गुरुवार, 17 मई 2018

ग्राम देवता का न्याय


देव भूमि उत्तराख़ण्ड के सुदूर पहाड़ों के एक गाँव की बात है। काँग्रेस राज के दौरान गाँव के दो राजनीतिक रसूख़दारों ने, जो गाँव में पक्ष विपक्ष की अगुवाई करते थे, गाँव सभा के नाम पर सरकारी खर्च के मार्फ़त से हासिल पीने के पानी की एक पाईप लाईन बनाई और दोनो ने मिल कर उस पर कब्जा कर लिया। राजनैतिक प्रतिद्वन्दता के चलते भले ही दोनो एक दूसरे को फ़ूटी आँख़ नहीं सुहाते थे लेकिन इस सरकारी सहायता प्राप्त पाईप लाईन से हासिल पानी के आपस बीच में बंटवारे को लेकर दोनो बहुत ईमानदार थे। उस गाँव के सामर्थ्य विहीन लोग डर, लिहाज और जानकारी के अभाव के चलते उनके इस अवैध कृत्य का प्रतिरोध नहीं कर पाते थे। जबकि राजनीतिक रसूख़दार उस पानी से अपने खेतों और बागीचों को सींच कर किस्म-किस्म के फ़ल और सब्जियाँ पैदा करते और जो पानी बच जाता उसे वे किसी खेतिहर को बेच देते।

एक बार देश के अनेको भागों की तरह गर्मियों के दौरान इस गाँव में भी सूख़े के चलते पीने के पानी की किल्लत हो गयी। गाँव के आम जनों में पानी को लेकर हाहाकार मच गया। दोनों रसूखदारों के अलावा उस गाँव के लोग पीने के पानी को लेकर व्यथित रहने लगे। उसी गाँव में एक कमजोर और लाचार बुढिया भी रहती थी, जिसके दरवाजे के सामने से दोनो में से एक राजनैतिक रसूख़दार के घर की ओर जाने वाली पानी की पाईप लाईन गुजरती थी। पानी की किल्लत के चलते एक दिन बुढिया उस राजनैतिक रसूख़दार के पास गयी और उस से विनती कर कहने लगी कि वृद्धावस्था के चलते वो पानी लेने दूर नहीं जा सकती है। यदि वे कृपा कर उसके दरवाजे के सामने से गुजर रही पानी की पाईप लाईन से दो बाल्टी पीने लायक पानी भरने दें तो वो ग्सेराम देवता से प्रार्थना करेगी कि उसका हमेशा भला होता रहे।

बुढिया की जर्जर हालत और ईश्वर की दुहाई के बावजूद भी राजनीतिक रसूख़दार का दिल नहीं पसीजा। उसने बुढिया को पानी देने से साफ़ इंकार कर दिया। राजनीतिक रसूख़दार की इस निष्ठुरता पर बुढिया को बहुत गहरा आघात पहुँचा। जिस ग्राम देवता और बुढापे का वास्ता देकर बुढिया नें राजनीतिक रसूख़दार से पानी के लिए फ़रियाद की थी उसे वो यूं ही नजर अंदाज कर गया। बुढिया ने पानी के एवज में राजनीतिक रसूख़दार की भलाई हेतु ग्राम देवता का आह्वान किया था । बेचारी बुढिया के पास ले दे कर अब ग्राम देवता का ही भरोसा बचा था। वो रोती बिलख़ती हुई गाँव के मन्दिर की देहरी पर पहुँच गयी। गारे-पत्थर और लकड़ी के मन्दिर में धातु के बने ग्राम देवता के सम्मुख़ बुढिया रो-रो कर उस राजनीतिक रसूख़दार को कोसने लगी।

उसी समय उधर से गुजर रहे सुभाषित नें बुढिया से उसके विलाप का कारण जानना चाहा। बुढिया नें सुभाषित को सारा वृताँत एक साँस में सुना दिया और कहने लगी कि वो ग्राम देवता को भेंट चढा रही है ताकि वो उस राजनीतिक रसूखदार को सबक सिखाएं। बुढिया की बात सुन कर सुभाषित ने उससे पूछा कि वो भेंट स्वरुप ग्राम देवता को क्या चढा रही है। बिना कुछ कहे बुढिया ने अपनी भिंची हुई मुट्ठी खोलते हुए हथेली सुभाषित के सामने कर दी।

हथेली पर रखे एक नए रुपये के सिक्के को देखते हुए सुभाषित ने बुढिया से अगला सवाल किया कि क्या उसे इस बात की जानकारी है कि धातु के जिस ग्राम देवता के आगे वो अपनी फ़रियाद रख रही है उसकी मूर्ती में मढा गया सेर भर चाँदी उसी राजनीतिक रसूख़दार ने दान दिया है जिसने उसे पानी देने से मना किया था। क्या उसे उम्मीद है कि तुम्हारा यह ग्राम देवता सेर भर चाँदी दान करने वाले के खिलाफ़ हो जाएगा और एक रुपये की भेंट चढाने वाले का पक्ष लेगा?

सुभाषित का सवाल सुन कर बुढिया नें अपने आँसू पोंछे, रुपया जेब के हवाले किया और वापिस अपने घर की और चल दी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुभाषित की कोई रास्ता सुझाना चाहिए था. बुढ़िया का भरोसा भी तोड़ दिया उसने.

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    1. ये अंध विश्वास के भरोसे टूटने बहुत जरुरी है, तभी मानवीय भरोसों के लिए जगह निकल पाएगी

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