा था। लगभग साढे दस बजे के आस पास मैने दोनो दोस्तों से विदा ली, पास ही के पेट्रोल पंप से डीजल भरवाया और  पहाड़ों पर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

हर्बटपुर से लेकर पहाड़ पर स्थित जिस गाँव में मुझे पहुँचना था वहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। मेरे पास सीमित समय था। अमावस की अंधेरी रात में उस सुनसान सड़क पर सफ़र करना, जो ऊँचे पहाड़ों, गहरी खाईयों और जंगलों के बीच से गुजर रही हो, मुझे रोमाँचित कर रहा था। ठीक 11 बज कर 3 मिनट मैनें कालसी गेट पार किया और अगले तीन घंटों के दौरान रास्तें में पड़ने वाले पानी के धारों पर अपना गला गीला करने के अलावा लगातार चलता रहा।

रात का अंतिम पहर पार कर जब दो बजने को हो रहे थे, मैं कांडोई गाँव के सामुदायिक आँगन में था जहांँ तब तक लोग एकत्र होने शुरु हो गए थे। दिवाली के उपलक्ष में निकाले जाने वाले मशाल जलूस के लिए आँगन में ख़ड़े युवा गीत गाते हुए माहौल बनाने में लगे हुए थे। एक परिचित की नजर मुझ पर पड़ी तो वो मुझे बाँह से पकड़ कर अपने घर ले गए। फ़टाफ़ट पीना-खाना किया गया। ठीक ढाई बजे मशाल जलूस के साथ पारंपारिक गीतों पर कांड़ोई के नाणसेऊ मय अपने मेहमानों के झूमकर नाचने लगे। इस मेले में यही वह मौका था जो मेरी स्मृतियों को सदैव रोमांचित करता है। मुझे भी मेरे परिचित ने एक मशाल मुहैया करवा दी थी।   बहुत से नव युवक थे जो इस मौके पर फ़ोटो शूट और विडियोग्राफ़ी कर रहे थे। लेकिन मुझे इसके लिए फ़िलहाल फ़ुरसत नहीं थी। मेरे पास मशाल थी, मैं तो बस ढोल की थाप पर गाए जा रहे पारंपरिक गीतों से लय ताल मिलाते हुए झूमना चाहता था। मशाल जलूस गाँव के उपर वाले हिस्से में बने सामुदायिक आँगन से चलकर जब तक गाँव के निचले छोर पर बने दूसरे सामुदायिक आँगन तक पहुँचा तब तक मैं मय साथियों के पसीने से तर बतर हो चुका था।

उसके बाद फ़िर से पंक्तिबद्ध गीतों का दौर चला जो सुबह रात खुलने के साथ खत्म हुआ। सुबह एक बार फ़िर गाँव के निचले आँगन से, जहाँ रात के अंतिम पहरसे गीत गाए जा रहे थे, एक जलूस की शक्ल में वापिस उसी आँगन की ओर चल दिया जहाँ से रात मशाल जलूस शुरु हुआ था।
एक दिन पहले दिल्ली से लेकर कांड़ोई तक लगातार दौडने और रात भर जागने के कारण मुझे अब जोर की नींद आ रही थी। थकान इतनी थी कि मैं किसी परिचित के घर जाने की बजाय उपर सड़क में खड़ी गाड़ी में जाकर पड़ते ही सो गया।

नींद खुली तो तेज रफ़्तार रात के बाद का सुस्त दिन लगभग आधा गुजर चुका था। दिन के तीन बज रहे थे और भूख़ के मारे बुरा हाल हो रहा था। मैं अब सड़क से नीचे गाँव में नहीं जाना चाहता था क्योंकि वहाँ जाने के बाद मेरे परिचित लोग मुझे फ़िर उस दिन लौटने नहीं देते जबकि मुझे एक दूसरे गाँव कुनुवा जाना था। गाड़ी से बाहर निकला तो सामने एक छोटी सी दुकान दिखाई पड़ी। मैंने वहाँ जाकर बिस्कुट के दो पेकेट लिए और गाड़ी अगले गाँव कुनुवा की ओर दौड़ा दी। थोड़ा आगे चलने के बाद सड़क के किनारे पानी के धारे के पास गाड़ी रोकी और ताजा पानी के साथ भरपेट बिस्कुट खाए। आगे कुनुवा की ओर जाते वक्त सडक के नजदीक पड़ने वाले गाँवों ठारठा और पिंगुआ में भी दिवाली के दूसरे दिन का जश्न चरम पर था। हर गाँव की भांति इन गाँवो में भी युवक एवं युवतियां सामुदायिक आँगन में पंक्तिबद्ध होकर गीत गा रहे थे और नृत्य कर रहे थे। गाड़ी किनारे खड़ी कर मैं भी थोड़ी देर सड़क के किनारे खड़ा होकर उनको  देखता रहा और फ़िर आगे कुनुवा गाँव की और बढ गया।   

कुनुवा में मुझे प्रदीप के घर जाना था। कुनुवा ख़त भरम का सबसे ऊँचाई पर बसने वाला गाँव है। देवदार के जंगल से सटे इस गाँव में एक जमाने के दौरान इस वक्त तक बर्फ़ गिर जाया करती थी लेकिन इस बार तो इस पूरे इलाके में सावन से लेकर अब तक आसमान ने एक बूँद भी नहीं बरसायी है। प्रदीप मेरे गाँव के स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा का छात्र है प्रदीप के घर जाने के कारण के बारे में अगली बार विस्तार से लिखूंगा। 

जब मैं कुनुवा गाँव में पहुँचा तो सूरज ढलने को हो चुका था। गाँव के आँगन में स्वांग कर रहे जोग़टों का नाच चल रहा था। मैने एक युवक से प्रदीप के बारे में पूछा तो उसने झट से प्रदीप को सामने कर दिया।  प्रदीप अपने एक छोटे भाई और इकलौती दस वर्षीय बहन के साथ मेरे गाँव हटाल में रहकर स्कूल पढते हैं जबकि प्रदीप के दो बड़े भाई इलाहबाद में प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी करने के लिए गए हुए हैं। प्रदीप के घर पर उसकी दादी, उसकी माँ और उसके दो पिताजी रहते हैं। प्रदीप के बड़े पिताजी गाय, बैल और बकरियों की देखभाल करते हैं जबकि छोटे वाले पिताजी पास ही के गाँव में शिक्षा मित्र है जो स्कूल के बाद और छुट्टियों के दौरान गाँव में खेती बाड़ी और घर के रोजमर्रा के काम सम्हालते हैं। हाड़-तोड़ मेहनत के बाद प्रदीप का परिवार प्रदीप, उसके भाईयों और बहन को बेहतर शिक्षा दिलवाना चाहता है। शिक्षा मित्र के तौर पर मिलने वाली थोड़ी सी तनख़्वाह के अलावा बच्चों पर खर्च करने के लिए आय के साधन खेत की उपज और पालतू पशु है। आय के इन्हीं स्रोतों के सहारे प्रदीप का परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने देख रहा है। अपने  दो बच्चों को इलाहबाद और तीन बच्चों को घर से अलग रख कर किराए का कमरा लेकर पढाना आर्थिक रुप से कितना  मुश्किल है, सोचा जा सकता है। लेकिन फ़िर भी प्रदीप के परिवार की प्राथमिकता अपने सभी बच्चों को पढा लिखा कर उन्हे सरकारी मुलाजिम बनता हुए देखने की है। वे जानते है कि पहाड़ पर आने वाले समय में पारंपारिक श्रम के सहारे पेट पालना दिन ब दिन मुश्किल होता जाएगा। बेमौसमी सब्जियों, फ़लों, जैविक खेती और उत्कृष्ट पशुपालन के लिए एक आदर्श क्षेत्र होने के बावजूद भी ये लोग नहीं चाहते कि इनकी भावी पीढियाँ अपने पुश्तैनी पेशों से जुड़ी रहें। ख़ेती बाड़ी और पशुपालन को आधुनिक और उन्नत बनाने हेतु वैज्ञानिक प्रयासों के प्रति सरकार की उदासीनता नें पहाड़ के इस समृद्ध पेशे की दुर्गत बना डाली है। क्षेत्र की ऐसी परिस्थितियाँ केवल यहाँ के बाशिन्दों के लिए ही घातक नहीं है, पहाड़ की उस परिस्थितिकी के लिए भी घातक है जिसके नाम पर दिल्ली देहरादून से लेकर पेरिस तक सेमिनार आयोजित किए जाते हैं और तथाकथित कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की एक अच्छी ख़ासी भीड़ पल रही है।  

कुनुवा गाँव में प्रदीप का घर सामुदायिक आँगन के पास ही था। चाय पीने के बाद आँगन का रुख किया गया जहाँ स्थानीय लोग इस मेले में आए मेहमानों के साथ गीत गाते हुए पंक्तिबद्ध होकर नृत्य कर रहे थे।  थोड़ी देर रुकने के बाद, लगभग सात बजे के आस पास मैंने प्रदीप को थकान और नींद हवाला दिया और वापिस उसके साथ उसके घर लौट आया। बेवक्त खाए गए बिस्कुट के कारण भूख लगभग खत्म थी। लेकिन फ़िर भी मैनें थोड़ा- बहुत खाना खाया और सो गया। सुबह उठा और भादों में उनसे फ़िर आने का वादा कर अपने अगले पड़ाव चकराता की ओर चल दिया।

कुनुवा से निकलने के बाद मेरा अगला पड़ाव लीला का गाँव च्यामा था। लीला का गाँव  जौनसार में लाखामण्डल के नजदीक पड़ता है। लीला पंत नगर विश्व विद्यालय से कृषि विज्ञान में डाक्ट्रेट की पढाई कर रही है। वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद लीला मेरी बहुत अच्छी मित्र है। वो  मेरे लिखे हुए को पढती है और मेरा लिखा हुआ अपने पिताजी को भी पढाती है।  लीला ने मुझसे कई बार कहा था कि वो मुझे अपने पिता जी से मिलवाना चाहती है। पिछले दिनों उससे बात हुई तो पता चला कि वो भी बूढी दिवाली के दौरान अपने घर जा रही है।

मेरे पास अभी पूरा दिन बाकी था और मुझे लीला के गाँव जाने के अलावा चकराता में केप्टन चेतन से भी मिलना था। चकराता से लाख़मण्डल को जा रहे सड़क मार्ग पर  ग्वासा पुल के नजदीक केप्टन चेतन का होटल है। जंगलात चौकी पहुँच कर केप्टन चेतन को फ़ोन किया तो पता चला कि वो फ़िलहाल अपने होटल में हैं। 

अगले आधे घंटे बाद मैं केप्टन चेतन के पास था। केप्टन चेतन भारतीय सेना में अधिकारी थे, स्वैछिक अवकाश लेकर आए इस युवा ने अपने पिता और भाई के साथ होटल का कारोबार सम्हाला। मेहमान नवाजी में दक्ष चेतन ने उन्नत और आधुनिक सूचना तकनीक को माध्यम बना कर देश भर के पहाड़ प्रेमी पर्यटकों को अपने इस होटल की ओर आकृषित किया है। यही वजह है कि उनका यह छोटा सा होटल हमेशा सभ्य पर्यटकों से आबाद रहता है।   

भीमकाय काले रंग की चट्टानों को चीर कर उतरते एक हिम युगीन गदेरे के अवशेष के एक ओर पहाड़ी शैली में बने इस भव्य होटल के बगल में केप्टन चेतन की कच्चे फ़र्श वाली साधारण सी रिहायशगाह है। मैं वहीं जाकर पसर गया। मैं पिछले दो दिनों से नहाया नहीं था। कांडोई में दिवाली की रात को धूल भरे आँगन में नाचते गाते हुए मैं पूरा का पूरा धूल से सना पड़ा था। मैने चेतन से नहाने के लिए गर्म पानी की फ़रमाईश की तो उसने तुरन्त गर्म पानी उपलब्ध करवा दिया। गुसलखाने से नहाकर बाहार निकला तो टेबल पर रख़ा लजीज नाश्ता मेरा इंतजार कर रहा था।

नाश्ता करने के दौरान और उसके बाद हमने ख़ूब गप्पें लड़ाई। पर्यावरण को लेकर संवेदनशील रहने वाले केप्टन चेतन की चिन्ताएं पहाड़ के नदी-गदेरों और जंगलों में बेतरतीबी से फ़ैल रहे प्लास्टिक कचरे को लेकर है। केप्टन चेतन अक्सर आस पास के स्कूल के बच्चों साथ मिलकर गाँवो और सड़क किनारे उग आयी बस्तियों, जंगलों और गदेरों से प्लास्टिक कूड़ा एकत्र कर उसे डंप करते रहते है। लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में चेतन का यह प्रयास ऊँट के मुँह में जीरे जैसा है। हमारी बातचीत का सिलसिला काफ़ी देर तक चलता रहा। मुझे लीला और उसके परिवार से मिलने के लिए उसके गाँव की ओर निकलना था। मैंने चेतन से विदा ली और दूर तक फ़ैली विहंगम क्वाँसी घाटी की सर्पीली सड़क पर नीचे की ओर उतरने लगा।

इस रास्ते पर तकरीबन पन्द्रह साल बाद मेरा जाना हो रहा था। मुझे इस रास्ते में पड़ने वाले गांवों, छोटे टोलों और मंजरों के बारे मे कोई विशेष जानकारी नहीं थी।  लीला के जिस गाँव च्यामा मुझे जाना था मैं उसके बारे में अनभिज्ञ था। दोपहर पार हो चुकी थी ऐसे में लीला के गाँव कैसे पहुँचा जाए, इसी उधेड़ बुन में मुझे अपनी एक पुरानी मित्र दीपा याद हो आई जो आजकल इसी क्षेत्र के विभिन्न गाँवों में ग्रामीणो के साथ जीविकोपार्जन के क्षेत्र में काम कर रही है। दीपा को फ़ोन किया तो पता चला कि वो अपनी टीम के साथ उसी तरफ़ के एक गाँव मिंडाल में है जिस तरफ़ से मैं जा रहा था। जिस वक्त मैने दीपा को फ़ोन किया उस वक्त वो अपनी टीम के साथ एक गाँव में ग्रामीणों के लिए चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्यस्त थी। जब मैनें दीपा से लीला के गाँव चलने की गुजारिश की तो उसने इस शर्त पर हामी भर दी कि वो अपना काम खत्म होने के बाद ही वहाँ चल पाएगी । दीपा द्वारा बताए गए नियत स्थान दाँवा पुल पर मैं उन लोगों का इंतजार करने लगा। दिन ढलने को हो रहा था कि तभी दीपा और उसके सहकर्मी वहाँ पहुँच गए और मैं उन लोगों के साथ-साथ लीला के गाँव की ओर चल पड़ा।

हम जब लीला के गाँव च्यामा पहुँचे तब तक अच्छी खासी शाम होने को थी। लीला का गाँव मुख्य सड़क से थोड़ा सा उपर की ओर हट कर एक ताजा खुदे संपर्क मार्ग से जुड़ा है। गाँव में जहाँ सड़क की हद खत्म हो रही थी मैने वहाँ गाड़ी किनारे खड़ी की और लीला को फ़ोन मिला दिया। जब लीला को मैने यह कहा कि मैं तुम्हारे गाँव में ख़ड़ा हूँ तो उसे एक बार को तो इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन जब मैने उससे कहा कि वो फ़टाफ़ट सड़क पर पहुँचे, तब जा कर उसे यकीन आया। कुछ ही देर में चहकती हुई लीला सड़क की ओर आती हुई नजर आने लगी। लीला से मेरी यह पहली मुलाकात थी। सहज और सरल ह्र्दय लीला नें बड़ी गर्मजोशी के साथ हमारा इस्तकबाल किया। वो बहुत खुश नजर आ रही थी।

जनजाति क्षेत्र होने के कारण हाल वक्त तक जौनसार बावर के अधिकतर युवाओं की प्राथमिकता और ध्येय स्नातक स्तर की सरकारी नौकरी हासिल करना होता है। यहाँ ऐसे बिरले ही युवा होंगे जो उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपना हुनर आजमाने की सोचते होंगे। मुझे लगता है कि लीला जौनसार बावर की पहली लड़की होगी जो कृषि विज्ञान में डाक्ट्रेट करने जा रही है।

लकड़ी और पत्थर की जुगलबन्दी से बना लीला का पुश्तैनी घर बहुत ही सुन्दर था। सारे महासू क्षेत्र में थोड़े बहुत बदलावों के अलावा एक समय इसी प्रकार के घर मिलते थे। लेकिन जब से जंगल सरकार नें अपने कब्जे में ले लिए तथा सीमेंट सरिया इस क्षेत्र में.पहुँचने लगा तब से यहाँ के बाशिन्दों नें इस शैली के मकानों को बनाना लगाभग बन्द ही कर दिया है। लीला ने अपने घर पर सबसे पहले हमारा परिचय अपनी दादी से करवाया। लीला की दादी एक ख़ुशदिल और खूबसूरत महिला है। उसके बाद लीला के भाई-बहन और उनकी माँ से मिलना हुआ। उस वक्त लीला के पिता जी घर पर नही थे। लीला परिवार के सभी लोगों से मेरा परिचय अपने अन्दाज में करवा रही थी। लीला के गाँव में भी बीत चुके कल दिवाली का मेला था। जब तक चाय बनकर तैयार हुई, लीला ने तब तक हमारे सामने अखरोट परोस दिये। लीला मुझे अपने पिताजी से मिलवाने हेतु बहुत उत्सुक्त थी। चाय पीते पीते लीला दो बार अपने पिताजी को जल्दी घर पहुँचने के लिए फ़ोन कर चुकी थी। थोड़ी देर बाद लीला के पिता जी भी पहुँच गए। 

लीला के पिताजी से मिलने की मेरी भी दिली तमन्ना थी। हमारे जौनसार में आज भी अभिभावको़ का एक बडा तबका अपनी लडकियों के हुनर और इच्छाओं को दरकिनार कर उनके विवाह की जल्दबाजी में रहता हैं। ऐसे में लीला के पिता का अपनी बिटिया को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित और प्रोहत्साहित करना उनकी प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। जातिवाद और लैंगिक रुढियों में जकडे इस क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति से मुलाकात अपने आप में एक सुखद एहसास था। ऐसे अभिभावक का होना अपने आप में खुशकिस्मती है। जौनसार के समाज और परंपराओं को लेकर काफी देर तक बातचीत करने के बाद मैने लीला के परिवार से विदा ली और आगे बढ गया।

अगला पड़ाव लाखा मण्डल था। शाम को यहाँ दीपा और उसके सह कर्मियों से उनके काम काज को लेकर लंबी बातचीत हुई।

दीपा समग्र आर्थिक विकास परियोजना,एटी इंडिया (एप्रोप्रियेट टेक्नोलॉजी इंडिया) व द हंस फाउंडेशन द्वारा वित्तीय सहयोग से संचालित एक परियोजना के लिए बतौर परियोजना प्रबंधक काम कर रही है।  पिछले वर्ष जुलाई से दीपा अपने विशेषज्ञ सहकर्मियों के साथ कृषि, पशुपालन और बागवानी के क्षेत्र मे चकराता की इस घाटी में कार्यरत हैI इनकी इस परियोजना का उद्देश्य जौनसार के इस क्षेत्र के 60 गांवों में काश्तकारों व उत्पादकों के साथ डेरी, मधुमक्खी पालन व सब्जी एवं बागवानी विकास हेतु रोजगारपरक गतिविधियाँ आयोजित कर उन्हें सतत आर्थिक व सामाजिक विकास प्रक्रिया से जोड़ना है I परियोजना, ए.टी इंडिया के मूल उद्देश्य “पर्यावरण से उद्यमिता विकास” को लेकर  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से  3200 परिवारों के साथ काम कर रही है I इनके द्वारा संगठित 103 स्वयं सहायता समूहों और 67 उत्पादक समूहों के माध्यम से प्रस्तावित गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं। इन्होने हाल तक 1262 स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष रूप से शामिल किया हैं I इनके द्वारा साथ के साथ स्वयं सहायता समूहों में लघु बचत के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे महिलाएं आत्म निर्भर बनें और सामाजिक रूप से भी उनकी स्थिति में सुधार आये I


इस परियोजना के तहत डेयरी विकास एवं पशुपालन को बेहतर आर्थिकी का माध्यम बनाने के लिए भी ग्रामीणो को प्रेरित किया जा रहा है जिससे वे पशुपालन का दोहरा लाभ प्राप्त कर पायेंI पशुपालन खेती के लिए तो सहयोगी हैं ही यदि दुग्ध उत्पादन की मात्रा बढे तो दूध बेचकर भी आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है I उत्पादक समूह से जुड़े उत्पादकों को कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से उन्नत नस्ल की गाय या भैंस की प्रजाति विकसित करने हेतु क्षेत्र के युवाओं को उत्तराखंड लाइव स्टॉक डेवलपमेंट  बोर्ड द्वारा 4 माह का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे वे भविष्य में क्षेत्र के उत्पादकों को अपनी सेवाएं प्रदान कर स्वयं के लिए भी रोज़गार के अवसर पैदा कर पायेंI इन लोगों को भरोसा है कि जल्द ही इस क्षेत्र की महिलाएं उन्नत पशुपालन से उत्पन्न दूध को प्रस्तावित दुकान के माध्यम से बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर पाएंगीI   

कृषि, पशुपालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी की उन्नत और आधुनिक तकनीकों और जानकारी से लेस समग्र आर्थिक विकास परियोजना की यह टीम और इनकी यह संकल्पना पहाड़ के परंपरागत अर्थ तंत्र को पुनर्जीवित करने  का काम कर सकती है। अगर यह लोग अपने मिशन मे सफल होते है तो इस क्षेत्र का सांस्कृतिक और सामाजिक ताना बाना, जो नौकर परस्त शिक्षा प्रणाली के चलते अपनी पहचान खोने की कगार पर पहुँच चुका है, अपनी सार्थकता साबित कर सकता है। जौनसार बावर का हर त्यौहार किसी दैवीय योग से नही बल्की पशुपालन और कृषि जैसे पारंपारिक व्यवसायों से जुड़ा हुआ है। ऐसी परियोजनाएं यदि अपने उद्देश्य में कामयाब हो जाती है तो लोग अपने पारंपरिक व्यवसायों के आधुनिक और उन्नत हो जाने से अपनी जड़ो से जुड़े रहेंगे और क्षेत्र के पारंपारिक त्यौहार, रिति रिवाज भी अपने मूल रुप के साथ बचे रहेंगे। लेकिन यह तभी स़भव होगा जब क्षेत्र के राजनीतिक और सामाजिक अगुआ समग्र आर्थिक विकास परियोजना के इन दक्ष कर्मियों का सहयोग करेंगे। 

इस प्रकार की योजनाएं इस क्षेत्र के लिए ही नही बल्की पूरे जौनसार बावर के निवासियों के लिए वरदान साबित हो सकती है। ऐसी ही परियोजनाएं लीला, प्रदीप या उसके जैसे युवाओं को पढ लिख जाने के बावजूद भी अपने पारंपारिक जीविकोपार्जन के प्रति गौर करने को प्रेरित कर सकती है। ऐसी परियोजनाओं की उपलब्धि यह होगी कि जौनसार बावर के युवा महानगरों की भीड़, भागदौड़ और प्रदूषण, जिसकी हालिया उपलब्धि अनेकों जानलेवा बीमारियां है, की बजाय जीवन यापन के लिए गाँव की शांत और साफ सुथरी आबो हवा को चुन सकते हैं।  लेकिन वर्तमान में जौनसार बावर की बड़ी समस्या जनप्रतिनिधियों की ठेकेदार मानसिकता है। राजनीतिक मूल्यों मे हो रही लगातार गिरावट के चलते आबाद हुई मुफ्तखोरी की लत ने भी क्षेत्र के लोगों को काहिल बना दिया है।  'हम क्या हासिल कर सकते हैं' की बजाय 'मुझे क्या मिलेगा' जैसी मानसिकता के चलते इस परियोजना के कर्मियों को क्षेत्र में काम करने में कठिनाईं हो सकती है क्योंकि यहाँ  सरकार की तरफ से गरीब गुरबों और दलितों की तरफ आने वाली हर ईमदाद यहाँ के अधिकतर अर्द्ध शिक्षित ठेकेदार जन प्रतिनिधि, नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों की मिली भगत से कागजों में ही ठिकाने लगा देते हैं। मैं जौनपुर रवाँई और बावर जौनसार के ऐसे बहुत से तथाकथित किसानों को जानता हूँ जो फाईलों में फसल उगा कर सरकार की तरफ से मिलने वाले अनुदान और ईनाम ईकराम देहरादून में ही कागजी खेल खेलकर झटक लेते है। ऐसे में इस परियोजना की सफलता को लेकर अभी से किसी नतीजे पर पहुँचना अपने आप में जल्दबाजी होगी। 

अगले रोज अल सुबह आर्थिक विकास परियोजना की परियोजना प्रबंधक दीपा और उसके सहकर्मियों को उनकी मेहमान नवाजी का शुक्रिया अदा करते हुए विदा ली और बर्नीगाड़ के रास्ते उस भरोसेमन्द वाहन पर सवार होकर वापसी की राह पकड़ ली जो खराब से खराब रास्ते को आसान तथा आरामदायक बनाता है और किसी बुज़ुर्ग की तरह रोज सुबह सफर शुरू करने से पहले जरूरी हिदायतों के साथ-साथ सीट बेल्ट नजर अंदाज करने या दरवाज़ा खुला रहने जैसी ग़लतियों पर डपट भी देता है।

-सुभाष तराण