बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

अभिव्यक्ति

भ्रष्टाचार से पीड़ित कुछ खाते-पीते लोगों ने एक भ्रष्टाचार विरोधी लेकिन विकास को समर्पित संगठन बनाने की सोची। बस, फिर क्या था, एक तरह की विचार धारा के लोग एक के बाद एक जुड़ते गये!  क्या सेवानिवृत कर्मचारी, अधिकारी, क्या वकील, क्या ठेकेदार, क्या उद्यमी क्या व्यवसायी। बस, जुड़ते ही रहे,। रही सही कसर दिशा-भ्रमित युवाओं ने पूरी कर दी!  और संगठन ने अपना रूप ले लिया।
तुरत-फुरत एक मीटिंग बुलाई गई! 
एजेंडा था, संगठन के पदाधिकारियों का चुनाव! 
मीटिंग शुरू हुई, मीटिंग का संचालन एक कुशल वक्ता (ऐसा वो समझते थे खुद के बारे में, वहाँ बैठे लोग नहीं) ने भाषण देना शुरू किया!
"साथियों, परमपिता परमेश्वर कि कृपा से आज हम लोग यहाँ कुछ मुद्दों पर, जो अभी तय नहीं हुए है, के लिए एकत्र हुए हैं।  हमने जो संगठन बनाया है, उसको एक लोकतांत्रिक रूप देने के लिए पदाधिकारियों का चुनाव करवाना होगा! हमें ऐसे व्यक्ति को अपने संगठन की कमान सौंपनी होगी जो निहायत ही ईमानदार हो! तो मैं समझता हूँ कि किसी सेवानिवृत शिक्षक को",,,,,
वो महाशय अपनी बात पूरी कर पाते, तभी एक व्यक्ति जो अपने जीवन के छठे दशक में दिखाई दे रहे थे और सेवानिवृति के बाद इस संगठन की जमीन का इस्तेमाल एक बड़े अखाड़े के रूप में करना चाहते थे, ने बात काटते हुए कहा, " एक मिनट! अध्यक्ष का पद कोई पाठशाला चलाना नहीं हैं। लोग बहुत बेईमान है। मास्टरजी के पास इस तरह के संगठनो को चलने का क्या तज़ुर्बा है?
 मित्रों! हमें एक ऐसा आदमी चाहिए जो लोहे के समान हो, क्योंकि लोहा लोहे को काटता है।"  
वह मास्टर जी को मुखातिब करते हुए बोले।
 "हम मास्टर जी कि सेवायें अवश्य लेंगे, जैसे इंद्र ने दधीचि कि सेवाएं ली थी, गांडीव बनाने के लिए! भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हथियार चाहिए न?"
अपना वक्तव्य जारी रखते हुए वह बाकि लोगों की तरफ़ मुड़े, और कहने लगे, "सबको उनकी योग्यतानुसार काम दिए जाएगा! लेकिन जहाँ तक अध्यक्ष पद की बात है, उसके लिए विशेष तज़ुर्बा चाहिए! उसके लिए ऐसे आदमी की जरुरत है जिसके पास पटवारी से लेकर पोर्ट तक के अधिकारियों से निपटने का तज़ुर्बा हो! जो आदमी काला-सफ़ेद करना जानता हो! बड़े-बड़े अधिकारियों को चूना लगाने वालों को अहमियत दी जाएगी, क्योंकि भ्रष्टाचार के मूल कारण यही अधिकारी होते हैं। उसको टोपी पहनाना आना चाहिए, लेकिंन खुद टोपी से परहेज होना चाहिए! उसके लिए हमें कोई डाक्यूमेंट प्रूफ चाहिए, मसलन कोई फोटो, जिसमे आप किसी और को टोपी पहनाए खड़े हो, लेकिन आप ने टोपी खुद न पहनी हो।
लोग मन्त्रमुग्ध हुए उनकी बात सुन रहे थे। महाशय ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा। 
 "और एक विशेष बात, उसके पास टोपी के नीचे मूंड़ने का हुनर भी होना चाहिए!" 
पहले वाले वक्ता ने बात काटते हुए पूछा,
 "टोपी के नीचे मूँडने का हुनर"?
महाशय ने लगभग खीजते हुए कहा, 
"ओफ्फो,  
"आपको पूरी बात समझानी पड़ेगी। देखिए, आप टोपी पहनते हैं, आपको मालूम है टोपी हमारी संस्कृति में इज्जत का प्रतीक है, यदि आपकी टोपी उतार कर कोई आपको मूंँड़ेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा? बताइये?,,,,, 
नहीं ना? ,,
 फिर?
अब देखिये, यदि संगठन को आपके बाल या खाल की आवश्यकता हुई तो बिना टोपी उतारे आपके बाल, और बिना कपडे उतारे आपकी खाल उतार दियें जाएगें। आपके सर पे टोपी बरक़रार तो आपकी इज्जत बरकरार। आपके शारीर पर कपडे बरकरार तो आपकी इज्जत बरक़रार। अब बताइये, यह दक्षता वाला काम है कि नहीं? क्या मास्टर जी इस काम को कर सकते हैं? इस बेचारे ने तो कभी अपनी पत्नी से ऊँची आवाज में बात नहीं की होगी, तो भला लोगों को कैसे डील करेंगे? हमें ऐसा आदमी चाहिए जो किसी के सवाल करने पर तुरंत उसका गिरेबान पकड़ ले। लांछन लगाने में  माहिर होना चाहिए, गाली गलौज में विशेषज्ञता होनी चाहिए! "
पूरी सभा में सन्नाटा छा गया! 

कोने में बैठा एक व्यक्ति जिसकी शक्ल पर अभी थोड़ी देर पहले भेड़ के हाव-भाव थे, उसने अब भेड़िये वाली मुस्कान ओढ़ ली थी!
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(जारी),,,

(सुभाष)

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