हल्द्वानी शहर में नवागंतुक होने के कारण मुझे मित्र चन्द्रशेखर करगेती बस अड्डे छोड़ आये थे।
शाम के साढे पाँच बजे के आस पास दिल्ली
जाने वाली बस का कंडक्टर सवारी बिठाने में व्यस्त था। मूलतः डीडीहाट के रहने वाले
बस ड्राईवर पाण्डे जी गुटका खाने और बीड़ी पीने की अनवरत कार्यवाही को छोड़
शारीरिक रुप से काफ़ी धार्मिक प्रतीत हो रहे थे। माथे पर लम्बा देसी सिन्दूर का
तिलक, कमीज के कालरों के बीच से झाँकता जनेऊ और सर पर चोटी जिसमें बड़े ही अनुशासित
तरीके से गाँठ लगाई गई थी। परिचय हुआ, थोड़ी देर की बातचीत और परशुराम के वंशज
होने के कारण हम दोनो में अच्छी आत्मियता हो गयी। पाण्डे जी ने आचार सहिंता का
खुलेआम उल्लंघन करते हुए एक नीरीह से नेपाली को डपट कर पीछे बिठाते हुए मुझे अपने बगल वाली सीट, जो काफ़ी सुविधाजनक होती है,
उपलब्ध करवा दी। ठीक छः बजे बस हल्द्वानी बस अड्डे से प्रस्थान कर गई। शहर से
बाहार निकलते-निकलते बस में सवारियां पूरी हो चुकी थी। पंतनगर से जो सवारियाँ बस
में चढी उनके लिए सीट का कोई इंतजाम नहीं था, उन्हे उसी तरह सफ़र करना था जैसे हमारे देश
की तीन चौथाई जनता सफ़र करती है। उन्ही सवारियों में एक लड़की ने, जो दिखने मे काफ़ी खूबसूरत थी,
ड्राईवर साहब से अपने लिए एक अदद सीट की गुजारिश कर डाली । ड्राईवर साहब नें आदेशात्मक आवाज में कंडक्टर
को युवती की समस्या से अवगत करवाया। कंड़क्टर साहाब ने पूरी बस का मुयायना करने के पश्चात मेरी बगल में
बैठे एक कमजोर से व्यक्ति को उठने के निर्देश जारी किये और उसकी जगह उस खूबसूरत
युवती को सीट दे दी गई। इस सारी घटना के दौरान मैं किसी प्रबुद्ध नागरिक की तरह
किताब पढने में व्यस्त रहा तथा यह सोचता रहा कि शुक्र है कंडक्टर ने मुझे उठने
के लिए नहीं कहा।
रुद्रपुर से निकलते ही उत्तराखण्ड
की सीमा समाप्त होने और उत्तर प्रदेश की सीमा आरम्भ होने का सहज ज्ञान आपको सड़कों
पर हिचकौले खाते समाजवाद के रुप में हो जाता है जब सवारियों के घुटने, कोहनी और
यदि लापरवाह रहे तो उनके सर तक लोहे की बस से टक्कर ले सकते है। इस स्थिति में नौकरी
के लिए जूझ रहा विद्यार्थी नहीं पढ सकता तो मेरी पढने की भला क्या बिसात होती।
मैं तो वैसे भी समय गुजारने के लिए पढ रहा था और साथ ही अन्धेरा भी हो चला था।
मैंने किताब बन्द की तो युवती ने किताब के शीर्षक को लेकर बातचीत की पहल की। बातचीत
शुरु हुई तो पता चला की लड़की का नाम शमा नाज़ है, रामपुर की रहने वाली है और अपनी
एक मित्र जो पंतनगर में रहती है, को मिलने यहाँ आयी थी।
थोड़ी देर की बातचीत के बाद आज
की युवा सोच की अच्छे बुरे की परिभाषा, जो हिन्दुस्तान के अन्य युवाओं की तरह
ही थी, से वाकफ़ियत हुई। लड़की में गजब का आत्मविश्वास था। बातचीत का तरीका और सलीका
प्रभावशाली था। बस ड्राईवर पाण्डे जी बस हांँकते हुए भी हम दोनो के बीच हो रही बातचीत को ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश
कर रहे थे कि हम दोनो के बीच हो रही बातचीत उनके दिमाग में घुमड़ रहे विचारों के आस
पास है या नहीं। उन्हे बस के शोर मचाते ईंजन पर बड़ा गुस्सा आ रहा था क्योंकि ईंजन हमारे
बीच की बातचीत पाण्डे जी तक पहुँचने में बाधा पहुँचा रहा है।
उबड़ ख़ाबड़ सड़क पर चल रही बस की सीट पर अपने आप को टिकाये रखने की
जद्दोजहद में रामपुर आ गया। लड़की को यहीं उतरना था। उसने एक सभ्य नागरिक की तरह मुझसे
हाथ मिलाया और बस से उतर गयी। पाण्डे जी ने हिकारत भरी नजर लड़की पर डाली और बस आगे
बढा दी। लगभग दस मिनट की चुप्पी के बाद पाण्ड़े जी ने मेरी तरफ़ मुखातिब होते हुए ईंजन
के शोर को कुचलने की चेष्ठा के साथ लगभग आधी बस की सवारियों को सुनाते हुए कहा,
"क्या कह रही थी?"
मैंने सुनने के बावजूद भी चेहरे पर
प्रश्नवाचक भाव लाकर पाण्डे जी को ऐसा महसूस करवाया जैसे मुझे कुछ सुनाई ना दिया
हो। पाण्डे जी ने तत्काल स्थितियों से समझौता करते हुए अपना ध्यान सड़क पर केंद्रित
कर दिया।
इस क्षेत्र में सड़कों की जगह
टोल टैक्स बूथों के निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है। जिसे देखकर ऐसा लगता
है कि सरकार सड़क की जगह टोल टैक्स बूथ का निर्माण इस आशय से करवा रही है कि ज्यादा से
ज्यादा राजस्व इक्कठा कर लोकतंत्र में कारपोरेट सेक्टर को पाँचवें स्तम्भ के रुप मे
स्थापित किया जा सके और सड़कों को शायद इसलिए ठीक नहीं करवाया जा रहा क्योंकि जनसंख्या
घनत्व के परिपेक्ष में बंजी-जंपिंग और पेरा-ग्लाईडिंग जैसे रोमाँचकारी खेलों के
अनुभव प्रदेश के जनमानस को सड़क चलते हो जाये।
मुरादाबाद के पश्चात जैसी सड़कों की कल्पना आजादी के दीवानों ने सन सैंतालिस से पहले की होगी उसी तरह की सड़क देखने को मिली। लेकिन जीवन में सहूलियतें और अच्छा समय कौन याद रखता है, उसकी तो चर्चा ही बेमानी है। लगभग दो घंटे के सफ़र के बाद बस को भोजन हेतु ड्राईवरों और कंडक्टरों से मान्यताप्राप्त ढाबे पर रोका गया। ढाबा माल कल्चर का देसी रुप था। साफ़ सफ़ाई को छोड़कर बाकी सारी व्यवस्थायें, जो किसी एक व्यक्ति को धनवान बनाने के लिए जरुरी हो, वहाँ उपल्ब्ध थी।
शिवम ढाबा कई छोटी दुकानों का समूह
था, जहाँ अण्डे वाला,ब्रेड पकौड़े वाला, आइसक्रीम वाले, छोले भटूरे वाले अपनी-अपनी योजनाओं
को ऐसे प्रसारित एवं प्रचारित कर रहे थे मानो यह माल केवल आज ही बिक्री के लिए
उपलब्ध हो पाएगा, कल से तो इस क्षेत्र में निषेधाज्ञाँ लागू होने वाली हो। छोले
भटूरे के साथ आचार मुफ़्त देने की बात कुछ इस तरह से कही जा रही थी जैसे ऐसा देश में पहली बार हो रहा हो। एक छोटा सा स्टाल खाने पीने से अलग एक जरुरी जीवनोपयोगी विषय से संबंधित
था। वहाँ एक आदमकद पोस्टर जिसमे भारतीय क्यों हजार सालों से भी ज्यादा गुलाम रहे, इस
बात का जिक्र नहीं बल्कि बचपन की गलतियों के कारण पैदा हुई कमजोरियों एवं उनके शर्तिया
ईलाज के बारे में अवगत करवा रहा था। ओशो के बाद यदि किसी ने इस विषय को महत्व दिया था तो वह शिवम
ढाबा था। आजकल इस सेक्टर में भी अन्य सेक्टरों की तरह ही मंदी का असर वैध-हकीमों, ताँत्रिकों
एवं सिद्ध बंगाली बाबाओं को प्रभावित कर रहा है। पोस्टर के कोने में हकीम जी की अपनी
फ़ोटो ट्रेडमार्क वाले अंदाज में छपी थी और बाकी हिस्से में हकीम जी के मुख्य कार्यालय
के पते के साथ एक अफ़्रीकी मूल के कसरती बदन आदमी की कमर तक की फ़ोटो छपी थी।
क्योंकि ढाबे पर पहले से कई बसें खड़ी
थी तो आसपास का महौल एक लघु भारत के रुप में देखा जा सकता था। यहाँ जिन लोगों की प्राथमिकता
भोजन नहीं थी वह इस आदमकद पोस्टर के आस-पास खड़े होकर वही पढ रहे थे जो इसमे लिखा
नहीं था। हकीम जी की दवाई खाने के बाद होने वाले फ़ायदे की कल्पना अफ़्रीकी मूल
के कसरती बदन के कमर के उपर वाले हिस्से को देख कर कमर के नीचे वाले हिस्से की अपने
वजन के तुलनात्मक अनुपात में की जा रही थी। हमारे देश में कल्पना ही सृजनता को
जन्म देती है और सृजनता जनसंख्या को। यह हमारा विज्ञापन का प्राचीन तरीका है जिसमे
थोड़ा समझाने पर लोग बहुत ज्यादा समझ सकते हैं। यह उस आधुनिक विज्ञापन की तरह नहीं
जिसमे पैरों में पहनी सेंडल को दिखाने के लिए पूरी टाँगों को बिना कपड़ों के दिखाना इसलिए
जरुरी है ताकी उपभोक्ता सेंडल के फ़ायदों से पूरी तरह वाकिफ़ हो। कल्पना शक्ति भी तो
कोई चीज है।
आगे मुख्य ढाबे की तरफ़ बड़ा तो
लगभग चार मन वजनी आदमी जो खड़ा होकर माईक हाथ में लेकर ढाबे में उपल्ब्ध व्यंजनो
का जाप धाराप्रवाह तरीके से उनके स्वाद एवं सेहत के लिए होने वाले फ़ायदे के साथ
कर रहा था। यदि कोई बस यात्री नींद से जाग उसका यह अनाउंसमेंट सुन ले तो उसे किसी
मेले में खोया-पाया स्टाल का भान हो जाय। उसके पीछे रखी रिवाल्विंग चैयर, जो उसका
आसन थी, की पीड़ा साफ़ नजर आ रही थी। रिवाल्विंग चैयर उसके पीछे कुछ इस स्थिति
में थी मानो अखाड़े में किसी पहलवान नें अंक हासिल करने के लिए दूसरे पहलवान को दबोच
रखा हो।
बहरहाल मैं जब उसके नजदीक पहुँचा तो उसने माईक सामने टेबल पर रखा। मेरा ध्यान भंग करने वाले अंदाज में वह बोला, "क्या चाहिए?"
मैं सकपका गया था, लेकिन मैने किसी
आम घटना की तरह उसकी इस हरकत को नजरअंदाज करते हुए कहा।
"खाना मिलेगा?
वह बड़ी ऐंठ के साथ बोला,
वह बड़ी ऐंठ के साथ बोला,
"और नहीं तो क्या हम तुम्हे कपड़ा
बेचने वाले लग रहे हैं?" वह मुझे नजर अंदाज करते हुए बोला
एक उपभोक्ता के तौर पर यह मेरी सरासर
बेइज्जती थी, लेकिन उपभोक्ता मामलों के विभाग के जागरुकता अभियान के सहारे यहाँ
अपने अधिकारों का बखान करना मेरे लिए हानिकारक हो सकता था। क्योंकि यह दिल्ली
और मुरादाबाद के बीच का वह क्षेत्र था जहाँ गाँधी जी और नेल्सन मंडेला के पढाये
पाठ के विपरीत घटनाओं से आये दिन अखबारों के माध्यम से जनता दो चार होते रहती
है। वह मेरी तरफ़ से लापरवाह होते हुए बस से उतरती सवारियों को देखते हुए बोला,
"जल्दी बोलो, टाईम नहीं है।"
मैने उसे सौ का नोट पकड़ाते हुए कहा,
" दे दो जो कुछ इतने में आता हो।"
उसने बड़े लापरवाह अंदाज से पैसे लिए और मेरी वित्तीय औकातानुसार चार रोटी और दाल
का कूपन पकड़ाते हुए मुझे मूक सलाह देकर आगे बढने का इशारा किया। मैं जाकर एक खाली
कुर्सी पर बैठ गया।
मेरे सामने की दिवार पर जहाँ
"शराब पीना सख्त मना है" का इश्तिहार चस्पा था, के ठीक नीचे वाली टेबल
पर उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बावर्दी हवलदार एक अपराधी से दिखने वाले आदमी के
साथ चोरी छुपे सुरा सेवन में व्यस्त था। उसने शराब की बोतल को टेबल के नीचे कुछ
इस तरह से छुपा कर रखा था कि कोई भी उधर से गुजरने वाला इसे देख सके।
मेरे बाईं तरफ़ "ओनली फ़ार
स्टाफ़" वाली टेबल के पीछे बैठे पाण्डे जी सामने बैठी एक महिला को इस अंदाज से देख रहे
थे जैसे कोई काबिल कसाई बकरी को देखकर यह अंदाजा लगाने कि कोशिश करता है कि उसके
किस अंग से कितना गोश्त निकलेगा। अचानक पाण्डे जी की नजर मुझपर पड़ी। जहाँ क्षण
भर पहले पाण्डे जी के चेहरे पर अंगुलीमाल के हाव भाव थे वहीं मुझ पर नजर पड़ते
ही वो साक्षात बुद्ध हो गये। थोड़े झेंपे, लेकिन जल्दी ही अपने चिरपरिचित अंदाज
धारण कर मेरी तरफ़ लपके और कहने लगे,
"पण्डित जी, हमारे साथ खाना खाइये,"
मैने कहा, "शुक्रिया, मैं बिल
कटवा चुका हूँ।"
पाण्डे जी ने इस बात का बड़ा अफ़सोस
जताया कि मैं भी उनके साथ मुफ़्त में खाना खा सकता था। पाण्डे जी ने एक कुर्सी
खैंची और वहीं मेरे सामने बैठ गये। मेरी आँखों में अपराध शाखा के मंजे हुए दारोगा
की तरह देखते हुए कहने लगे,
"क्या कह रही थी वो?"
मैने कहा, 'कौन'
"अरे वो ही, जो आपके बगल में
बैठी थी?" पाँडे जी झुँझलाते हुए बोले,
मैंने कहा, "किताब के बारे में
पूछ रही थी।"
पाण्डे जी ने मूक शंका व्यक्त कर अपना
सर इस अंदाज से हिलाया मानो मेरा झूठ वो पहली ही नजर में पकड़ गये हैं।
"आप क्यों पूछ रहे हो?"
वो कुछ कह पाते मैंने उससे पहले ही उन पर सवाल दाग दिया।
पाण्डे जी जैसे भरे बैठे थे, बोले,
-अरे साहाब, मैने अखबार
में पढा था कि अभी पिछ्ले दिनों देह व्यापार के मामले में रामपुर में पाँच लड़कियाँ
पकड़ी गयी है, और यह उन्हीं में से एक होगी।
मैंने कहा,
"पाण्डे जी आप ऐसा कैसे कह सकते
हैं, जरुरी थोड़े ही है कि यह वही लड़की होगी।"
पाण्डे जी ने दार्शनिकों वाले अंदाज में कहा,
पाण्डे जी ने दार्शनिकों वाले अंदाज में कहा,
-दाज्यू, पच्चीस सालों से
इन सड़कों पर गाड़ी चला रहा हूँ, बड़ा तजुर्बा है अपने पास। अब तो बिना पूँछ उठाये ही बता
सकता हूँ कि कौन नर है कौन मादा है।
मैं समझ चुका था कि पाँडे जी अब अपनी
धारणा से एक भी इंच इधर उधर नहीं होने वाले। मैने पाँडे जी की बात का कोई जवाब नहीं
दिया।
मैं मन ही मन सोचने लगा कि अपना देश भी कुछ ऐसा ही है जहाँ एक बड़ा तबका पूर्वाग्रहों के आधार पर रास्ते चलती महिलाओं का चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर देता हैं।
-सुभाष तराण