मुझे और मेरे सहपाठी रतन सिंह को जिस दिन चकराता से त्यूनी जाना था उसके एक रात पहले चकराता और आस पास के पहाडी क्षेत्रों में ज़बरदस्त बर्फ़बारी हो गयी थी और जिसकी वजह से लोखण्डी से त्यूनी जाने वाला रास्ता बन्द हो गया था।
यह बात सन् 1992 के मार्च महीने की २६ तारीख़ की है। हमे अगले रोज किसी भी हालत में
त्यूनी पहुँचना था क्योकि इसी महीने की २८ तारीख से हमारी बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू
होनी थी। हमारे पास मात्र दो अतिरिक्त दिन का समय था। अब गाडी से त्यूनी जाने का जो एक मात्र रास्ता रह गया था उसके लिए हमे पहले
विकास नगर जाना पडता और फिर वहाँ से वाया नौगाँव पुरोला होते हुए त्यूनी। लेकिन जब हमने
अपनी जेबों का जायज़ा लिया तो इस रास्ते से सफर का ख्याल दूर की कौडी हो गया।
क्योंकि
सुबह तक मौसम भी साफ हो चुका था इसलिए अब तय यह हुआ कि हमारे पास दो दिन का समय
है, लिहाज़ा पैदल ही वाया लोखण्डी होते हुए त्यूनी के लिए कूच किया जाय। इस सफर की
भावी रणनीति के तहत पहले दिन कोटी,
जो कि रतन का गाँव
था, तक पहुँचना तय हुआ और अगले दिन सुबह-सुबह
वहाँ से मेरे गाँव
हटाल। उस जमाने मे भी आज की तरह ही हटाल से त्यूनी के लिए रोज़ाना सुबह और शाम
के वक्त हिमाचल परिवहन की बसों की भरोसेमन्द सेवाएँ उपलब्ध रहती थी। इसी उधेड़ बुन
के चलते तकरीबन १२ बजे के आस पास हम चकराता से पैदल-पैदल सड़कों सडक लोखण्डी की ओर
चल दिए।
चकराता से लोखण्डी तक के रास्ते हमे कच्ची बर्फ़ मिली। उस पर चलना ज्यादा मुश्किल नही था लेकिन लोखण्डी से कोटी तक बर्फ़ का समन्दर मौजूद था। एक तो पुरानी बर्फ़ और उस पर गिरी ताज़ा बर्फ़। लोखण्डी से कोटी तक के पैदल सफर के दौरान हमारे जान के लाले पड गये। बर्फीले रास्ते में चलने के कारण हमारे घिसे हुए जूते टूट गये। पैर सूज गये और पैरों की उगलियों के पोर से खून निकलने लगा। लेकिन यह हमारी हिम्मत ही थी कि हम जैसे तैसे देर शाम तक कोटी गाँव में रतन के घर पहुच गये। हमारी हालत खराब थी। रतन और उसके घर, गाँव वाले सर्दी दर सर्दी इस तरह की परेशानियों से दो चार होते रहते थे। सो तुरत फुरत गर्म पानी के तसलों मे पानी लाया गया। हमारे पैर, जो लगभग सुन्न हो चुके थे, उन भाप उगलते तसलों में डाले गये। लगभग घंटे भर में लकड़ी के मकानों के भीतर बाँज के कोयलों से सुलगती अँगीठी और गर्म पानी की सिकाई से हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति सामान्य हो गयी थी। रात के खाने में हमारे लिए सूखा गोश्त पकाया गया जिसने उस सर्द मौसम के चलते हमारी ख़स्ता हालत में दवा का काम किया।
चकराता से लोखण्डी तक के रास्ते हमे कच्ची बर्फ़ मिली। उस पर चलना ज्यादा मुश्किल नही था लेकिन लोखण्डी से कोटी तक बर्फ़ का समन्दर मौजूद था। एक तो पुरानी बर्फ़ और उस पर गिरी ताज़ा बर्फ़। लोखण्डी से कोटी तक के पैदल सफर के दौरान हमारे जान के लाले पड गये। बर्फीले रास्ते में चलने के कारण हमारे घिसे हुए जूते टूट गये। पैर सूज गये और पैरों की उगलियों के पोर से खून निकलने लगा। लेकिन यह हमारी हिम्मत ही थी कि हम जैसे तैसे देर शाम तक कोटी गाँव में रतन के घर पहुच गये। हमारी हालत खराब थी। रतन और उसके घर, गाँव वाले सर्दी दर सर्दी इस तरह की परेशानियों से दो चार होते रहते थे। सो तुरत फुरत गर्म पानी के तसलों मे पानी लाया गया। हमारे पैर, जो लगभग सुन्न हो चुके थे, उन भाप उगलते तसलों में डाले गये। लगभग घंटे भर में लकड़ी के मकानों के भीतर बाँज के कोयलों से सुलगती अँगीठी और गर्म पानी की सिकाई से हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति सामान्य हो गयी थी। रात के खाने में हमारे लिए सूखा गोश्त पकाया गया जिसने उस सर्द मौसम के चलते हमारी ख़स्ता हालत में दवा का काम किया।
अगले दिन अल सुबह
उठकर हम लोग कोटी से हटाल के पारम्परिक पैदल रास्ते पर निकल पडे। दिन का दिन
का खाना हटाल में खाने के बाद उसी दिन हमने
शाम के वक्त त्यूनी के लिए बस पकड़ी और त्यूनी
पहुँच गये।
इसे इत्तेफाक ही कहा जाना चाहिए कि जौनसार बावर के लोगो से जन संवाद में शरीक होने
हेतु चौबीस बरस के अंतराल के बाद मार्च महीने की ठीक उसी 26 तारीख को एक बार फिर से
चकराता से लोखण्डी होते हुए कोटी की ओर उसी रास्ते से गुजरना हुआ। लेकिन इस बार का
सफर गाड़ी से तय हो रहा था क्योकि अब यहाँ इतनी बर्फ़ ही नही गिरती कि रास्ते बन्द हो जाए। लोखण्डी से कोटी तक जहाँ चौबीस
बरस पहले बर्फ़ ही बर्फ़ होती थी, इस दफे वहाँ धूल उड़ रही थी।
क्योंकि कुछ हम ख्याल दोस्त इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि जौनसार बावर के ग्राम गणों की बात दूर शहरों में
बैठकर नही बल्कि उनके बीच जाकर होनी चाहिए, समस्याओं का अन्दाज़न
आकलन स्थानीय समाज और उनके राजनीतिक अगुवाओं के साथ नाइंसाफ़ी मानी जाएगी। इसलिए इसी
सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हम लोगों ने जौनसार बावर के चार छोरों, लखवाड, क्वानू, लाखामण्डल
और हनोल से चकराता तक के रास्ते में पडने वाले गाँवो से गुजरते हुए जन संवाद की योजना
बनायी। मुझे हनोल से चकराता के बीच पडने वाले गाँवो के लोगों से संवाद का ज़िम्मा सौंपा
गया।
रात
कोटी कनासर में गुज़ारने के बाद अगले रोज सवेरे-सवेरे हनोल का रूख किया गया। इस क्षेत्र
में जन संवाद का आग़ाज़ यहीं से होना था। हम लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से पहाड
को लेकर चिंता जताने वाले बुद्दिजीवियों का आह्वान किया था। हमे उम्मीद थी कि पहाडो
की समस्याओं को लेकर जन क्रान्ति की बात कहने और करने वाले बहुत से लोग इस यात्रा के
हम सफर बनेंगे और अपने अनुभवों से ग्राम गणों को लाभान्वित करेगे। कुछ उनकी सुनेंगे,
कुछ अपनी बताएँगे। लेकिन अफ़सोस! कोई नही आया। खैर, किसी के साथ ज़बरदस्ती नही की जा
सकती थी। वैसे भी यहाँ न तो कोई मीडिया अटेंशन थी, ना राजनैतिक लाभ और न ही कोई
बडा मंच। अगर यहाँ कुछ था तो वो थे पहाड और उसके वो बाशिन्दें जो सरकारो के लिए उनके
मूल भूत अधिकारों समेत हाशिए पर है।
27 मार्च, 2016 को लगभग 11 बजे के आस पास हम लोग हनोल पहुँच गये
थे। सर्वप्रथम एक आदिम समुदाय की जन भावनाओं
के आराध्य महासू के मन्दिर में हाजिरी बजाई गयी। हमने मन्दिर प्राँगण में मन्दिर समिति
के प्रतिनिधियों और श्रद्द्वालुओं के सामने अपने इरादों को पेश किया गया। वहाँ उपस्थित
लोगों से अपनी बात कहने का आह्वान किया गया। हनोल के मौजीज शख़्स पूरण नाथ को हनोल की
वास्तविक स्थिति जानने के लिए टटोला गया तो मालूम पडा कि तीर्थ स्थल होने के कारण हनोल
कि समस्याएं जौनसार के बाकी गाँव कस्बों से बिलकुल भिन्न है। पूरण नाथ चाहते हैं कि
हनोल को एक धार्मिक पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया जाय। पूरण नाथ कहते हैं कि यहाँ
चैत बैसाख़ और भादों में श्रद्धालुओं की बहुतायत के चलते अफ़रा तफ़री का महौल रहता है।
ठहरने की उचित व्यवस्था न होने के चलते श्रद्धालु ख़ुले में रात गुजारने को मजबूर होते
हैं। गर्म घाटी होने के चलते यहाँ साँप बिच्छूओं का डर अमूमन बना रहता है। अभी पिछले
ही साल दो लोगों को साँप ने डंस लिया था। दूसरे यहाँ रात बिताने वाले श्रद्धालुओं में
महिलाएं भी होती है उनके लिए रात बिरात शौच हेतु नजदीक में फ़िलहाल कोई सुविधा नहीं
है। सार्वजनिक शौचालय बनाए गये हैं लेकिन वह मन्दिर परिसर से बहुत दूर है। जिसके रात
के समय दिशा शौच के लिए जाने वाली महिलाओं के साथ होने वाली अभद्र घटनाएं होने का भय
हमेशा बना रहता है। हम लोग चाहते थे कि शौचालय मन्दिर परिसर के नजदीक बनाया जाता लेकिन
पुरातत्व विभाग के सख़्त आदेश है कि परिसर के 300 मीटर के दायरे में कोई भी नव निर्माण
नहीं होना चाहिए। पूरण नाथ आगे कहते हैं कि आर्थिक उदारवाद ने लोगों की क्रय शक्ति
बढा दी है। श्रद्धालुओं का एक बड़ा तबका सुविधाओं की अच्छी ख़ासी कीमत चुका सकता है।
ऐसे में यहाँ पर साफ़ सुथरे होटलों, रेस्टोरेंटों, फ़ल एवं पेय स्टालों की सख्त दरकार
है। यात्रा के दौरान परंपरागत श्रद्धालुओं को मन्दिर की ओर से उनके भोजन हेतु राशन
दिया जाता है यदि उसमें सरकारी या गैर सरकारी इमदादों को शामिल कर एक अहर्निश भंडारे
का रुप दिया जाय दूर-दूर से आने वाले गरीब श्रद्धालुओं के लिए यह किसी वरदान से कम
नहीं होगा। इसके लिए मन्दिर समिति और स्थानीय प्रशासन की मजबूत ईच्छा शक्ति की जरुरत
है जो कि फ़िलहाल कहीं भी नजर नहीं आती। सरकारी मदद अथाह रुप से आ रही है लेकिन जब आप
धरातल पर नजर दौड़ाएंगे तो मालूम हो जाएगा कि स्थानीय प्रशासन के उदासीन रवैये, अर्द्ध
शिक्षित चकड़ैतों और अपढ ठेकेदारों की कारगुजारियों के चलते सब कुछ अव्यवस्थित सा है।
जातिवाद के सवाल पर पूरण नाथ चेहरे पर उभर आए दर्द को दबाते हुए कहने लगे,
-पंडित जी, यह सब तो पूर्व जन्मों के कर्मों का प्रताप है। आप
के कर्म ज्यादा अच्छे रहे होंगे इसलिए आपने ब्रहाम्ण के घर जन्म लिया और मैंने शायद
अपने पूर्व जन्म के पापों के प्रायश्चित हेतु जोगी के घर जन्म लिया है।
पूरण नाथ ने पूर्वाग्रहों से ग्रसित तर्कों के साथ अपनी बात को
समाप्त किया। मेरे पास पूरणनाथ की बात का जवाब था लेकिन मैं जानता था कि वो इससे संतुष्ट
नही हो पाएगा, उल्टा मुझे वहाँ विराजमान पंड़ितों और वजीरों के कोप का भाजन बनना पड़ेगा।
पूरण नाथ से विदा लेने के बाद अगले पड़ाव की ओर कूच किया गया।
हनोल से आगे के सफ़र के दौरान अब मैं अकेला था। लोगों से बात करनी
थी, उनकी बात सुननी थी। ऐसे समय में, जब आप जन संवाद के लिए जा रहे हो, अकेले होना
बहुत ख़लता है। क्योंकि सवाल जवाब के दौरान आप पहाड़ के गाँवों की समस्याओं के परिपेक्ष्य
में कुछ कहने सुनने का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। एक अकेला आदमी सब कुछ नहीं कह
सुन सकता, ऐसे में स्थानीय मुद्दों और वहाँ की मुख़्य समस्याओं के नजर अंदाज होने का
डर बराबर बना रहता है।
हनोल से अगले गाँव नीनूस का रुख किया गया। बागवानी एवं कृषि के
लिए समृद्ध घाटी दारमी-गाड़ का एक गाँव। त्यूनी कथियान मोटर मार्ग से उत्तर की ओर निकली
जंगलात महकमे की चार नंबर सड़क से हाल के दिनों में संपर्क मार्ग के रुप में बनी उबड़
ख़ाबड़ सड़क आपको नीनूस गाँव तक ले जाती है। रास्ते में पड़ने वाली क्यारी गाड़ से आपको
ठेकेदार जन प्रतिनिधियों के द्वारा बनाई गयी, हर ओर को निकलती सूख़ी नहरे बहुतायत में
मिल जाएगी। इन नहरों में शायद ही कभी पानी गया हो। आपको इस किस्म के कई निर्माण कार्य
इस श्रेत्र में देखने को मिल जाएगें। यह इस क्षेत्र की भ्रष्ट व्यवस्था के जीते जागते
स्मारक है। आप चाहें तो इसे नेताओं, सरकारी विभागों और ठेकेदारों की घालमेल का जीवंत
इतिहास भी कह सकते है। साथ के साथ आप उन टूटे फ़ूटे प्लास्टिक के काले पाइपों से भी
रुबरु हो सकते हैं जो स्थानीय मेहनतकश किसानों के व्यक्तिगत प्रयासों के चलते क्यारीगाड़
से उनके ख़ेतों तक पानी पहुँचा रहे है।
नीनूस पहुँचने पर मुझे बहुत से ऐसे पढे लिख़े युवा मिले जो कृषि
क्षेत्र में उत्तराख़ण्ड सरकार की उदासीनता के बावजूद भी बागवानी और ख़ेती बाड़ी में ख़ुद
को बेहतर साबित करना चाहते है। इस गाँव में ही मुझे प्रह्लाद जोशी नाम का एक युवक मिला
जिसने लंबी बीमारी के बाद फ़िर से पढाई लिखाई शुरु कर दी है। यहाँ के ख़ेतों में हर ओर
सेब के नवजात, युवा और प्रौढ पेड़ नजर आते हैं। नगदी फ़सलों की सिंचाई के चलते पानी की
समस्या मार्च महीने में ही शुरु हो गयी है। जबकि पूरा ग़्रीष्म अभी सामने पडा हुआ है।
समाधानों के आस पास होने के बावजूद भी समस्याओं के अंबार लगे हुए हैं। व्यवहारिक शिक्षा
की बहुत जरुरत है। दुर्भाग्य इस बात का भी है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली जिसे भी शिक्षित
करती है वह पलायन कर शहर का हो जाता है और गाँव में बचा रहता है ख़ेत जंगलों से उलझता
अपढ किसान जो सरकार सम्मत समस्याओं को अपनी परिणति मान लेता है।
नीनूस के बाद अगला पड़ाव पुरटाड़ गाँव था। जंगलात की उसी चार नंबर
की सड़क से एक जीप कद रास्ता पुरटाड़ गाँव के लिए जाता है। यह सड़क ख़ुद में एक कहानी है।
सरकार से सड़क की मनुहार लगाने वाले पुरटाड़ वासियों की राह में जंगलात रोड़ा बन कर आ
रहा था। चार नंबर की वही सड़क जिसे एक जमाने में जगंलात महकमें ने जंगलों के दोहन हेतु
बनवाया था, से पुरटाड़ गाँव तक संपर्क मार्ग पहुँचाने हेतु लगभग 100 मीटर जंगलात की
भूमि रुकावट बन रही थी। जब बहुत कोशिशों के बाद बात नहीं बनी तो थक हार कर गाँव वालों
ने मिलकर श्रमदान से सड़क बनाने की ठान ली। होली के दिन एक सामुहिक भोज का आयोजन कर
सारा गाँव सड़क बनाने में जुट गया और गाँव वालों के गुजारे लायक सड़क बना डाली। जंगलात
महकमे ने बाद में बहुत हाथ पैर पटके, जुर्मी काटने की धमकी दी लेकिन गाँव वाले भी अड़
गये और सड़क बन गयी। मुझे लगता है कि राज्य के एक कोने में स्थित अकेले गाँव के ग्राम
वासियों के स्व प्रयासों से वजूद में आयी शायद यह उत्तराख़ण्ड़ की इकलौती सड़क होगी। सड़क
बहुत ही उबड़ ख़ाबड़ है लेकिन सड़क तो है जो यह निश्चित करती है कि गाँव वालों को राशन
अब पीठ पर ढो कर नहीं लाना पड़ेगा, जो यह निश्चित करती है कि अब हारी बीमारी के समय
किसी मरीज को नजदीकी अस्पताल तक त्वरित और बिना शारीरिक श्रम के पहुँचाया जा सकता है।
मैं जब पुरटाड़ पहुँचा तो अधिकतर लोग रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थे। कुछ लोग मिले
भी। यहाँ भी समस्याओं और समाधान के बीच छत्तीस का आँकड़ा था। ठेकेदारों को फ़ायदा पहुँचाने
के लिए बनाई गई बिना पानी की नहरे यहाँ भी बहुतायत में देखने को मिल रही थी। गाँव के ठीक सामने जंगल में लगी आग, जो चीड़ के हरे
दरख़्तों के बीच से सफ़ैद धुँआ उगल रही थी, को नजर भर देख़ कर वापिस उस सड़क पर लौट आया
जिस पर चल कर मुझे अपनी यात्रा के अगले पड़ाव की ओर जाना था।
शाम होने को थी। मुझे अब अगले गाँव बागी जाना था। कथियान मोटर
मार्ग पर पड़ने वाला यह पहला गाँव था। जौनसार बावर के गाँवो के बरअक्स यह अपर हिमाचल
के गाँवो की तरह दूर-दूर बिखरे मकानों का गाँव है। बाग बगीचे, ख़ेती बाड़ी और सरकारी
नौकरियों के चलते यहाँ के बाशिन्दे समृद्ध है। इस बात का सहज अन्दाजा इस गाँव के आलिशान
मकानों को देख़कर लगाया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह गाँव भी रोजमर्रा की समस्याओं
से अछूता हो। बातचीत के दौरान गाँव के निवासी सूरत राम डोभाल कहते हैं कि यहाँ भी पानी
की समस्या मार्च महीने में ही शुरु हो गयी है और गर्मी के तीन महीने अभी आने बाकी है।
अन्धेरा होते-होते मैं अगले गाँव कूणा पहुंच गया था। सड़क के साथ
ही लगती एक परचून की दुकान के मालिक से दुआ सलाम हुई तो पता चला की बन्दे को अरविन्द
पँवार कहते हैं। थोड़ी देर में कुछ और लोग भी वहाँ आ जुटे। बाचचीत का दौर शुरु हुआ तो
मालूम पड़ा कि अरविन्द सन् 2002 से बागवानी के काम में जुटे हुए हैं। उन्होने बागवानी
से संबधित कोई उचित प्रशिक्षण नही लिया है लेकिन उनकी रुचि ने उन्हे समय के साथ-साथ
बागवानी का अच्छा ख़ासा जानकार बना दिया। यदि फ़सल अच्छी रहे तो अरविन्द के बागीचे से
लगभग 8 से 10 लाख़ रुपये का निकल आता हैं और परचून की दूकान सो अलग। बाकी के लोग भी
कृषि और बागवानी की तरफ़ आकृषित तो है लेकिन जानकारी और जमीन संबंधी संसाधनों के अभाव
से हाल बुरा है। अरविन्द की तरह अपने दम पर जितना किया जा सकता है, किया जा रहा है।
रात के अगले पहर कूणा के युवाओं से विदा ली गयी और अगले ठिकाने,
जहाँ रात गुजारनी थी, मित्र रवि राणा के घर बास्तिल गाँव का रुख किया गया। समय की कमी
के चलते मैं चाहता था कि यहाँ के लोगों से रात को ही बात कर ली जाय लेकिन उस दिन भारत
आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट का मेच ख़ेला जा रहा था सो मामला सुबह पर ड़ाल दिया गया।
सुबह बास्तील के मौजीज लोगों से राय शुमारी करने हेतु गाँव की
सामुदायिक चौपाल, जो कि वहाँ कि पारंपरिक बैठक है, पर आसन जमाए गये। बावर के समृद्ध
गाँवो में से एक गाँव बास्तील भी है। नौकरी पेशा लोगों की गाँव में अच्छी ख़ासी तादात
है। बागवानी और खेती बाड़ी अच्छी होती है। पशु पालन भी गुजारे भर का होता ही है। लोग
हद तक के जागरुक है, लेकिन केवल खुद भर के लिए। क्योंकि पूरा का पूरा गाँव एक चट्टान
पर है इसलिए शौचालय जैसी आम समस्या से जूझ रहा है। वैसे हाल के दिनों में सीवर लाईन
स्वीकृत होने की ख़बर है लेकिन सीवर लाईन बिछेगी कब इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
बिरनाड़ बास्तील के बगल का गाँव है, दोनो गाँवों में स्कूल समेत दूसरे भी कई महकमों
के भवन आस पास बनाए गए है लेकिन सभी में ताले पड़े थे। जब स्कूल में शिक्षक की बावत
पूछा गया तो एक अधेड़ ने बगल में ख़ेल रहे बच्चे से उसके बारे में जानकारी चाही। रबर
के पाईप को गोल कर बनाए गए टायर से खेलते हुए बच्चे नें बड़ी लापरवाही से जवाब दिया
कि अभी तो होली की छुट्टियाँ चल रही है, जबकि होली को बीते आज छ दिन हो चुके थे। गाँव
के साथ लगते गदेरे में देवदार और बांज के युवा पेड़ो का एक छोटा सा जंगल है जो कि गाँव
की सामुदायिक मिल्कियत है।
सुबह का सूरज जब आसमान में लगभग आदमी भर की ऊँचाई ले चुका था,
मैने बास्तील वालों से विदा ली और अपने अगले गाँव चौसाल का रुख कर दिया।
सड़क के जिस छोर से चौसाल गाँव की हद शुरु होती है वही पर है गाँव
का प्राथमिक विद्यालय। विद्यालय में गया तो वहाँ स्थानीय निवासी जगवीर से मुलाकात हुई।
लगभग ग्यारह बजने को थे। जगवीर स्कूल की मरम्मत में मय मिस्त्री के जुटे पड़े थे। स्कूल
की बारहदरी में जो दो बच्चे खेल रहे थे वे दोनो बच्चे जगवीर के ही थे। बातचीत के दौरान
मालूम पड़ा कि जगवीर स्कूल अभिभावक संघ के अध्यक्ष है लिहाजा यहाँ की राजनीतिक प्रथा
के हिसाब से स्कूल की मरम्मत का ठेका भी उन्हे ही हासिल हुआ था। जगवीर से परिचय के
बाद जब स्कूल के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बारे में पूछा गया तो जगवीर नें मेरा
यही सवाल बारहदरी में ख़ेल रहे अपने बच्चों की तरफ़ उछाल दिया। बच्चों से पता चला कि
यहाँ भी अभी होली की ही छुट्टियाँ चल रही है, कब तक चलेगी यह इन्हे नहीं मालूम। जगवीर
नें मुझे चाय का निमन्त्रण दिया जो मैने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बातचीत का एक और दौर
शुरु हुआ। चर्चा शिक्षा, स्वास्थ्य से होती हुई ख़ेती बागवानी से जुड़े महकमे उद्यान
विभाग तक पहुँच गयी। जयवीर कहने लगे कि जितना नुकसान उद्यान विभाग नें किसानो का किया
है, उतना कोई और नहीं कर सकता। मेरे पिताजी ने उद्यान विभाग से सेब के पौधे लिए। हम
अपढ लोगों ने सेब के पौधे अपनी उपजाऊ जमीन मे रोप दिये। ख़ूब मेहनत की, मजदूरी कर पैसा
कमाया और लगाए गए पौधों की दवा खाद में खर्च किया। लगभग डेढ दशक की जी तोड़ मेहनत और
पेट काट कर बचाए गए गांठ के पैसों को ख़र्च करने के बाद इन पौधों पर फ़ल लगे तो पता चला
कि यह तो सेब की ऐसी दोयम नस्ल है जिसका बाजार भाव सबसे कम होता है। हमारे यहाँ उद्यान
विभाग फ़लों के ऐसे कलमी पौधे देता है जिसकी
किस्म बिलकुल घटिया होती हैं। हम कहते हैं कि हमे पावल्टी (बीज बोकर उगाया हुआ पौधा)
दे दो, हम कलम खुद कर लेगें लेकिन दो सौ से चार सौ रुपये की दर से खरीदे गए कलमी पौधों
में कमीशन की भरपूर गुंजायश रहती है, जबकि पावल्टी तो पाँच रुपये में मिल जाती है और
उसमे अधिकारियों कर्मचारियों के खाने कमाने की संभावनाएं बहुत कम रह जाती है। ऐसे में
भला कोई क्यों कलमी पौधें न खरीदें। आजकल सेब के फ़लदायी पैड़ों में फ़ूल आ रहे हैं, वो
फ़लों में तब्दील होने तक पैड़ों पर बने रहे, इसके लिए इन फ़ूलों पर छिड़कने के लिए दवा
चाहिए। चौसाल में उद्यान विभाग का सचल दल कार्यालय
है लेकिन वहाँ दवाएं नहीं है। मैने कहा कि
चलो, उद्यान विभाग के कर्मचारी से मिला जाय, तो जयवीर कहने लगे कि वहाँ भी अभी होली
की छुट्टियां चल रही होगी। अभी कोई नहीं मिलेगा वहाँ भी।
चौसाल में जगवीर के घर से आगे बढा तो सड़क से नीचे की ओर एक सेब
के क्लेक्शन सेंटर पर नजर पड़ी। यह क्लेक्शन सेंटर किसी कोल्ड स्टोर वाले की मिल्कियत
है। राह गुजरते लोगों से उसके बारे में जानकारी की तो पता चला कि यह अगस्त में खुलता
है जबकि कम ऊँचाई होने के कारण यहाँ अधिकतर सेब जुलाई अंत तक बाजार का रुख कर लेता
है। थोड़ा आगे बढा तो सामने सड़क साथ ही लगते एक ढलवा छत वाले मकान के बाहार उद्यान विभाग
का जंग लगा बोर्ड नजर आने लगा। नजदीक जाने पर देखता हूँ कि अभी तक देखे गए हर सरकारी
कार्यालय की तरह इस पर भी ताला लटका हुआ है। हाथ से लिखी गयी बन्द किवाड़ के उपर चस्पा
सूचियाँ, जो उस पर नजर आ रही तारीख के हिसाब से साल भर पुरानी मालूम होती थी, के अलावा
वहाँ और कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।
लगभग दो सौ मीटर के करीब आगे जाने पर नीचे की ओर निकलती हुई एक
पगडंडी पकड़ी जो गाँव कोटी की ओर जाती थी। कोटी गाँव का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है।
ब्रिटिश काल के दौरान इस कोटी गाँव में बावर देवघार का एक मात्र स्कूल था। आज भले ही
हिन्दोस्तान की महत्वकाँक्षाएं मंगल को छू आयी हो लेकिन कोटी गाँव का यह स्कूल अभी
भी प्राथमिक स्तर का ही है। स्थानिकों से समस्याएं पूछी तो यहाँ पानी की किल्लत का
जिक्र प्राथमिकता पर था। बागवानी करने वाले कुछ लोग मिले, जो अपनी पीठ पर पानी से भरे
ड्र्म लाद कर सेब के फ़ूलों पर दवा का छिडकाव करने हेतु अपने बागीचों की ओर जा रहे थे।
उनसे बात की तो पता चला कि गाँव की पाईप लाईन यहाँ से लगभग 20 किलो मीटर दूर ऐठाण से
आती है और ये लाईन जिन-जिन गाँवों, खेड़ों से गुजरती है,इस पाईप लाईन का पानी वहाँ-वहाँ
खर्च होता हुआ हम तक थोड़ा बहुत ही पहुँच पाता है। यह पाईप लाईन अक्सर टूटते रहती है।
पहाड़ का 20 किलोमीटर कोई मामूली दूरी नहीं होती और लाईन के साथ-साथ चलते हुए पैदल तय
करना। कभी-कभी तो दो दिन में लौटना हो पाता है। रोज की जद्दोजहद है। इतनी दूर जब तक
हम लोग पानी की लाईन दुरुस्त कर वापिस लौटते हैं तब तक कोई न कोई कहीं न कहीं से इसको
तोड़ा देता है। आप समस्याओं की पूछ रहे हैं, तो देख लिजिए। जीवन के लिए पानी जैसी जरुर
चीज के लिए जो लोग संघर्ष कर रहे हैं उनके लिए बाकी बुनियादी सुविधाएं तो फ़िलहाल गौण
ही समझिए। इन पर बात करना तो बेमानी होगा।
कोटी गाँव से विदा लेने के बाद मैं अपने अगले पड़ाव कथियान की ओर
चल पड़ा।
कथियान कुछ एक दुकानों, ढाबों, चाय के खोमचों और कुछ एक बेमकसद
टहलते युवाओं का ठौर है। इन सबों के अलावा एक बारहवी तक का विद्यालय, एक जंगलात महकमें
का डाक बंगला इस कस्बेनुमा जगह की भव्यता में चार चाँद लगाता है। एक अपरिचित दुकानदार
से दुआ सलाम की गयी। परिचय दिया गया तो उन्होने बैठने का आमंत्रण दे डाला। सुनने सुनाने
का दौरा शुरु हुआ। पता चला कि दारमी घाटी और दारागाड़ घाटी को विभक्त करता कथियान के
आस पास वाला क्षेत्र सेब बागानों के लिए प्रसिद्ध है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया
जा सकता है कि ग्राम सभा डेरनाड़ में हाल तक साढे तीन लाख सेब की पौध आँकी जा चुकी है
जिनमे कई हजार तो पेड़ हो चुके है और अब अच्छी खासी फ़सल देते हैं। आने वाले समय में
जिस दिन सभी पेड़ फ़ल देना शुरु करेंगे उस दिन क्षेत्र का आर्थिक स्तर पर काया पलट होना
निश्चित है।
जन संवाद यात्रा के दौरान मुझे कथियान में ही आस पास के गाँव के
दलित युवाओ के एक समूह से बातचीत करने का मौका मिला जिन्होंने स्थानीय स्तर पर जन समस्याओं
के निराकरण हेतु जनजाति क्षेत्र विकास समिति का गठन किया है। ज़ाहिर सी बात है कि लोकतांत्रिक
और संवैधानिक व्यवस्था में आस्था रखने वालो के लिए यह खुशी की बात हो सकती है लेकिन
दुर्भाग्य इस बात का है कि इन दलित युवाओ के गाँव का रसूखदार स्वर्ण तबक़ा इस समिति
के गठन को पचा नही पा रहा है। स्थानीय अखबार में इस क्षेत्र विकास समिति के कार्यकर्ताओं
के नाम सहित छपी एक छोटी सी खबर से वे आगबबूला हो गये और समिति के अध्यक्ष को फोन कर
उसे और उसके साथियों को उनकी उस औकात के दायरे में रहने की सलाह दे डाली जो वेदों और
पुराणों में उनके लिए निहित है। यहाँ यह अकेला मामला नही है, कुरेदने भर की देर है,
पके फोड़े से मवाद के मानिन्द कई विभत्स सच सामने आ जाएंगे। लेकिन यह जानकर अच्छा लगा
कि ये दलित युवा इस प्रकार की धौंस धमाली को लेकर प्रतिरोध की मुद्रा में है और इस
तरह के अनैतिक प्रयासो के प्रति दबी ज़ुबान में सही, अपना विरोध तो दर्ज कर ही रहे
हैं।
इस क्षेत्र विशेष के संबंध में बडी बिडम्बना यह है कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव जैसी असंवैधानिक प्रथाओं से ग्रस्त इस क्षेत्र का स्वर्ण तबक़ा दलितों की तरह ही आरक्षण का लाभ सन् 1967 से ले रहा है और बावजूद इसके वो जातिवाद की सर्वोच्चता का मोह अभी भी त्याग नही पाया है। इस क्षेत्र में जो दलित पढ लिख गये हैं उनकी शैक्षिक योग्यता भी मात्र कोटे के तहत सरकारी नौकरी हासिल करने तक ही सीमित रही है बाकि पढा लिखा तबक़ा, चाहे स्वर्ण हो या दलित, केवल सरकारी नौकरियों में रोजगार के लिए पढाई कर रहे हैं और अभी भी सब के सब जातिवाद के सामन्त वादी और दक़ियानूसी ढर्रे को अपने पूर्वाग्रहों के साथ ढोते आ रहे हैं।
कथियान
के बाद अगला गाँव भटाड़ था। सड़क पर से एक युवा से मुलाकात हुई, लोगों की बावत पूछा तो
पता चला कि सभी लोग बागीचों में व्यस्त है लिहाजा उस युवक से ही । इस सफ़र में यह पहला
युवक था जिसने मुझे खासा प्रभावित किया। समस्या को लेकर मुखर रहने वाले इस दलित युवक
ने स्थानीय स्तर की व्यवस्थाओं की बखिया उधेड़ कर रख दी। इस युवा के पास तर्क थे, जानकारी
थी लेकिन उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था । पढते लिखते हुए सामाजिक पहचान के लिए जूझ
रहे इस युवा ने बड़ी मजबूती से अपने क्षेत्र की समस्याओं और उनके समाधानों के साथ अपना
पक्ष रखा। इसके बाद मैं हरटाड़ भुनाड़, डांगूठा गाँवो तथा सारनी किस्तूल के खेड़ों ढांढी
और केराड़ होता हुआ देर रात चिल्हाड़ गाँव पहुँच गया। कथियान के बाद वाले गाँवों, ख़ेड़ों
से गुजरने पर ऐसा कुछ भी अलग नहीं दिख़ा जिसे यहाँ अलग से लिखा जाय। यहाँ भी बुनियादी
सुविधाओं को लेकर कोई खास उत्साह नहीं दिख़ा। इन गाँवों की समस्याएं भी बावर के बाकी
गाँवो से लगभग मिलती जुलती ही थी।
अगले रोज सुबह चिल्हाड़ गाँव के युवाओं से बात चीत की। यहाँ की समस्याएं
भी तकरीबन वैसी ही है जैसी इस यात्रा के दौरान मैं लिखता आ रहा हूँ। अलग कुछ था तो
चिल्हाड़ के एक अधेड़ से एक संवाद, जो कुछ इस प्रकार से थाः
मैने अधेड़
से पूछा, 'तुम्हारे मुताबिक़ गाँव की मुख्य समस्याएँ क्या है?'
अधेड़ बोला 'बेरोज़गारी'
मैने कहा, 'इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?'
अधेड़ बोला, 'गाँव में बारात घर नही है'
मैने कहा , 'बारात घर का बेरोज़गारी से क्या संबंध?'
अधेड़ बोला , 'ठेका मिलेगा।'
अधेड़ बोला 'बेरोज़गारी'
मैने कहा, 'इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?'
अधेड़ बोला, 'गाँव में बारात घर नही है'
मैने कहा , 'बारात घर का बेरोज़गारी से क्या संबंध?'
अधेड़ बोला , 'ठेका मिलेगा।'
मैं बिना कुछ और कहे सुने अगले गाँव
बाणा धार की ओर हो लिया।
बाणा धार दारागाड़ और बेनाल केचमेंट
से उठते उस पहाड़ के उन अन्तिम गाँवों में से एक है जो वहां से उपर ख़ड़म्बा टाप तक फ़ैले
देवदार, बांज जैसे दरख्तों के छितराए जंगलों के साथ अपनी सीमाएं साझा करते हैं। यहाँ
भी जीविकोपार्जन के मुख्य स्रोत खेती बाड़ी और पशुपालन ही है। यहाँ भी स्कूल कालेज पढ
रहे युवाओं का मुख्य ध्येय मात्र सरकारी नौकरी है। गाँव में बे वक्त पहुँचना हुआ। गाँव के लोग तब तक
खेतों और पशुओं में काम हेतु जा चुके थे। कुछ एक महिलाओं से बात हो पाई बस। लेकिन उनके
अनुसार तो सारी समस्याएं ही ईश्वर की मर्जी के कारण होती है। इन सबों से विदा लेकर
मैं अगले गाँव सिलावड़ा की ओर चल दिया।
अगला गाँव सिलावड़ा शिल्पकारों
का गाँव है। पता नहीं कब जातिवाद के दंश ने देवताओं की मदद से इन कारिगरों के पुरखों
को दलित घोषित कर दिया होगा जिसके चलते इनकी पीढियां आज भी छुआछूत जैसी कुरितियों को
अपनी नीयति मान कर ढो रही है। एक जमाने से इस गाँव के वाशिन्दों को काष्ठ एवं पाहान
शिल्प महारत हासिल है। इस पूरे क्षेत्र में रिहाइश के लिए बनने वाले पारंपारिक और आधुनिक
मकानो के निर्माण में ये लोग हमेशा से अहम भूमिका निभाते आए है।
सिलावड़ा गाँव में पहुंचने पर
स्थानीय निवासी रतिया की पूछ की तो पता चला कि वो तो गाँव वाला घर छोड़ कर सामने सड़क
की चपेट में आये एक खेत के बचे अवशेष पर झौंपड़ी बना कर रहने लगा है। पूछते ताछते मैं
उसकी झौंपड़ी तक पहुँच गया। झौंपड़ी का दरवाजा अधखुला था, मैने अन्दर झाँक कर देखा तो
जमीन पर लेटा रतिया झौंपड़ी की छत ताक रहा था। मैने आवाज लगाई तो वो चौंक कर उठ बैठा।
मैने पूछा, मुझे पहचानते हो? बोला, याद नहीं आ रहा। मैने अपना परिचय दिया तो उछल पड़ा।
रतिया मेरे बचपन का साथी था लेकिन कई सालों बाद मिलने पर वो मुझे पहचान नहीं पाया।
मेरा यूँ अचानक उसके सामने खड़ा होना उसकी स्मृतियों को झकझोर गया। उसकी आँखे गीली हो
गयी। हम गले मिले। असहाय और थके मांदे रतिया नें मूक होकर हाथों के संकेत से अपने इर्द
गिर्द की दयनीय परिस्थितियों से परिचित करवाते हुए मुझे बैठ जाने को कहा।
शायद अस्सी के दशक के आख़िरी और नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों
की बात रही होगी। जौनसार बावर का गीत संगीत उस दौर तक के मेलों ठेलों और बार त्यौहार
से निकल कर ऑडियो कैसेट्स में बन्द होकर टेप रिकार्ड के माध्यम से घर-घर में सुनाई
देने लगा था। अपने पडौसी, सिरमौर, सतौता, किरण, बंगाण, रंवाई तथा जौनपुर की तरह देश
दुनिया से भिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक ताने बाने वाले जौनसार बावर के लोक गीत प्रकृति
के साथ संधर्षरत जीवन जीने वाले मेहनतकश समुदाय के लिए उनके जीवन में ऊर्जा के संचार
का काम करते आए हैं। जहाँ एक जमाने में गीत बात के लिए साल में विशेष दिनों का इंतज़ार
करना होता था वहाँ अब टेप रिकार्डों नें इसे अत्यन्त सुलभ बना दिया।
उस दौर में संस्कृतिधर्मी नन्द लाल भारती की अगुआयी में जगत राम
वर्मा ने जौनसार के पारंपरिक और रतन सिंह जौनसारी द्वारा लिखित तथा स्वरचित गीतों को
जौनसार बावर के लोगों द्वारा खूब सराहा जाने लगा था। इसी देखा देखी में जौनसार बावर
के अन्य युवाओं ने, जो स्थानीय गीत संगीत में दिलचस्पी रखते थे और स्थानीय लोक संस्कृति
के प्रति संवेदनशील थे, इस ओर का रूख करना शुरू किया।
इस नए दौर के गीत बात में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं में बावर के
सिलावडा गाँव का यह युवक रतिया नन्द भी शामिल था। जहाँ तक मुझे याद है स्थानीय बोली
के स्वरचित लोक गीतों के साथ रतिया नन्द को गाने का पहला मौका जगत राम वर्मा के साथ
ही मिला। लोक गीतों को लेकर अपने जूनून के चलते रतिया नन्द नें बैंकों से कर्ज लेकर
देहरादून और दिल्ली स्थित रिकॉर्डिंग स्टूडियो वालों से संपर्क किया तथा स्वरचित गीतों
के कुछ एक संग्रह निकाले। रिकॉर्डिंग स्टूडियो वालों की लोभी प्रवृति, मार्केटिंग के
मिस-मैनेजमेंट और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति सरकारी तथा स्थानीय लोगों की उदासीनता
के चलते अपढ़ रतिया नन्द लोक गायक बनने की बजाय क़र्ज़दार बन गया। गरीबी से जूझ रहे
रतिया नन्द को यह शगल बहुत मंहगा पडा और वह आगे चलकर दिहाडी मज़दूर हो गया।
लोक गीतों में फूहड़ता, तड़क भड़क और दोहरे संवादों के बरक्स रतिया
नन्द के गीतो में प्रेम, स्थानीय समाज की जीवन चर्या और संस्कृति का पुट, युवाओं और
युवतियों की चुहलबाजी तथा कृषकों, पशु चारकों का दर्शन विद्यमान था। पहाड पर खेती बाड़ी
और पशुओं के पीछे रात दिन खटने वाले स्थानिकों के लिए प्रेम के क्या मायने है, वे खुद
को कैसे बहलाते हैं, इसका चित्रण रतिया नन्द के गीतों में स्पष्ट महसूस किया जा सकता
है। यदि आसाम का लोक संगीत भूपेन हज़ारिका के बिना, पंजाब का लोक संगीत गुरदास मान
के बिना और गढवाल के लोक गीत नरेन्द्र सिंह नेगी के बिना अधूरे है तो जौनसार बावर का
लोक संगीत भी रतिया नन्द के बिना पूरा नही होता लेकिन जौनसार बावर के लोक संगीत की
बिडम्बना देखिए, आज रतिया नन्द नरेगा के अंतर्गत मज़दूरी कर अपना और अपने परिवार का
पेट पाल रहा है।
मेरे आने के कारणों की पड़ताल
करने के बाद रतिया मुझे लेकर अपने गाँव की ओर लेकर चल दिया। आजकल रतिया के साथ-साथ
गाँव के युवक मनरेगा के तहत मुख्य सड़क से गाँव तक के लिए एक जीप कद रास्ता बना रहे
थे। दो पहर हो चुकी थी, लिहाजा इस वक्त सभी लोग आराम के लिए अपने-अपने घरों में थे।
रतिया मुझे लेकर दलजीत के घर ले गया। मेरे आने की खबर पर गाँव के सभी युवा वहाँ जुट
गए। बात चीत का दौर चला। दलज़ीत नजदीक के कस्बे विकास नगर में दुकान चलाता है। वो आजकल
इसलिए यहाँ आया हुआ है कि यहाँ के वाशिन्दों को क्षेत्र के देवता महासू के लिए साल
के दौरान भेंट किए जाने वाले अनाज की खेप, जिसे कूत भराई कहा जाता है, को लेकर हनोल
जाना है। यह उसकी खानदानी जिम्मेदारी है।
आह! कितने भोले लोग है ये। जो
व्यवस्था इन्हे सामाजिक तौर पर हाशिए पर ढकेले हुए है, जिस व्यवस्था ने इन्हे अछूत
करार दिया है, ये लोग उसी समाज द्वारा विकसित किए गए दकियानूसी ढर्रे क़ूत भराई को अपनी
नीयति मान कर आज भी ढो रहे हैं। छुआछूत का दंश झेल रहे इन लोगों की श्रद्धा का स्तर
देख कर दिल पसीज गया और देवताओं के अस्तित्व को लेकर घृणा और उद्वेलित हो उठी। लेकिन
कमाल की बात यह है कि जातीय व्यवस्था में निचले पायदान पर होना इनके लिए कोई बड़ी समस्या
नहीं है। इनकी प्राथमिकताओं में भी शिक्षा, रोजगार, सड़क, पानी और ख़ेती बाड़ी है। एक
जमानें में इनके पुरख़ों के दो चार परिवार ही यहाँ थे लेकिन अब यहाँ चालीस के उपर परिवार
रहते हैं। जन संख़्या तो बढ गयी लेकिन जमीन तो उतनी ही है। तो खेती बाड़ी करें भी तो
कैसे। दिहाड़ी मजदूरी ही एक मात्र विकल्प बचता है, वो किया जा रहा है। सिलावड़ा के युवा
चाहते हैं कि यदि सरकार उन्हे पट्टे पर जमीन उपल्ब्ध करवाती तो वो अपनी जमीन पर मेहनत
करते।
भरपेट बातचीत के बाद जब मैं जाने
को हुआ तो दलजीत कहने लगा, -पंडित जी, हम तो आपको चाय भी नहीं पिला सकते।
मैने कहा, -क्यों नहीं पिला सकते,
आप बनाईए, मैं पिऊंगा।
वहाँ बैठे सारे लोग अवाक होकर
मुझे देख रहे थे। दलजीत के घर पर चाय बनी, सभी के साथ बैठ कर मैने चाय पी और उन लोगों
से विदा लेकर अगले गाँव भन्द्रोली की ओर निकल गया।
भंद्रोली, चकराता त्यूनी मार्ग
से लगता गाँव है। यहाँ के बाशिन्दों की समस्याओं की जो एक लंबी चौड़ी फ़ेरहिस्त है उसमे
पेयजल की किल्लत सबसे प्रमुख है। बावर के बाकी गाँवों की तरह बुनियादी सुविधाओं का
अभाव स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। समाधान को लेकर क्या किया जा सकता है, ये यहाँ कोई
नहीं जानता। समय काफ़ी था, लिहाजा अगले गाँव डूँगरी की ओर निकल पड़ा। सावड़ा की ओर को
आगे बढते हुए चकराता त्यूनी मुख्य मार्ग से निकली एक नई नवेली डूँगरी गाँव को देश दुनिया से जोड़ती है। प्रधान
मन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत निर्माणाधीन इस सड़क पर डामरीकरण का काम चल रहा था।
डामर को गर्म करने के लिए सड़क के दोनो ओर आस पास के जंगल से सैकड़ों हरे पेड़ों को काट
कर ढेर लगाए गए थे। यह सब देख कर जेहन में एक सवाल उभर आया, क्या जंगलात महकमे ने इन पेड़ों को काटने की अनुमति
ठेकेदार को दी होगी? हैरत हो रही थी कि पर्यावरण के नाम पर स्थानीय चरवाहों और ग्रामीणों
को जलावन की लकड़ी और मवेशियों के लिए चारा पत्ती के लिए बात बे बात परेशान करने वाला
वन विभाग इतने पेड़ों के काटे जाने पर खामोश क्यों है?
टौंस और बेनाल के संगम से उठे पहाड़ की चोटी से थोड़ा
सा नीचे एक छुपी हुई जगह पर बसा डूँगरी गाँव प्राकृतिक किलेबन्दी का अनूठा उदाहरण है।
सैकड़ों सालों से पूरे महासू क्षेत्र में अधिकतर गाँव ऐसी ही जगहों पर आबाद है। दो भागों
में बंटा यह गाँव एक जमाने में आदर्श मौसम के चलते समृद्ध खेती बाड़ी के लिए जाना जाता
था । लेकिन स्थानीय जीविकोपार्जन के प्रति उदासीनता के चलते यहाँ के अधिकतर बाशिन्दे
चकराता त्यूनी सड़क पर स्थित खेड़ों को पलायन कर चुके हैं। सड़क भले ही गाँव तक पहुँच
चुकी हो लेकिन अब गाँव में गिनती भर के ही लोग बाकी रह गए हैं।
डूँगरी गाँव से लौट कर चकराता
त्यूनी मोटर मार्ग पर कस्बे के रुप में विकसित हो रहे ख़ेड़े सौडा पहुँचना हुआ। मुख्य
सड़क के इर्द गिर्द बने ढाबों, दुकानों और मकानों की वजह से वजूद में आ रहे कस्बे का
नाम है सौड़ा। सौड़ा एक जमाने में खेड़ा हुआ करता था। त्यूनी चकराता मोटर मार्ग के अस्तित्व
में आते ही नेपाली कामागरों और स्थानीय लोगों नें यहाँ ढाबे और छोटी मोटी दुकानें खोलनी
शुरु कर दी थी। सौड़ा आज एक अच्छे खासे ग्रामीण बाजार के रुप में विकसित हो चुका है।
यहाँ एक बारवहें दर्जे तक का स्कूल है जिसमे विद्यार्थियों की अच्छी खासी संख़्या है।
शाम हो चुकी थी। सावड़ा से आगे निकल कर मैं रोटा खड़्ड़ पहुँचा जहाँ अमराड़ गाँव के श्याम
सिहं मेरा इंतजार कर रहे थे।
श्याम सिहं के परिवार नें जो
मेजबानी की वो आजीवन याद रहेगी। पहाड़ के गाँवों में मेहमानों के आव भगत की परंपरा अनूठी
है। श्रमजीवी श्याम सिहं के भरे पूरे खुशहाल परिवार नें हमारी खातिर दारी में दिल निकाल
कर रख दिया। माघ को गुजरे महीना होने को था लेकिन खास और अजीज मेहमान की तरह हमारे
लिए श्याम सिहं ने सूखा गोश्त पकाया। यह दावत अपने आप में अद्भुत थी। खा पी कर देर
रात को आँगन में अमराड़ गाँव के लोगों के साथ सभा की गई।
बातचीत का दौर स्थानीय समस्याओं
के साथ शुरु हुई। सुनने और सुनाने का दौर चल पड़ा। अमराड़ गाँव की समस्याएं भी जौनसार
बावर के अन्य गाँवों से अलहदा नहीं है। लेकिन सभा में बैठे ग्रामीणों की एक बात नें
मुझे भविष्य के प्रति आशांवित कर दिया जब उन्होने कहा कि उनकी जो सबसे बड़ी समस्या है
वो है नजदीक में स्कूल का न होना। यह उनकी व्यक्तिगत समस्या नहीं थी। यह इस पूरे ईलाके
के गाँवों की समस्या थी। उनका कहना था कि दसवें दर्जे तक का स्कूल भले ही पास के गाँव
खरोड़ा में खुल गया हो लेकिन उसके बाद आगे की पढाई के लिए उनके बच्चों को सावड़ा या कोटी
जाना पड़ता है। हमारे बच्चों समेत सैंज, कुनैण और कचाणू जैसे दूरस्थ गाँवों के बच्चों
को सावड़ा तक पहुँचने में लगभग 10 से 15 किलोमीटर का पैदल सफ़र तय करना पड़ता है। लड़के
तो चलो जैसे तैसे यह मुश्किल पार भी कर लें लेकिन जवान होती लड़कियों को इतनी दूर कैसे
और किसके सहारे भेजें? इस क्षेत्र में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है। हाल
के दौरान रोटा खड़्ड़ में एक आवासीय विद्यालय खुलने की बात संज्ञान में आई थी। हम लोग
बहुत खुश थे, हमे लगने लगा था कि अब हमारे इस ईलाके के गाँव क़ी बच्चियों को सुरक्षित
शिक्षा मुहैया हो जाएगी। लेकिन सत्तासीनों को यह बात नागावर गुजरी। उन्होने इस आवासीय
विद्यालय को त्यूनी स्थान्तरित कर दिया। हम लोग ठगे से रह गए। यहाँ जन भावनाओं को नहीं
सत्ता को सलाम होता है। पहले हमारी तहसील पहले चकराता हुआ करती थी लेकिन उसे भी अब
त्यूनी कर दिया गया है। जब तक चकराता तहसील हुआ करती थी, कोई न कोई अफ़सर या कारकून
वहाँ मिल ही जाता था लेकिन त्यूनी की तहसील का तो भगवान ही मालिक है। त्यूनी में इंटरनेट
का उपलब्ध न रहना अपने आप में एक बड़ी त्रासदी है।
कोई विरला ही हो सकता है जो त्यूनी में इंटरनेट के साथ-साथ संबंधित अधिकारी
या कर्मचारी को एक साथ पा जाए। । चकाराता तहसील
होने के समय यह होता था कि सरकार के दरवाजे पर पड़ने वाले कामों के साथ घर के लिए लाए
जाने वाला सौदा पत्ता भी आ जाता था लेकिन त्यूनी से क्या लाएं। त्यूनी जाने के लिए
तो समय पर कोई सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था भी नहीं। विकास नगर देहरादून से आने वाली
गाड़ियाँ आधा दिन निकलने के बाद यहाँ पहुँचती है, उसके बाद त्यूनी जाते-जाते शाम हो
जाती है। अगले दिन दस बजे सरकारी दफ़्तरों के
दरवाजे पर काम की फ़रियाद लेकर जाओ, छोटा से छोटा काम होने में भी सरकारी दफ़्तरों में
समय तो लग ही जाता है। दस बजे तक हमारे तरफ़ आने वाली सभी गाड़ियां निकल चुकी होती है।
परिवहन की सुविधाओं नें पैदल चलने के ख्याल को ही खत्म कर दिया है। लिहाजा तीसरे दिन
घर वापस आना हो पाता है। अब आप ही बताईए, समय और धन के अतिरिक्त व्यय के अतिरिक्त त्यूनी
की नई तहसील नें हमारी समस्याएं दूनी कर दी है।
अभी तक की जन संवाद यात्रा में
अमराड़ मुझे ऐसा इकलौता गाँव मिला जहाँ के बाशिंदे सामुहिक रुप से जन सरोकारों को लेकर
सजग नजर आए। बातचीत के बाद उस रात वहीं ठहरना हुआ लेकिन अगले रोज अल सुबह अगले गाँव
कुनैण का रुख कर लिया।
प्राकृतिक रुप से कुनैण गाँव
जौनसार बावर के खूबसूरत गाँवों में से एक है। जहाँ एक ओर कुनैण गाँव की हद में ख़डे
होकर आप मोईला डांडा से लेकर लोख़ंडी, देवबन, खड़ंबा मुंडाली होते हुए कथियान मोल्टा
तक श्रंख़ला बद्ध पहाड़ियों का सुगढ अर्ध वृत नजर आता है वहीं दूसरी ओर सामने की तरफ़
बेनाल घाटी के बाद टौंस घटी का फ़ैलाव, जो सामने हिमाचल के साथ सीमा बनाती मुराच और
सतोता क़ी पहाड़ियों तक जाता है, नजर आता है। देवदार के जंगल से अपनी सीमाएं साझा करता
कुनैण गाँव कृषकों और पशुचारकों के लिए एक आदर्श गाँव है हो सकता है लेकिन पारंपरिक
तौर तरीकों से किए जा रही कृषि और पशुपालन इन लोगों को बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी
मुहैया करवा पाता है। पारंपारिक लकड़ी के मकानों के बीच-बीच में पैबन्द की तरह दिखने
वाले कंकरीट के बेतरतीब ढाँचों की एक श्रंखला की तरह नजर आता है कुनैण गाँव। । सड़क
से गाँव में उतरती पगडंडी के दोनो तरफ़ ख़ुले में किए गए शौच बदबू नें मेरे सर से कुनैण
गाँव की प्राकृतिक छ्टा का भूत तुरंत ही उतार दिया। एक दूसरे से सट कर बनाए गए मकानों
से निकलने वाले गंदे पानी और रास्ते में यहाँ वहाँ बिखरे कूडे के कारण गाँव के बीचों
बीच उतरता रास्ता बदबू से सराबोर था। हर ओर गंदगी के चलते मक्खियों के झुंड के झुंड
घर मकानों के आँगन, सीढीयों, देहरियों और बरामदों में फ़िर रहे थे। गाँव में कुछ एक
मकान थे जो बाहर से देखने पर ठीक ठाक नजर आते थे लेकिन बाकी की स्थिति तो बहुत ही दयनीय
थी। गाँव के अन्तिम छोर में बने प्राथमिक विद्यालय में जाना हुआ। स्कूल में पढाई लिखाई
के साथ-साथ निर्माण कार्य भी चल रहा था। बच्चों की अच्छी खासी संख़्या थी। स्थानीय युवकों
के साथ-साथ शिक्षकों से भी बातचीत हुई। स्कूल में पढाई लिखाई ठीक ठाक थी। बातचीत के
दौरान पता चला की स्कूल में सेवारत शिक्षक महोदय अपने पैसे खर्च कर पढाई लिखाई में
होशियार बच्चों को नवोदय और एकलव्य आवासीय विद्यालय के लिए तैयारी करवाते हैं और स्कूल
के अलावा यह शिक्षक महोदय योग्य बच्चों को अतिरिक्त समय में भी पढाते हैं।। यह बात खासी प्रभावित करने वाली थी। स्थानीय युवाओं
से जब यह पूछा गया कि सरकार की महत्वपूर्ण मुहीम सफ़ाई अभियान के तहत शौचालयों के लिए
दिए जाने वाले अनुदान के बावजूद भी लोग ख़ुले
में शौच क्यों करते हैं, तो वे बिफ़र पड़े। कहने लगे, सरकार 12 हजार देती है। यहाँ कोई
ड्रेनेज सिस्टम नहीं है। ऐसे में एक पक्का ग़ड्ढा बनाने में लगभग दस हजार रुपए का खर्च
हो जाते है। शौचालय बनाने के लिए इसके अलावा टायलेट शीट, चार दिवारी, छत और दरवाजा
भी चाहिए होता है। आपको क्या लगता है, क्या वो दो हजार में ये सब बन जाएगा? मान लिया
जाए, यदि हम सरकारी योजना में अंशदान मिलाकर शौचालय तैयार करवा भी लेते हैं तो उसके
बाद उसमे इस्तेमाल के लिए पानी कहाँ से आएगा? अभी मार्च का महीना ही चल रहा है। अभी
से पीने के पानी की किल्लत है। आने वाले समय में पानी की किल्लत और बढेगी। गर्मियों
में बमुश्किल से बीस तीस लीटर पानी मिल पाता है। अब आप ही बताईए, इतना पानी तो दो बार
शौच जाने में बह जाएगा, फ़िर पिएंगे क्या? हमारे लिए किसी डेम से रोका हुआ पानी नहीं
आता। पिछले दस सालों मे कई नहरे और पाईपलाईन सूखी पड़ी है। हमारी तो यही नियति है जिसे
हमारे बाप दादा भोगते आए हैं। कुनैण गाँव के युवाओं के सम्मुख मैं निरुत्तर था। मैने
उन सबों से विदा ली और अपने अगले गंत्वय की ओर निकल पड़ा।
कुनैण से निकल कर मैं खरोडा,
त्यूना, विणसौण होते हुए देर शाम तक कोटी जा पहुँचा। रात को कोटी से लगते जंगल में मित्र ईन्द्र सिहं
राणा की नवनिर्मित काटेज में डेरा डाला गया। जंगल के बीचों बीच अपनी पुश्तैनी जमीन
पर बनाई गई यह आराम गाह अपने आप में स्वप्न लोक का भान करवाती है। स्थानीय भवन शैली
को सुव्यवस्थित आकार देकर बनाई गई काटेजों की वास्तुकला अपने आप में अद्भुत है। यह
काटेज ईन्द्र सिहं राणा के संघर्षों की कहानी है। एक समय दिल्ली में सिविल सर्विसेस
की तैयारी करने आए ईन्द्र सिहं राणा नें कुछ हट कर करने की सोची। वो चाहते तो नौकरी
भी कर सकते थे लेकिन उन्होने कुछ हट कर करने की सोची। उन्होने जब काटेज बनाने का प्रस्ताव
अपने परिवार के सामने रखा तो खेती बाड़ी के प्रति पारंपारिक सोच रखने वाले उनके परिवार
वालों ने इसका पुरजोर विरोध किया। लेकिन उन्होने जैसे तैसे कर उन्हे मना लिया। इस परियोजना
के लिए पूँजी एक दूसरी बड़ी चुनौती थी, लेकिन ईन्द्र सिहं के मजबूत ईरादों नें सब बाधाओं
को पार पाकर अपने सपने को साकार कर दिखाया।
अगले दिन लौहारी, जाड़ी दारना
धार होता हुआ मैं चकराता पहुँच गया। सभी गाँवों में स्थानीय लोगों के साथ बैठना हुआ।
ब्यौरेवार विवरण इसलिए नहीं दे रहा हूँ क्योंकि इन गाँवों की भी वही समस्याएं थी जो
कमोवेश बावर के गाँवों थी। इन सभी की प्राथमिकता भी पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली
और स्थानीय स्तर पर कृषि, पशुपालन से संबधित रोजगार की थी। सभी लोग अपने-अपने स्तर
पर जीविकोपार्जन की कोशिश में लगे हुए है। बावजूद इसके, आने वाले समय में खेती बाड़ी के आदिम
और पारंपरिक तरीकों से जीविकोपार्जन आत्मघाती हो सकता है। तेज भागती दुनियां का मुकाबला
पारंपरिक तौर तरीकों से तो नहीं हो सकता है। गिनती भर के लोग है जो खेती बागवानी और
पशुपालन के आधुनिक तरीकों के लिए अपने आप ही जूझ रहे हैं, बाकी तो इस क्षेत्र की नई
पीढी खेती बाड़ी और पशुपालन से विमुख होकर नौकरी और ठेकेदारी के लिए सरकारों के मुँह
ताकती नजर आती है।
-सुभाष तराण
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंमार्क्स, लेनिन हो या पेरियार, अम्बेडकर, कलबुर्गी, पंसारे हो या फिर बुद्ध और ओशो। किसी से तुलना तो नही लेकिन इनकी भांति आपको पचाना मुश्किल होगा।
जवाब देंहटाएंइखबर फिर से अद्भुत, आश्चर्यचकित और वास्तविक लेख।
भाई सुभाष जी आपका एक और अद्भुत लेख फिर पढ़ने को मिला,,, आपकी लेखनी के विषय में मैं बातो क्या स्वम् नामधारी जी,, हजारी प्रसाद दुवेदी ,,,जी भी कुछ नही कह सकते
जवाब देंहटाएंसुभाष जी का शानदार लेख! इस यात्रा के दौरान आपने जो जानकारी जुटाई है वो जौनसार-बावर का सच है! आपके द्वारा जानकारी जुटाने हेतू किया गया प्रयास एंव जानकारी का साझा करना सराहनीय है!
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंजो जनसमस्याएं आपने यहाँ बताई है वो सच है। और इस छेत्र के दलितों के साथ जो बर्ताव होता है वैसा पूरे पहाड़ में है-हिमाचल से गढ़वाल-कुमाऊँ तक। फर्क है तो अर्थव्यवस्था में। और
हटाएंअब समय बदल गया है। दलितों को एकजूट होंना होगा और अपने हितों के लिए काम करना होगा। एक व्यवस्था को त्याग कर एक दूसरी व्यस्था अपनाने से समस्या दूर नही होगी(गिरिजाघर से समस्याएं दूर नही होगी-दलित क्रिस्टियान बनने से समस्याएं कम नही होगी। होगी तो हक़ की लड़ाई से,शिक्षा से।
-लेकिन कुछ बातें आप ने भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर ही कही है जो मार्किट में बिकने के लिए TRP के लिए कुछ लोग करते है।
जो जनसमस्याएं आपने यहाँ बताई है वो सच है। और इस क्षेत्र के दलितों के साथ जो बर्ताव होता है वैसा पूरे पहाड़ में है-हिमाचल से गढ़वाल-कुमाऊँ तक। फर्क है तो अर्थव्यवस्था में। और
जवाब देंहटाएंअब समय बदल गया है। दलितों को एकजूट होंना होगा और अपने हितों के लिए काम करना होगा। एक व्यवस्था को त्याग कर एक दूसरी व्यस्था अपनाने से भी समस्या दूर नही होगी(गिरिजाघर से समस्याएं दूर नही होगी-दलित क्रिस्टियान बनने से समस्याएं कम नही होगी। होगी तो हक़ की लड़ाई से,शिक्षा से।
-लेकिन कुछ बातें आप ने भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर ही कही है जो मार्किट में बिकने के लिए TRP के लिए कुछ लोग करते है।
काश महासू क्षेत्र के हर ब्राह्मण का पूर्वाग्रह मेरे जैसा ही हो। रही बात मार्केट में बिकने की तो मैं आपके संज्ञान में लाना चाहूंँगा कि मैं श्रम बेचता हूंँ विचार नहीं। अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए मैं नौकरी करता हूंँ। लोगों से मिलना जुलना मेरा शौक है। मैं कुछ ख़रिदता बेचता नहीं हूंँ। मेरी पहली लड़ाई तो बाजारवाद से ही है, भ्रम से दूर रहते हुए यदि आलोचनाओं को संकारात्मकता के साथ लेंगे तो समाधान सामने आएंगे।
हटाएं