गुरुवार, 3 मई 2018

मदारी

डुगडुगी की गड़गड़ाहट हवा में बुलंद हुई तो बाजार की सडक पर गुज़रते राहगीरों का ध्यान अनायस ही उस ओर खिंचता चला गया जहाँ से गड़गड़ाहट की आवाज आ रही थी। डुगडुगी की गड़गड़ाहट का स्रोत एक उम्र दराज़ मदारी था जो एक आठ साला बच्चे तथा दो और मरियल से दिखने वाले युवकों  के साथ सडक किनारे की पटरी पर खडा होकर दिखाए जाने वाले तमाशे की भूमिका बाँध रहा था। मदारी फिलहाल उस आठ साला बच्चे से, जिसे वह जमूरा कह कर संबोधित कर रहा था, डुगडुगी से लय ताल मिलाते हुए सवाल जवाब कर रहा था। जहाँ डुगडुगी की गड़गड़ाहट मदारी और जमूरे की आवाज के उतार चढ़ाव के साथ क़दमताल कर रही थी वहीं मदारी के बाकी दो साथी सामने पटरी पर, जहाँ सडक की हद ख़त्म हो रही थी, चादर के उपर काँच के रंग बिरंगे मर्तबानों को क़रीने से सजाने में मशगूल थे। मदारी नें जमूरे से संवाद जारी रखते हुए अपनी झोली से महाकाली के रौद्र रूप वाली एक तस्वीर निकाली और  उसे बगल में विद्यमान एक दरख़्त के तने पर चस्पा कर दिया। सवाल जवाब की इस फेरहिस्त के दौरान मदारी का हाथ जब अगली बार उस बगल में लटकी झोली से बाहर निकला तो उसके हाथ में मानव मस्तिष्क का एक कंकाल मय दो बिलाथ भर लंबी हड्डियों के साथ था। उसने सावधानी के साथ उन हड्डियों को काली के रौद्र रूप वाली तस्वीर, जो दरख़्त के तने पर चस्पा थी, उसके ठीक नीचे क़रीने से सज़ा कर दिया।

बाजार में यहाँ वहाँ घूमते लोग मदारी, जमूरे के संवाद और डुगडुगी की जुगलबन्दी के चलते जैसे ही उनके इर्द गिर्द बेतरतीब घेरा बनाने लगे, मदारी नें अपनी झोली में एक बार फिर हाथ डाला और इस बार हड्डी और लकड़ी की जुगलबन्दी से बनी छड़ी निकाल कर, इर्द गिर्द  भीड की शक्ल में तब्दील होते लोगों को पीछे धकियाते हुए, उससे अपने बाकी तीनों सहयोगियों के चारों और एक लकीर खैंच कर एक गोल घेरा बना लिया।  सवाल जवाब के दौरान इधर उधर टहलते जमूरे का पैर अचानक उस ताजा खींची लकीर को छू गया। जमूरे का पैर लकीर पर पडते ही महाकाली की तस्वीर के नीचे क़रीने से सज़ा कर रखी गयी इंसानी खोपड़ी और हड्डियों के पास एक मंद विस्फोट हुआ। अचानक में हुए इस मामूली धमाके का ज़ाहिर अंजाम तो मामूली सी चिनगारियाँ और एक पस्त  धुएँ का ग़ुब्बार था लेकिन ये विस्फोट जेहनी तौर पर इक्कट्ठा हो रही भीड को भयभीत कर गया। मदारी नें उस डर को अपने लहजे में लपेट कर तेज़ आवाज से जमूरे को जान के जोखिम की चेतावनी देते हुए उसे खेल ख़त्म होने तक इस लकीर को न लाँघने की चेतावनी के साथ आइंदा से सावधान रहने का फ़रमान सुना दिया। भीड ने, जो थोडी देर पहले कोतहूलवश मदारी और उसके साथियों पर टूट पड़ने को आतुर प्रतीत हो रही थी, धमाके, धुएँ और चिनगारियों के बाद उस लकीर से एक सम्मान जनक दूरी बना कर शान्ति के साथ खड़ी हो गयी। तमाशाई भीड़ भले ही  ख़ड़े होने भर की जगह के लिए एक दूसरे के साथ धक्का मुक्की कर रही थी लेकिन मदारी के कब्जे में इतनी जगह आ चुकी थी कि वे चारों लोग अपने सामान सहित सहूलियत के साथ बेहिचक इधर उधर टहल सकते थे। मरियल से दिखने वाले दोनो युवक अब अपने काम से फ़ारिग़ मालूम पड रहे थे। उनके द्वारा पोटली से निकली अन्तिम वस्तुएं एक गंडासा और एक इमाम दस्ता थी। वे दोनो चुपचाप से उस गोल घेरे के अन्दर एक कोने में जाकर बैठ गए।

जहाँ अभी थोडी देर पहले मदारी और जमूरा अपने सवालों जवाबों में दुनियादारी के तमाम फ़लसफ़ों का ज़िक्र कर रहे थे वहीं अब मदारी जमूरे से सवाल जवाब छोड सामने खडी भीड के मुखातिब हो गया। मदारी की जो बात दुनियादारी के विषयों से शुरू हुई थी वो अब काँच के मर्तबानों में रखी जड़ी बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों पर आ गयी। मदारी के मुताबिक हिमालय के दुरूह पहाडो पर से हासिल की गयी इन जड़ी बूटियों में बडे से बडे असाध्य रोगों को जड़ से ख़त्म करने की ताकत थी। इन जड़ी बुटियों में ताकत केवल रोगों को ख़त्म करने की ही नही, बल्की खोई हुई ताकत हासिल करने की भी ताकत थी। एक सधे हुए हकीम की तरह मदारी नें जरा सी देर में इमाम दस्ते में जड़ी बूटियों को कूट कर कई प्रकार के मिश्रण तैयार कर दिए और उनकी बहुत सी पुडिया बना डाली।  मदारी द्वारा जड़ी बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों की प्रभावशाली प्रस्तुति और उसकी कम कीमत के चलते भीड नें जड़ी बूटी के इस मिश्रण को हाथो हाथ लिया। यह मदारी का ही कमाल था कि उनके चारों ओर खडी भीड पूरी कीमत चुका कर दवा की इन पुड़िया को हासिल करने के लिए अपनी जगह अनुशासित और कतारबद्ध होकर धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। दवा की पुड़िया की एवज में एक माकूल कीमत वसूलते हुए मदारी भीड़ को लगे हाथ मुफ़्त में दुआएं दे भी रहा था।
जड़ी बूटियों से फ़ारिग़ होते ही मदारी नें ताली बजायी तो लकीर के अन्दर कोने में बैठे दोनो मरियल से लड़कों नें काँच के मर्तबान समेटकर पोटली में रखने शुरू कर दिए।

मदारी अपने वक्तव्यों के माध्यम से एक बार फिर भीड को दवा के मसले को पीछे छोड़ दुनियादारी के फ़लसफ़े बताने लगा। वह बात कर ही रहा था कि तभी पेड़ के तने पर चस्पा महाकाली की तस्वीर के नीचे रखी खोपड़ी और हड्डियों के बीच एक ओर मामूली सा विस्फोट हुआ। यह विस्फोट पिछली बार के मुक़ाबले थोडा तेज़ था।  अचानक हुए विस्फोट से हँसते बतियाते मदारी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी। वो तेज़ी से उस ओर पलटा और जमीन पर पडे गंडासे को उठाकर अपनी हथेली में पेवस्त कर दिया। मुट्ठी के अन्दर दबे गंडासे की मूठ से खून की धार बहने लगी। मदारी चेहरे पर दर्दनाक भाव भंगिमाएँ ओढ़ते हुए महाकाली की तस्वीर की ओर बढ़ा और हथेली से निकलते लहू को उन हड़्ड़ियों पर टपका दिया।

लेकिन यह क्या! धुआँ उगलती हड्डियों पर खून की बूँदे टपकते ही उससे आग की लपटें उठने लगी। मदारी ने बिलबिलाते हुए जमूरे का आह्वान किया। मदारी की बौखलाहट और खून टपकने पर लपटें उगलती हड्डियों को देखकर तमाशाई भीड के बीच सन्नाटा पसर गया। लपटों के तेज होने पर मदारी ने रूँधी आवाज में भीड को सुनाते हुए जमूरे से कहने लगा कि तमाशाई भीड के बीच किसी व्यक्ति नें महाकाली के दरबार में विघ्न डाल दिया है लिहाज़ा इस पृथ्वी पर कभी भी प्रलय आ सकती है। एक मंजे हुए कलाकार की तरह संवादों की अदायगी करते हुए जमूरे ने जब इस प्रलय रोकने का उपाय जानना चाहा तो मदारी ने कहा कि अभी के अभी महाकाली के सामने एक इंसानी बलि चढ़ानी होगी। मदारी गिड़गिड़ाते हुए दयनीय भाव के साथ एक बार फ़िर जमूरे से मुखातिब हुआ और कहने लगा कि क्या वह इस ब्रह्माण्ड़ को बचाने के लिए खुद की क़ुर्बानी दे सकता है। अपने नाक ख़ुजाते हुए किसी प्रशिक्षित पालतू की तरह जमूरे नें बिना देर किए हाँ कह दी।
मदारी नें बिना देर किए गंडासा उठाया और उसे जमूरे की गरदन पर रख कर खैंच दिया। जमूरा जमीन पर गिर कर छटपटाने लगा और उसके गरदन के आस पास ख़ून उबलने लगा।

हड़्ड़ियों से उठती लपटें अचानक शान्त होने लगी। भीड़ सतब्ध थी। छटपटाते लड़के की गरदन पर धंसे गंडासे को देखकर भीड़ के बीच में बहुत से लोगों के मुँह से घुटी हुई चीख़ें फ़ूट पड़ी। छटपटाते जमूरे को अपनी आड़ में लेकर अचानक मदारी जोर से चिल्लाया।

'सब लोग अपनी-अपनी मुट्ठियाँ ख़ोल दें, बच्चा आपके लिए तकलीफ़ उठा रहा है'।

भीड़ ने तत्काल से मदारी के हुक्म की तामील की।

मदारी एक बार फ़िर अपनी आवाज में आस पास के भय को मिलाते हुए दहाड़ा,

-क्या आप लोगों की हथेलियों में पसीना आ रहा है? –

भयभीत भीड़ नें मदारी द्वारा उछाले गए सवाल के जवाब में सामुहिक रुप से हाँ में सर हिला दिया। 
मदारी ने भीड़ से मिले मन माफ़िक जवाब की एवज में अपने चेहरे पर उम्मीद की परत ओढते हुए भीड़ के बीच एक ओर जुमला छोड़ा,

'हमे इस नीरीह बालक की जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए',

भीड़ ने कुछ इस तरह से दर्दमन्द आवाज में हामी भरी मानों गंड़ासा उनकी गर्दन में घँसा हुआ हो।

अब भीड़ के हाव भाव देख कर मदारी का लहजा आदेशात्मक हो गया। इस बार किसी जवाब की अपेक्षा किए बिना मदारी ने भीड़ के समक्ष एक चेतावनी के साथ इस जानलेवा समस्या का समाधान परोस दिया।  

-बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बशर्ते आप लोगों की जेब में जो कुछ हो उसे सामने पड़ी चादर पर डाल दिया जाए, वर्ना इस मासूम बच्चे की हत्या आप लोगों के सर होगी।–

दोनो मरियल से युवक, जो अब तक एक कोने में ख़ड़े थे, बिना किसी आदेश के चादर फ़ैला कर सहमी हुई भीड़ के सम्मुख़ हो लिए।

मदारी एक बार फ़िर गरजा

'बच्चे की जान का सवाल है, हम रहमदिल मुल्क के बाशिन्दे है। मुझे उम्मीद है आप बच्चे की जान बचाने के लिए ईमानदारी दिखाएंगे।'

पूरी तरह से मदारी के काबू में डरी सहमी भीड़ दत्त चित होकर दवा ख़रीदने के बाद ख़ीसे में पड़ा बचा हुआ पैसा चादर पर डालने लगी।

यह दौर ख़त्म होने ही था कि अचानक भीड़ के बीच एक आदमी मुँह से ख़ून उलटता हुआ मदारी की ओर लड़ख़ड़ाते हुए बढने लगा। मदारी ने हाथ के इशारे से उसे वहीं रुकने का हुक्म दिया। लड़ख़ड़ाते हुए गिरने को हो रहे उस आदमी ने अपनी जेब में हाथ ड़ाला और एक दस का नोट मदारी की तरफ़ उछाल दिया और वहाँ का वहीं धराशायी हो गया।
मदारी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान फ़ैल गयी। मदारी बैचेन और विकल भीड़ को चेतावनी स्वरुप जमीन पर पड़े आदमी की ओर इशारा करते हुए भीड़ को संबोधित करने लगा।

'देख लिए आपने बेईमानी के नतीजे। यह पहली चेतावनी है। जिसकी जेब में जो कुछ है वो चुपचाप उसे चादर पर डाल दें। दस मिनट का समय दे रहा हूँ। अगर किसी नें कोताही बरती तो उसका हश्र बिलकुल ऐसा ही होगा जैसा इस सामने पड़े आदमी का हुआ है।'

मरियल से दिखने वाले उन युवकों ने एक बार फ़िर भीड़ के सामने चादर फ़ैला दी। मन्त्रमुग्ध भीड़ के बीच से फ़ैली चादर पर सिक्कों और नोटों की बरसात होने लगी।
चादर मय उस पर पड़े रुपयों के एक पोटली की शक्ल में मदारी के हाथ में आ गयी। मदारी ने ख़ेल ख़त्म होने की घोषणा कर दी।जमूरा जो थोड़ी देर पहले जमीन पर पड़ा छटपटा रहा था, उठ कर ख़ड़ा हो गया। जमीन पर ख़ून की उल्टियाँ करते हुए गिरा आदमी उठ कर भीड़ में घुस कर गायब हो गया । सारा बिखरा सामान लपेटने के बाद मदारी, जमूरा और उसके दोनो मरियल से साथी आरक्षित जगह पर भीड़ के सामने पंक्तिवद्ध होकर ख़ड़े हो गए और भीड़ से मुखातिब होते हुए एक नारा लगाया।
"भारत माता की जय"
सहमी हुई भीड़ ने डर और व्याकुलता के बीच अपना बचा ख़ुचा जोश इक्कट्ठा करते हुए एक सामुहिक उद्घोष किया।

"भारत माता की जय।" 

6 टिप्‍पणियां:

  1. कथा भले ही काल्पनिक है। मगर सच के करीब है। जिस देश में आर्थिक-सामाजिक समस्याओं का समाधान , व्यवस्था के द्वारा न किया जा रहा हो,
    जिस देश के लोगो का राजनीतिक-सामाजिक चेतना का विकास सही तरह से न हुआ हो, वहाँ पर एक ऐसी भीड़ इकट्ठी होना लाजमी है जिसे बेहद आसानी से गुमराह किया जा सकता है और "भारत माता की जय" के उद्घोष के साथ कुछ भी करवाया जा सकता है ।

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  2. खेल जारी है, मदारी हंस रहा है और हम "भारत माता की जय" बोलते जा रहे हैं, अथक ।

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  3. हा हा हा..बहुत बढ़िया..बचपन में देखे मदारी के खेल हूबहू आंखों के सामने आ गए..गजब बात तो यह कि देश के वर्तमान मदारी राजनेता पर भी सटीक निशाना साध लिया.

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  4. लेखन का सबसे भद्दा पन व्यगं की एक सीमा होती है ऐसे खेल बहुत बार हमने भी देखें हैं मगर अब भारत जागरूक हैं यहां का हर नागरिक अपना भला बुरा जानता है ।
    यह लेख हताशा का पर्याय है ,और चमचागिरी की चम्मच न मिलने की बौखलाहट है ।
    जिसने भी लिखा है उसको सांत्वना ।
    जय श्री राम ।

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  5. ऐसा ही खेल मैंने भी देखा जब मैं अपने स्कूल मित्र के साथ मेला देखने जा रहा था मेला शुरू होने से पहले ठीक इसी तरह का खेल एक मदारी और जमुरा दिखा रहा था हम वहां रुक गए खेल का अंत होते होते ठीक ऐसा ही क्षण हमारे सामने भी आया भीड़ के सभी लोग डर गए यहां तक कि मैं और मेरा मित्र भी यह देख डर गया और सभी पैसा देने लग गया मेरे मित्र के पास उस वक्त डेड सो रुपए थे और और मेरे पास 60 रूपय थे चुंकी मेला था तो हमने पैसे एक जेब में ना डाल कर अलग-अलग जेबो में डाल रखे थे मैंने और मेरे मित्र ने! खेल के अंत में एक बच्चा अपने घुटनों के बल बैठा था और उनका एक साथी उसके गले में खंजर धसां कर उसको पकड़ रखा था वही उनका तीसरा साथी जिसने अपने चेहरे को रंगा हुआ था और भीड़ के बीच जा जाकर पैसा ले रहा था सभी लोग मारे डर के पैसा दे रहे थे और वह हमारे पास भी आया और मेरे मित्र ने अपनी दोनों तीनों जेब से निकालकर डेढ़ सौ रुपए उसे दे दिए मैंने भी अपनी एक जेब में हाथ डालकर ₹30 उसे दे दिए और देखने लगी कि अब उस छोटे बच्चे के साथ क्या होगा उनका साथी जो पैसे ले रहा था सबसे पैसे लेकर उसने बैग में डाल दिए और जिसने खंजर पकड़ रखा था उसने भी खंजर निकालकर खेल समाप्त हो गया बोल दिया वह बच्चा भी उठ खड़ा हुआ और अब भीड़ हटने लगी मैं और मेरा मित्र बड़े अफसोस से छोटा मुंह लेकर मेले में घुस गए और बिना कुछ खरीदें वापस घर की ओर निकल पड़े यहां तक कि जिस देवता का मेला देखने गए थे उनके वहां दर्शन करने के लिए भी नहीं गए क्योंकि जो ₹30 बचें थे वह भी किराए के लिए थे! और वापस घर की और लौटते समय दोनों यह सोच रहे थे कि यह ₹30 भी दे देते तो वापस लौटने के पैसे भी नहीं होते हैं और उस खेल दिखाने वाले हैं को भला बुरा भी कह रहे थे उस वक्त हम 14:15 साल के थे! जब आप की यह कहानी पढ़ी तो मानो सारी घटना वापस आंखों के सामने आ गई हो! मजे की बात यह है कि यह घटना हमने हमारे घर वालों को कभी भी नहीं बताई!!

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