जौनसार बावर और देवघार के युवा साथियों !
आप सभी से एक महत्वपूर्ण विषय पर संवाद करना चाहता हूँ। विषय हमारे समाज, संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज का अपनी संस्कृति, मान्यताओं और परंपराओं के प्रति भावनात्मक लगाव होता है। प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं को सर्वश्रेष्ठ समझता है तथा हमेशा उनके लिए फिक्रमंद रहता है।
बदलते परिवेश के बावजूद भी हर कोई चाहता है कि उसकी और उसके समाज की पहचान बरकरार रहे। लेकिन इन में से बहुत से लोग अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों को नही छोड़ना चाहते। या फिर बदलाव के नाम दूसरी ऐसी बहुत सी कुप्रथाओं को सहर्ष ही स्वीकार कर लेते है जो ताकतवर व्यक्तियों के हित साधती हो। यह किसी एक समाज की नहीं, दुनिया के लगभग सभी समाजों की स्थिति रही है। हम आप यह बात अब बहुत अच्छे से जानते हैं कि दुनिया भर मे वही समाज विकसित हो पाए हैं जिन्होने मनवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखकर धार्मिक तथा सामाजिक रूढियों, कुरितियों और अंध विश्वास को किनारे कर दिया और प्रगतिशीलता को अपनाते हुए सामाजिक बदलावों को आत्मसात किया।
पिछली सदी के छटे दशक तक जौनसार बावर में हमारे लोग भी पहाड़ की अन्य बहुत सी बसासतों की तरह सीमित दायरों में रहते हुए पारंपरिक तौर तरीकों से जीवन यापन के लिए जूझते थे। उनके पास अभिव्यक्ति के लिए व्यवहारिक अनुभव तो थे लेकिन कोई ऐसी लिपि नहीं थी जिसके आधार पर वह अपने अनुभवों को संग्रहित कर अपनी अगली पीढियों को सौंपते। इसी कारण हमारे क्षेत्र में आजादी से पहले शिक्षा दीक्षा की कोई संकल्पना अस्तित्व में नही आ पायी। नतीजन उनका पारंपारिक ज्ञान पिछड़ता चला गया और समय के साथ पुराना पड़ता चला गया। हमारे बाकी हिमालय वासी बंधुओं की तरह ही हमारे लोग भी गजब के मेहनत कश थे जो कि आज भी है। आज भी आप अपने गाँव खेड़ों के आस पास की उनकी कमाईं हुई जमीनें देख सकते हैं और इस बात का सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे पुरखों ने कैसी कैसी दुरूह जगहों को जीवन यापन के लायक बनाया है।
हमारे पुराने लोगों की सम्रद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने उत्पाद को बेचने में अपनी तौहीन समझते थे। पुराने समय के ऊनी कपड़े बर्तन और रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को देखकर पता चलता है कि हमारा हस्तशिल्प बेजोड़ था। हमारे क्षेत्र के पुराने घर आज भी वास्तुकला का अद्वितीय नमूना है। हमारे पुराने गीत बात में दर्शन कूट कूट कर भरा मिलता है। जब क्रूर और निरंकुश मध्यकाल दुनिया के हर कोने में मार काट मचा रहा था तब हमारे लोगों ने पहाड़ पर की अपनी छितरायी बसासतों मे खुद को सुरक्षित बचाए रखा । व्यक्तिगत लोभ के लिए आपस की छिटपुट जानलेवा झड़पों के अलावा हमारे इस क्षेत्र के लोगों को कभी किसी प्रकार की मानवीय और प्राकृतिक आपदाओं का सामना नही करना पड़ा। बीती सदियों के दौरान कितने ही लोग भगोड़ों और शरणार्थियों की शक्ल में हमारे पुरखों की शरण में आए, उन्होने शरणागतों को जगह दी और उन्हे अपना बना लिया।
जौनसार बावर और देवघार में हमारे लोग महासू देवताओं के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। महासू बंधु इस क्षेत्र की सभ्यता के प्रतीक है। महासू देवताओं के नाम पर इस क्षेत्र में सदियों से एक अदृश्य सत्ता, जिसकी अपनी एक स्थानीय व्यवस्था है, चली आ रही है। यह व्यवस्था उन्हे अतीत की किसी बेनाम तारीख से विरासत में मिली थी। महासू बंधु इस क्षेत्र में कैसे और कहाँ से आए इस बारे में हमारे पास किंवदंतियों के अलावा कुछ खास नही है लेकिन यह साबित हो चुका है कि एक समय में महासू बंधुओं का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व सतलुज से लेकर यमुना तक फैला था।
हालांकि बाद के समय में धूर्त पुरोहितों और सामंतों की जीते जी अमरत्व प्राप्त करने की महत्वकाँक्षाएं कुछ नये देवताओं को अस्तित्व मे ले आयी। एक जमाने में ऐसे ही धर्म प्रचारकों की बदौलत भारत का हिमालयी क्षेत्र जातिवाद की चपेट में आ गया था। मध्य भारत के रास्ते पहाड़ में घुसे इस चंट पुरोहित वर्ग ने बड़ी चतुराई के साथ हिमालय के बड़े हिस्से की तरह ही हमारे लोगों को भी जातियों में विभाजित कर डाला। इन लोगों की कुटिल चालों की वजह से पूरे पहाड़ में मुफ्तखोरों का एक ऐसा तबका तैयार हुआ जिसने भारत के बाकी भागों की तरह देवताओं को आगे कर यहाँ के शिल्पकारों और कामागरों का शोषण करना शुरू कर दिया। इससे हमारा क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। बावजूद इसके भी हमारे क्षेत्र के लोगों की महासू देवताओं में श्रद्धा बनी रही।
भारत की आजादी के पहले की डेढ सदी के दौरान जब दुनियां के कुछ देश दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर रहे थे उस वक्त जातिवाद से ग्रसित हमारे लोग न्याय और स्वास्थय के लिए स्थानीय देवताओं के भरोसे पर आश्रित थे। जहाँ बाकी दुनियां का एक हिस्सा उस दौरान शिक्षा के प्रचार प्रसार और समतामूलक समाज की अवधारणा के लिए संघर्ष कर रहा था, ठीक उसी वक्त हमारे पुरख़ों के जैसे दुनिया के तमाम लोग शोषण और अंध विश्वास को अपनी नियति मान कर आगे बढा रहे थे।
अशिक्षा अंध विश्वास की माँ होती है। अपढ लोगों की आस्था का बहुत से चतुर लोगों ने फायदा उठाया। इसी के चलते हिमालय के एक बड़े भाग में देवताओं से सीधे संवाद की सदियों से एक ऐसी व्यवस्था बनी रही जो कि पीड़ित की मनोस्थिति को संतुष्ट करती है। हमारे क्षेत्र में माली, गढवाल में पस्वा, कुमाऊं में डंगरिया, नेपाल में झांकरी और तिब्बत में नेचुंग इसके जीवंत उदहारण है। वर्तमान दलाई लामा अपनी जीवनी 'फ्रीडम इन एक्साईल' में लिखते हैं कि जब चीन की मुक्ति सेनाओं के तिब्बती जनता पर बढते अत्याचार और तिब्बतियों के हिंसक प्रतिरोध के चलते वह तिब्बत में बने रहने या निर्वासित होने के विचार पर असंमझस में थे तब उन्होने अपने उस नेचुंग यानी दिव्य वक्ता से राय ली थी। एक समय में जब लोगों के पास हारी बीमारी, न्याय अन्याय से निपटने के कोई तार्किक विकल्प नही थे तब उनके लिए इस तरह के दैवीय आश्वासन जीने की उम्मीद साबित होते थे। लेकिन आज जब संविधान और विज्ञान ने बहुत कुछ परिभाषित कर दिया है तो फिर इन अंध विश्वासों को किसलिए ढोया जाए?
यह बात सर्व विदित है कि दुनियां में समतामूलक समाज की जिस अवधारणा के चलते सामाजिक सौहार्द विकसित हुआ है उसमें शिक्षा का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। नये लोकतांत्रिक भारत की संवैधानिक व्यवस्था के चलते ही हमारे लोगों की अगली पीढियों का शिक्षा से संपर्क संभव हो पाया था। आजाद भारत के शुरूआती दशक में हमारे नीति नियंताओं ने देश में सामाजिक समानता लाने के लिए सदियों से पिछड़े और दमित नागरिकों को आरक्षण देने का फैसला किया। उस वक्त की हमारी सामाजिक स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने हमारे क्षेत्र को भी आरक्षित श्रेणी में डाल दिया था। इससे हमारे लोगों को बहुत लाभ मिला। आने वाले समय में हमारे लोग जब पढने लिखने लगे तो उन्होने बेहतर जीवन के लिए रोजगार के नये माध्यमों के जरिए खूब सारी सुख सुविधाएं जुटाई। ईक्कसवीं सदी के मुहाने पर आते आते दुनियां विज्ञान और तकनीक की बदौलत एक वैश्विक गाँव में तब्दील होने लगी। हमारी नयी पीढी ने विद्यालयों और विश्व विद्यालयों में साहित्य, विज्ञान और मानविकी का अध्य्यन तो किया लेकिन वे अपने पूर्ववर्तियों की तरह अपने सामाजिक दुराग्रहों से निजात नहीं पा सके।
आपने देखा होगा जब भी हमारे क्षेत्र का कोई युवा परीक्षा पास करता है या सरकारी नौकरी पाता है या किसी व्यवसाय के चलते लाभ कमाता है तो वो सीधा सपरिवार मंदिर पहुँच जाता है। मैने सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों को अभिव्यक्त करते देखा है कि फलाने देवता के आशिर्वाद से मुझे फलानी सफलता मिल गयी या फलानी नौकरी मिल गयी है। अरे भई, तुम्हारे बाप दादाओं को भी तो देवताओं का आशिर्वाद प्राप्त था। तुम तो कभी कभार मंदिर जा पाते हो लेकिन तुम्हारे बाप दादा तो अपनी मुश्किल जिंदगी में से समय निकाल कर बैसाख और भादों में नियमित रुप से अपने आराध्यों के दर पर पूरी रात लगाकर आते थे। अगर देवताओं के बस में किसी का भला करना होता तो पहले उनका भला करते। तुम्हारे चढावे के कुछ रुपये उनकी खून पसीने की कमाई के आगे कहाँ ठहरते है। अंदाजा लगाईए। उन्हे तो कभी ऐसा सुख नही मिल पाया जैसा हम आप आज पा रहे हैं। वे बेचारे तो एक रात से दूसरी रात तक खेत, पशुओं और ज़गलों में खटते थे।
भावनाओं के फेर में आकर हम कितने अतार्किक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे द्वारा पढे गये तमाम मानवीय विषय भी हमारी मदद नहीं कर पाते। हमारी बुद्धि हमे यह समझाने में नाकाम हो जाती है कि यदि हमारे गाँव में स्कूल न खुला होता तो क्या हम यह सब हासिल कर पाते? अगर देश में नागरिक प्रत्येक को समान अवसर प्रदान करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था न होती तो क्या हम इस तरह से कामयाब हो पाते जैसे आज है? क्या हम कभी इस बारे में सोचते हैं कि ये सरकारी नौकरी और रोजगार के अवसर कहाँ से आते हैं? हमारे अंध विश्वास के चलते हमारा विवेक हमे यह समझाने में असमर्थ हो जाता है कि हमको मिलने वाले अवसर उस संवैधानिक व्यवस्था की देन है जो आजाद भारत के बाद अस्तित्व में आयी है।
आपने देखा होगा जब भी हमारे क्षेत्र का कोई युवा परीक्षा पास करता है या सरकारी नौकरी पाता है या किसी व्यवसाय के चलते लाभ कमाता है तो वो सीधा सपरिवार मंदिर पहुँच जाता है। मैने सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों को अभिव्यक्त करते देखा है कि फलाने देवता के आशिर्वाद से मुझे फलानी सफलता मिल गयी या फलानी नौकरी मिल गयी है। अरे भई, तुम्हारे बाप दादाओं को भी तो देवताओं का आशिर्वाद प्राप्त था। तुम तो कभी कभार मंदिर जा पाते हो लेकिन तुम्हारे बाप दादा तो अपनी मुश्किल जिंदगी में से समय निकाल कर बैसाख और भादों में नियमित रुप से अपने आराध्यों के दर पर पूरी रात लगाकर आते थे। अगर देवताओं के बस में किसी का भला करना होता तो पहले उनका भला करते। तुम्हारे चढावे के कुछ रुपये उनकी खून पसीने की कमाई के आगे कहाँ ठहरते है। अंदाजा लगाईए। उन्हे तो कभी ऐसा सुख नही मिल पाया जैसा हम आप आज पा रहे हैं। वे बेचारे तो एक रात से दूसरी रात तक खेत, पशुओं और ज़गलों में खटते थे।
भावनाओं के फेर में आकर हम कितने अतार्किक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे द्वारा पढे गये तमाम मानवीय विषय भी हमारी मदद नहीं कर पाते। हमारी बुद्धि हमे यह समझाने में नाकाम हो जाती है कि यदि हमारे गाँव में स्कूल न खुला होता तो क्या हम यह सब हासिल कर पाते? अगर देश में नागरिक प्रत्येक को समान अवसर प्रदान करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था न होती तो क्या हम इस तरह से कामयाब हो पाते जैसे आज है? क्या हम कभी इस बारे में सोचते हैं कि ये सरकारी नौकरी और रोजगार के अवसर कहाँ से आते हैं? हमारे अंध विश्वास के चलते हमारा विवेक हमे यह समझाने में असमर्थ हो जाता है कि हमको मिलने वाले अवसर उस संवैधानिक व्यवस्था की देन है जो आजाद भारत के बाद अस्तित्व में आयी है।
आज जब हमारे लोग पढ लिख कर कामयाब हो गये हैं और अपने क्षेत्र को कुछ लौटाने की स्थिति में तब हम बड़े बड़े मंदिर बनाने पर आमदा है। भौगोलिक रुप से दुरूह हमारे क्षेत्र की प्राथमिकता तो आधुनिक शिक्षालय और अस्पताल होने चाहिए थे लेकिन ऐसा नही हो पाया। जौनसार बावर से संबध रखने वाला व्यक्ति, वो चाहे पढ लिख कर कारोबारी, नौकरीपेशा हो गया हो या बेहतर जीवन के लिए पलायन कर शहरों मे रहता हो, यह बात अच्छी तरह से जानता है कि अच्छी शिक्षा के लिए सुविधा संपन्न स्कूलों और अनुभवी चिकित्सकों के साथ साथ आधुनिक तथा उच्च तकनीक से लेस अस्पतालों की मानव जीवन के लिए क्या अहमियत है लेकिन यह सब जानते हुए भी उन मे से ज्यादातर लोग चंदा और चढावा देवताओं और मंदिरों को देते है।
हमारे जैसे ही लोगों के सौजन्य से बिसोई, बुल्हाड़, क्वानूं और लखवाड़ जैसे गाँवों में करोड़ो की लागत लगा कर भव्य मंदिर बनाए गये हैं और इनकी देखादेखी में दूसरे कई गाँवों में भी मंदिर बनाने की तैयारी चल रही है। जबकि वहाँ रह रहे लोगों की हारी बीमारी के समय की दयनीय दशा को देखते हुए इतने पैसे में एक ऐसे अस्पताल की नींव रखी जा सकती थी जो अपने भविष्य में चिकित्सा की उन्नत और आधुनिक सुविधाओं से लेस हो जाता। लेकिन नही साहब, हम तो इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की बजाय अपनी और देश की तरक्की का श्रेय अपने देवताओं को देते हैं। अरे भाई, ये देवता क्या मुगलों और अंग्रेजों के वक्त नही थे? जब ये देवता इतने चमत्कारी है तो फिर इन्होने जेम्स वाट से पहले रेल और राइट बंधुओं से पहले जहाज को हमारे लोगों से क्यों नही ईजाद करवा दिया। अगर ऐसा होता तओ हमारे लोगों को भी नोबेल प्राईज मिलते। क्यों इन्होने अपनी आलौकिक शक्ति से किसी को आजादी के पहले वैज्ञानिक, डाक्टर, कलक्टर और पुलिस कप्तान नही बनवाया?
अगर हमारे देवता हमारे लोगों का इतना ख्याल रख पाते तो फिर ये गाड़ियां जिन पर चढ कर हम अपने गाँव आते जाते हैं, हमारे पूर्वजों को हम से पहले ही नसीब हो गयी होती। मुझे याद है जब बचपन के दौरान हमारे गाँव में कोई घटना घटती थी तो रिश्तेदारी नातेदारी में खबर देने के लिए आदमियों को भेजा जाता था लेकिन आज यह काम फोन की एक कॉल से संभव हो जाता है। अंदाजा लगाईए कि तकनीक के वर्तमान साधनों ने हमारा कितना श्रम बचा लिया है। लेकिन हमे यह सब सोचने की फुर्सत ही कहाँ है। हम तो अपनी थोड़ी सी स्थिति सुधरते ही अपने जातीय दंभ को पोसने पर आतुर ह़ो जाते हैं। दूसरे जाति और धर्म से संबधित लोगों को संशय की दृष्टि से देखने और कमतर समझने की यह संस्कृति जौनसार बावर की तो बिलकुल नहीं थी। हमे अपनी कामयाबी की बजाय अपनी कमियों पर गौर करना चाहिए। हमारे लोग आज पढ लिख जाने के बाद भी दलितों के साथ जातीय आधार पर छुआछूत का भेदभाव करते हैं जो कि कानूनन् अपराध है।
हमारे जैसे ही लोगों के सौजन्य से बिसोई, बुल्हाड़, क्वानूं और लखवाड़ जैसे गाँवों में करोड़ो की लागत लगा कर भव्य मंदिर बनाए गये हैं और इनकी देखादेखी में दूसरे कई गाँवों में भी मंदिर बनाने की तैयारी चल रही है। जबकि वहाँ रह रहे लोगों की हारी बीमारी के समय की दयनीय दशा को देखते हुए इतने पैसे में एक ऐसे अस्पताल की नींव रखी जा सकती थी जो अपने भविष्य में चिकित्सा की उन्नत और आधुनिक सुविधाओं से लेस हो जाता। लेकिन नही साहब, हम तो इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की बजाय अपनी और देश की तरक्की का श्रेय अपने देवताओं को देते हैं। अरे भाई, ये देवता क्या मुगलों और अंग्रेजों के वक्त नही थे? जब ये देवता इतने चमत्कारी है तो फिर इन्होने जेम्स वाट से पहले रेल और राइट बंधुओं से पहले जहाज को हमारे लोगों से क्यों नही ईजाद करवा दिया। अगर ऐसा होता तओ हमारे लोगों को भी नोबेल प्राईज मिलते। क्यों इन्होने अपनी आलौकिक शक्ति से किसी को आजादी के पहले वैज्ञानिक, डाक्टर, कलक्टर और पुलिस कप्तान नही बनवाया?
अगर हमारे देवता हमारे लोगों का इतना ख्याल रख पाते तो फिर ये गाड़ियां जिन पर चढ कर हम अपने गाँव आते जाते हैं, हमारे पूर्वजों को हम से पहले ही नसीब हो गयी होती। मुझे याद है जब बचपन के दौरान हमारे गाँव में कोई घटना घटती थी तो रिश्तेदारी नातेदारी में खबर देने के लिए आदमियों को भेजा जाता था लेकिन आज यह काम फोन की एक कॉल से संभव हो जाता है। अंदाजा लगाईए कि तकनीक के वर्तमान साधनों ने हमारा कितना श्रम बचा लिया है। लेकिन हमे यह सब सोचने की फुर्सत ही कहाँ है। हम तो अपनी थोड़ी सी स्थिति सुधरते ही अपने जातीय दंभ को पोसने पर आतुर ह़ो जाते हैं। दूसरे जाति और धर्म से संबधित लोगों को संशय की दृष्टि से देखने और कमतर समझने की यह संस्कृति जौनसार बावर की तो बिलकुल नहीं थी। हमे अपनी कामयाबी की बजाय अपनी कमियों पर गौर करना चाहिए। हमारे लोग आज पढ लिख जाने के बाद भी दलितों के साथ जातीय आधार पर छुआछूत का भेदभाव करते हैं जो कि कानूनन् अपराध है।
आज की तारीख में होना तो यह चाहिए था कि हमारी पढी लिखी युवा पीढी जातिवाद जैसी जघन्य कुरीति के विरोध में समाज के सामने खड़ी होती और कुरितियों को उखाड़ फैंकती। होना तो यह भी चाहिए था कि स्व रोजगार के लिए अपने पुरखों के पारंपरिक संसाधनो को अनुसंधानों के जरिए पुनर्जीवित किया जाता तथा विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल कर उन्हे उन्नत और आधुनिक बनाते हुए जीविकोपार्जन के क्षेत्र में एक नई क्रांति का माहौल बनाया जाता लेकिन हो यह रहा है कि हमारी पढी लिखी युवा पीढी पूरी तरह से सरकारी नौकरियों पर निर्भर होकर राजनीतिक दलों के लिए कच्चा माल बन कर रह गयी है। हमारी समस्याएं क्या है इस बात के अधिकार किसी और के हवाले कर हम जयकारे लगाने में व्यस्त है जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपने जन प्रतिनिधियों से जन सरोकारों को लेकर सवाल जवाब तलब करते लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। हम अपनी समस्याओं की बजाय बिना काम के मसलों उलझे रहे और हमारी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रही। याद रखिए, हमारी समस्याओं का समाधान केवल हमारे पास हो सकता हैं, कोई और हमारी समस्याओं का समाधान नही कर सकता। यह अंतिम सत्य है। हम इसे नहीं झुठला सकते।
अंत में अपनी बात यह कह कर समाप्त करना चाहुँगा कि आने वाले समय में आपके पास समाज को देखने के लिए सम दृष्टि हो और आप अपने जीवन में बहुत बड़े व्यक्तित्व बने लेकिन, उससे पहले आप एक बढिया इंसान बने।
शुभकामनाओं के साथ
आपका
सुभाष, तराणों की सैंज से
आपका
सुभाष, तराणों की सैंज से
बहुत ही सुंदर लेख , आपकी सोच और लेख को मेरा सलाम
जवाब देंहटाएंकड़वा सच।
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