बुधवार, 12 अप्रैल 2017

नए बर्तन का भूत


पन्द्रह बरस तक अभावों में रहते हुए पढ लिख कर सुदूर पहाड़ के गाँव का हरिचन्द शहर के नजदीक वाले कस्बे में स्कूल मास्टर हो गया था। नौकरी पा जाने के बाद जब वह पहली बार अपने गाँव लौटा तो वह शहर से अपने घर परिवार के लोगों के लिए जरुरत का बहुत सारा सामान भी लेकर आया। छ महीनों की नौकरी के दौरान वो जितनी कुछ भी बचत कर पाया, उस में से उसने एक बड़ा हिस्सा परिवार के लोगों की जरुरतों के सामान पर खर्च कर दिया। हरिचन्द पहाड़ के एक ऐसे सयुंक्त परिवार से ताल्लुक रखता था जहाँ रिश्तों की दूरियों और नजदीकियों को मापने का एक मात्र मापदण्ड परिवार होता है। पिता हो, चाचा हो, या ताऊ हो।  सगा हो, चचेरा हो या किसी और रिश्ते का, यहाँ सब को बराबर सम्मान और स्नेह दिया जाता है। अपनी इसी परंपरा की तर्ज पर हरिचन्द भी परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ लेकर आया था।

हरिचन्द के द्वारा लाए गए सामान की फ़ेरहिस्त में कुछ आधुनिक किस्म के उपयोगी बर्तन भी थे। उसने बचपन से देखा था कि कैसे उसके घर की पारंपारिक रसोई में पहाड़ पर पैदा होने वाले ठोस दलहनों को भोजन हेतु गलाने के लिए चूल्हे में बहुत सारी सूखी लकड़ियाँ राख हो जाया करती थी। बचपन से ही उसने इस तकलीफ को व्यक्तिगत तौर पर अनुभव किया था कि जलावन की ये लकड़ियाँ उन्हे दूर जंगल से सर और पीठ पर ढो कर लानी होती थी। पढ लिख कर हरिचन्द ने रोजगार ही हासिल नहीं किया, अपने परिवार के रोजमर्रा के जीवन को कैसे बेहतर और सरल बनाया जाय, वह इस बारे में भी अक्सर सोचते रहता था। परिवार के लिए उसके द्वारा लायी गई हर वस्तु उसकी समझ को प्रमाणित करती थी।

सर्दियों का मौसम था। छुट्टी पर आए हरी चन्द का आज अपने घर में दूसरा दिन था। दिन का खाना ख़त्म होते ही हरीचन्द की माँ ने रात का खाना बनाने के लिए फ़िर से चूल्हा फ़ूँकना शुरु कर दिया। माँ के द्वारा की जा रही जल्द बाजी को देखकर हरी चन्द समझ गया था कि आज घर में राजमा या उड़द की दाल बन रही है। जब चूल्हा सुलगने लगा तो हरी चन्द ने माँ से कहा कि आज वो उसके द्वारा लाए गए नए बर्तन में दाल पकाएगा। माँ अपने बेटे की बात सुनकर मुस्कुरायी और थाली में बीन कर रखी दाल उसकी ओर बढा कर स्वयं दूसरे कामों में व्यस्त हो गयी। हरीचन्द नें खुद का लाया नया बर्तन निकाला और धुली हुई दाल को उसके हवाले कर उसमे उचित मात्रा में पानी डाला, उसका ढक्कन बंद किया और उसे चूल्हे पर चढा दिया। चूल्हे की लकड़ियाँ दुरुस्त करने के बाद हरी चन्द ने माँ से कहा कि वो अपने दोस्तों के साथ थोड़ी देर के लिए खेतों की तरफ़ जा रहा है। रोजमर्रा के कामों के चलते रसोई में उलझ कर रह जाने वाली माँ ने उसकी बात के जवाब में लापरवाही के साथ हामी भरी और अपने कामों में व्यस्त हो गयी।

चूल्हा रोज की तरह आज भी पूरी तन्मयता के साथ सुलग रहा था। पहाड़ में ऊँचाई पर पाए जाने वाले बांज जैसे पेड़ों की लकड़ियाँ जब जलती है तो उसमें बड़ा ताव होता है।  एक बार जब चूल्हा भर ये सख़्त मिजाज सूखी लकड़ियाँ सुलग जाती है तो ये घंटे भर तक लपटें उगलती रहती है। यही नहीं, जल कर अँगार होने के बाद भी इनमें जोर की आँच बनी रहती हैं। बाँज के सुलगते अँगार को यदि राख में दबा दिया जाय तो वो लगभग आठ से दस घंटे तक सुलगता रहता है।   

हरिचन्द की माँ का ध्यान जब चूल्हे पर चढे नए बर्तन की चमक को काला करती लपटों पर गया तो उन्होने राख़ को गीला कर उस नए बर्तन के चारों ओर राख का लेप लगा दिया।  हरीचन्द घर से निकल कर गया ही था कि तब तक उसके पिता जंगल से बकरियों का रेहड़ चरा कर वापिस घर पहुँच गए। थके मांदे पिता नें जब पत्नी से तंबाकू का तकाजा किया तो पत्नी नें रसोई में अपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर उन्हे स्वयं हुक्का भरने को कहा। जंगल से लौटे हरीचन्द के पिता को तंबाकू की तेज तलब हो रही थी। उन्होने हुक्का उठाया, उसका पानी बदला, चिलम में एक खुराक तंबाकू  डाला, चूल्हे से सुलगते हुए चार कोयले तोड़ कर चिलम पर सजा दिए और वहीं रसोई की दीवार में टेक लगा कर हुक्का गुडगुडाते हुए पत्नी से हरिचन्द द्वारा शहर से लाए गए सामान को लेकर बातचीत करने लगे।   

  कुछ पंद्रह एक मिनट का समय गुजरा होगा,  पति पत्नी की बातचीत किसी नतीजे पर पहुँचती कि तभी चूल्हे पर चढा बर्तन दबी आवाज में चीख़ पडा। हरिचन्द के माता पिता के लिए किसी बर्तन का ऐसा व्यवहार अप्रत्यिशित था। रसोई में नए बर्तन की इस गर्जना से हरि चन्द के माता पिता सब कुछ ज्यों का त्यौं छोडकर चीख़ते हुए रसोईघर से बाहार की ओर भागे। 
पहाड़ के गाँवों में घर बहुत पास-पास होते हैं। रसोई से निकली चीख़ों के चलते घड़ी भर में जितने आस पास में लोग थे, वे हरिचन्द की रसोई की ओर दौड़ पड़े लेकिन चूल्हे पर चढे बर्तन की गर्जना सुनकर सब के सब रसोई के दरवाजे से एक उचित दूरी बनाकर ठिठक गए। अचानक रसोई के बाहार खड़ी भीड़ में से एक आदमी कंपकंपाकर हुँकार भरता हुआ रसोई के दरवाजे पर आ गया। उस आदमी पर देवता अवतरित होता था। कांपते हुए उस आदमी के हाथ में किसी नें तुरत चावल के दाने रख दिए। पहाड़ के देवता अपनी सारी दैवीय प्रक्रियाएं चावल के दानों से पूरी करते हैं। वो चाहे किसी को दिया जाने वाला प्रसाद हो, गले में बांधे जाने वाला गंडा या ताबीज हो, कोई भाष्य, भविष्यवाणी हो या बुरी आत्माओं से छुटकारा पाने की बात जैसा कुछ और, यहाँ सभी कुछ चावल के दानों से ही तय होता है। इसलिए किसी मनुष्य पर देवता के अवतरित होते ही सबसे पहले उसे चावल प्रस्तुत किए जाते हैं।  आदमी पर अवतरित देवता नें चावल के दानों को मुट्ठी में लेकर आसमान की ओर देख़ते हुए उस पर फ़ूँक मारी और हट का उच्चारण करते हुए चावल के दाने चूल्हे पर सवार शोर कर रहे उस नए बर्तन पर दे मारे।

मानों जैसे कोई चमत्कार हो गया हो।

चूल्हे पर लपटों से घिरा नया बर्तन एक दम खामोश हो गया। हरिचन्द के पिता जी ने हाथ जोड़े और आदमी पर अवतरित हुए देवता के सामने नत मस्तक होकर कहने लगे,

-       हे माराज, नर देई (मनुष्य) से क्या खता हो गयी?

इतनी देर में रसोई घर के बाहार एक अच्छी खासी भीड़ जुट चुकी थी। हरिचन्द के घर के आस पास रहने वाले बहुत से लोग आज एक ऐसी घटना के प्रत्यक्षदर्शी बन चुके थे जिसके बारे में वे अक्सर सुनते आए थे। उन सबों की मनोस्थिति फ़िलहाल ऐसी थी कि चूल्हे पर चढे नये बर्तन के भीतर घुसी बुरी आत्मा देवता की शक्ति के चलते खामोश हो गयी है। आस पास खड़े लोगों के हाव भाव देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यदि उस आदमी पर समय रहते देवता अवतरित न हुए होते तो वहाँ प्रलय निश्चित थी। नए बर्तन के दहाड़ने के किस्से और आदमी पर अवतरित हुए देवता के द्वारा उसे शान्त करवाने की बात नमक मिर्च के साथ गाँव भर में आग की तरह फ़ैलने लगी। जिसने सुना, काम धन्धा छोड़कर हरिचन्द के घर की ओर दौड़ पड़ा।  

आदमी पर अवतरित हुए देवता ने काफ़ी देर तक आँखे बन्द कर आसमान की तरफ़ देखा और फ़िर मुट्ठी में रखे चावल के दानों पर फ़ूँक मारते हुए चावल के उन दानों को हरि चन्द के पिता के फ़ैले हाथों पर फ़ैंक दिया।

हरिचन्द के पिता के हाथ चावल के दो दाने आए।

हरि चन्द के पिता नें आदमी पर अवतरित देवता के आगे शीश नवाते हुए कहा,

-       जैकार माराज।

इतनी देर में गाँव के कई मौजिज महानुभव भी आदमी पर अवतरित हुए देवता को हाथ जोड़ते हुए हरिचन्द के पिता के बगलगीर हो गए। रसोई घर के सामने ख़ड़ी सारी भीड़ भयातुर नजर आ रही थी।

आसमान से जमीन पर अपनी नजर लौटाते हुऐ आदमी पर अवतरित हुए देवता बुदबुदाया।

-       संकट पड़ा है। बंध रखो। 

हरि चन्द के पिता नें जेब से एक नए रुपये का सिक्का निकाला और आदमी पर अवतरित हुए देवता के सम्मुख फ़र्श पर टिका दिया। आदमी पर अवतरित हुए देवता नें बायीं मुट्ठी से चावल के कुछ दाने दायीं मुट्ठी में लिए, उस पर फ़ूँक मारी और चावल के उन दानों को फ़र्श पर पड़े सिक्के पर दे मारा।

-       संकट का समय था, फ़िल वक्त टाल दिया है। संक्रांति के दिन फ़िर से पूछ करनी पड़ेगी।

आदमी पर अवतरित हुए देवता बन्द आँखों से आसामान की ओर देखते हुऐ बड़बड़ाए।

हरिचन्द के पिता समैत मौजिज लोगों ने हाथ जोड़ कर सर झुकाते हुए एक सुर मे कहा

-       जैकार माराज।

अचानक चूल्हे पर रखा नया बर्तन फ़िर से दहाड़ उठा। आदमी पर अवतरित हुए देवता रसोई के दरवाजे से यूँ चिपक गए मानों बर्तन चूल्हे पर से चीखते हुऐ आगे बढेगा और उनका गला दबा देगा। चेहरे पर आते जाते कई किस्म के भावों के बीच उनके माथे पर पसीने की बूँदे चमकने लगी। रसोई घर के सामने बरामदे में बैठे मौजिज लोगों का झुण्ड डर के मारे वहीं पसर गया। इस बार चूल्हे पर सवार धुआं छोड़ते बर्तन की गर्जना कुछ ज्यादा तीखी लग रही थी।  इसकी वजह से रसोई के बरामदे के सामने ख़ड़ी भीड़ में भी मामूली सी भगदड़ मच गयी। कुछ प्रत्यक्षदर्शी तो चीखते चिल्लाते भाग खड़े हुए। लेकिन दुनिया में मजबूत दिल वालों की संख्या भी कम नही है। बहुत से लोग अपनी जिज्ञासु प्रवृति के चलते वहीं ख़ड़े रहे। चूल्हे पर चढे नए बर्तन के इस औचक व्यवहार से उसी वक्त भीड़ में शामिल एक अधैड़ कंपकंपाने लगे। इन अधैड़ महाशय पर भी एक क्षेत्रीय देवता अवरतित होते थे। क्षण के अन्तराल में अधैड़ ने अपने शरीर को झटकते हुए सर पर पहनी टोपी को खुद से अलग किया और सामने एक कटोरे में पड़े चावल के दानों को मुट्ठी में भरते हुए बरामदे को फाँदकर रसोई के दरवाजे की तरफ़ कूद लगा दी। अधैड़ पर अवतरित हुए क्षेत्रीय देवता के पास आते ही घिघिया कर दरवाजे से चिपके पहले वाले आदमी पर अवतरित हुए देवता को थोड़ा ढांढस बंधा। आदमियों पर अवतरित देवताओं ने हुंकारों के माध्यम से एक दूसरे का अभिवादन किया। बांज की लकड़ीयों की तेज लपटों से घिरा नया बर्तन अब भी लगातार कर्कश आवाज किए जा रहा था। अधैड़ पर अवतरित हुए देवता नें रसोई घर के सामने खड़ी भीड़ के उपर चावल के कुछ दाने उछाल दिए। अचानक सामने खड़े जन समूह में से दो और आदमी सर पर की टोपियों को झटकते हुए हुंकार भरने लगे। ये दोनो भी कंपकंपाते हुए पहले से दो आदमियों पर अवतरित देवताओं की ओर लड़खड़ाते हुए पहुँच गए और उनकी हुँकारों में अपनी हुँकारे मिलाने लगे। चारों आदमियों पर अवतरित देवताओं की हुँकारों से इतना शोर बरपा कि चूल्हे पर चीख़ रहे नए बर्तन का शोर कम लगने लगा। आदमियों पर अवतरित देवताओं ने आपस में आँख़ों-आँख़ों मे बात की और एक साथ मुट्ठियों में बन्द चावल के दानों को चूल्हे पर चढे नए बर्तन पर दे मारे।

कुछ क्षण गुजरे होंगे, अचानक चूल्हे पर धरा नया बर्तन किसी आज्ञाकारी बालक की तरह शाँत हो गया। रसोई के बाहर बरामदे के सामने खड़े गाँव भर के भयातुर लोगों का झुण्ड एक सुर में बुदबुदाया,

-       जैकार माराज

रसोई घर के दरवाजे के साथ अदमियों पर अवतरित देवताओं नें बन्द आँखों से आसमान की ओर देखते हुए आशीष स्वरुप चावल के कुछ दाने हवा में उछाले और अधेड़ पर अवतरित हुए देवता नें गरजते हुए मौजीज लोगों में बैठे हरिचन्द के पिता की तरफ़ मुखातिव होते हुए कहना शुरु किया,

-       संकट बहुत विकट था, शुक्र मनाओं कि तुम पर देवताओं की छाया है,  नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता।

देवताओं पर अगाध विश्वास रखने वाले हरिचन्द के पिता नें सर से टोपी उतारी और उसे आदमियों पर अवतरित देवताओं के पैरों की ओर सरकाते हुए कातर स्वर में कहा,

-       माराज, तुम्हारी दी हुई साँसे लेते हैं, इसकी रक्षा करना भी तुम्हारा ही फ़र्ज है। माराज, अरज ये है कि अब ये विकट संकट कैसे कटे? आप उपाय बताएं, जो भी हुक्म होगा, खुशी-खुशी कबूल होगा……

सबसे पहले आदमी पर अवतरित हुए देवता नें हरिचन्द के पिता की बात ख़त्म होने से पहले ही अपना वक्तव्य शुरु कर दिया।

-       मामला इतना हलका नहीं है जितना तुम समझ रहे हो। संकट बलि माँगता है। जितना जल्दी हो सकता है, बलि का बंध रखो। 

आदेश का तुरंत पालन हुआ। बकरियों के बाड़े में से एक बकरा निकाल कर रसोईघर के बरामदे में लाया गया। आदमी पर अवतरित हुए देवता को पानी का एक भरा हुआ लोटा प्रस्तुत किया गया। आदमी पर अवतरित हुए देवता नें बकरे को पकड़ा और लोटे का पानी बकरे के कानों और गुदा में डालते हुए उसकी पूरी पीठ गीली कर उसे बरामदे में छोड़ दिया। मौजिज लोगों के साथ-साथ सामने खड़े जन समूह नें हाथ जोड़ कर बिखरे स्वरों में बुदबुदाना शुरु कर दिया।

-       ले बे माराज, ले बे माराज। ले बे माराज, ले बे माराज। 

समय कुछ एक पल ही आगे बढा होगा, रसोई के बाहार एकत्र हुए लोगों को बेवकूफ़ों की तरह देखता बकरा अचानक कंपकंपा उठा।

भीड़ दबे स्वर में बुदबुदाई,

-       जेकार माराज।

मौजिज लोगों और सामने खड़ी भीड़ के चेहरे पर संतोष के भाव नजर आने लगे। पानी से भीग़े बकरे की देह पर छूटी कंपकंपी इस बात का संकेत थी कि देवताओं नें बलि कबूल कर ली है। चारों आदमियों पर अवतरित देवताओं नें हरिचन्द के पिता और मौजिज लोगों पर आशिर्वाद स्वरुप चावल के दाने बरसाने शुरु कर दिए। रसोई घर के बरामदे को घेर कर खड़ी भीड़ को देखते हुए बकरा रसोई घर के अन्दर घुस गया और अपने थूथन से वहाँ रखे अनाज और पानी के बर्तनों की पड़ताल करने लगा। वहाँ मौजूद लोगों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। जिस रसोई में चूल्हे पर रखा बर्तन चीख़ रहा हो, जिस रसोई में आदमियों पर अवतरित देवताओं के घुसने की हिम्मत नहीं पड़ रही हो, वहाँ देवताओं द्वारा बलि स्वरुप ग्रहित बकरा बेधड़क होकर घुस गया था। सभी प्रत्यक्षदर्शी हाथ जोड़े देवताओं की असीमित शक्तियों को महसूस करने की कोशिश कर रहे थे। रसोई के अन्दर घुसा बकरा वहाँ रखे पानी और अनाज से भरे बर्तनों की बड़ी बेरहमी से जाँच पड़ताल कर रहा था। कोई दो मिनट का समय गुजरा होगा कि अचानक चूल्हे पर रखा नया बर्तन फ़िर से चिंधाड़ा।

नये बर्तन की इस औचक आवाज से रसोई में घुसे बकरे ने अपना आपा खो दिया। नए बर्तन की यह आवाज सुनकर बकरा बुरी तरह से बिदक गया और रसोई में रखे बर्तनों और सामान को गिराते हुए इधर उधर दौड़ने लगा। अब तो चारों आदमियों पर अवतरित देवता भी असहाय नजर आने लगे। चूल्हे पर रखे नए बर्तन की कर्कश आवाज और बकरे द्वारा रसोई में की जा रही उछ्ल कूद ने माहौल को और भी भयानक और डरवाना बना दिया। रसोई के आस पास जमा हुए लोगों को लग रहा था कि अब शायद प्रलय आने ही वाली है कि तभी भीड़ को धकेलता हुआ हरिचन्द रसोई के दरवाजे की ओर बढ़ा। अपने घर के पास ईकट्ठा हुई भी को देखकर वह बहुत घबरा गया था। भीड़ को देखकर उसके दिमाग मे कई डरावने ख्याल कौंधने लगे। लेकिन जब उसने रसोई में जाकर वहाँ का जायजा लिया तो उसकी समझ में सबकुछ आ गया। उसने सबसे पहल बकरे को कान पकड़ कर रसोई से बाहर निकाला। उसके बाद चूल्हे पर रखे नए बर्तन, जिसे उस वक्त के दौरान शहर के लोग प्रेशर कुकर कहते थे, उसकी सीटी को बन्द करते हुए उसे नीचे उतार कर एक तरफ़ रख दिया और बाहर आकर वहाँ आदमियों पर अवतरित देवताओं समेत सभी लोगों से मुखातिब होते हुए कहने लगा।

-       क्या बात हो गयी?
-       

तीन लोकों की खबर रखने वाले देवताओं के पास हरिचन्द के सवाल का कोई जवाब न था। जिन आदमियों पर अभी थोड़ी देर पहले देवता अवतरित हो रखे थे वे अब फ़र्श पर अपनी टोपियाँ ढूँढते नजर आ रहे थे। हरिचन्द के सवाल से जहाँ आदमियों पर अवतरित हुए देवता कूच कर गए वहीं सामने किसी चमत्कार की उम्मीद में खड़ी भीड़ भी बिना कुछ कहे सुने ही तीतर बितर हो गयी। 

-सुभाष तराण


3 टिप्‍पणियां:

  1. गजब एक हकीकत के साथ ही हास्यास्पद भी मजा आ गया।😀

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  2. मजा आ गया भाई क्या गजब लिखा है और यह बात हकीकत होगी इसका में समर्थन करता हूँ...!!

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