बुधवार, 12 दिसंबर 2018

महासू क्षेत्र तथा उसके भ्रम और भ्रांतियाँ

बहुत सारे लोगों टौंस और यमुना के बीच बसे भूभाग को, जिसमे जौनसार, बावर, देवघार, बंगाण, पर्वत और रवाँई, शामिल है, पाँडवों और कौंरवों से जोड़ने की भरसक कोशिश में रहते हैं। ऐसे लोगों का आधार इन क्षेत्रों में प्रचलित बहु पति प्रथा और कुछ भागों में पाँड़व नृत्य का होना बताया जाता है। हिमालय के इतिहास से अन्जान और धार्मिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित ये लोग शायद ही इस बात को जानते हों कि हिन्दू कुश से लेकर तिब्बत तक जितनी भी बसासतें हैं उनमे पिछली सदी के मध्य तक बहु पति प्रथा का वैध चलन था। पश्चिमी हिमालय की निचली बसासतों और गढवाल-कुमाऊँ के पहाड़ी क्षेत्र में काफ़ी पहले उत्तर भारत के मैदानों से आए राजपूतों, पुरोहितों और पंड़ो के प्रभाव, जीवन यापन के पारंपारिक तरीकों में ह्रास और रोजगार के लिए पलायन के चलते वहाँ यह प्रथा भले ही विलुप्त हो गई हो लेकिन अपने मजबूत ताने बाने के लिए प्रसिद्ध महासू क्षेत्र में यह प्रथा इसकी परंपराओं में पिछली सदी के अन्तिम दशकों तक विद्यमान रही और अभी भी यहाँ इसके इक्का दुक्का उदाहरण देख़ने को मिल ही जाते है।
जहाँ तक महासू क्षेत्र में पाँडव और उनके नृत्य की बात है तो उनका आगमन इस क्षेत्र में उन्नीसवीं सदी में उस दौर के बाद का है जब अंग्रेजों नें यमुना के किनारे बसे लाख़ामंडल, जिसका स्थानीय नाम धड़ा-मड़ा था, को ख़ोज निकाला। तंत्र मंत्र और पूजा पाठ को व्यवसाय कि तरह करने वाले गढवाल और टिहरी में फ़ैले कुछ पुरोहितों और पंडितों को जैसे ही इस बात की भनक लगी कि लाखामंडल में बौद्ध मठ, मंदिर और मूर्तियाँ मिली है, उन में से बहुत से लोग जीविकोपार्जन के लिए यहाँ आ गए और इस स्थान को पांडवों से जोड़ कर अपने पारंपरिक व्यवसाय को चलाने के लिए इसका प्रचार प्रसार करने लगे। 
अंग्रेजों द्वारा मिट्टी में दबे लाखामंडल की खोज के पुख्ता प्रमाण उनके गजेटियर्स में सपष्ट रुप से मिलते हैं। यमुना घाटी, पर्वत और जौनसार बावर में पाँडवों और पाँडव नृत्य का प्रचार प्रसार वहीं से हुआ है। मैं किसी और की बात नहीं कर रहा हूँ, मेरे गाँव में जो पाँडव है, उनकी चौंरी (मन्दिर) हमारी पैतृक जगह पर विद्यमान है। आज भी पांडवों के खजाने का हिसाब किताब मेरे छोटे दादा जी रखते है। उसका कारण यह है कि पांडवों को गाँव में लाने वाला व्यक्ति हमारे परिवार का एक पूर्वज धूड़ू था। सन् 1862-72 के सेटिलमेंट की तस्दीक से पता चलता है कि धूड़ू उस वक़्त हमारे परिवार का मुखिया था। वह पांडव कहाँ से, कैसे और क्यों लाया, इस बात से पांडवों के महासू क्षेत्र में स्थापित होने का समय लगभग स्पष्ट हो जाता है। 
1815 के बाद जब अंग्रेजों नें जौनसार बावर को अपने कब्जे में लिया तो उन्होने सबसे पहले इस क्षेत्र का अपने अधिकारियों से उचित सर्वेक्षण करवाया। जौनसार बावर क्षेत्र से अधिकतम राजस्व हासिल करने के लिए अंग्रेजो ने इस क्षेत्र में दोहन की संभावनाओं के लिए यहाँ होने वाली पैदावार और पशुपालन सहित सामाजिक, साँस्कृतिक, भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों की पड़ताल करवाई और फ़िर इसी को आधार बनाकर जौनसार बावर के काश्तकारों पर लगान ठहराया। जौनसार बावर में जहाँ एक ओर बेश कीमती जंगल थे वहीं दूसरी और अनाज और पशुओं से समृद्ध भोले भाले मेहनत कश लोग थे। जौनसार बावर की जमीनी तहकीकात में अंग्रेजों ने पाया कि इस क्षेत्र के लोग जातिवाद और अंध विश्वास की एक ऐसी व्यवस्था में जकड़े हुए हैं जो प्रशासनिक तौर पर अंग्रेजी हुकूमत के लिए बहुत ही फ़ायदेमन्द साबित हो सकती है। अंग्रेजों ने केवल यहाँ के चौंतरूओं, स्याणो और महासू के उस वक्त के वजीर करम सिंह को अपने प्रभाव में ले लिया। उन्हे यह बात अच्छी तरह से मालूम हो गयी थी कि इस क्षेत्र की आस्थावान जनता चुपचाप चौंतरूओं, महासू के वजीर और स्याणों के पीछे हो लेगी। 
महासू क्षेत्र  के मूल निवासी आदिकाल से न्याय और स्वास्थ्य के लिए महासू देवताओं पर निर्भर रहते आए है। इस क्षेत्र के निवासी अपने इन देवताओं को  अपने जीवन और आकांक्षाओं की सुरक्षा का आश्वासन मानते हैं। आज भी यहाँ के एक बड़े तबके के लिए महासू देवताओं का भरोसा ही न्यायाधीश और डाक्टर है। कोई माँग हो या मुराद, झगड़ा फ़साद हो या हारी बीमारी, महासू क्षेत्र से संबधित अधिकतर लोग आज भी ऐसे मसाईलों के निदान हेतु महासू देवताओं की शरण में जाते है।  ये देवता आज भी इन लोगों पर किसी भी आई गई बला से टकराने की हिम्मत का काम करते हैं। 
 महासू क्षेत्र की जिस खत (पट्टी) में मेरा गाँव सैंज पड़ता है उसका नाम देवघार है। देवघार और बावर दोनों खतों को ईलाका टौंस नदी के आर पार का क्षेत्र पड़ता है। सन् 1827 में अंग्रेज बहादुर मेजर के फेड्रिक यंग नें महासू के वजीर करम सिंह को बावर देवघार क्षेत्र का सर्वे सर्वा घोषित कर दिया था, लिहाजा बावर देवघार के सभी स्याणे लगान करम सिंह वजीर के माध्यम से अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़ज़ाने में जमा करवाते थे। शुरूआती वर्षों मे तो करम सिंह वजीर स्याणों से लगान वसूली तक ही सीमित रहा लेकिन आने वाले समय में वह अपने रुतबे में इज़ाफ़ा होने के चलते टौंस के किनारे के उपजाऊ ख़ेड़ों को कब्जाने की फिराक में लग गया। उसने  सबसे पहले देवघार के खेड़े गयराणु, मणोर और रिशाणू को हथिया लिया। उसके बाद उसने हमारे गाँव के मुखिया को खेड़े हटाल को छोड़ देने का फ़रमान सुना दिया। 
हमारे गाँव के मुखिया उस समय अमर सिंह था जो कि धूडू का बड़ा भाई था। करम सिंह की भभकी ने उसका पारा गरम कर दिया था लेकिन उसका छोटा भाई धूड़ू एक आस्थावान व्यक्ति था। उसे पूरा भरोसा था कि इस मामले में महासू देवता उनके साथ ज़रूर न्याय करेंगे। उसने माली (जिस पर देवता अवतरित होता है) बुलाकर महासू की पूछ की। महासू देवता ने उसे आश्वासन दिया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे एक दिन करम सिंह वज़ीर अपने आदमियों को लेकर खेड़े हटाल में आ धमका और खेतों में काम कर रहे मज़दूरों को दंड स्वरूप प्रताड़ित करने लगा। उन्हीं मज़दूरों में से एक आदमी जो उस वक़्त दिशा शौच के लिए जंगल झाड़ी गया था, अपने साथी मज़दूरों को सज़ा पाता देख सीधा सैंज गाँव की तरफ़ भागा। 
हाँफता काँपता मज़दूर सैंज गाँव के नीचे खेतों में पहुँचा ही था कि  उसे अफ़ीम के खेत में काम करता हुआ मुखिया अमर सिंह दिख गया। उसने अमर सिंह को एक साँस में सारी बात बता दी। अमर सिंह ने आव देखा न ताव। कुर्ती पहनी और सीधा हटाल गाँव की तरफ़ दौड़ पड़ा। 
जेठ महीने की सुलगती दोपहर का समय था। हटाल की रैतीली मिट्टी आग उगल रही थी।  करम सिंह वज़ीर ने सारे मज़दूरों को धूप में पंक्तिबद्ध खड़ा कर उनके सर पर पहले एक पत्थर का टुकड़ा और फिर उस पर एक बड़ा सा पत्थर रखवाया हुआ था। इस बर्बर सज़ा के चलते कुछ मज़दूर तो बेहोश हो गए थे। जो खड़े थे उनकी भी टाँगे काँप रही थी। अमर सिंह ने यह सब देखा तो आग बबूला हो उठा। उसने सबसे पहले तो मज़दूरों के सर पर रखे पत्थरों को फिंकवा दिया फिर पलट कर घर के बरामदे में नीचे को टाँगे लटकाए बैठे करम सिंह वज़ीर को टाँग से पकड़ कर खैंचा और नीचे कीचड़ में गिरा दिया। महासू का वज़ीर होने के चलते उसे सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस ईलाके का कोई भी बाशिंदा उस पर हाथ डाल सकता है। करम सिंह के धराशायी होते ही उसके साथ आए उसके आदमी भाग खड़े हुए। तमतमाए अमर सिंह ने करम सिंह वज़ीर की तसल्ली बख़्श मरम्मत कर डाली। करम सिंह वज़ीर जैसे तैसे जान बचा कर भागा और सीधा अंग्रेज़ बहादुर के दरबार में कालसी पहुँच गया। 
अंग्रेज़ बहादुर को आप बीती सुनाने के बाद करम सिंह ने सीधी शर्त रखी कि उसे किसी भी क़ीमत पर अमर सिंह की जान चाहिए। वह उनके लिए अब तभी करेगा जब अमर सिंह की निर्जीव देह उसके सामने होगी। चालाक अंग्रेज़ बहादुर ने उसी वक़्त एक कारिंदा भेज कर सैंज गाँव के स्याणा अमर सिंह को जितनी जल्दी हो सके, कालसी हाज़िर होने का सम्मन जारी कर दिया। 
बूते से बहादुर और ख़्याल से भोले भाले अमर सिंह को फिरंगियों से न्याय की उम्मीद न के बराबर ही थी। लेकिन वह चाहता था कि अंग्रेज़ी हुकूमत को उसका पक्ष भी तो पता चले। वह घर से कालसी के लिए निकल पड़ा। कालसी में उस दौरान जकातियों का थाना होता था। अमर सिंह सीधा वहीं पहुँचा और वहां अपनी बात रखनी चाही लेकिन अंग्रेज़ बहादुर ने करम सिंह वज़ीर को ख़ुश करने के लिए बिना किसी सुनवाई के ही अमर सिंह की हत्या करवा दी। 
अगले रोज़ कालसी से हाट लेकर लौट रहे चिल्हाड़ गाँव के लोगों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने दूर पार की बात तथा रिश्तेदारी का वास्ता देकर जकातियों से स्याणा अमर सिंह की लाश लेकर उसकी अंत्येष्टि कर दी और उसका लोईया ( महासू क्षेत्र में पहना जाने वाला एक क़िस्म का ऊनी कोट) और डिगुआ (ऊन की टोपी) को उसकी हत्या की ख़बर के साथ उसके  गाँव सैंज भिजवा दिया। महासू के प्रति अगाध आस्था रखने वाला धूड़ू अपने भाई की हत्या की ख़बर सुनकर विचलित हो उठा। उसने तय किया कि वह कालसी जाकर अपने भाई की हत्या के ख़िलाफ़ अंग्रेजी हुकूमत के पास अपील करेगा। 
धूड़ू गाँव के अपने एक ख़श साथी को साथ लेकर कालसी जा पहुँचा लेकिन वहाँ उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। उसका दुख दूना हो उठा। इसी दौरान उसे और उसके साथी को कालसी में एक गढ़वाली ब्राह्मण मिला। धूड़ू को दुखी देखकर जब उसने उसकी परेशानी का सबब पूछा तो धुड़ू ने उसे सारी बात बता दी। धूड़ू की बात सुनकर वह कहने लगा कि अंग्रेजों के साथ मुक़ाबला करना आदमियों का बस नहीं है। तुम्हारे देवता ने तुम्हारी मदद नहीं की। तुम मेरे साथ धड़े मड़े चलो, वहाँ पांडव प्रकट हो रखे हैं। तुम उनको अपने गाँव लेकर जाना, वे वजीर और इन फिरंगियों से तुम्हारा बदला पूरा कर देंगे। 
आस्था जब तर्कहीन हो जाती है तब वह अंधविश्वास में बदल जाती है। गढ़वाली पंडित उन्हें धड़े-मड़े ( आज के लाखामंडल) ले गया। यही वह समय था जब जौनसार बावर से लेकर पर्वत, सेराईं और रवाईं तक के भोले भाले लोग पांडवों की महिमा सुनकर किसी चमत्कार की उम्मीद में उनके प्रतीकों  को अपने यहाँ प्रस्थापित कर रहे थे। 1817  में ब्रिटिश सर्वेयर जनरल एच एल हर्बट  द्वारा खोजा गया मिट्टी में दबा हुआ धड़ा-मड़ा तब तक पंडों और पुरोहितों के प्रपंच से लाक्ष्यागृह और लाखामंडल में तब्दील हो चुका था। वहाँ रोज़ पांडव नृत्य होता और वहाँ किसी चमत्कार की उम्मीद में आस पास के ईलाको से आए लोगों को गढवाल से आए पुरोहितों द्वारा पांडव स्थापित किए जाने की विधि बताई जाती।  
 भाई की हत्या के दुख और महासू देवताओं से हताश निराश धूड़ू को पांडवों की महिमा सुनकर बड़ा संबल मिला। वह प्रतीक चिन्ह लेकर अपने गाँव लौट आया और अपने गाँव में पांडवों की स्थापना कर उन मे रम गया। मानव सभ्यता का अतीत गवाह है, कि कैसे अंध विश्वास सूखे घास में लगी आग की तरह तेज़ी के साथ चारों ओर फैल जाता है। लाखामंडल से पांडव महासू क्षेत्र के एक बड़े भाग में फैल गए लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि पुरातत्व विदों की पड़ताल के दौरान लाखामंडल में पांडवों से संबंधित अभी तक एक भी साक्ष्य नहीं मिला है।  
बहुत से लोग महासू क्षेत्र में प्रचलित शांठी और पांशी शब्द को कौंरव और पांडवों से जोड़ते है जबकि  इस क्षेत्र में गाए जाने वाले एक अदद गीत के अलावा कौंरवों का कहीं और कोई ज़िक्र ही नहीं होता। शांठी बील (देवघार बावर से पीछे का ईलाका जिसकी सीमा एक समय में सतलुज तक होती थी) और पांशी बील (बंगाण से पीछे का ईलाका, जिसकी सीमाएँ मांझीवन तक होती थी) महासू क्षेत्र के दो ऐसे भाग है जिन्हे किसी जमाने में महासू भाईयों की सहूलियत के लिए विभाजित किया था। पांशी बील का देवता पवासी है जबकि शांठी बील में बोठा और बाशीक महासू की मानता होती है। महासू भाईयो में चालदा चलायमान रहने वाला देवता है जो 24 से 36 वर्षो के अंतराल में महासू क्षेत्र में एक फेरा पूरा करता है। 
वक़्त के साथ दुश्मनियाँ दोस्ती में तब्दील हो गई। अंग्रेज़ों और राजशाही का दौर चला गया और देश में लोकतंत्र ने दस्तक दी। देश की संवैधानिक व्यवस्था नें इस क्षेत्र के लोगों को पढने लिख़ने के समान मौके मुहैया करवाए और लोग सम्मानजनक रोजगार पाने लगे। लेकिन पढ लिख़ जाने और रोजगार पाने के बाद भी यहां के लोगों का एक बड़ा तबका इसे अपने देवताओं की कृपा ही मानता है। इस क्षेत्र में हज़ारों सालों से विद्यमान आस्था और अंध विश्वास को गिनती के लोगों द्वारा तर्कों की कसौटी पर कसा जा रहा है। इधर डेढ़ सौ सालों के दौरान पांडव भी वैसे ही महासू क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा हो गए जैसे एक वक़्त में राजों रजवाड़ों, पुरोहितों और गोरख पंथियों को इस क्षेत्र की संस्कृति ने ख़ुद में एकाकार कर लिया था। इसमें कोई दोराय नहीं है  बाहर से आए लोग और प्रतीक इस क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा हो गए लेकिन यहाँ की आस्था का केन्द्र तो फ़िलहाल केवल और केवल महासू और उनके नायब ही  हैं, और कोई नहीं। 

-सुभाष तराण

सोमवार, 12 नवंबर 2018

सौदा


वैसे तो उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में प्राकृतिक आपदाएं अपना कहर अमूमन साल दर साल बरपाते रहती है लेकिन जब से भारतीय राजनीति की कोख नें विकास को जन्मा है तब से इनकी मारक क्षमता कई गुना अधिक हो गई है। पहले के समय में पहाड़ पर यहाँ के बाशिंदों का इन आपदाओं से निपटने का अपना एक स्थानीय तरीका होता था लेकिन विकास के पैदा होते ही सरकार के लिए आपदाओं के मायने ही अलग हो गए।
ऐसे ही एक बार की बात है। उत्तर भारत के एक पहाड़ी राज्य के सुदूर गाँव के उपर आषाढ महीने की एक काली रात को अचानक से बादल फ़ट पड़े और आपदा आ गई। इस अचानक आई आफत से लोगों के घर और माल मवेशी पानी के सैलाब में बह गए। गाँव में आपदा के कारण हुए नुकसान की सुबह में जब सरकार को जानकारी हुई तो उन्होनें आनन फ़ानन में आपदा संबंधित विभाग को राहत सामग्री की व्यवस्था करने के आदेश जारी कर दिये। आदेश का तुरन्त पालन हुआ। अगले कुछ घंटों में मातहतों के अमले ने सरकार को सूचित किया कि राहत सामग्री की खेप पहाड़ पर चढने को तैयार ख़ड़ी है। सरकार ने जब भेजी जाने वाली राहत सामग्री मौका मुयायना किया तो पाया कि राहत सामग्री से भरे कई ट्रक पंक्तिबद्ध खड़े होकर सरकार द्वारा हरी झण्ड़ी दिखाए जाने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। मौका मुयायना करने के दौरान  सरकार ने मातहतों से पूछा,
-ट्रकों में लदी राहत सामग्री बाँटने कौन जा रहा है?'
मातहतों की टोली में एक उम्र दराज अफ़सर विनम्र भाव से बोला,
-सर, इसकी जिम्मेदारी तो अमूमन संबंधित क्षेत्र के परगना अधिकारी और तहसीलदार को दी जाती है।
सरकार अफ़सर की बात सुन कर बिगड़ते हुए बोले,
'यह क्या बात हुई भला? इन प्रशासनिक अधिकारियों को राहत सामग्री के वितरण से दूर रखा करो। एक तो ख़ैरात बाँटने के बाद ये लोग खुद को खलीफ़ा समझकर नौकरी करने की बजाय नेता बनने के ख़्वाब पालने लगते है, दूसरे, विपक्ष यह अफ़वाह उड़ा सकता है कि यह राहत सामग्री तो उन के प्रयासों से भिजवाई जा रही है। मेरा मानना है कि ऐसे कामों के लिए तो किसी ऐसे आदमी को भेजना चाहिए तो हमारी पार्टी का भले ही न हो लेकिन हमारी पार्टी का विश्वासपात्र हो।'
क्षेत्र में राहत सामग्री बाँटने किसे भेजा जाए, इस विषय पर सरकार और मातहतों के बीच गहन मंथन चल ही रहा था कि तभी सरकार के सामने सुरक्षा कर्मियों को ठेलते हुए एक स्वनाम धन्य बुद्धिजीवी आ धमके। उनको देखते ही सरकार ने मुस्कुराते हुए कहा,
'अरे! हमे आपका ही इंतजार था। आईए, आईए।'
बुद्धिजीवी पैंतीस डिग्री झुके, आँखे बन्द की और सरकार को प्रणाम करते हुए कहने लगे।
‘मेरे अहोभाग्य कि आपने मुझे याद फ़रमाया। मैं तो आपके दर्शन को ही इधर आया था।’
सरकार ने मुस्कान को और गहरा करते हुए अपने मक्खन से मुलायम चेहरे को और मुलायम किया और कहने लगे,
'मैं जानता हूँ आप मानवता और पहाड़ को लेकर बहुत चिंतनशील रहते है।  पहाड़ पर ऐसी कोई जगह नहीं होगी जहाँ आप नहीं गए होगें। आपकी धर्म निरपेक्ष प्रवृति को कौन नहीं जानता। विपक्ष की नालायकी और अदूरदर्शिता के चलते मैं आपके लिए अभी तक कोई ऐसा पद सृजित नहीं कर पाया जो आपके रुतबे को चार चाँद लगा देता और आप भी शहर के वातानुकुलित दफ़्तर में बैठ कर पहाड़ की सेवा सुश्रूषा करते। इसका मुझे खेद है, लेकिन यकिन मानिए, यदि मैं पहाड़ के कल्याण को लेकर कोई आयोग बनाने में सफ़ल रहा तो उसका आयुक्त आपको ही बनाया जाएगा।'
गला ख़ख़ारते हुए सरकार ने थोड़ा विराम लिया और एक बार फ़िर से बुद्धिजिवी के गले में बाहँ डालते हुए कहने लगे,
-ख़ैर, ये तो रही बाद की बात। अभी आपके लिए एक जरुरी काम आन पड़ा है। मैं जानता हूँ कि जिस काम को मैने आपके लिए तय किया है उस काम को आपके सिवाय कोई और ठीक से कर ही नहीं सकता।'
यह सुनकर तथा कथित बुद्धिजीवी की आँख़े डबडबा गयी। वे कहने लगे,
‘बताईए बीर भड! मुझे आपके लिए क्या करना होगा। आपके लिए तो जान भी हाजिर है?'
जान देने की बात सुनकर सरकार नें बुद्धि जीवी को हिकारत भरी नजरों से देखा लेकिन तुरत ही परिस्थिति अनुसार अपनी आवाज में दर्द को गहरा किया और कहने लगे,
-आपको पहाड़ के गाँव में बादल फ़टने की घटना के बारे में तो मालूम ही होगा। आपदाएं भले ही जनता के जान माल के नुकसान का कारण बनती हो लेकिन राजनीति के लिए यह वरदान की तरह होती है। खास कर मेरे लिए तो। आपको भी यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि पार्टी के भीतर और बाहर मैने अपने प्रतिद्वन्दियों को आपदाओं के माध्यम से ही ठिकाने लगाकर यह पोजिशन हासिल की है। मैं नहीं चाहता कि पार्टी या सत्ता के भीतर और बाहर के मेरे प्रतिद्वन्दी इस आपदा के बहाने मेरे लिए कोई नया बख़ैड़ा ख़ड़ा करे। बाहर राहत सामग्री से भरे कुछ ट्रक ख़ड़े है। मैं चाहता हूँ कि आप इन ट्रकों में से एक ट्रक छाँट लें और आपदा ग्रस्त ईलाके में जाकर प्रभावित लोगों में हमारी सरकार की तरफ़ से इसमे लदी राहत सामग्री बाँट आएं।'
बुद्धिजीवी सरकार के परम भक्त थे। परजीवी होने के नाते वैसे तो वे किसी भी मालदार और रसूखदार के आगे पूँछ हिला लिया करते थे लेकिन सरकार ने उन्हे सत्ता में आते ही अपना पालतू बना लिया था। सरकार जब कभी भी मुसिबत में होते, बुद्धिजीवी सरकार के लिए, सरकार की तरफ़ से सरकार के विरोधियों पर दिल से भौंकते। सरकार के बहुत से मातहतों को पता था कि बुद्धिजीवी सरकार के मुँह लगे हैं। इनके सामने जब कभी या जब कहीं सरकारी महकमों का कोई मातहत पड़ता, ये गुर्रा या गिड़गिड़ा कर उससे कुछ न कुछ झटक लेते और अपनी भावी शाम गुलजार करते। सरकार से अपनी नजदीकियों का फ़ायदा ये सरकार के मातहतों से ही नहीं, हर उस व्यक्ति से उठा लेते जो इनके झाँसे में आ जाता। सरकार को इनके बारे मे सब जानकारी थी। सरकार को मालूम था कि इस किस्म के लोग भले ही देश दुनिया की संस्कृति, इतिहास, भूगोल राजनीति और नैतिकता की बात हाँकते हो लेकिन अपने मामले में ऐसे लोग पेट की क्षुब्धा से उपर नहीं उठ पाते। सरकार को इनकी खूबियों और खामियों का अच्छी प्रकार से भान था। बुद्धिजीवी भी अक्सर सरकार की शरण में आ धमकते ताकी सरकारी मातहतों और व्यापारियों पर उनका दबाव बना रहे। आज भी रोटी-बोटी की गरज के चलते वे किसी ठेकेदार के काम को लेकर सरकार के सम्मुख हाजिर हुए थे लेकिन राहत सामग्री के वितरण के कार्यभार की बात सुनते ही अब वे उसे भूल चुके थे। बुद्धिजीवी के ख़्यालों में अब राहत सामग्री से भरा ट्रक था और आपदा में तबाह हुए लोगों को देने के लिए भाषण था। सरकार नें दरबार को बर्ख़ास्त करते हुए मातहतों को निर्देशित करते हुए कहा,
 'आपके सम्मुख जो मान्यवर खड़े हैं वो नितांत निरपेक्ष व्यक्ति है। यह ऐसे व्यक्ति है जिन्हे हमारे वर्तमान लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष से भी उपर  रख़ा जाता है। इनसे राहत सामग्री के सारे ट्रकों की पावती लेकर, एक ट्रक़ इनके हवाले कर दिया जाय। आपदा सामग्री से लदे बाकी ट्र्कों को अगला आदेश मिलने तक यहीं रहने दिया जाए। ख्याल रहे, ये हमारे मित्र सरीख़े है। इन्हे किसी भी किस्म की कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। और हाँ, इन्हे फौरन से एक राजकीय वाहन उपलब्ध करवाया जाए ताकी इन्हे आपदा क्षेत्र में भ्रमण के दौरान किसी किस्म की दिक्कत पेश ना हो।'
बुद्धिजीवी गुरु चेला परंपरा को मानने वाले व्यक्ति थे। उन्होने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया था वो केवल और केवल चेलागिरी और चमचागिरी कर ही हासिल किया था। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर थोपी गई शिक्षा पद्वत्ति का वे उतना ही विरोध करते थे जितना आजादी के दौरान स्वतंत्रता सैनानी फ़िरंगी हुकूमत का विरोध किया करते थे। बुद्धिजीवी अपने प्रवचनों में भले ही प्रगतिशील विचारों को महत्व देते थे लेकिन वे स्वंय ऋषि मुनिंयों वाली परंपरा के वाहक थे। उनका विश्वास था कि जैसे राजा का अस्तित्व आज्ञाकारी प्रजा से निहित है वैसे ही अपने ईर्द गिर्द गुजारे भर के चेलों का अपने गुरु के प्रति समर्पण अत्यन्त आवश्यक है। बुद्धि जीवी अपने चेलों और चाहने वालों को अक्सर बताते कि वे विचारों से भले ही प्रगतिशील हो लेकिन वे संबंध  तो ऋषि के कुल से ही रखते हैं।  ऋषि कुल में जहाँ गुरु-चेला परंपरा के द्वारा पीढियों से अर्जित ज्ञान एक पीढी से दूसरी पीढी को स्थान्तरित किया जाता वहीं चेलों के संख्या बल द्वारा गुरु की पोजिशन तय करने में की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन बुद्धिजीवी इस परंपरा को इतना ही मानते थे जितने में इनका काम चल जाय। इन्हे ज्ञान को दूसरी पीढी तक पहुँचाने से कोई इत्तेफ़ाक न था। ये जब तक खुद चेले थे तब तक इन्होने वक्त मिलते ही अपने गुरुओं की जेबें टटोली, अब जबसे खुद को गुरु घोषित किया, तब से ये अपने चेले चपाटों की जेबें टटोलते थे। सरकार से नजदीकियों के चलते बुद्धिजीवी बहुत से युवाओं को मूर्ख बना कर उनकी जेबें झाड़ चुके थे। अपनी इस परंपरा के तहत बुद्धिजीवी अपने चेलों को दुतकारते, उनसे नौकरों की तरह अपने जूते साफ़ करवाते। लेकिन जब कभी कहीं से कुछ मिलता वो उनके आगे भी ईमानदारी से डाल देते और इस तरह अपने गिनती के चेलों की नजरों में महान हो जाते। उनका समाजवाद यही था।     
बहरहाल, बुद्धिजीवी नें अपने कुछ खास चेलों को फ़ोन के माध्यम से सूचित कर डाला कि सरकार साहब के एक खास मिशन के तहत हमे कल सुबह पहाड़ के लिए रवाना होना हैं। सभी लोग फ़लाने समय तक फ़लानी जगह पर मिलें। अगले रोज सुबह के मुँह अंधेरे सरकारी मातहतों ने झटपट से एक सादे समारोह का आयोजन कर डाला और देवताओं की याद में नारियल फ़ोड़ कर राहत सामग्री की ख़ेप के सारे ट्रकों को पंक्तिबद्ध खड़ा कर एक प्रेस काँफ़्रेंस बुला ली। सादे समारोह में चाय पकौड़ों की दावत के बाद जैसे ही पत्रकार तितर बितर हुए राहत सामग्री से भरे बाकी ट्रकों को वहीं रोककर मातहतों ने मय ड्राईवर के एक सरकारी कार, दो बोतल उम्दा शराब, दो हजार के दो नए पाँच नोट और राहत सामग्री से लदे एक ट्रक को बुद्धिजीवी के हवाले कर दिया। सरकारी कार में बैठे बुद्धिजीवी नें नीयत स्थान से अपने उस दौरान के खास चेलों को उठाया और पहाड़ के आपदा ग्रस्त क्षेत्र की ओर कूच कर दिया।
आपदा से ग्रस्त लोगों के लिए राहत सामग्री से लदे ट्रक के पीछे दौड़ती कार में बैठे अमल के शौकीन चेलों ने जब अपने गुरु जी से शाम की व्यवस्था की बात की तो बुद्धिजीवी ने किसी पहुँचे हुए संत की तरह चेहरे पर हल्की सी मुस्कान ओढी और मोबाईल से आँख़ें हटाते हुए पैरों के पास पड़ी प्लास्टिक की थैली में रखी शराब की बोतलों को हाथ में उठाते हुए शाही अंदाज में कहा
‘हो जाएगा सब, चिंता क्यों करते हो, मैं हूँ न।’
-आज तो माल असबाब का पूरा का पूरा ट्रक साथ चल रहा है, ऐसे में पीने खाने की क्या चिंता,'
चेहरे पर हरामीपन की परत चढाते हुए एक चेले नें गिरोह के बीच में जुमला फैंका।
पहले चेले की बात सुनकर दूसरा चेला चेहरे पर चिंता की परत चढाते हुए बोला
-जहाँ हम जा रहे हैं वो कोई शहर या कस्बा नहीं है। एक छोटा सा गाँव हैं। वहाँ खाने की ठीक ठाक चीजें तक नहीं मिलती।
तीसरे चेले नें दूसरे चेले को डपटते हुए कहा,
-तुम गुरुजी को नहीं जानते, गुरु जी चाहें तो हवा में हाथ लहराकर दारू शिकार पैदा कर सकते हैं। आज तो वैसे भी गुरुजी जन सेवा के वास्ते पहाड़ चढ रहे हैं।
दूसरे चेले नें अपनी बची खुची शंकाओं के समाधान हेतु अगला सवाल किया
-लेकिन फ़िर भी, विषय पर बात करने में कोई बुराई थोडे ही है। गुरु जी तो वैसे भी वाद विवाद के समर्थक है।
आगे की सीट पर बैठे बुद्धि जीवी नें पीछे मुड़कर दूसरे नंबर के चेले की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा
'बच्चे, जितनी तुम्हारी उम्र है उतना समय मैने शराब और शिकार के साथ ही गुजारा है। बाकी तुम जानते ही हो हम जहाँ होते हैं, सुविधाएं हमारे आगे पीछे नत मस्तक हुए फ़िरती है।'
बुद्धि जीवी की बात खत्म होते ही सरकारी खर्चे पर दौड़ती हुई कार के अन्दर जोर का ठहाका गूँज पड़ा।
  बुद्धि जीवी नें मुनादी वाले अंदाज में चेलों को संबोधित करते हुए अपनी बात आगे बढाई
‘देखना आज तुम्हारी कैसी खातिर होती है।’  
जोशो ख़रोश से लकदक बुद्धिजीवी और उनके चेलों का दल सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई कार से ट्रक को आगे-आगे हाँकते हुए दिन के चौथे पहर तक आपदा ग्रस्त गाँव में पहुँच गए। आपदा ग्रस्त गाँव के लोगों तक राहत सामग्री पहुँचने की सूचना विश्वस्त सूत्रों के माध्यम से पहुँच चुकी थी लिहाजा गाँव के लोग पहले से ही उनके स्वागत के लिए फ़ूल मालाएं लेकर तैयार बैठे थे।
आपदा ग्रस्त गाँव में बुद्धिजीवी और उनके चेलों का स्थानीय लोगों द्वारा विधिवत स्वागत किया गया। बुद्धिजीवी नें भी एकत्र हुई भीड़ में से एक गरीब सी शक्ल वाले शख़्स को अपने पास बुलाया और चेलो की मार्फ़त अनाज-असबाब से लदे ट्रक में से एक आटे का बोरा उतरवाया और उसे लेकर उस गरीब के साथ तस्वीर उतरवानी चाही। आटे का बोरा थोड़ा वजनी था। बुद्धिजीवी नें आटे के बोरे को उठाकर जब उस गरीब को देना चाहा तो वह उनसे न हो सका। चेलों ने मदद की गुहार लगाई लेकिन बुद्धिजीवी नें सपष्ट मना कर दिया। बुद्धिजीवी अपने इस कृत्य की तस्वीर उतरवाते हुए किसी की मदद लेते हुए नहीं दिखना चाहते थे लेकिन आटे का बोरा तीस किलो का था। उम्र भर बेकाम और निठल्ले रहने वाले बुद्धिजीवी के पास इतने से श्रम के लायक भी ताकत नहीं बची थी। मौके की नजाकत को देखते हुए चेलों नें आटे के एक बोरे को ट्रक के डल्ले पर ख़ड़ा किया, तब जाकर बुद्धिजीवी आपदा राहत सामग्री बाँटते हुए अपनी तस्वीरें उतरवा सकें। चेलों ने इस समारोह की विभिन्न कोणो से तस्वीरें उतारी और बिना समय गवाँए उन्हे जय जयकार हासिल करने के लिए सोशल मीडिया पर अपने चाहने वालों के लिए यहाँ वहाँ परोस दिया।
जिस आपदाग्रस्त गाँव में बुद्धिजीवी ओर उनके चेले जनता की मदद हेतु सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई जरुरी वस्तुओं की खेप लेकर पहुँचे थे उसी गाँव में लछमन नाम के बनिये की इकलौती दुकान थी। अधेड़ उम्र का हट्टा कट्टा लछमन खानदानी बनिया था। लछमन ने अपने दादा और पिता से ख़रीद फ़रोख़्त के गुण ग्रहण किए थे। बिजनेस मेनेजमेंट के आधुनिक गुरुओं से भी पहले से लछमन को यह बात पता थी कि इस दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो बेचा या खरीदा ना जा सके। वह यह बात किसी किताब से पढकर नहीं बल्की अपने निजी तजुर्बों के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचा था। वह अपने जीवन में आबरू, आन से लेकर ईमान तक की खरीद फ़रोख्त कर चुका था। वह अच्छे से जानता था कि मजबूर की मजबूरी का फ़ायदा कैसे उठाया जाता है। वह कड़ियल सौदेबाज था। अचानक आई आपदा नें  सारे गाँव को अपनी चपेट में ले लिया था लेकिन गाँव से हटकर ऊँचाई पर होने के कारण लछमन की दुकान साफ बच गई थी। आपदा में बरबाद हुए लोग समझते कि लछमन पर ईश्वर की बड़ी कृपा है लेकिन लछमन की ईश्वर पर उतनी ही आस्था थी जितने से वो लाभ कमा सके। अपनी दुकान के बच जाने के कारण को वह बाकी आस्तिकों की तरह ईश्वर की मर्जी नहीं बल्की अपने उन बाप दादाओं की दूरदृष्टि मानता था जिन्होने दुकान के लिए ऐसी जगह का चयन किया था जो पहाड़ में होने के बावजूद लगभग हर तरफ़ से सुरक्षित थी। उसके बाप दादाओं ने ही उसे यह भी बताया था कि दूसरों पर आई आफ़त ही व्यापारियों को ज्यादा मुनाफ़ा कमाने के अवसर पैदा करती है। वह गाँव में आई इस आपदा को एक मौके की तरह देख रहा था। हालांकि गाँव के लोगों के पास कुछ ख़ास नहीं बचा था लेकिन लछमन को भरोसा था कि एक सौदागर के जीवन में कमाई के ऐसे विरले ही मौके नसीब होते हैं।
सड़क के एक ओर बनी लछमन की दुकान के ठीक दूसरी तरफ़ सरकारी डाक बंगला था। सड़क में डाक बंगले और लछमन की दुकान के बीच आपदा ग्रस्त ग्रामीणों का जमघट लगा हुआ था और उन में से कई लोग बुद्धि जीवी के लिए वैकल्पिक मंच की व्यवस्था कर रहे थे। 
लछमन बुद्धि जीवी को बचपन से जानता था। वह उसकी कमजोरियों से वाकिफ़ था। वह जानता था कि बुद्धि जीवी को शराब का ऐब है और वह बिना नशा किए हुए एक रात भी नहीं रह सकता।  वह सोच रहा था कि ये काश, इसके पास आज शराब न होती। अगर ऐसा हो जाता, तो ट्रक में लदे माल का एक बडा हिस्सा अपने गोदाम में पहुँच जाता। माल असबाब से भरे ट्रक को देख कर अब तक वह मुंह में लगातार आ रहे पानी के कई घूँट गटक चुका था। लछमन का दिल जोरों से धड़क रहा था। वह रात ढलने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। लछमन नें दिल बहलाने के लिए दुकान के अन्दर बेपरवाही से दाना चुग रहे अपने पालतू देसी मुर्गे को पकड़ कर गोद में खींच लिया और धीरे से उसकी पंखों को सहलाने लगा। जहाँ एक ओर बुद्धिजीवी अपने चेलों चपाटों, ग्रामीणों और राहत सामग्री से लदे ट्रक के साथ खड़े होकर भाषण दे रहे थे, वहीं लछमन बनिया अपनी दुकान में बैठा थड़े पर रख़ी ऊँची संदूकची को मोर्चे की तरह इस्तेमाल करते हुए सामने सड़क पर हो रही सभा पर नजर गडाए हुए मुर्गे की कलगी पर कुछ इस तरह से हाथ फ़ेर रहा था मानों वह कोई ऐसा चिराग हो जिसके अन्दर मनोकामनाओं को पूरा करने वाला जादुई जिन्न सोया पड़ा हो।
सूरज अस्त हो चुका था। बुद्धिजीवी का भाषण अपने चरम पर था। वह अपने भाषण में गाँव वालों का आह्वान कर रहे थे कि पहाड़ के लोगों को आपदा से ऐसे ही लड़ना चाहिए जैसे अंग्रेजों से भगत सिंह लड़े थे, गाँधी और नेहरू लड़े थे। आपदाग्रस्त गांव वालों के लिए बुद्धिजीवी के भाषण का लब्बों लुआब यह था कि यदि आपदाओं का अंग्रेज समझकर मुकाबला किया जाए तो वे नहीं आती। इधर बुद्धि जीवी का भाषण चल रहा था उधर चेलों का झुंड ढलती शाम के चलते बैचेनियों के साथ आस पास का मुआयना कर रहा था। अमल के मारों की यह विडंबना होती है कि वे बिना नशे पत्ते के शाम की कल्पना भी नहीं कर सकते। नशेड़ी अपने नशे की ख़ुराक को लेकर उतना ही प्रयत्नशील रहता है जितना सत्ता को लेकर नेता रहा करते है।
 बुद्धि जीवी नें सभा को विसर्जित करते हुए लोगों से कहा,
'मित्रों! शास्त्रों में कहा गया है कि शाम के समय दान क़ी वस्तुओं का वितरण शुभ नहीं होता। मैं समझता हूँ कि कल सुबह की शुभ बेला पर इसका वितरण करना उचित रहेगा। दूसरे, क्योंकि यह रसद सरकारी है इसलिए इसके वितरण के हिसाब किताब के लिए एक रजिस्टर भी बनाना पड़ेगा।'
शास्त्रों और लिखत पढत का हवाला सुनकर आपदा के कारण बरबाद हुए गाँव के धर्मावलंबी लोगों नें बुद्धिजीवी की इस बात को सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। 
बुद्धि जीवी के द्वारा सभा समाप्त करने की घोषणा के साथ ही गाँव के लोग इधर उधर हो गए। फ़िजा में अब अंधेरा तैरने लगा था। बुद्धिजीवी के आदेश पर चेलों द्वारा डाक बंगले के चौकीदार को तलब किया गया। चौकीदार हाजिर हुआ तो कार के बोनट पर अपना पिछवाड़ा टिकाए बैठे बुद्धि जीवी ने बड़े साहबी अंदाज से डाक बंगले के बुकिंग परमिट की कापी थमाते हुए उसे अपने आगामी ईरादों से अवगत करवाते हुए कहा,
'हम लोगों के लिए खाना भी बनाना पडेगा'
चौकीदार मिमियाते हुए बोला
-बना दिया जाएगा साहब, लेकिन तेल-मसाले और राशन मेरे पास नहीं है।
बुद्धिजीवी नें लापरवाही से गुटखे की पीक को सड़क पर थूकते हुए चौकीदार से कहा
'तुम उसकी चिंता न करो, तुम्हे जो-जो चाहिए, वो सारा सामान हमारे ये लड़के तुम्हे लाकर दे देंगे।'
शाम गहरा कर रात होने के मंसूबे बाँध चुकी थी। दो रोज पहले किसी अंधड़ की तरह मोटी-मोटी बूँदें बरसाने वाला आसमान आज शफ़्फ़ाक होकर ऐसा प्रतीत करवा रहा था जैसे उसे हाल के दौरान गाँव में आई आपदा के बारें में कोई जानकारी ही न हो। सरकारी खर्चे पर चल कर आई कार किसी नौकरशाह की तरह डाक बंगले के खुले पोर्च में खड़ी हो चुकी थी जबकि आपदा सामग्री से लदा ट्रक बाहर मुख़्य सड़क पर किसी प्रवासी मजदूर की तरह एक किनारे ख़ड़ा नजर आ रहा था । बुद्धि जीवी के आदेश पर चौकीदार कार में से सभी का सामान उतार कर कमरों तक पहुँचा चुका था। डाक बंगले के कमरों में सौर ऊर्जा की मंदिम रौशनी गुजारे भर का उजाला फैलानें में कामयाब होती नजर आ रही थी। जहाँ एक ओर चेले चुहलबाजी में व्यस्त थे वहीं दूसरी ओर बुद्धि जीवी प्लास्टिक की थैली में रखी शराब की बोतलों को सीने से लगाए डाक बंगले के कमरों में किसी ऐसी जगह को तलाश कर रहे थे जहाँ इसके बाद महफ़िल जमाई जा सके।
काफ़ी देर मौका मुयायना करने के बाद उन्होनें दोनो शयन कक्षों के बीच स्थित डाईनिंग कम ड्राईंग रुम को रात होने बैठकी के लिए चयनित कर लिया था। उन्होने सारी संभावनाओं पर गौर करने के बाद ही इस जगह का चयन किया और चौकीदार को आदेश दिया कि वो बाकी सारे काम छोड़ कर सबसे पहले गिलास और पानी की व्यवस्था करें। हाथ में मिट्टी तेल की ढिबरी लिए भूत की तरह नजर आने वाले चौकीदार के रुखसत होने के बाद बुद्धि जीवी ने चेलों को तलब किया और उन्हे रात के लिए खाने पीने का जरुरी सामान लाने के निर्देश देते हुए पास की ईकलौती दुकान पर भेज दिया।   
इसमे कोई दोराय नहीं थी कि बुद्धिजीवी के पास ज्ञान का अथाह भंडार था लेकिन रात होने के साथ ही उनकी शराब की तलब पराकाष्ठा के पार पहुँच जाती थी। शाम ढलते ही उनकी हालत उस नवजात बछड़े के जैसी हो जाती थी जिसने कई दिनों से थन न देखा हो। बुद्धिजीवी की बहुत सी कमजोरियों में शराब की लत एक प्रमुख कमजोरी थी। इसके लिए अक्सर वे किसी भी हद तक चले जाते थे। बुद्धिजीवी शराब को साम्यवाद का सूचक मानते थे। उनके अन्दर जो कुछ भी थोड़ा बहुत अहम और आत्म सम्मान रहता था वो उनके अन्दर केवल शराब पीने से पहले तक विद्यमान रहता था उसके बाद वे सभी जीवों को बराबर की दृष्टि से देखते थे। शराब पीने के बाद उन पर फ़कीरी सवार हो जाती थी। उसके बाद उन्हे सड़कों, नालियों और वहां ठौर बनाए पशु मवेशियों के साथ तक में लोटने से कोई परहेज न था।  
दस मिनट का समय गुजरने के बाद भी जब चौकीदार पानी और गिलास लेकर नहीं लौटा तो बुद्धिजीवी अधीर हो उठे और शराब की बोतलों वाली थैली को काँख में दबाए डाक बंगले से हटकर बाहर की तरफ़ बनी रसोई की तरफ़ चौकीदार को पुकारते हुए निकल पड़े। रसोई की तरफ़ वाले उबड़ खाबड़ और अंधेरे रास्ते में वे चार कदम ही चले थे कि अचानक उनका पैर खड़ंजे के पत्थर से उलझ गया। नतीजा यह हुआ कि चौकीदार को पुकारते हुए अपनी रौ में जा रहे बुद्धि जीवी ऐसे गिरे कि चारो खाने चित्त हो गए। उनके साथ-साथ उनकी काँख के नीचे दबी शराब की बोतलों वाला थैला जब फ़र्श पर गिरा तो फ़िजा में ऐसी आवाज गूँजी मानो किसी नृतकी के पैरों के घुँघरू टूट कर गिर गए हो। बुद्धिजीवी के जमीन पर गिरने से हुई धप्प की आवाज के बाद बोतलों के टूटने की छनकार से वातावरण में जो संगीतमय स्वर लहरी फैली वह बहुत ही हृदय विदारक थी। निपट अंधेरे में गिरने और टूट फ़ूट कि आवाज सुनते ही सामने रसोई के दरवाजे पर हाथ में मिट्टी तेल की ढिबरी लिए डाक बंगले का चौकीदार अचानक से जार्ज रामसे की फ़िल्म के भुतहा किरदार की तरह प्रकट हुआ और कहने लगा
-क्या हुआ बाबू साहब?
बुद्धिजीवी उम्मीद भरे स्वर में चौकीदार पर चिल्लाए,
'जल्दी से उजाला इधर ले आ, देख कहीं बोतले टूट तो नहीं गई है।'
 चौकीदार नें उजाला पास लाया। पत्थर के ढालदार और उबड़ ख़ाबड़ खड़ंजे पर काँच के टुकड़े प्लास्टिक की थैली से बाहर निकल कर यहाँ वहाँ बिखरे पड़े थे। थोड़ी देर पहले तक बोतल में बंद स्कॉच ढालदार और खुरदुरे फर्श से बहती हुई मिट्टी में मिल रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों बुद्धिजीवी की दुनियां ही लुट गई हो। वे तेजी से उठे और किसी प्यास से व्याकुल बैल की तरह खुरदुरे फर्श पर पड़ी शराब चूसने लगे। यह देख कर चौकीदार नें उनका कालर पकड़, कर उन्हे खड़ा करते हुए डपटने वाले अंदाज में कहा
-क्या कर रहे हो बाबू साहब? देखते नहीं, काँच बिखरा पड़ा है। काँच की एक किरचन भी पेट में गयी तो कल सुबह सीधा मुर्दाघाट पहुँचोगे। आप कमाल करते है।
  विक्षिप्तों जैसी हालत में अपने बालों को नोचते हुए बुद्धिजीवी कहने लगे।
'अरे पापी, यह सब तेरी वजह से हुआ है। तू समय से गिलास और पानी ले आता तो ये अनर्थ न होता।'
-बाबू साहब, इसमे मेरी क्या गलती है? आप इन बोतलों को कमरे में रख कर भी तो मुझे बुलाने आ सकते थे।
चौकीदार बड़े कातर स्वर के साथ अपनी बात खत्म की।
'चुप हो जा हराम खोर, बुद्धिजीवी जख्मी शेर की तरह दहाड़े।'
सदमे में पड़े बुद्धिजीवी चौकीदार को कुछ और बुरा भला कह पाते कि तभी पास की ईकलौती दुकान से लौटकर आया चेलों का झुंड सामने प्रकट हो गया। बुद्धिजीवी की नजर चेलों पर पड़ी तो वे कुछ इस तरह से असहाय होकर उनकी तरफ़ देखने लगे जैसे अभी-अभी उनके सामने उनके किसी अजीज की कोई जवान मौत हुई हो।
'सब सत्यानाश कर दिया।'
हाथ मलते हुए बुद्धिजीवी नें अपनी बात को विराम दिया।
-अरे, यहाँ तो शराब महक रही है। ये क्या हुआ गुरुजी?
चेला नंबर दो अंधेरे की बेखबरी के मारे चौंकते हुए सवाल करने लगा।
'होना क्या था, नसीब फ़ूट गए हैं। इस चौकीदार के बच्चे को आवाज देने के लिए बाहर निकला था कि अचानक अंधेरे के चलते पत्थर पर पैर पड़ा और मैं गिर गया।'
बुद्धिजीवी पश्चाताप भरे स्वर में बुदबुदाए।
-लेकिन गुरु जी, आप गिरे तो गिरे ये शराब कैसे गिर गई?
चेला नंबर दो नें काउंटर क्वेश्चन कर डाला।
बुद्धिजीवी नें झुँझलाते हुए कहा,
'अरे मूर्ख़, शराब की बोतलें मेरे हाथ में थी। मैं गिरा तो वो भी हाथ से छूट कर गिर गई। समझा कुछ, या कुछ और समझाऊँ?'
चेला झेंप कर चुप हो गया। चारों ओर चुप्पी का साम्राज्य स्थापित हो गया। जिस स्काच को उन लोगों के पेट में होना चाहिए था वो मिट्टी में मिलने के बाद भी अपने गंध से उनके नथूने फ़ड़का रही थी। उत्सव का माहौल गमी में बदल गया था। बुद्धिजीवी ने अपनी बिखरी ऊर्जा को समेटा और वातावरण में छाई खामोशी को तोड़ते हुए चौकीदार को संबोधित करते हुए कहने लगे
'यहाँ किसी के पास दारू मिलेगी क्या?'
चौकीदार ने थूक सटकते हुए कहा,
-बाबू साहब, लछमन के पास मिल सकती है। क्या मैं पता करुं?
बुद्धिजीवी नें खीजते हुए कहा, तुम रहने दो, हम खुद ही पता कर लेंगे। अब जो होना था वो हो गया, अब तुम खाना बनाओ, हम अभी आते हैं।  
-लछमन राशन देने से मना कर रहा है। कहता है वह सामान पैसे के बदले नहीं बल्की केवल सामान के बदले सामान देगा।
चेला नंबर एक निराश भाव से बोला,
‘ठीक है, ठीक है। ये हरामजादा भी राहत सामग्री का ट्रक देख कर सौदेबाजी करना चाहता है। दुनिया का दस्तूर है, हड़्ड़ी को देखते ही कुत्तों की नीयत में फ़र्क आ जाता है। खैर, तुम चलो रसोई में, हम अभी आते हैं।’ बुद्धि जीवी नें चौकीदार को आदेश देते हुए अपनी बात कर डाली।
इधर बुद्धिजीवी का मूक संकेत पाकर जहाँ चेले उनके पीछे हो लिए वहीं हाथ में ढिबरी लिए डाक बंगले का चौकीदार भी किसी पारदर्शी प्रेत की तरह फिर से रसोई में विलीन हो गया।
बुद्धिजीवी चेलों के झुंड के साथ जब लछमन की दुकान पर पहुँचा तो लछमन बनिया दुकान बढाने की तैयारी कर रहा था। लछमन को देखते ही बुद्धिजीवी नें बड़े जोशो खरोश के साथ उसे संबोधित करते हुए कहा
'प्रणाम दादा, क्या हाल खबर है?'
लछमन नें बुद्धिजीवी को गौर से देखा और फ़िर बाहर रखे आलू के बोरे को दुकान के अन्दर धसीटते हुए कहने लगा,
-सब खैरियत से है, तुम सुनाओ? अब तो बड़े आदमी हो गए हो। बड़ी खुशी हुई यह जानकर।
'बस दादा, आपके दर्शन की इच्छा हुई, सो चला आया आपके पास सोचा आपके साथ हुक्का पानी साझा करूं, इसी बहाने नई पुरानी बात भी हो जाएगी। एक सिगरेट पिला दिजिए।'
लछमन नें चुपचाप से बुद्धिजीवी को एक तीली सिगरेट थमा दी।
बुद्धिजीवी ने सिगरेट की एवज में लछमन को बीस का नोट पकड़ाना चाहा तो लछमन नें ख़बरदार की मुद्रा में हाथ उपर उठाया और कहने लगा।
-सामान के लिए पैसे का लेन देन बंद। जब तक गाँव आपदा से नहीं उबरता तब तक केवल वस्तु विनियम और कुछ नहीं। गाँधी जी भी यही चाहते थे। तुम तो अपने हो, ये सिगरेट मेरी तरफ़ से पी लो।  
'लेकिन दादा, शहर के बाजार से दुकान के लिए माल असबाब फ़िर कैसे ख़रीदोगे?' बुद्धिजीवी ने सिगरेट सुलगाते हुए सवाल किया
दुकान के किवाड़ को दुरुस्त करते हुए लछमन लापरवाह होकर बोला
-यह बाद की बात है। फ़िलहाल तो मैने यह तय किया है कि माल के बदले माल, बस, और कुछ नहीं।
बुद्धिजीवी सिगरेट के कश लेते हुए असल मुद्दे पर पहुँचने से पहले लछमन से नैतिकता को लेकर इधर उधर की बोलने बताने लगे। लछमन नें पूरे धैर्य का परिचय दिया और पूरी बातचीत के दौरान अपने चेहरे पर घाघ शिकारियों वाला छलावरण ओढे रखा। सिगरेट खत्म होने को हुई तो आखिरकार बुद्धिजीवी नें नैतिकता की सारी बातों को एक ओर धर कर लछमन से सीधा ही पूछ लिया।
'दादा, आपके पास दारू मिल जाएगी क्या?'
बुद्धिजीवी का सवाल सुनकर लछमन की बाँछे खिल गई लेकिन मजाल है कि उसने इसका कोई प्रभाव अपने चेहरे पर आने दिया हो।
-बिरादर, मेरे पास तो सब कुछ मिल जाता है। हम जैसे लोग पहाड़ के इन बीहड़ों में आखिर बैठे ही किसलिए है। हमारे पास हर किस्म का माल मिल जाता है। बस, आजकल उसकी एक शर्त है। सामान की कीमत मैं रुपयों में नहीं ले सकता।
रात गहराने को हो रही थी। रात के गहराने के साथ-साथ बुद्धिजीवी की रगों में दौड़ता लहू सुस्त पड़ने को हो रहा था। उनका दिमाग उनके दिल पर जोर ड़ाल रहा था कि अब तक शराब पेट में क्यों नहीं पहुँची। कनख़ियों से ताकते लछमन ने ताड़ लिया था कि बेचैनी के मारे बुद्धिजीवी व्याकुल हो रहे हैं। 
बुद्धिजीवी ने दुकान के अन्दर कोने में ऊंघ रहे देसी मुर्गे की तरफ़ ईशारा करते हुए लछमन की तरफ़ अगला सवाल उछाला।
ये मुर्गा भी क्या बिकाऊ है क्या दादा?
-हाँ, हाँ, मुझे छोड़कर यहाँ सबकुछ बिकाऊ है। ये दुकान मकान और इसके अन्दर की हर चीज बिकाऊ ही है।
बुद्धिजीवी ने सिगरेट को अपने जूते के नीचे मसलते हुए लछमन की तरफ़ हिकारत भरी नजर डाली और कहने लगा
दादा, हम कौन से यहाँ मुफ़्त का खाने आए हैं। ऐसा करते हैं दो बोरे आटा और दो बोरे चावल आपके लिए ट्रक से उतरवा देते हैं। बदलें में आप हमे आप रात के खाने भर का राशन और दो बोतल शराब दे दो।
लछमन ने उसकी बात को ऐसे नजर अंदाज किया जैसे सुना ही न हो। 
लछमन ने बुद्धिजीवी के अगल बगल में खड़े चेलों को एक नजर देखा और फ़िर अपनी बात को आगे बढाते हुए बोला,
-वैसे तुम्हारी और तुम्हारे चेलों की क्या कीमत होगी, बेटा?
लछमन के मुंह से अपनी कीमत की बात सुनकर बुद्धिजीवी सकपका गए। उन्होने खींसे निपोरते हुए कहा,
'आप मजाक अच्छा कर लेते हो दादा।'
लछमन उसकी बात खत्म होते ही बोल पड़ाः - इसमे मजाक की क्या बात है। ये पूरी दुनियां ही अपने आप में एक सामान है। आपके पास माल और मौका होना चाहिए, लोग झख मार कर मुंह माँगे दाम देंगें। तुम्हारी कीमत की बात इसलिए कर रहा हूँ कि तुम लोग भी मौका पड़ने पर बेश कीमती साबित हो जाते हो। लेकिन जब किसी को तुम्हारी जरुरत नहीं रहती तब तुम्हारी कोई पूछ नहीं होती। बाकी तुम समझदार हो। यहाँ जरुरत तुम्हारी है। तुम्हारे पास राहत सामग्री से भरा ट्रक है, जिसे वैसे ही लोगों के बीच बाँटा जाना है और मेरे पास तुम लोगों के लिए एक पेकेज है जिसमे चार बोतल रम, एक देसी मुर्गा और सिगरेट के पांच पेकिट, राशन अलग से। मेरा यह पेकेज तुम्हारी आज रात की जरुरत है, रही बात राहत सामग्री की तो इसे मेरे हवाले कर दो। तुम्हे तो कल वैसे भी वापिस शहर लौटना ही है लेकिन मुझे तो कहीं जाना भी नहीं हैं। तुम गाँव के कितने लोगों को जानते हो? कौन जरुरतमंद है कौन नहीं, इस बात का तुम्हे कैसे पता चलेगा, लेकिन मुझे एक-एक का मालूम है। मैं तुम्हारे काम को आसान कर सकता हूँ और मेरे पास तुम्हारी रात को रंगीन करने का सामान भी मौजूद है। मुझसे ज्यादा फ़ायदे का आदमी आज रात तुम्हारे आस पास और पहुँच में नहीं है। बाकी गेंद तुम्हारे पाले में है।
'दादा, ये तो सरासर मौका परस्ती है। आपसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी। बुद्धिजीवी अधीर होकर बड़बड़ाए।'
लछमन नें दुकान का किवाड़ बंद करने के लिए खैंचेते हुए बेरुखी से कहा,
-तो फ़िर आप अपना रास्ता नापें और मुझे बख़्शें। 
लछमन की बात सुनकर बुद्धिजीवी का संतों के जैसा चेहरा अचानक से विकृत हो उठा। बुद्धिजीवी को ऐसा महसूस होने लागा जैसे लछमन दुकान का किवाड़ नहीं बल्की फ़ाँसी का वो तख़्ता खैंच रहा हो जिस पर उन्हे गले में फ़ंदा लटका कर ख़ड़ा किया गया हो। डूबते हुए की आखिरी कोशिश की तरह बुद्धिजीवी नें दुकान के बंद होते किवाड़ के बीच में अपनी टाँग फ़साकर गिड़गिड़ते हुए कहा,
'दादा, ऐसा न करो, मुझे आपकी सारी शर्ते मंजूर है। आप बस जल्दी से एक बोतल तो पकड़ा ही दिजिए।'  
लछमन के चेहरे पर विजयी योद्धा वाली मुस्कान तैर गई। उसने दुकान एक किवाड़ को एक हाथ से बाहर की तरफ़ ठेलते हुए दूसरा हाथ दीन हीन से दिखाई दे रहे बुद्धिजीवी के कंधे पर रखा और पुचकारते हुए कहा,
-देखो भाई, मैं तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से, तुम्हारे जैसे लोगों के लिए ही तो यहाँ बैठा हूँ। क्या मैं शहर नहीं जा सकता था? मैं भी शहर चला गया होता, लेकिन पहाड़ियों की सेवा के भाव का ख़्याल मेरे मन से कभी जा ही नहीं पाया। भाषण तो वैसे भी तुम्हारा हो चुका है। राहत सामग्री मैं अच्छे से बाँट दूँगा। तुम चिन्ता न करो। अचानक लछमन को जैसे कुछ याद आ गया हो, वह सकपकाया और ख़ींसे निपोरते हुए कहने लगा
-मैं भी कहाँ प्रवचन देने लग गया। भूल ही गया था कि ये काम तो बुद्धिजीवियों का होता है। अच्छा एक मिनट रुको, तुम्हे अभी जल्दी होगी
इतना कहकर लछमन दुकान के अंदर की तरफ़ के कमरे में गायब हो गया। दुकान के बाहर खड़े बुद्धिजीवी और चेलों के चेहरे पर किसी गुजर चुके तूफ़ान के बाद वाली शान्ति छाई हुई थी। दो मिनट भी नहीं गुजरे होंगे कि लछमन टाट के एक झोले में चार बोतल रम की लेकर कमरे से बाहर दुकान में लौट आया।
-ये लो! लछमन चहका। -केंटीन का माल है। एक दम ओरिजिनल।
थैला बुद्धिजीवी को पकड़ाते हुए लछमन पलटा और दुकान के अन्दर कोने में दुबके देसी मुर्गे को दबोचकर पकड़ लिया और उसे बुद्धिजीवी के सामने कर दिया।
-पौने तीन किलो से कम माल नहीं निकलेगा। ये फ़ारम की मुर्गियों की तरह नहीं है। वो तो एक दम आलू की तरह होते हैं। इसके शिकार की तासीर इतनी गर्म होती है कि चार बोटी खाने के बाद बरफ़ में लोट जाईए, मजाल है कि खाने वाले का सर्दी कुछ बिगाड़ पाए। कोई इसकी एक कटोरी तरी पी ले, तो बड़े से बड़े नजले जुकाम से निजात मिल जाती है। तुम्हे देर हो रही होगी बिरादर, तुम थैला लेकर पहुँचो डाक बंगले। और हाँ, ट्रक ड्राईवर से कहकर जरा ट्रक मेरे गोदाम के पास ख़ड़ा करवा दो। तुम जाकर मजे से खाओ पियो, तब तक मैं भी आपदा के लिए इस राहत सामग्री को जाँच पड़ताल कर लेता हूँ। सामान ट्रक में पड़ा रहेगा तो उसका बिना बात भाड़ा देना पड़ेगा।
बुद्धिजीवी ने एक चेले को इशारे से मुर्गा पकड़ने को कहा और लछमन को मुखातिब होते हुए उसे अपनी अंतिम फरमाइश से अवगत करवाते हुए कहा
दादा, लड़कों को जरा जल्दी से सामान दे दिजिए। और हां, सबसे पहले प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलास और एक पानी की बोतल तो मुझे ही दे दो।
-अभी लो प्यारे,
लछमन ने बोतल से निकले जिन्न की तरह मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
रम का एक तगड़ा पेग बना कर एक सांस में गटकने के बाद बुद्धिजीवी ने टाट का थैला बगल में टाँगा और खामोशी के साथ डाक बंगले की तरफ़ लौट पड़े। रम पेट में उतर चुकी थी। बुद्धिजीवी के चेहरे पर पश्चाताप के कोई भाव नहीं थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बुद्धिजीवी के चेहरे के सारे गम टाट के इस थैले नें पौंछ दिए हो। लछमन की दुकान के बाहर थोड़ी देर पहले दरिद्रता का जो रुप उनके समूचे चेहरे और हाव भाव पर नजर आ रहा था, उसकी जगह अब जन प्रतिनिधियों वाली सौम्यता और गंभीरता ने ले ली थी। उनको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन्होने जो फैसला लिया है वो जनता की भलाई के लिए लिया हो। उनके चेहरे पर ऐसा आत्म विश्वास झलक रहा था जैसा उन राष्ट्राध्यक्षों के चेहरों पर दिखाई देता है जो दो देशों के बीच के सदियों से लटके मसले को सुलझाने के बाद कांफ़्रेंस रुम से बाहर निकलकर मीडिया के सामने ब्यान जारी करने के लिए जा रहे होते हैं। उनके चेले भी उनके पीछे-पीछे खामोशी के साथ डाक बंगले की तरफ चले जा रहे थे। हर तरफ शांति छाई हुई थी। अगर थोड़ी बहुत छटपटाहट कहीं थी तो वो उस देसी मुर्गे में थी जिसे बुद्धिजीवी का एक चेला  पैरों से पकड़ कर उल्टा लटकाते हुए उस रसोई की तरफ़ ले जा रहा था जहाँ डाक बंगले का चौकीदार छुरा तेज करते हुए उसका बेसब्री के साथ इंतजार कर रहा था ।


 -सुभाष तराण 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

जौनसार-बावरः अतीत से भविष्य तक


सुदूर उत्तर भारत के पहाडी प्रदेश उत्तराखंड में यमुना अपने उद्गम से लगभग सौ मील चल कर जब देहरादून जिले के पुरातन स्थल कालसी पहुँचती है तो वहाँ उसका मिलन उस टौंस नदी से होता है जो उसको अकूत जल राशी प्रदान कर उसके अस्तित्व को गंगा में विलीन होने तक बचाए और बनाए रखती है। टौंस और यमुना के बीच का भूभाग, जिसे जौनसार बावर कहा जाता है, अपनी सरल सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक मान्यताओं के चलते अपने आप में विशिष्ट पहचान रखता है। यदि हम इस क्षेत्र के हर पहलू पर गौर करें तो उत्तराखंड और हिमाचल में फैले इस वृहत भूभाग को महासू सभ्यता कहना ज्यादा सार्थक और उचित लगता है। इस इलाके के मेले ठेले हो, बार त्यौहार हो, दुख दर्द हो या खुशी गमी, आप सब जगह महासू देवताओं और उनके नायबों को शामिल पाएँगे। कृषको और पशुपालकों के यह क्षेत्र देवता यहाँ के समाज और संस्कृति में बहुत गहरे समाए हुए है। यह कहना ज्यादा सार्थक होगा कि इस क्षेत्र के निवासी और महासू देवता एक दूसरे का वजूद तय करते हैं। इस पुरातन सभ्यता के आराध्य महासू देवताओं और उनके नायबों की देवठी (मन्दिर) वैसे तो लगभग इस क्षेत्र के हर गाँव में मौजूद है लेकिन इनका मूल देवालय उसी टौंस नदी, जो यमुना की सहायक है, के तट पर हनोल नामक स्थान पर स्थित है।
यदि हम इसकी ज़मीनी पड़ताल करें तो हम पाएँगे कि इस क्षेत्र का सामाजिक और सांस्कृतिक ताना बाना यहाँ के बाशिन्दों के आराध्य महासू देवताओं और उनके नायबों के इर्द गिर्द ही घूमता हुआ मिलता है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक ताना बाना जौनसार बावर और देवघार के अलावा हिमाचल के सिरमौर और शिमला जिलों के एक बडे भाग से लेकर उत्तराखंड के उत्तरकाशी के बंगाण, पर्वत, रंवाई और टिहरी के जौनपुर तक फैला हुआ है। एक जमाने में जब हिमाचल पंजाब प्रांत का हिस्सा था तो उस समय हिमाचल का एक बडा भाग महासू के नाम से विख्यात था, और तब यह एक जिला हुआ करता था।  महासू क्षेत्र के गाँव घर मे मनाए जाने वाले बार-त्यौहारों के अलावा साल में दो बार, एक बैसाख माह में बीशू की ढाल (आराधना) और दूसरे भादों के महीने में जागरे की ढाल, दो प्रदेशों के लगभग पाँच जिलों में रहने वाले वाशिन्दो द्वारा हनोल देवालय के प्रांगण में रात गुजार कर अर्पित की जाती है। 
 यह इस महासू क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद के उदासीन राजनीति और संवेदनहीन प्रशासन ने इसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं को नजर अंदाज कर इसे अलग प्रदेशों और जिलों में विभक्त कर दिया। भले ही आज के आधुनिक दौर में न्याय और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत समस्याओं को देश और प्रदेश की सरकारें अपनी जिम्मेदारी बताती हो लेकिन इस क्षेत्र का श्रमजीवी समाज तो आज भी अपनी समस्याओं के निवारण हेतु महासू और उनके नायबों के अदृश्य प्रशासन पर ही भरोसा करता है। यह बात अलग है कि अब यहाँ चुनाव जीतना और ठेकेदारी में ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाना भी इसमे ही शामिल हो चुका है। 
मध्य हिमालय के जिस क्षेत्र जौनसार बावर से हम आते है, संयुक्तता वहाँ के समाज की विशेष पहचान और परंपरा रही है । इस क्षेत्र का टुकड़ो मे बिखरा इतिहास बताता है कि बर्बर और बहशी अतीत के दौरान टौंस यमुना का यह आदिम देश अपने समाज और संस्कृति के अस्तित्व को संगठन के बल पर ही बचाए रखने में कामयाब रहा है। यदि कोई चाहे तो आज भी इस क्षेत्र के गाँवों में जाकर सामूहिकता और सामुदायिकता को देख और सीख सकता है। शादी ब्याह, तीज त्यौहार, ख़ुशी-गमी के दौरान निस्वार्थ भाव से एक दूसरे के लिए समर्पित रहने वाले यहाँ के समाज में बहुत सारी कमियां हो सकती है लेकिन इसकी अपनी अनेकों ऐसी विशेषताएं हैं जो बिखराव के दौर में गुजर रही बाकी दुनिया के लिए भी एक सबक बन सकती है।     
रोज के रोज रोजी रोटी के लिए जंगल और जमीन से जूझने वाला जौनसार बावर का उत्सवधर्मी समाज, जो हमेशा किसी मामले या मसले पर मिल बैठ कर ही कोई राय कायम करता आया है, आज शहर में आकर एकाँकी होने की राह पर अग्रसर है। ऐसा देखने और सुनने में आने लगा है कि जब नौकरी और व्यवसाय के लिए घर से निकला कोई व्यक्ति वापिस अपने घर आता है तो  आय के आधार पर परिवार में अपना आंकलन करने लग जाता है। आर्थिक असमानता के चलते परिवार में वर्गभेद होना निश्चित है। हालांकि यह बाजारबाद के वैश्विक प्रभाव है लेकिन फ़िर भी मिल बैठकर अपनी उन पुरानी परंपराओं को संरक्षित/पुनर्जिवित करने को लेकर चिंतन मनन होना चाहिए जो हमारे परिवार और समाज को सहस्राब्दियों एक सूत्र में पिरो कर रखती आई है।  
हमारे इस जनजातीय क्षेत्र से जो लोग नौकरी पेशा या व्यवसाय में है वे तो आर्थिक रुप से  समृद्ध है लेकिन जो लोग किसी कारण वश पढ लिख नहीं पाए या जो लोग अपढ रहकर गाँव में ही खेती बाड़ी और पशुपालन से जुड़े हैं,  बड़ी चिंता उनकी है। वैसे जौनसार बावर के संयुक्त परिवारों से नौकरी या व्यवसाय के लिए पलायन कर चुके अधिकतर लोग अपने परिवारों से जुड़े रहते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से जौनसार बावर के समाज में भी अलगाव की घटनाएं देखने सुनने को मिलने लगी है। उदाहरण के लिए यदि दो सगे भाई अपनी क्षमताओं के आधार पर क्रमश: नौकरी और कृषि के क्षेत्र मे जाते है तो अगले कुछ सालों में उन दोनो की जीवनशैली में जमीन आसमान का अंतर हो जाता है। एक समय जौनसार का शहर में नौकरी या व्यवसाय कर रहा एक भाई भी गाँव के खेतों और पशुओं में खट रहे अपने भाईयों के बच्चों को भी शहर में पढाता था लेकिन अब ऐसा कम ही दिखाई या सुनाई देता हैं। जौनसार बावर के जो संयुक्त परिवार पहले अपनी एकजुटता के लिए जाने जाते थे अब वही परिवार खामोशी के साथ घर-बाहर में बंटने लगे हैं। उपभोग की संस्कृति के चलते दो सगे भाईयों के बच्चों के पहनावे और रहन सहन में यह फर्क साफ तौर पर देखा जा सकता है। 

खेत पशुओं और कृषि बागवानी के अलावा आज की तारीख में जौनसार बावर एक ठेकेदार बाहुल्य क्षेत्र है जिसमे एक बड़ा हिस्सा ऐसे अर्द्ध शिक्षित छुटभैयों का है जो राष्ट्रीय दलों के नेताओं के लिए खाद पानी का काम करते हैं।  ऐसे लोग आपको कुतर्कों के भोथरे दम पर यहाँ वहाँ आपस में सींग लड़ाते मिल जाएंगे। हमारे यहाँ से बहुत सारे लोग पढ लिख कर छोटी मोटी नौकरियों के अलावा अपनी काबिलियत के बूते पर राजकीय तथा केन्द्रीय संगठनों में अच्छे ओहदेदार भले ही हो गए हो लेकिन हम अभी तक अपने क्षेत्र को कुछ भी ऐसा लौटाने की स्थिति में नहीं है जो स्थानीय समाज और संस्कृति को समृद्ध कर पाए। देश भर में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर पहुँचने के बाद भी हमारे लोग सरकार की नीतियों को अपने दायरों में रहकर ही लागू करवा सकते हैं। जबकि आज हमारे समाज और क्षेत्र के लिए स्थानीय संसाधनो को मद्देनजर रखते हुए कुछ अलग और कुछ हटकर करने वालों की आवश्यकता है।

वैश्विकरण के चलते दुनिया की लाखों बोलियां और भाषाएं अपनी सँस्कृति समेत या तो खत्म हो चुकी है या फिर विलुप्ति की कगार पर है लेकिन फिलहाल तक जौनसार बावर का सामाजिक और साँस्कृतिक वजूद बरकरार है। इसलिए हमारी पहली जरूरत आज यह है कि सबसे पहले जातीय और लैंगिक दुराग्रहों को दरकिनार करते हुए ईमानदारी के साथ अपनी परंपराओं को पढा जाय और  मानवीय आधार पर ख़रा उतरने वाली सभी परंपराओं को समय रहते उनके संरक्षण पर जोर दिया जाए। यह भले ही  एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है लेकिन कोई मुश्किल काम नही है। यह कैसे संभव हो और इसके लिए क्या जरूरी कदम उठाने चाहिए, पढे लिखे, बौद्धिक और आर्थिक रुप से संपन्न तबके का इसके लिए आगे आना बहुत जरूरी है।

जौनसार बावर के गाँवों से भले ही अभी तक पलायन नही हुआ हो लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वह पलायन की कगार पर खड़ा है। गढवाल और कुमाऊं के उजड़े गाँवों का हश्र हमारे सामने है। वहाँ के लोग भले ही बड़े नामधारी और ओहदेदार हो गये हो लेकिन वे कई पीढी पहले अपनी जड़ों से उखड़ चुके हैं। अभी जौनसार बावर के गाँवों में उसकी संस्कृति और समाज की जड़े हरी है। शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर जाना कोई बुरी बात नहीं है। बिना बाहर गए कुछ भी देखा और सिखा नहीं जा सकता। लेकिन यदि हम कहते हो कि हमे अपनी संस्कृति, समाज और भाषा से प्यार है तो हमे वापिस अपनी जड़ों को लौटना पड़ेगा। उसका फायदा यह होगा कि बाहर रह कर आया व्यक्ति अपने परिवेश मे लौटने के बाद अपने समाज को एक नई दिशा दे सकता है। वह दुनिया भर से बहुत कुछ देख और सीख कर आता है। वह अपने साथ बहुत कुछ नया लाता है।  बाहरी दुनिया के संपर्क में रह कर आए व्यक्तियों के साथ रहने से परंपराएं और धारणाएं विकृत होने से बची रहती है। भले बुरे की परिभाषाएं वक्त के साथ बदलती रहती है।  बोली-भाषा और संस्कृति के अस्तित्व के लिए स्थानीय परिवेश और एक शिक्षित समाज का होना बहुत जरूरी है। हम देहरादून, दिल्ली, मुंबई में रहकर अपनी संस्कृति, बोली और बार त्यौहारों को नही बचा सकते।   इसका वर्चस्व तभी कायम रह सकता है जब यह लोक से जुड़ी हो और यह बिलकुल सपष्ट है कि लोक का सृजन वैश्विक नहीं हो सकता, लोक तो परिवेश आधारित होता है। 
 जौनसार बावर का समाज सहस्राब्दियों से अपने संसाधनों पर निर्भर रहता आया है। जौनसार बावर के लोग तब भी तो जीवन यापन करते थे जब उसका बाहर की दुनिया से कोई लेना देना नहीं था।  प्राकृतिक आपदाओं के चलते जहाँ हिमालय के बाकी इलाके और लोग अनेकों बार तहस नहस हुए वहीं टौंस और यमुना के बीच का यह प्रायद्वीपीय क्षेत्र प्राकृतिक वरदान के चलते अपनी आदिम संस्कृति के साथ सहस्राब्दियों से आज दिनाँक तक आबाद है। दुनियाँ भर में वही सभ्यताएं और समाज अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे हैं जिन्होने वक्त के साथ अपनी परंपराओं का निष्पक्ष अवलोकन किया है। जौनसार बावर की जरुरत भी यही है। मानव समाज में पशु और कृषि उत्पादों की माँग हमेशा रहेगी और जौनसार बावर के लोग इस क्षेत्र में परंपरागत रुप से जुड़े हुए है। बेमौसमी जैविक सब्जियों, फ़लों और पशु उत्पादों के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र की जरुरतें बिलकुल सपष्ट है कि कैसे स्थानीय संसाधनों के दोहन के तरीकों को उन्नत और आधुनिक बनाया जाए और इसके लिए हम क्या कर सकते हैं इस पर विचार करना बहुत जरुरी है। नौकरियों के लिए पलायन करने के बाद जौनसार बावर की संस्कृति, बोली और बार त्यौहार को बचाने की बात बिलकुल बेमानी है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर जागरुकता और शौध की बहुत ज्यादा जरुरत है। आजीविका के क्षेत्र में पर्यटन एक नया उद्योग है जिसमे समृद्ध रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। किसी भी क्षेत्र की पहचान उसकी बोली भाषा, बार-त्यौहार और रहन-सहन से होती है। यह पहचान तभी है जब वहाँ लोग रहते हो। यही लोग उस क्षेत्र की संस्कृति के वाहक होते हैं। ये लोग कैसे समृद्ध हो, इस बात पर जोर देने की जरुरत है। हम लोग इसके लिए अब तक सरकारों के भरोसे रहते आए हैं लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम सरकार के भरोसे रहने की बजाय अपने लोगों को आत्म निर्भर बनाने के लिए कमर कस लें। हमारे लोग समृद्ध होंगे तो हमारी संस्कृति समृद्ध और दिर्धायु होगी।          
इस में कोई दो राय नहीं है कि जौनसार बावर का समाज जातिवाद और अंधविश्वास जैसी कुरितियों से आज भी ग्रस्त है। दुनिया भर के प्रत्येक समाज में भी तो थोड़ी बहुत खामियां होती ही है लेकिन वह तभी दूर हो पाती है जब उस समाज के लोग उसकी बेहतरी के लिए चिंतन मनन करें। हमे यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जौनसार बावर को जनजाति का दर्जा देश की सवैधानिक व्यवस्था ने दिया है यह किसी देवता का चमत्कार नहीं है। दुनियादारी को समझने के लिए अंध विश्वास की बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन मुद्दों पर ख़ुल कर बात होनी चाहिए जो मनुष्यों-मनुष्यों में भेद करते हैं। दूसरों की बात भी सयम के साथ सुनी जानी चाहिए और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उस पर अमल किया जाना चाहिए।


हमे एक बात हमेशा याद रख़नी होगी कि एक मानवीय और संवेदनशील समाज के लिए लगातर संवाद और वैचारिक मंथन बहुत जरुरी है।

जौनसार का सूदूर गांँव ख़ारसी



जौनसार के स्थानीय त्यौहार नुणाई के दौरान मायके आई लड़कियां मेहमान नवाजी के लिए जाती हुई

जमीन और आसमान के मिजाज को पढने वाले जौनसार के पशु पालक

-सुभाष तराण

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

एक अदद सी ये उम्र गुजर क्यों नहीं जाती, 
आस उसके लौटने की मर क्यों नहीं जाती?

वैसे तो चला जाता है सब कुछ जहान से, 
ये दर्द की सदाएं मगर क्यों नहीं जाती ?

मैंने भी उसकी यादों से दो टूक कह दिया, 
जाता जिधर है वो तुम उधर क्यों नहीं जाती ? 

जिस शय को देख के है दिल का हाल ये हुआ 
उस तक हमारे दिल की खबर क्यों नहीं जाती ? 

जिनके किए करे को भुगतता है जमाना 
उनकी बलाएं उनके ही सर क्यों नहीं जाती?

 -सुभाष तराण