शहर
मे एक अकेले आदमी की मौत
छत
का बोझ सर पर लिए कमरे की दिवारें
खामोश खडी थी।
दीवारों
के दरमियान फैले फर्श पर फ्रिज
सोफे और सजावट की तमाम चीजों
के अलावा बिछी हुई दरी पर वह
चित पडा था। उसका चेहरा कमरे
के भीतर की पस्त रौशनी और तेज
बुखार के चलते तमतमा रहा था।
वह महसूस कर रहा था कि उसके
पैरों के नीचे कोई भाड़ सुलग
रहा है जिसकी तपिश उसके तलवों
से होती हुई पेट, सीने
और सर तक तारी है। उसकी साँसें
फेफडों तक का रास्ता उस अंधे
मुसाफिर की तरह तय कर रही थी
जो किसी अंजान राह पर पहली दफा
सफर कर रहा हो। उसके गले में
अटके बलगम के टुकडों से टकरा
कर आती जाती कोई- कोई
साँस अचानक बगावत कर डालती
और उसके उजाड चेहरे पर ऐसे भाव
लाती मानों उसके मुँह से कोई
ज्वालामुखी फूटने वाला हो।
इस किस्म की तेज उठी खाँसी से,
जिसका हश्र उसके सारे
शरीर पर जलजले की तरह मालूम
होता, वो तडप उठता।
उसकी सुर्ख आँखे जो अंगार हो
रही थी, नीम अंधेरे
में नामालूम क्या टटोल रही
थी।
उसका
सारा बदन उसके ख्यालो समैत
दर्द में गर्क था। दरी पर बिछे
उस शख्स के शरीर में जब दर्द
के कई आँधी तूफान और जलजले सर
से पैर और पैर से सर की और बिजली
की मानिंद यका-यक
दौड पडते तो उसकी कराह, जो
किसी गहरे कुँए से आती मालूम
पडती, उस स्याह फिजा
में नुमाया होकर एक चाल से चल
रहे पँखे की आवाज से टकराकर
खत्म हो जाती।
यह
एक आलिशान घर था। इस घर में वो
तमाम सहुलियतें मौजूद थी जो
मानव सभ्यताओं ने अपने आगाज
से अब तक हासिल कर लिया हैं।
अगर उस घर में कुछ था नही तो
उस दरी पर बिछे शख्स के अलावा
कोई और इंसान। वातानुकुलित
वातावरण ने कमरे का तापमान
भले ही अपने काबू में रखा हो
लेकिन उसकी तबियत सुलग रही
थी। दर्द के इस सैलाब में उसे
केवल प्यास महसूस हो रही थी।
उसका मन हो रहा था कि ठण्डे
पानी का रेला उसके मुंह में
दाखिल हो और उसके गले से लेकर
पेट तक सुलग रहे सुर्ख अंगार,
स्याह कोयलों में
तब्दील हो जाय।
लेकिन
उसका यह बे-नतीजा
ख्याल उसके जेहन में कौंध कर
दर्द से सराबोर उसके वजूद के
समन्दर में कहीं बहुत गहरे
गायब हो जाता।
उसकी
नजर, जो कभी आसमान
तक को अपने नजारों में भर लेने
की कुव्वत रखती थी, फिलहाल
कमरे की दीवारों
से टकरा कर वापिस पलकों में
पेवस्त हो रही थी। कुछ देर
पहले वो कम से कम उठ कर पानी
पीने की स्थिति में तो था लेकिन
अब उसका सारा वजूद उसके काबू
से बाहर था। वो चाह कर भी अपने
बदन में कोई जुंबिश पैदा नहीं
कर पा रहा था। अपनी सारी ताकत
के एवज में वो केवल साँस ले पा
रहा था। तमाम कोशिशों के बावजूद
उसका सारा बदन हाशिए पर था।
अगर कहीं कुछ रवानगी थी, तो
वो उसके ख्यालों में थी, जो
यादों के घोडों पर सवार होकर
अतीत के गलियारों में सरपट
दौड लगा रही थी।
उसके
ख्याल उसके उस गुजरे वक्त की
पडताल कर रहे थे जब उसका सारा
शरीर उसके हुक्म का गुलाम हुआ
करता था। वो जैसे चाहे, उस
पर अपनी हुकुमत चला सकता था।
उसे याद आ रहा था कि कैसे वो
कभी-कभी राह चलते,
खामोशी से अपना सफर
तय कर रही हवा तक से उलझने के
मंसूबे बना लेता। गर्मियों
की दोपहर के दौरान जब धधकता
सूरज आग बरसा रहा होता तो उसकी
ईच्छा होती की वो जाकर उसका
गिरेबान पकड कर उसे झिंझोड दे और
कहे कि जाओ, अपनी
ये गर्मी कहीं और जाकर दिखाओे,
यहाँ अगर रहना हो तो
अपने दायरों में रहो। तब कई
दफा उसका मन करता कि वो बरसात
के दौरान उफनती नदिंयो को
फटकार लगाये और उन्हे उनकी हदों
में रहने की हिदायत दे डालें। वह ये सब तब सोच लेता था जब उसके
शारीर में ताकत थी। लेकिन आज
वो असहाय था। आज प्यास होने
पर पानी की बोतल तक पहुँचने
की सोचना और उस पर अमल करना
उसके लिए सूरज के गिरेबान को
पकडने की सोचने से भी मुश्किल
काम लग रहा था।
उसके
शरीर के सारे के सारे अंग किसी
बगैर सरदार की फौज की तरह बे-
नतीजा कोशिशों के साथ
आखिरी जोर आजमाईश कर रहे थे।
अचानक उसके सारे अंग, उसकी
जिन्दा खाल में एक दूसरे से
समन्वय की नाकाम कोशिश के साथ
हरकत में आये। लेकिन सब व्यर्थ।
वो दरी पर तलवों और सर के बल
कमान की तरह तना और एक झटके के
साथ मुर्दा फर्श पर उसी की
मानिंद अपने दायरों
तक फैल गया। बेजान चीजों के
जखीरे के बीच थोडी देर पहले
जो एक जानदार जात थी, अब
मलवे के ढेर में तब्दील हो गयी
थी।
वह
छत, जिसे दिवारों
ने सर पे उठाया था, वो
अपने आप और भी कई दीवारों
के सर पर सवार थी। वह छत,
जहाँ एक और तो छत थी
वहीं इस छत का दूसरा पहलू फर्श
भी था। कई छतें जिनका दूसरा
पहलू फर्श था, कई
फर्श जिनका दूसरा पहलू छत थी
वो कई और दिवारों के सर सवार
हो एक दूसरे से गुंथते हुए एक
भयानक और दानवाकार दायरा घेरे
हुए एक ऐसी रिहायशी बस्ती थी
जिसमें उसकी तरह, जो
अब मलवे का ढेर था, बहुत
सारे जिन्दा इंसान तमाम
सहूलियतों के साथ उसी तरह
जिन्दा मौजूद थे जैसे कभी वो
हुआ करता था। इस पूरी रिहयशी
बस्ती में रात के सीने पर
कृत्रिम रौशनी ढहाए उजालों
के झुण्ड के झुण्ड जहाँ तक नजर
दौड सकती थी, जमीन
पर रात को दिन किए हुए थे।
पॉश
ईलाके की सोसायटी के आलिशीन
फ्लेटों की बारहदरियाँ,
जो महँगे इत्रों और
लोबानों की खूशबूओं से सरोबार
रहती थी, अचानक भयानक
बदबू के भभके से भर गयी। जब
जीनों से गुज़रना मुहाल हुआ
तो कई दिनों से बन्द पडे फ्लेट
के पड़ौस में रहने वाले मालिक
मकान नें पुलिस को इत्तिला
कर दी। पुलिस आयी। बन्द दरवाज़े
के बावत पास पड़ौस में तफ़तीश
की गयी। बेनतीजा पूछताछ के
बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुँची
कि फ्लैट के अन्दर
कुछ सड़ रहा है।
पुलिस
ने मौका ए वारदात तक पहुँच
बनाने के लिए कई दिनों से बन्द
पडे फ्लेट का दरवाज़ा तोड़
दिया। दरवाज़े के टूटते ही
बदबू का तेज़ भभका बाहर खड़ी
तमाशाई पड़ोसियों के
झुंड में पेवस्त हो गया।
सारा हुजूम तितर बितर हो गया
लेकिन इस सब की परवाह किए बिना,
नथूनों को कपड़े से
ढक कर पुलिस के जवान दरवाज़े
से अन्दर दाख़िल हो गये। अन्दर
कमरे के फ़र्श पर कहानी का
किरदार मरा पडा था और उसके
जिस्म में कीड़े उबल रहे थे।
-सुभाष तराण
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