बुधवार, 12 दिसंबर 2018

महासू क्षेत्र तथा उसके भ्रम और भ्रांतियाँ

बहुत सारे लोगों टौंस और यमुना के बीच बसे भूभाग को, जिसमे जौनसार, बावर, देवघार, बंगाण, पर्वत और रवाँई, शामिल है, पाँडवों और कौंरवों से जोड़ने की भरसक कोशिश में रहते हैं। ऐसे लोगों का आधार इन क्षेत्रों में प्रचलित बहु पति प्रथा और कुछ भागों में पाँड़व नृत्य का होना बताया जाता है। हिमालय के इतिहास से अन्जान और धार्मिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित ये लोग शायद ही इस बात को जानते हों कि हिन्दू कुश से लेकर तिब्बत तक जितनी भी बसासतें हैं उनमे पिछली सदी के मध्य तक बहु पति प्रथा का वैध चलन था। पश्चिमी हिमालय की निचली बसासतों और गढवाल-कुमाऊँ के पहाड़ी क्षेत्र में काफ़ी पहले उत्तर भारत के मैदानों से आए राजपूतों, पुरोहितों और पंड़ो के प्रभाव, जीवन यापन के पारंपारिक तरीकों में ह्रास और रोजगार के लिए पलायन के चलते वहाँ यह प्रथा भले ही विलुप्त हो गई हो लेकिन अपने मजबूत ताने बाने के लिए प्रसिद्ध महासू क्षेत्र में यह प्रथा इसकी परंपराओं में पिछली सदी के अन्तिम दशकों तक विद्यमान रही और अभी भी यहाँ इसके इक्का दुक्का उदाहरण देख़ने को मिल ही जाते है।
जहाँ तक महासू क्षेत्र में पाँडव और उनके नृत्य की बात है तो उनका आगमन इस क्षेत्र में उन्नीसवीं सदी में उस दौर के बाद का है जब अंग्रेजों नें यमुना के किनारे बसे लाख़ामंडल, जिसका स्थानीय नाम धड़ा-मड़ा था, को ख़ोज निकाला। तंत्र मंत्र और पूजा पाठ को व्यवसाय कि तरह करने वाले गढवाल और टिहरी में फ़ैले कुछ पुरोहितों और पंडितों को जैसे ही इस बात की भनक लगी कि लाखामंडल में बौद्ध मठ, मंदिर और मूर्तियाँ मिली है, उन में से बहुत से लोग जीविकोपार्जन के लिए यहाँ आ गए और इस स्थान को पांडवों से जोड़ कर अपने पारंपरिक व्यवसाय को चलाने के लिए इसका प्रचार प्रसार करने लगे। 
अंग्रेजों द्वारा मिट्टी में दबे लाखामंडल की खोज के पुख्ता प्रमाण उनके गजेटियर्स में सपष्ट रुप से मिलते हैं। यमुना घाटी, पर्वत और जौनसार बावर में पाँडवों और पाँडव नृत्य का प्रचार प्रसार वहीं से हुआ है। मैं किसी और की बात नहीं कर रहा हूँ, मेरे गाँव में जो पाँडव है, उनकी चौंरी (मन्दिर) हमारी पैतृक जगह पर विद्यमान है। आज भी पांडवों के खजाने का हिसाब किताब मेरे छोटे दादा जी रखते है। उसका कारण यह है कि पांडवों को गाँव में लाने वाला व्यक्ति हमारे परिवार का एक पूर्वज धूड़ू था। सन् 1862-72 के सेटिलमेंट की तस्दीक से पता चलता है कि धूड़ू उस वक़्त हमारे परिवार का मुखिया था। वह पांडव कहाँ से, कैसे और क्यों लाया, इस बात से पांडवों के महासू क्षेत्र में स्थापित होने का समय लगभग स्पष्ट हो जाता है। 
1815 के बाद जब अंग्रेजों नें जौनसार बावर को अपने कब्जे में लिया तो उन्होने सबसे पहले इस क्षेत्र का अपने अधिकारियों से उचित सर्वेक्षण करवाया। जौनसार बावर क्षेत्र से अधिकतम राजस्व हासिल करने के लिए अंग्रेजो ने इस क्षेत्र में दोहन की संभावनाओं के लिए यहाँ होने वाली पैदावार और पशुपालन सहित सामाजिक, साँस्कृतिक, भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों की पड़ताल करवाई और फ़िर इसी को आधार बनाकर जौनसार बावर के काश्तकारों पर लगान ठहराया। जौनसार बावर में जहाँ एक ओर बेश कीमती जंगल थे वहीं दूसरी और अनाज और पशुओं से समृद्ध भोले भाले मेहनत कश लोग थे। जौनसार बावर की जमीनी तहकीकात में अंग्रेजों ने पाया कि इस क्षेत्र के लोग जातिवाद और अंध विश्वास की एक ऐसी व्यवस्था में जकड़े हुए हैं जो प्रशासनिक तौर पर अंग्रेजी हुकूमत के लिए बहुत ही फ़ायदेमन्द साबित हो सकती है। अंग्रेजों ने केवल यहाँ के चौंतरूओं, स्याणो और महासू के उस वक्त के वजीर करम सिंह को अपने प्रभाव में ले लिया। उन्हे यह बात अच्छी तरह से मालूम हो गयी थी कि इस क्षेत्र की आस्थावान जनता चुपचाप चौंतरूओं, महासू के वजीर और स्याणों के पीछे हो लेगी। 
महासू क्षेत्र  के मूल निवासी आदिकाल से न्याय और स्वास्थ्य के लिए महासू देवताओं पर निर्भर रहते आए है। इस क्षेत्र के निवासी अपने इन देवताओं को  अपने जीवन और आकांक्षाओं की सुरक्षा का आश्वासन मानते हैं। आज भी यहाँ के एक बड़े तबके के लिए महासू देवताओं का भरोसा ही न्यायाधीश और डाक्टर है। कोई माँग हो या मुराद, झगड़ा फ़साद हो या हारी बीमारी, महासू क्षेत्र से संबधित अधिकतर लोग आज भी ऐसे मसाईलों के निदान हेतु महासू देवताओं की शरण में जाते है।  ये देवता आज भी इन लोगों पर किसी भी आई गई बला से टकराने की हिम्मत का काम करते हैं। 
 महासू क्षेत्र की जिस खत (पट्टी) में मेरा गाँव सैंज पड़ता है उसका नाम देवघार है। देवघार और बावर दोनों खतों को ईलाका टौंस नदी के आर पार का क्षेत्र पड़ता है। सन् 1827 में अंग्रेज बहादुर मेजर के फेड्रिक यंग नें महासू के वजीर करम सिंह को बावर देवघार क्षेत्र का सर्वे सर्वा घोषित कर दिया था, लिहाजा बावर देवघार के सभी स्याणे लगान करम सिंह वजीर के माध्यम से अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़ज़ाने में जमा करवाते थे। शुरूआती वर्षों मे तो करम सिंह वजीर स्याणों से लगान वसूली तक ही सीमित रहा लेकिन आने वाले समय में वह अपने रुतबे में इज़ाफ़ा होने के चलते टौंस के किनारे के उपजाऊ ख़ेड़ों को कब्जाने की फिराक में लग गया। उसने  सबसे पहले देवघार के खेड़े गयराणु, मणोर और रिशाणू को हथिया लिया। उसके बाद उसने हमारे गाँव के मुखिया को खेड़े हटाल को छोड़ देने का फ़रमान सुना दिया। 
हमारे गाँव के मुखिया उस समय अमर सिंह था जो कि धूडू का बड़ा भाई था। करम सिंह की भभकी ने उसका पारा गरम कर दिया था लेकिन उसका छोटा भाई धूड़ू एक आस्थावान व्यक्ति था। उसे पूरा भरोसा था कि इस मामले में महासू देवता उनके साथ ज़रूर न्याय करेंगे। उसने माली (जिस पर देवता अवतरित होता है) बुलाकर महासू की पूछ की। महासू देवता ने उसे आश्वासन दिया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे एक दिन करम सिंह वज़ीर अपने आदमियों को लेकर खेड़े हटाल में आ धमका और खेतों में काम कर रहे मज़दूरों को दंड स्वरूप प्रताड़ित करने लगा। उन्हीं मज़दूरों में से एक आदमी जो उस वक़्त दिशा शौच के लिए जंगल झाड़ी गया था, अपने साथी मज़दूरों को सज़ा पाता देख सीधा सैंज गाँव की तरफ़ भागा। 
हाँफता काँपता मज़दूर सैंज गाँव के नीचे खेतों में पहुँचा ही था कि  उसे अफ़ीम के खेत में काम करता हुआ मुखिया अमर सिंह दिख गया। उसने अमर सिंह को एक साँस में सारी बात बता दी। अमर सिंह ने आव देखा न ताव। कुर्ती पहनी और सीधा हटाल गाँव की तरफ़ दौड़ पड़ा। 
जेठ महीने की सुलगती दोपहर का समय था। हटाल की रैतीली मिट्टी आग उगल रही थी।  करम सिंह वज़ीर ने सारे मज़दूरों को धूप में पंक्तिबद्ध खड़ा कर उनके सर पर पहले एक पत्थर का टुकड़ा और फिर उस पर एक बड़ा सा पत्थर रखवाया हुआ था। इस बर्बर सज़ा के चलते कुछ मज़दूर तो बेहोश हो गए थे। जो खड़े थे उनकी भी टाँगे काँप रही थी। अमर सिंह ने यह सब देखा तो आग बबूला हो उठा। उसने सबसे पहले तो मज़दूरों के सर पर रखे पत्थरों को फिंकवा दिया फिर पलट कर घर के बरामदे में नीचे को टाँगे लटकाए बैठे करम सिंह वज़ीर को टाँग से पकड़ कर खैंचा और नीचे कीचड़ में गिरा दिया। महासू का वज़ीर होने के चलते उसे सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस ईलाके का कोई भी बाशिंदा उस पर हाथ डाल सकता है। करम सिंह के धराशायी होते ही उसके साथ आए उसके आदमी भाग खड़े हुए। तमतमाए अमर सिंह ने करम सिंह वज़ीर की तसल्ली बख़्श मरम्मत कर डाली। करम सिंह वज़ीर जैसे तैसे जान बचा कर भागा और सीधा अंग्रेज़ बहादुर के दरबार में कालसी पहुँच गया। 
अंग्रेज़ बहादुर को आप बीती सुनाने के बाद करम सिंह ने सीधी शर्त रखी कि उसे किसी भी क़ीमत पर अमर सिंह की जान चाहिए। वह उनके लिए अब तभी करेगा जब अमर सिंह की निर्जीव देह उसके सामने होगी। चालाक अंग्रेज़ बहादुर ने उसी वक़्त एक कारिंदा भेज कर सैंज गाँव के स्याणा अमर सिंह को जितनी जल्दी हो सके, कालसी हाज़िर होने का सम्मन जारी कर दिया। 
बूते से बहादुर और ख़्याल से भोले भाले अमर सिंह को फिरंगियों से न्याय की उम्मीद न के बराबर ही थी। लेकिन वह चाहता था कि अंग्रेज़ी हुकूमत को उसका पक्ष भी तो पता चले। वह घर से कालसी के लिए निकल पड़ा। कालसी में उस दौरान जकातियों का थाना होता था। अमर सिंह सीधा वहीं पहुँचा और वहां अपनी बात रखनी चाही लेकिन अंग्रेज़ बहादुर ने करम सिंह वज़ीर को ख़ुश करने के लिए बिना किसी सुनवाई के ही अमर सिंह की हत्या करवा दी। 
अगले रोज़ कालसी से हाट लेकर लौट रहे चिल्हाड़ गाँव के लोगों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने दूर पार की बात तथा रिश्तेदारी का वास्ता देकर जकातियों से स्याणा अमर सिंह की लाश लेकर उसकी अंत्येष्टि कर दी और उसका लोईया ( महासू क्षेत्र में पहना जाने वाला एक क़िस्म का ऊनी कोट) और डिगुआ (ऊन की टोपी) को उसकी हत्या की ख़बर के साथ उसके  गाँव सैंज भिजवा दिया। महासू के प्रति अगाध आस्था रखने वाला धूड़ू अपने भाई की हत्या की ख़बर सुनकर विचलित हो उठा। उसने तय किया कि वह कालसी जाकर अपने भाई की हत्या के ख़िलाफ़ अंग्रेजी हुकूमत के पास अपील करेगा। 
धूड़ू गाँव के अपने एक ख़श साथी को साथ लेकर कालसी जा पहुँचा लेकिन वहाँ उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। उसका दुख दूना हो उठा। इसी दौरान उसे और उसके साथी को कालसी में एक गढ़वाली ब्राह्मण मिला। धूड़ू को दुखी देखकर जब उसने उसकी परेशानी का सबब पूछा तो धुड़ू ने उसे सारी बात बता दी। धूड़ू की बात सुनकर वह कहने लगा कि अंग्रेजों के साथ मुक़ाबला करना आदमियों का बस नहीं है। तुम्हारे देवता ने तुम्हारी मदद नहीं की। तुम मेरे साथ धड़े मड़े चलो, वहाँ पांडव प्रकट हो रखे हैं। तुम उनको अपने गाँव लेकर जाना, वे वजीर और इन फिरंगियों से तुम्हारा बदला पूरा कर देंगे। 
आस्था जब तर्कहीन हो जाती है तब वह अंधविश्वास में बदल जाती है। गढ़वाली पंडित उन्हें धड़े-मड़े ( आज के लाखामंडल) ले गया। यही वह समय था जब जौनसार बावर से लेकर पर्वत, सेराईं और रवाईं तक के भोले भाले लोग पांडवों की महिमा सुनकर किसी चमत्कार की उम्मीद में उनके प्रतीकों  को अपने यहाँ प्रस्थापित कर रहे थे। 1817  में ब्रिटिश सर्वेयर जनरल एच एल हर्बट  द्वारा खोजा गया मिट्टी में दबा हुआ धड़ा-मड़ा तब तक पंडों और पुरोहितों के प्रपंच से लाक्ष्यागृह और लाखामंडल में तब्दील हो चुका था। वहाँ रोज़ पांडव नृत्य होता और वहाँ किसी चमत्कार की उम्मीद में आस पास के ईलाको से आए लोगों को गढवाल से आए पुरोहितों द्वारा पांडव स्थापित किए जाने की विधि बताई जाती।  
 भाई की हत्या के दुख और महासू देवताओं से हताश निराश धूड़ू को पांडवों की महिमा सुनकर बड़ा संबल मिला। वह प्रतीक चिन्ह लेकर अपने गाँव लौट आया और अपने गाँव में पांडवों की स्थापना कर उन मे रम गया। मानव सभ्यता का अतीत गवाह है, कि कैसे अंध विश्वास सूखे घास में लगी आग की तरह तेज़ी के साथ चारों ओर फैल जाता है। लाखामंडल से पांडव महासू क्षेत्र के एक बड़े भाग में फैल गए लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि पुरातत्व विदों की पड़ताल के दौरान लाखामंडल में पांडवों से संबंधित अभी तक एक भी साक्ष्य नहीं मिला है।  
बहुत से लोग महासू क्षेत्र में प्रचलित शांठी और पांशी शब्द को कौंरव और पांडवों से जोड़ते है जबकि  इस क्षेत्र में गाए जाने वाले एक अदद गीत के अलावा कौंरवों का कहीं और कोई ज़िक्र ही नहीं होता। शांठी बील (देवघार बावर से पीछे का ईलाका जिसकी सीमा एक समय में सतलुज तक होती थी) और पांशी बील (बंगाण से पीछे का ईलाका, जिसकी सीमाएँ मांझीवन तक होती थी) महासू क्षेत्र के दो ऐसे भाग है जिन्हे किसी जमाने में महासू भाईयों की सहूलियत के लिए विभाजित किया था। पांशी बील का देवता पवासी है जबकि शांठी बील में बोठा और बाशीक महासू की मानता होती है। महासू भाईयो में चालदा चलायमान रहने वाला देवता है जो 24 से 36 वर्षो के अंतराल में महासू क्षेत्र में एक फेरा पूरा करता है। 
वक़्त के साथ दुश्मनियाँ दोस्ती में तब्दील हो गई। अंग्रेज़ों और राजशाही का दौर चला गया और देश में लोकतंत्र ने दस्तक दी। देश की संवैधानिक व्यवस्था नें इस क्षेत्र के लोगों को पढने लिख़ने के समान मौके मुहैया करवाए और लोग सम्मानजनक रोजगार पाने लगे। लेकिन पढ लिख़ जाने और रोजगार पाने के बाद भी यहां के लोगों का एक बड़ा तबका इसे अपने देवताओं की कृपा ही मानता है। इस क्षेत्र में हज़ारों सालों से विद्यमान आस्था और अंध विश्वास को गिनती के लोगों द्वारा तर्कों की कसौटी पर कसा जा रहा है। इधर डेढ़ सौ सालों के दौरान पांडव भी वैसे ही महासू क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा हो गए जैसे एक वक़्त में राजों रजवाड़ों, पुरोहितों और गोरख पंथियों को इस क्षेत्र की संस्कृति ने ख़ुद में एकाकार कर लिया था। इसमें कोई दोराय नहीं है  बाहर से आए लोग और प्रतीक इस क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा हो गए लेकिन यहाँ की आस्था का केन्द्र तो फ़िलहाल केवल और केवल महासू और उनके नायब ही  हैं, और कोई नहीं। 

-सुभाष तराण

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