बुधवार, 12 अप्रैल 2017

नए बर्तन का भूत


पन्द्रह बरस तक अभावों में रहते हुए पढ लिख कर सुदूर पहाड़ के गाँव का हरिचन्द शहर के नजदीक वाले कस्बे में स्कूल मास्टर हो गया था। नौकरी पा जाने के बाद जब वह पहली बार अपने गाँव लौटा तो वह शहर से अपने घर परिवार के लोगों के लिए जरुरत का बहुत सारा सामान भी लेकर आया। छ महीनों की नौकरी के दौरान वो जितनी कुछ भी बचत कर पाया, उस में से उसने एक बड़ा हिस्सा परिवार के लोगों की जरुरतों के सामान पर खर्च कर दिया। हरिचन्द पहाड़ के एक ऐसे सयुंक्त परिवार से ताल्लुक रखता था जहाँ रिश्तों की दूरियों और नजदीकियों को मापने का एक मात्र मापदण्ड परिवार होता है। पिता हो, चाचा हो, या ताऊ हो।  सगा हो, चचेरा हो या किसी और रिश्ते का, यहाँ सब को बराबर सम्मान और स्नेह दिया जाता है। अपनी इसी परंपरा की तर्ज पर हरिचन्द भी परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ लेकर आया था।

हरिचन्द के द्वारा लाए गए सामान की फ़ेरहिस्त में कुछ आधुनिक किस्म के उपयोगी बर्तन भी थे। उसने बचपन से देखा था कि कैसे उसके घर की पारंपारिक रसोई में पहाड़ पर पैदा होने वाले ठोस दलहनों को भोजन हेतु गलाने के लिए चूल्हे में बहुत सारी सूखी लकड़ियाँ राख हो जाया करती थी। बचपन से ही उसने इस तकलीफ को व्यक्तिगत तौर पर अनुभव किया था कि जलावन की ये लकड़ियाँ उन्हे दूर जंगल से सर और पीठ पर ढो कर लानी होती थी। पढ लिख कर हरिचन्द ने रोजगार ही हासिल नहीं किया, अपने परिवार के रोजमर्रा के जीवन को कैसे बेहतर और सरल बनाया जाय, वह इस बारे में भी अक्सर सोचते रहता था। परिवार के लिए उसके द्वारा लायी गई हर वस्तु उसकी समझ को प्रमाणित करती थी।

सर्दियों का मौसम था। छुट्टी पर आए हरी चन्द का आज अपने घर में दूसरा दिन था। दिन का खाना ख़त्म होते ही हरीचन्द की माँ ने रात का खाना बनाने के लिए फ़िर से चूल्हा फ़ूँकना शुरु कर दिया। माँ के द्वारा की जा रही जल्द बाजी को देखकर हरी चन्द समझ गया था कि आज घर में राजमा या उड़द की दाल बन रही है। जब चूल्हा सुलगने लगा तो हरी चन्द ने माँ से कहा कि आज वो उसके द्वारा लाए गए नए बर्तन में दाल पकाएगा। माँ अपने बेटे की बात सुनकर मुस्कुरायी और थाली में बीन कर रखी दाल उसकी ओर बढा कर स्वयं दूसरे कामों में व्यस्त हो गयी। हरीचन्द नें खुद का लाया नया बर्तन निकाला और धुली हुई दाल को उसके हवाले कर उसमे उचित मात्रा में पानी डाला, उसका ढक्कन बंद किया और उसे चूल्हे पर चढा दिया। चूल्हे की लकड़ियाँ दुरुस्त करने के बाद हरी चन्द ने माँ से कहा कि वो अपने दोस्तों के साथ थोड़ी देर के लिए खेतों की तरफ़ जा रहा है। रोजमर्रा के कामों के चलते रसोई में उलझ कर रह जाने वाली माँ ने उसकी बात के जवाब में लापरवाही के साथ हामी भरी और अपने कामों में व्यस्त हो गयी।

चूल्हा रोज की तरह आज भी पूरी तन्मयता के साथ सुलग रहा था। पहाड़ में ऊँचाई पर पाए जाने वाले बांज जैसे पेड़ों की लकड़ियाँ जब जलती है तो उसमें बड़ा ताव होता है।  एक बार जब चूल्हा भर ये सख़्त मिजाज सूखी लकड़ियाँ सुलग जाती है तो ये घंटे भर तक लपटें उगलती रहती है। यही नहीं, जल कर अँगार होने के बाद भी इनमें जोर की आँच बनी रहती हैं। बाँज के सुलगते अँगार को यदि राख में दबा दिया जाय तो वो लगभग आठ से दस घंटे तक सुलगता रहता है।   

हरिचन्द की माँ का ध्यान जब चूल्हे पर चढे नए बर्तन की चमक को काला करती लपटों पर गया तो उन्होने राख़ को गीला कर उस नए बर्तन के चारों ओर राख का लेप लगा दिया।  हरीचन्द घर से निकल कर गया ही था कि तब तक उसके पिता जंगल से बकरियों का रेहड़ चरा कर वापिस घर पहुँच गए। थके मांदे पिता नें जब पत्नी से तंबाकू का तकाजा किया तो पत्नी नें रसोई में अपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर उन्हे स्वयं हुक्का भरने को कहा। जंगल से लौटे हरीचन्द के पिता को तंबाकू की तेज तलब हो रही थी। उन्होने हुक्का उठाया, उसका पानी बदला, चिलम में एक खुराक तंबाकू  डाला, चूल्हे से सुलगते हुए चार कोयले तोड़ कर चिलम पर सजा दिए और वहीं रसोई की दीवार में टेक लगा कर हुक्का गुडगुडाते हुए पत्नी से हरिचन्द द्वारा शहर से लाए गए सामान को लेकर बातचीत करने लगे।   

  कुछ पंद्रह एक मिनट का समय गुजरा होगा,  पति पत्नी की बातचीत किसी नतीजे पर पहुँचती कि तभी चूल्हे पर चढा बर्तन दबी आवाज में चीख़ पडा। हरिचन्द के माता पिता के लिए किसी बर्तन का ऐसा व्यवहार अप्रत्यिशित था। रसोई में नए बर्तन की इस गर्जना से हरि चन्द के माता पिता सब कुछ ज्यों का त्यौं छोडकर चीख़ते हुए रसोईघर से बाहार की ओर भागे। 
पहाड़ के गाँवों में घर बहुत पास-पास होते हैं। रसोई से निकली चीख़ों के चलते घड़ी भर में जितने आस पास में लोग थे, वे हरिचन्द की रसोई की ओर दौड़ पड़े लेकिन चूल्हे पर चढे बर्तन की गर्जना सुनकर सब के सब रसोई के दरवाजे से एक उचित दूरी बनाकर ठिठक गए। अचानक रसोई के बाहार खड़ी भीड़ में से एक आदमी कंपकंपाकर हुँकार भरता हुआ रसोई के दरवाजे पर आ गया। उस आदमी पर देवता अवतरित होता था। कांपते हुए उस आदमी के हाथ में किसी नें तुरत चावल के दाने रख दिए। पहाड़ के देवता अपनी सारी दैवीय प्रक्रियाएं चावल के दानों से पूरी करते हैं। वो चाहे किसी को दिया जाने वाला प्रसाद हो, गले में बांधे जाने वाला गंडा या ताबीज हो, कोई भाष्य, भविष्यवाणी हो या बुरी आत्माओं से छुटकारा पाने की बात जैसा कुछ और, यहाँ सभी कुछ चावल के दानों से ही तय होता है। इसलिए किसी मनुष्य पर देवता के अवतरित होते ही सबसे पहले उसे चावल प्रस्तुत किए जाते हैं।  आदमी पर अवतरित देवता नें चावल के दानों को मुट्ठी में लेकर आसमान की ओर देख़ते हुए उस पर फ़ूँक मारी और हट का उच्चारण करते हुए चावल के दाने चूल्हे पर सवार शोर कर रहे उस नए बर्तन पर दे मारे।

मानों जैसे कोई चमत्कार हो गया हो।

चूल्हे पर लपटों से घिरा नया बर्तन एक दम खामोश हो गया। हरिचन्द के पिता जी ने हाथ जोड़े और आदमी पर अवतरित हुए देवता के सामने नत मस्तक होकर कहने लगे,

-       हे माराज, नर देई (मनुष्य) से क्या खता हो गयी?

इतनी देर में रसोई घर के बाहार एक अच्छी खासी भीड़ जुट चुकी थी। हरिचन्द के घर के आस पास रहने वाले बहुत से लोग आज एक ऐसी घटना के प्रत्यक्षदर्शी बन चुके थे जिसके बारे में वे अक्सर सुनते आए थे। उन सबों की मनोस्थिति फ़िलहाल ऐसी थी कि चूल्हे पर चढे नये बर्तन के भीतर घुसी बुरी आत्मा देवता की शक्ति के चलते खामोश हो गयी है। आस पास खड़े लोगों के हाव भाव देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यदि उस आदमी पर समय रहते देवता अवतरित न हुए होते तो वहाँ प्रलय निश्चित थी। नए बर्तन के दहाड़ने के किस्से और आदमी पर अवतरित हुए देवता के द्वारा उसे शान्त करवाने की बात नमक मिर्च के साथ गाँव भर में आग की तरह फ़ैलने लगी। जिसने सुना, काम धन्धा छोड़कर हरिचन्द के घर की ओर दौड़ पड़ा।  

आदमी पर अवतरित हुए देवता ने काफ़ी देर तक आँखे बन्द कर आसमान की तरफ़ देखा और फ़िर मुट्ठी में रखे चावल के दानों पर फ़ूँक मारते हुए चावल के उन दानों को हरि चन्द के पिता के फ़ैले हाथों पर फ़ैंक दिया।

हरिचन्द के पिता के हाथ चावल के दो दाने आए।

हरि चन्द के पिता नें आदमी पर अवतरित देवता के आगे शीश नवाते हुए कहा,

-       जैकार माराज।

इतनी देर में गाँव के कई मौजिज महानुभव भी आदमी पर अवतरित हुए देवता को हाथ जोड़ते हुए हरिचन्द के पिता के बगलगीर हो गए। रसोई घर के सामने ख़ड़ी सारी भीड़ भयातुर नजर आ रही थी।

आसमान से जमीन पर अपनी नजर लौटाते हुऐ आदमी पर अवतरित हुए देवता बुदबुदाया।

-       संकट पड़ा है। बंध रखो। 

हरि चन्द के पिता नें जेब से एक नए रुपये का सिक्का निकाला और आदमी पर अवतरित हुए देवता के सम्मुख फ़र्श पर टिका दिया। आदमी पर अवतरित हुए देवता नें बायीं मुट्ठी से चावल के कुछ दाने दायीं मुट्ठी में लिए, उस पर फ़ूँक मारी और चावल के उन दानों को फ़र्श पर पड़े सिक्के पर दे मारा।

-       संकट का समय था, फ़िल वक्त टाल दिया है। संक्रांति के दिन फ़िर से पूछ करनी पड़ेगी।

आदमी पर अवतरित हुए देवता बन्द आँखों से आसामान की ओर देखते हुऐ बड़बड़ाए।

हरिचन्द के पिता समैत मौजिज लोगों ने हाथ जोड़ कर सर झुकाते हुए एक सुर मे कहा

-       जैकार माराज।

अचानक चूल्हे पर रखा नया बर्तन फ़िर से दहाड़ उठा। आदमी पर अवतरित हुए देवता रसोई के दरवाजे से यूँ चिपक गए मानों बर्तन चूल्हे पर से चीखते हुऐ आगे बढेगा और उनका गला दबा देगा। चेहरे पर आते जाते कई किस्म के भावों के बीच उनके माथे पर पसीने की बूँदे चमकने लगी। रसोई घर के सामने बरामदे में बैठे मौजिज लोगों का झुण्ड डर के मारे वहीं पसर गया। इस बार चूल्हे पर सवार धुआं छोड़ते बर्तन की गर्जना कुछ ज्यादा तीखी लग रही थी।  इसकी वजह से रसोई के बरामदे के सामने ख़ड़ी भीड़ में भी मामूली सी भगदड़ मच गयी। कुछ प्रत्यक्षदर्शी तो चीखते चिल्लाते भाग खड़े हुए। लेकिन दुनिया में मजबूत दिल वालों की संख्या भी कम नही है। बहुत से लोग अपनी जिज्ञासु प्रवृति के चलते वहीं ख़ड़े रहे। चूल्हे पर चढे नए बर्तन के इस औचक व्यवहार से उसी वक्त भीड़ में शामिल एक अधैड़ कंपकंपाने लगे। इन अधैड़ महाशय पर भी एक क्षेत्रीय देवता अवरतित होते थे। क्षण के अन्तराल में अधैड़ ने अपने शरीर को झटकते हुए सर पर पहनी टोपी को खुद से अलग किया और सामने एक कटोरे में पड़े चावल के दानों को मुट्ठी में भरते हुए बरामदे को फाँदकर रसोई के दरवाजे की तरफ़ कूद लगा दी। अधैड़ पर अवतरित हुए क्षेत्रीय देवता के पास आते ही घिघिया कर दरवाजे से चिपके पहले वाले आदमी पर अवतरित हुए देवता को थोड़ा ढांढस बंधा। आदमियों पर अवतरित देवताओं ने हुंकारों के माध्यम से एक दूसरे का अभिवादन किया। बांज की लकड़ीयों की तेज लपटों से घिरा नया बर्तन अब भी लगातार कर्कश आवाज किए जा रहा था। अधैड़ पर अवतरित हुए देवता नें रसोई घर के सामने खड़ी भीड़ के उपर चावल के कुछ दाने उछाल दिए। अचानक सामने खड़े जन समूह में से दो और आदमी सर पर की टोपियों को झटकते हुए हुंकार भरने लगे। ये दोनो भी कंपकंपाते हुए पहले से दो आदमियों पर अवतरित देवताओं की ओर लड़खड़ाते हुए पहुँच गए और उनकी हुँकारों में अपनी हुँकारे मिलाने लगे। चारों आदमियों पर अवतरित देवताओं की हुँकारों से इतना शोर बरपा कि चूल्हे पर चीख़ रहे नए बर्तन का शोर कम लगने लगा। आदमियों पर अवतरित देवताओं ने आपस में आँख़ों-आँख़ों मे बात की और एक साथ मुट्ठियों में बन्द चावल के दानों को चूल्हे पर चढे नए बर्तन पर दे मारे।

कुछ क्षण गुजरे होंगे, अचानक चूल्हे पर धरा नया बर्तन किसी आज्ञाकारी बालक की तरह शाँत हो गया। रसोई के बाहर बरामदे के सामने खड़े गाँव भर के भयातुर लोगों का झुण्ड एक सुर में बुदबुदाया,

-       जैकार माराज

रसोई घर के दरवाजे के साथ अदमियों पर अवतरित देवताओं नें बन्द आँखों से आसमान की ओर देखते हुए आशीष स्वरुप चावल के कुछ दाने हवा में उछाले और अधेड़ पर अवतरित हुए देवता नें गरजते हुए मौजीज लोगों में बैठे हरिचन्द के पिता की तरफ़ मुखातिव होते हुए कहना शुरु किया,

-       संकट बहुत विकट था, शुक्र मनाओं कि तुम पर देवताओं की छाया है,  नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता।

देवताओं पर अगाध विश्वास रखने वाले हरिचन्द के पिता नें सर से टोपी उतारी और उसे आदमियों पर अवतरित देवताओं के पैरों की ओर सरकाते हुए कातर स्वर में कहा,

-       माराज, तुम्हारी दी हुई साँसे लेते हैं, इसकी रक्षा करना भी तुम्हारा ही फ़र्ज है। माराज, अरज ये है कि अब ये विकट संकट कैसे कटे? आप उपाय बताएं, जो भी हुक्म होगा, खुशी-खुशी कबूल होगा……

सबसे पहले आदमी पर अवतरित हुए देवता नें हरिचन्द के पिता की बात ख़त्म होने से पहले ही अपना वक्तव्य शुरु कर दिया।

-       मामला इतना हलका नहीं है जितना तुम समझ रहे हो। संकट बलि माँगता है। जितना जल्दी हो सकता है, बलि का बंध रखो। 

आदेश का तुरंत पालन हुआ। बकरियों के बाड़े में से एक बकरा निकाल कर रसोईघर के बरामदे में लाया गया। आदमी पर अवतरित हुए देवता को पानी का एक भरा हुआ लोटा प्रस्तुत किया गया। आदमी पर अवतरित हुए देवता नें बकरे को पकड़ा और लोटे का पानी बकरे के कानों और गुदा में डालते हुए उसकी पूरी पीठ गीली कर उसे बरामदे में छोड़ दिया। मौजिज लोगों के साथ-साथ सामने खड़े जन समूह नें हाथ जोड़ कर बिखरे स्वरों में बुदबुदाना शुरु कर दिया।

-       ले बे माराज, ले बे माराज। ले बे माराज, ले बे माराज। 

समय कुछ एक पल ही आगे बढा होगा, रसोई के बाहार एकत्र हुए लोगों को बेवकूफ़ों की तरह देखता बकरा अचानक कंपकंपा उठा।

भीड़ दबे स्वर में बुदबुदाई,

-       जेकार माराज।

मौजिज लोगों और सामने खड़ी भीड़ के चेहरे पर संतोष के भाव नजर आने लगे। पानी से भीग़े बकरे की देह पर छूटी कंपकंपी इस बात का संकेत थी कि देवताओं नें बलि कबूल कर ली है। चारों आदमियों पर अवतरित देवताओं नें हरिचन्द के पिता और मौजिज लोगों पर आशिर्वाद स्वरुप चावल के दाने बरसाने शुरु कर दिए। रसोई घर के बरामदे को घेर कर खड़ी भीड़ को देखते हुए बकरा रसोई घर के अन्दर घुस गया और अपने थूथन से वहाँ रखे अनाज और पानी के बर्तनों की पड़ताल करने लगा। वहाँ मौजूद लोगों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। जिस रसोई में चूल्हे पर रखा बर्तन चीख़ रहा हो, जिस रसोई में आदमियों पर अवतरित देवताओं के घुसने की हिम्मत नहीं पड़ रही हो, वहाँ देवताओं द्वारा बलि स्वरुप ग्रहित बकरा बेधड़क होकर घुस गया था। सभी प्रत्यक्षदर्शी हाथ जोड़े देवताओं की असीमित शक्तियों को महसूस करने की कोशिश कर रहे थे। रसोई के अन्दर घुसा बकरा वहाँ रखे पानी और अनाज से भरे बर्तनों की बड़ी बेरहमी से जाँच पड़ताल कर रहा था। कोई दो मिनट का समय गुजरा होगा कि अचानक चूल्हे पर रखा नया बर्तन फ़िर से चिंधाड़ा।

नये बर्तन की इस औचक आवाज से रसोई में घुसे बकरे ने अपना आपा खो दिया। नए बर्तन की यह आवाज सुनकर बकरा बुरी तरह से बिदक गया और रसोई में रखे बर्तनों और सामान को गिराते हुए इधर उधर दौड़ने लगा। अब तो चारों आदमियों पर अवतरित देवता भी असहाय नजर आने लगे। चूल्हे पर रखे नए बर्तन की कर्कश आवाज और बकरे द्वारा रसोई में की जा रही उछ्ल कूद ने माहौल को और भी भयानक और डरवाना बना दिया। रसोई के आस पास जमा हुए लोगों को लग रहा था कि अब शायद प्रलय आने ही वाली है कि तभी भीड़ को धकेलता हुआ हरिचन्द रसोई के दरवाजे की ओर बढ़ा। अपने घर के पास ईकट्ठा हुई भी को देखकर वह बहुत घबरा गया था। भीड़ को देखकर उसके दिमाग मे कई डरावने ख्याल कौंधने लगे। लेकिन जब उसने रसोई में जाकर वहाँ का जायजा लिया तो उसकी समझ में सबकुछ आ गया। उसने सबसे पहल बकरे को कान पकड़ कर रसोई से बाहर निकाला। उसके बाद चूल्हे पर रखे नए बर्तन, जिसे उस वक्त के दौरान शहर के लोग प्रेशर कुकर कहते थे, उसकी सीटी को बन्द करते हुए उसे नीचे उतार कर एक तरफ़ रख दिया और बाहर आकर वहाँ आदमियों पर अवतरित देवताओं समेत सभी लोगों से मुखातिब होते हुए कहने लगा।

-       क्या बात हो गयी?
-       

तीन लोकों की खबर रखने वाले देवताओं के पास हरिचन्द के सवाल का कोई जवाब न था। जिन आदमियों पर अभी थोड़ी देर पहले देवता अवतरित हो रखे थे वे अब फ़र्श पर अपनी टोपियाँ ढूँढते नजर आ रहे थे। हरिचन्द के सवाल से जहाँ आदमियों पर अवतरित हुए देवता कूच कर गए वहीं सामने किसी चमत्कार की उम्मीद में खड़ी भीड़ भी बिना कुछ कहे सुने ही तीतर बितर हो गयी। 

-सुभाष तराण


मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

-पहाड़, पर्यावरण और प्लास्टिक-


अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों के दौरान मेरे गाँव के लोग स्थायी गाँव से दूर खेड़े (मंजरों) में जमीन कमाने जाते थे। गाँव के अन्य बच्चों की तरह मैं भी अपने परिवार वालों के संग हो लेता। वहीं खेल कूद हो जाता और खेत में काम कर रहे लोगों को पानी पिलाने जैसे छोटे-मोटे काम भी कर लेता। मुझे याद है जब खेतों के आस पास चारा पत्ती के पालतू पेड़ों पर गाँव के लोगों द्वारा दिन के भोजन हेतु साथ लायी गई रोटियाँ, जो खाल या कपड़े के थैलों मे बंधी होती और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले तुम्बे, जो एक किस्म के प्राकृतिक थर्मस का काम करते, जगह-जगह टंगे दिखाई पड़ते। तुम्बा लौकी की ही एक प्रजाति है।  आदि काल से तुम्बे मध्य भारत एवं हिमालय के इन नदी घाटी क्षेत्रों में पानी एवं घरेलू इस्तेमाल में काम आने वाले अन्य तरल पदार्थों को रखने एवं लाने ले जाने के काम में लाये जाते रहें हैं। मजबूती में यह मिट्टी के बर्तन के समकक्ष ही होता है। किफ़ायत से रखने पर यह सालों साल चल जाता है। और यदि टूट जाय तो यह मिट्टी में उर्वरक के रुप में बहुत आसानी विलीन हो जाता।
सड़क मार्गों के स्थायी गाँवों से पहले जुड़ने के कारण यह खेड़े मंजरे अब स्थायी गाँवों के रुप में आबाद हो चुके है। लोग अब भी यहाँ खेती बाड़ी ही करते हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पारम्परिक फ़सलों की जगह अब नकदी फ़सलों ने ले ली है जो कि समय की माँग है लेकिन पारम्परिक खाल के थैलों और तुम्बों की जगह अब प्लास्टिक एवं पालिथीन की थैलियों और प्लास्टिक की इस्तेमाल हो चुकी बोतलों ने ले ली है। हल्की फ़ुल्की और मजबूत। टूटने फ़ूटने का डर नहीं, खो जाये तो गम नहीं। मैं बचपन की स्मृतियों में जाकर खूब याद करने की कोशिश करता हूँ लेकिन तब प्लास्टिक या इससे बनी किसी भी वस्तु जो रोजमर्रा इस्तेमाल मे लायी जाती हो, लेकिन याद नहीं आता। आज प्लास्टिक पहाड़ के हर व्यक्ति के जीवन में शामिल मिलता है। उपभोक्ता वाद की पराकाष्ठा यह है कि लगभग हर बिकाऊ चीज के साथ प्लास्टिक समान्तर हो चला है। हमारी आधुनिकता पूरी तरह से प्लास्टिक पर निर्भर है। जहाँ मैदानी क्षेत्र के शहरों के लोग इस धीमे जहर से पारिस्थितिकी को होने वाले दुष्परिणामों से दो चार हो कर सजगता दिखा रहे हैं वहीं पहाड़ के शहर, कस्बे एवं गाँव का समाज और स्थानीय प्रशासन आँखें मूँदे विकास की अलग परिभाषा गढ रहा है।
इसका परिणाम यह है कि पर्यटन के लिए प्रसिद्ध उत्तराखण्ड के पर्यटन स्थल प्लास्टिक के कचरे से भरे पड़े हैं। हवा के साथ यह प्लास्टिक का कचरा इन से लगे जंगलों मे काफ़ी अन्दर तक पहुँच गया है। जो हर साल दावानल के लिए ईंधन का काम करता है। इन पर्वतीय स्थलों की खूबसूरती को चार चाँद लगाते देवदार, बाँज एवं अन्य पेड़ तने-तने तक कचरे से पटे पड़े होते हैं जिसमे प्लास्टिक का कचरा मुख्यत् होता है। उपर से विकास के नाम पर लापरवाह ईंजीनियरों एवं अर्द्ध शिक्षित ठेकेदारों द्वारा बनाया गया छ्दम् ड्रेनेज सिस्टम, जो केवल सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने का अभेद अस्त्र है, कोढ में खाज के जैसा है।  छोटे कस्बों एवं गाँव के बाजारों में रुके हुए पानी और प्लास्टिक के कचरे से बजबजाती खुली नालियां आपको हर जगह विद्यमान मिलेगी।   कमोवेश यही हाल अन्य पहाड़ी शहरों का भी है। तेजी से पनपते उपभोक्तावाद के चलते उगते बाजार इस प्लास्टिक कचरे का मुख्य स्रोत है। सरकार की तरफ़ से पहाड़ के किसी भी गाँव या कस्बे मे साफ़ सफ़ाई से संबंधित कोई व्यव्स्था है ही नहीं। राज्य सरकार और पहाड़, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए कागजों पर समर्पित गैर सरकारी संगठनों का स्वच्छ्ता अभियान होटलों के सभागारों तक ही सीमित रहता है, जहाँ सरकारी धन की आहुति अनवरत रुप से जारी है।
क्योंकि प्लास्टिक के कचरे के त्वरित दुष्परिणाम दिखाई नहीं देते इसलिए पहाड़ के अधिकतर स्थानीय निवासी इसके दुष्परिणामों को लेकर चिंतित नहीं दिखाई देते। इस बात का अन्दाजा यहाँ से लगाया जा सकता है कि पहाड़ के स्थानीय दुकानदारों द्वारा प्लास्टिक के कचरे को रोज सुबह जलाते हुए देखा जा सकता हैं और इस प्रक्रम के दौरान पैदा होने वाला विषैला धुआँ पर्यावरण के लिये क्या समस्याएं पैदा कर सकता है वे इस बात से अनभिज्ञं होते हैं। खेत में काम करता किसान बीज का पेकेट फ़ाड़कर बीज को बो देता है लेकिन प्लास्टिक का खाली रेपर वहीं फ़ैंक देता है। कीट नाशकों एवं खेती बाड़ी मे इस्तेमाल होने वाले अन्य रासायनिकों की खाली प्लास्टिक की बोतलें बगीचों एवं खेतों में यहाँ वहाँ कुछ-कुछ दूरी बाद ही नजर आने लगती है। पालिथीन बाजार से घरों में रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले सामान के साथ आता है और मतलब पूरा होते ही घरों के बाहार हवा के हवाले हो जाता है। शीतल पेय की खाली हो चुकी प्लास्टिक की बोतलें, जो लंबे समय तक इस्तेमाल होती है, फ़ेंकने के बाद उसके अन्दर पानी सड़ता रहता है और वह अपने क्षेत्रफ़ल के बराबर जमीन को बाँझ कर देती है। साबुन गुड़ एवं तथा अन्य खाद्य पदार्थों के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के बोरे, पालिथीन में फ़ेंका गया घर का कूड़ा, जिसमे भोज्य पदार्थों के अवशिष्ठ भी रहते हैं, पालतू जानवरों को आकृषित करतें है और परिणाम स्वरुप बहुत से पशु बे-मौत मारे जाते है। विकास की कवायद के तहत अंधाधुंध बनती सड़कों, बाँधों और कंकरीट के उगते म्यांदी जंगल वैसे ही हर साल तबाही लाते रहते है उपर से जल, मृदा एवं वायु प्रदुषण के मुख्य स्रोत इस प्लास्टिक से होने वाले दुष्परिणामों से यदि समय रहते सचेत न हुआ गया तो कुछ एक वर्षों बाद पारिस्थितिक़ी संतुलन गड़बडाना शुरु हो जाएगा। जिसके परिणाम यह होंगे की भंगुर और भुरभुरे हिमालय के पहाड़ दरकने शुरु हो जायेंगे।
पहाड़ी क्षेत्रों को लेकर प्लास्टिक जनित प्रदूषण को रोकने के लिए केंद्र सरकार सहित विभिन्न राज्य सरकारों के कानून और अधिनियम का धरातल से कोई वास्ता नहीं दीख पड़ता। यहाँ प्लास्टिक पर प्रतिबंध कागजी नजर आता है। सरकार को चाहिए कि लोगों को जागरुक करने के लिए सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर स्वेच्छा से काम करने वाले लोगों को प्रशिक्षण दे कर उन्हे प्रोहत्साहित करें ताकि वो गाँव-गाँव जाकर लोगों को प्लास्टिक  के कचरे के निपटान और इससे होने वाले किसी भी स्तर के नुकसान से अवगत करवा सके। इसके अलावा सरकार को साथ के साथ ही प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण के अनुकूल स्थानीय पारम्परिक विकल्पों का अध्य्यन कर उन्हें भी प्रोहत्साहित करना चाहिए। नकद व्यवसाय से जुड़े लोग जो निजी स्वार्थ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं और पर्यावरण से संबंधित समस्याओं को हाशिए पर रखे हुए हैं,  पॉलीथीन व प्लास्टिक की थैलियों को खरीद फ़रोख्त में इस्तेमाल करने वालों से सख्ती से निपटने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को  जमीनी स्तर पर हरकत में रहना चाहिए क्योंकि  हमारे देश में कानूनों की तो कमी नहीं है, कमी है तो बस उन्हें सख्ती से लागू करने की। 


 -सुभाष तराण

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

मेरे सपनों का पहाड़


मेरा गाँव पहाड़ पर है। गाँव से लौटे महीना नहीं होता कि मैं फ़िर से गाँव की ओर हो लेता हूँ। पहाड़ पर ख़राब मौसम को लेकर मौसम विभाग की तमाम चेतावनियों के बावजूद भी मेरी हर महीने कम से कम एक या दो बार गाँव जाने की कामयाब कोशिश तो रहती ही है। यदि शनिवार रविवार के अलावा कोई और अतिरिक्त छुट्टी न हो तो कभी-कभार केवल एक रात ही गाँव में ठहरना नसीब हो पाता है। जबकि दिल्ली से गाँव तक आने और वापिस जाने में तकरीबन 30-35 घंटे सफर में ख़र्च हो जाते हैं जिसमें दो रातों की नींद भी शामिल रहती है। बावजूद इसके माता जी पिताजी के साथ बिताया गया थोड़ा सा समय भी मन मस्तिष्क को भरपूर सुकून देता है। जहाँ मेरे लिए यह एक प्रकार की तीर्थ यात्रा हो जाती हैं वहीं मेरे उम्र दराज अभिभावक भी मेरा साथ पाकर ताजा दम हो जाते हैं।
सीमित ज़रूरतों के अलावा थोडी बहुत खेतीबाड़ी, एक दूधारू गाय, तीन बछड़े, दो कुत्तों और एक बिल्ली के साथ अपना समय व्यतीत करने वाले मेरे इन बुजुर्गों की उपलब्धियाँ मेरे लिए बहुत प्रेरक होती है। चाहे घर में प्रचूर मात्रा में मिलने वाला घी, मक्खन, दूध या मट्ठा हो, चाहे केला, आम, अनार जैसे मौसमी फल या गुज़ारे लायक ताजी सब्ज़ियाँ, यहाँ ये सब अपना होता है। आदर्श खान पान और स्वस्थ्य आबो हवा जीवन की बड़ी जरुरतें हैं।  ऐसी स्थिति में कोई गया गुज़रा ही कोई होगा जो ऐसे माहौल में स्वयं को संतुष्ट महसूस न करें।
मेरी यह दिली ईच्छा है कि पहाड़ के गाँवों से मेरे बाद की पीढियाँ पलायन न करें। उनके लिए उनके गाँव के इर्द गिर्द ही सम्मानजनक रोजगार की भरपूर संभावनाएं उपलब्ध हो।   परदेस में रहकर अपने पुश्तैनी गाँव के प्रति इसी लगाव के चलते मैने पहाड की बात करने वाले कई संगठनों से खुद आगे बढ़कर स्वय को जोड़ने की कोशिश की। लेकिन ये संगठन और इनसे जुड़े अधिकतर लोगों के इरादों की असलियत मालूम होते ही मैनें इन संगठनों से खुद को थोड़े से अन्तराल के बाद ही अलग कर दिया। पहाड़ और पहाड़वासियों की समस्याओं की दुहाई देकर बनाए गये संगठनों के माध्यम से राजनीतिक महत्वकांक्षाओं और मुफ़्त ख़ोरी के लिए प्रयासरत बुद्धि जीवियों की बजाय मुझे ऐसे लोगों की तलाश थी जो पहाड़ों पर के गाँवों के बाशिन्दों की मूल भूत सुविधाओं और वहाँ की स्थानीय समस्याओं की तरफ़ सरकार का ध्यान आकृषित करवाने के लिए प्रयत्नशील हो। पलयान को लेकर सरकार से संवाद करते रहना और इस पर काम करते रहना बहुत जरुरी है। पहाड़ पर पलायन भाषणों और घोषणाओं से नहीं रुक सकता, इसके लिए तो वहां के पारंपरिक संसाधनो के दोहन, पहाड़ की ख़ेती बाड़ी और उनके पारंपरिक उपकरणों को उन्नत और आधुनिक करवाने की कवायद के लिए वैज्ञानिक शोधों और आविष्कारों को लेकर काम करने की सख़्त दरकार है।
उत्तराख़ण्ड में पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं। यहाँ की अनूठी प्राकृतिक एवं साँस्कृतिक छटा दुनिया के हर शख़्स को अपनी ओर आकृषित करने का माद्दा रखती है। ऐसे में यहाँ के गाँवों को पर्यटक स्थलों के रुप में विकसित कर स्थानीय स्तर पर आय के अतिरिक्त जरिए पैदा किए जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए भी ऐसे ही लोगों की जरुरत है जो पहाड़ के पर्यटन की दृष्टि से मुनासिब क्षेत्रों की पहचान कर पर्यटन विभाग तथा पर्यटन के क्षेत्र में काम कर रही अन्य एजेंसियों से बात कर उन्हे यहाँ इको टूरिज्म विकसित करने के लिए आमन्त्रित करें। साथ ही यह बात भी सशर्त रखी जाय कि इसमें स्थानीय उत्पाद और श्रम को प्राथमिकता दी जाएगी।
स्थानीय स्तर पर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करवाने के लिए जहाँ एक ओर सरकार से संवाद की निताँत आवश्यकता है वहीं स्थानीय स्तर पर सरकार की योजनाओं को लेकर लोगों को जागरुक करना भी एक बड़ा काम है। आज उत्तराख़ण्ड के गाँव प्रत्येक में ऐसे नेता, समाज सेवक भरे पड़े हैं जो सरकार की ओर से गाँव की तरफ़ आती हर एक कल्याणकारी योजना को सराकारी कारिन्दों के माध्यम से फ़ाईलों के अन्दर ही उन्हे ठिकाने लगाने में माहिर है। ऐसे लोगों के लिए विकास का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ ठेकेदारी होता है। ये लोग सरकारी दफ़्तरों में तभी तक सक्रिय रहते हैं जब तक कि किसी नहर, सड़क, पुल या इमारत का ठेका हासिल नहीं हो जाता। उसके बाद, नहर में पानी है या नहीं, सड़क या पुल यातायत लायक है या नहीं, या सरकार के द्वारा स्कूल, अस्पताल आदि जैसी मूल भूत सुविधाओं के लिए बनाए गए भवनों में संबधित विभागों के कर्मचारी अधिकारी रहते है या नहीं, जैसे मसलों पर सरकार से कोई बात नहीं करता। वैसे ये चंट-चकड़ैत बात करेंगे भी किसलिए,  ये अपने राजनैतिक आकाओं से प्रभावित होकर स्वयं तो परिवार सहित देहरादून या तराई के अन्य शहरों में आ बसे हैं। शहरों में किसी बात की कोई कमी थोड़े ही है। ठेकों के भुगतान से लेकर, स्कूल अस्पताल तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं यहाँ उचित दामों पर उपलब्ध हो जाती है। इसके लिए ये लोग ही अकेले दोषी नहीं है, दोष उन जन प्रतिनिधियों का है जो चुनाव के दौरान तो क्षेत्र में नजर आते है लेकिन चुनाव जीतते ही देहरादून के हो जाते हैं। फ़र्ज किजिए, यदि विधान सभा का विधायक अपनी विधान सभा के मुख्यालय में रहेगा तो क्षेत्र की तमाम कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारी/कर्मचारी भी उस क्षेत्र में अपने-अपने कार्यालयों पर तैनात रहने को अपनी जिम्मेदारी समझेगे और जनता की समस्याओं पर त्वरित कार्यवाही होगी। लेकिन वर्तमान में स्थितियां बिलकुल इसके बरक्स है। सुदूर क्षेत्रों में तैनात सरकार के अधिकारी कर्मचारी देहरादून से ही आना जाना करते हैं। उन्हे मालूम है कि जब क्षेत्र के जन प्रतिनिधि स्वयं देहरादून में रह कर क्षेत्र की जनता के प्रति अपनी जवाबदेही तय कर लेते है तो फ़िर हम भी पहाड़ पर क्यों रहें। वे तो कभी कभार जाकर लौट आने को भी अपनी बड़ी उपल्बधि मानते हैं।  ऐसे में क्षेत्र की जनता के हितों के लिए कितना और क्या काम हो पाता होगा अन्दाजा लगाया जा सकता है। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि लोक तंत्र में जन प्रतिनिधि राजनैतिक अगुआ ही नहीं बल्कि सामाजिक अगुआ भी होता है।
उत्तराख़ण्ड की वर्तमान दशा के लिए तथाकथित समाज सेवियों, ठेकेदारों और जनप्रतिनिधियों के अलावा जो एक और तबका भी बराबर का दोषी है वो है उन पढे लिखे लोगों का जो रोजगार के लिए पलायन करते है और पलट कर अपने गाँव घर की ओर देखते तक नहीं। गाँव में बचे अपढ लोगों से, जो हमेशा जीविकोपार्जन के लिए संघर्षरत रहते हैं, किसी क्रान्ति की उम्मीद करना महज मुगालते में रहने जैसा है। यह सुखद है कि अब गाँव में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता अपने बच्चों को शिक्षित करना है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि शिक्षा का यह वर्तमान ढाँचा पहाड़ के लिए एक अभिशाप है। पुश्तैनी खेती बाड़ी और पशुपालन ने पहाड़ पर सदियों से मानव सभ्यताओं को आबाद रखा है लेकिन आज हमारी इस नौकरपरस्त शिक्षा प्रणाली के चलते यह पारंपरिक आजिविका लगभग मृतप्राय होने को है।  शिक्षा का यह हासिल हमे हमारी  जड़ों से उखाड़ कर कहीं और लाकर पटक देता है।



- सुभाष तराण