किसी
भी समाज की प्रगति के लिए उसका संगठित होना बहुत जरुरी है। जिस क्षेत्र जौनसार बावर
से हम आते है, संयुक्तता वहाँ के समाज की विशेष पहचान और परंपरा रही है । इस क्षेत्र
का टुकड़ो मे बिखरा इतिहास बताता है कि बर्बर और बहशी अतीत के दौरान टौंस यमुना का यह
आदिम देश अपने समाज और संस्कृति के अस्तित्व को संगठन के बल पर ही बचाए रखने में कामयाब
रहा है। यदि कोई चाहे तो आज भी इस क्षेत्र के गाँवों में जाकर सामूहिकता और सामुदायिकता
को देख और सीख सकता है। शादी ब्याह, तीज त्यौहार, ख़ुशी-गमी के दौरान निस्वार्थ भाव
से एक दूसरे के लिए समर्पित रहने वाले यहाँ के समाज में बहुत सारी कमियां हो सकती है
लेकिन इसकी अपनी अनेकों ऐसी विशेषताएं हैं जो बिखराव के दौर में गुजर रही बाकी दुनिया
के लिए भी एक सबक बन सकती है।
रोज
के रोज रोजी रोटी के लिए जंगल और जमीन से जूझने वाला जौनसार बावर का उत्सवधर्मी समाज,
जो हमेशा किसी मामले या मसले पर मिल बैठ कर ही कोई राय कायम करता है, आज एकाँकी होने
की राह पर अग्रसर है। ऐसा देखने और सुनने में आने लगा है कि जब नौकरी और व्यवसाय के
लिए घर से निकला कोई व्यक्ति वापिस अपने घर आता है तो आय के आधार पर परिवार में
अपना आंकलन करने लग जाता है। आर्थिक असमानता के चलते परिवार में वर्गभेद होना निश्चित
है। हालांकि यह बाजारबाद के वैश्विक प्रभाव है लेकिन फ़िर भी मिल बैठकर अपनी उन पुरानी
परंपराओं को संरक्षित/पुनर्जिवित करने को लेकर चिंतन मनन हो जो हमारे परिवार और समाज
को सहस्राब्दियों एक सूत्र में पिरो कर रखती आई है।
हमारे
इस जनजातीय क्षेत्र से जो लोग नौकरी पेशा या व्यवसाय में है वे तो आर्थिक रुप से
समृद्ध है लेकिन जो लोग किसी कारण वश पढ लिख नहीं पाए या जो लोग अपढ रहकर गाँव में
ही खेती बाड़ी और पशुपालन से जुड़े हैं, बड़ी चिंता उनकी है। वैसे जौनसार बावर के
संयुक्त परिवारों से नौकरी या व्यवसाय के लिए पलायन कर चुके अधिकतर लोग अपने परिवारों
से जुड़े रहते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से जौनसार बावर के समाज में भी अलगाव की घटनाएं
देखने सुनने को मिलने लगी है। उदाहरण के लिए यदि दो सगे भाई अपनी क्षमताओं के आधार
पर क्रमश: नौकरी और कृषि के क्षेत्र मे जाते है तो अगले कुछ सालों में उन दोनो की जीवनशैली
में जमीन आसमान का अंतर हो जाता है। एक समय जौनसार का शहर में नौकरी या व्यवसाय कर
रहा एक भाई भी गाँव के खेतों और पशुओं में खट रहे अपने भाईयों के बच्चों को भी शहर
में पढाता था लेकिन अब ऐसा कम ही दिखाई या सुनाई देता हैं। जौनसार बावर के जो संयुक्त
परिवार पहले अपनी एकजुटता के लिए जाने जाते थे अब वही परिवार खामोशी के साथ घर-बाहर
में बंटने लगे हैं। उपभोग की संस्कृति के चलते दो सगे भाईयों के बच्चों के पहनावे और
रहन सहन में यह फर्क साफ तौर पर देखा जा सकता है।
खेत
पशुओं और कृषि बागवानी के अलावा आज की तारीख में जौनसार बावर एक ठेकेदार बाहुल्य क्षेत्र
है जिसमे एक बड़ा हिस्सा ऐसे अर्द्ध शिक्षित छुटभैयों का है जो राष्ट्रीय दलों के नेताओं
के लिए खाद पानी का काम करते हैं। ऐसे लोग आपको कुतर्कों के भोथरे दम पर यहाँ
वहाँ सींग लड़ाते मिल जाएंगे है। हमारे यहाँ से बहुत सारे लोग पढ लिख कर छोटी मोटी नौकरियों
के अलावा अपनी काबिलियत के बूते पर राजकीय तथा केन्द्रीय संगठनों में अच्छे ओहदेदार
भले ही हो गए हो लेकिन हम अभी तक अपने क्षेत्र को कुछ भी ऐसा लौटाने की स्थिति में
नहीं है जो स्थानीय समाज और संस्कृति को समृद्ध कर पाए। देश भर में महत्वपूर्ण प्रशासनिक
पदों पर पहुँचने के बाद भी हमारे लोग सरकार की नीतियों को अपने दायरों में रहकर ही
लागू करवा सकते हैं। जबकि आज हमारे समाज और क्षेत्र के लिए स्थानीय संसाधनो को मद्देनजर
रखते हुए कुछ अलग और कुछ हटकर करने वालों की आवश्यकता है।
वैश्विकरण
के चलते दुनिया की लाखों बोलियां और भाषाएं अपनी सँस्कृति समेत या तो खत्म हो चुकी
है या फिर विलुप्ति की कगार पर है लेकिन फिलहाल तक जौनसार बावर का सामाजिक और साँस्कृतिक
वजूद बरकरार है। इसलिए हमारी आज पहली जरूरत यह है कि सबसे पहले ईमानदारी के साथ अपनी
परंपराओं को पढा जाय और मानवीय आधार पर ख़रा उतरने वाली सभी परंपराओं को समय रहते
उनके संरक्षण पर जोर दिया जाए। यह भले ही एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है लेकिन
कोई मुश्किल काम नही है। यह कैसे संभव हो और इसके लिए क्या जरूरी कदम उठाने चाहिए,
पढे लिखे, बौद्धिक और आर्थिक रुप से संपन्न तबके का इसके लिए आगे आना बहुत जरूरी है।
जौनसार
बावर के गाँवों से भले ही अभी तक पलायन नही हुआ हो लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में
वह पलायन की कगार पर खड़ा है। गढवाल और कुमाऊं के उजड़े गाँवों का हश्र हमारे सामने है।
वहाँ के लोग भले ही बड़े नामधारी और ओहदेदार हो गये हो लेकिन वे कई पीढी पहले अपनी जड़ों
से उखड़ चुके हैं। अभी जौनसार बावर के गाँवों में उसकी संस्कृति और समाज की जड़े हरी
है। शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर जाना कोई बुरी बात नहीं है। बिना बाहर गए कुछ भी
देखा और सिखा नहीं जा सकता। लेकिन यदि आप कहते हो कि आपको अपनी संस्कृति, समाज और भाषा
से प्यार है तो आपको वापिस अपनी जड़ों को लौटना पड़ेगा। उसका फायदा यह होगा कि बाहर रह
कर आया व्यक्ति अपने परिवेश मे लौटने के बाद अपने समाज को एक नई दिशा दे सकता है। वह
दुनिया भर से बहुत कुछ देख और सीख कर आता है। वह अपने साथ बहुत कुछ नया लाता है।
बाहरी दुनिया के संपर्क में रह कर आए व्यक्तियों के साथ रहने से परंपराएं और धारणाएं
विकृत होने से बची रहती है। भले बुरे की परिभाषाएं वक्त के साथ बदलती रहती है। बोली-भाषा
और संस्कृति के अस्तित्व के लिए स्थानीय परिवेश और एक शिक्षित समाज का होना बहुत जरूरी
है। हम दिल्ली में रहकर अपनी संस्कृति, बोली और बार त्यौहारों को नही बचा सकते।
इसका वर्चस्व तभी कायम रह सकता है जब यह लोक से जुड़ी हो और यह बिलकुल सपष्ट है
कि लोक का सृजन परिवेश आधारित होता है।
हमारे
समाज की दशा दिशा का काफी हद तक अंदाजा लगाया जा सकता है। हमारे लोग भले ही आर्थिक
रूप से संपन्न हो चुके हो लेकिन हम लोग सामाजिक रुप से संवेदनशील नही हो पाए हैं। अभी
पिछले दिनों देहरादून में जौनसार-बावर के स्व स्फ़ूर्त संगठन लोक मंच द्वारा आयोजित
सम्मेलन में सुनीता चौहान नाम की एक महिला ने जब सम्मेलन में महिलाओं की मामूली भागीदारी
को लेकर सवाल उठाया तो उसके जवाब में समारोह के मुख्य वक्ता राजेंद्र सिंह जी, जो कि
भारतीय तट रक्षक के महा निदेशक जैसे महत्वपूर्ण ओहदे पर काबिज है, का यह कहना कि यदि
महिलाएं भी यहाँ आ जाएगी तो फिर वहाँ (चूल्हा) कौन देखेगा। हो सकता है कि उन्होने यह
बात हंसी ठट्ठे में कही हो लेकिन उनकी इस बात पर बजने वाली तालियों ने साबित कर दिया
कि पढ लिख जाने के बावजूद भी महिलाओं के प्रति हमारी यह सामुहिक सोच लैंगिक और जातीय
समानता के मुदों पर कहाँ ठहरती है।
जौनसार
बावर का समाज सहस्राब्दियों से अपने संसाधनों पर निर्भर रहता आया है। प्राकृतिक
आपदाओं के चलते जहाँ हिमालय के बाकी इलाके और लोग अनेकों बार तहस नहस हुए वहीं टौंस
और यमुना के बीच का यह प्रायद्वीपीय क्षेत्र प्राकृतिक वरदान के चलते अपनी आदिम संस्कृति
के साथ सहस्राब्दियों से आज दिनाँक तक आबाद है। दुनियाँ भर में वही सभ्यताएं और
समाज अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे हैं जिन्होने वक्त के साथ अपनी परंपराओं को
उन्नत और आधुनिक किया है। जौनसार बावर की जरुरत भी यही है। मानव समाज में पशु और कृषि
उत्पादों की माँग हमेशा रहेगी और जौनसार बावर के लोग इस क्षेत्र में परंपरागत रुप से
जुड़े हुए है। बेमौसमी जैविक सब्जियों, फ़लों और पशु उत्पादों के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र
की जरुरतें बिलकुल सपष्ट है कि कैसे स्थानीय संसाधनों के दोहन के तरीकों को उन्नत और
आधुनिक बनाया जाए और इसके लिए हम क्या कर सकते हैं इस पर विचार करना बहुत जरुरी है।
नौकरियों के लिए पलायन करने के बाद जौनसार बावर की संस्कृति, बोली और बार त्यौहार को
बचाने की बात बिलकुल बेमानी है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर जागरुकता और शौध की बहुत
ज्यादा जरुरत है। आजिविका के क्षेत्र में पर्यटन एक नया उद्योग है जिसमे समृद्ध रोजगार
की अपार संभावनाएं हैं। किसी भी क्षेत्र की पहचान उसकी बोली भाषा, बार-त्यौहार और रहन-सहन
से होती है। यह पहचान तभी है जब वहाँ लोग रहते हो। यही लोग उस क्षेत्र की संस्कृति
के वाहक होते हैं। ये लोग कैसे समृद्ध हो, इस बात पर जोर देने की जरुरत है। हम लोग
इसके लिए अब तक सरकारों के भरोसे रहते आए हैं लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम सरकार के
भरोसे रहने की बजाय अपने लोगों को आत्म निर्भर बनाने के लिए कमर कस लें। हमारे लोग
समृद्ध होंगे तो हमारी संस्कृति समृद्ध और दिर्धायु होगी।
इस में कोई दो राय नहीं
है कि जौनसार बावर का समाज जातिवाद और अंधविश्वास जैसी कुरितियों से आज भी ग्रस्त है।
दुनिया भर के प्रत्येक समाज में भी तो थोड़ी बहुत खामियां होती ही है लेकिन वह तभी दूर
हो पाती है जब उस समाज के लोग उसकी बेहतरी के लिए चिंतन मनन करें। हमे यह बात हमेशा
याद रखनी चाहिए कि जौनसार बावर को जनजाति का दर्जा देश की सवैधानिक व्यवस्था ने दिया
है यह किसी देवता का चमत्कार नहीं है। दुनियादारी को समझने के लिए अंध विश्वास की बजाय
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं। बात करें, दूसरों की बात सुने और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने
के बाद उस पर अमल करें। एक मानवीय और संवेदनशील समाज के लिए जो वैचारिक मंथन जरुरी
है।
- सुभाष तराण
- सुभाष तराण
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