गुरुवार, 18 मई 2017

–प्रशिक्षण-


बात 1984 के जून या जुलाई महीने की है। 

गर्मी के मौसम के दौरान गाँव के बच्चे, कुछ घर में बता कर और कुछ चोरी छुपे नहाने एवं तैरने हेतु गावं के एक ओर की घाटी में बह रही एक छोटी नदी में जाते थे। मेरे एक बाल सखा थे, भाई मेहरचन्द। हम दोनों में दांत कटी दोस्ती थी। दोनो एक ही कक्षा में पढते थे लेकिन मेहर चन्द मुझ से साल भर बड़े थे तो जहाँ अनुभव की बात आती, मेहर चन्द भाई वहाँ मुझसे इक्कीस होते। शेख चिल्ली और शेख चिल्ली की कहानियों से मेरी वाकफियत मेहर चन्द भाई के माध्यम से ही हुई थी। उनका सुझाव था कि गर्मियों में जहाँ नदी का शीतल जल देह को सुकून पहुंचता है वहीं तैरना अपने आप में एक विशेष हुनर एवं कसरत है। वह एक कुशल तैराक थे। उनके तैराक होने का कारण यह भी था कि उनके परिवार के पास काफी सारी भैंसे थी जिन्हे वो लोग गर्मी के दिनों की दोपहर में गांँव के दूसरी तरफ़ बह रही बड़ी नदी की ओर ले जाते। गर्मी के दौरान परजीवियों से परेशान भैंसों को पानी से बड़ी राहत मिलती है। इसी वजह से मेहर चन्द भाई को इस मामले में बड़ी रियायत थी। वो स्वछंद तरिके से नदी की तरफ़ आ और जा सकते थे। लेकिन मेरे घर से सख्त हिदायत थी कि नदी की तरफ़ जाना तो क्या यदि जाने का सोचा भी गया तो परिणाम वही होंगे जो पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा युवराज विश्वास राव के हुए थे, यानी कि पहले खाल खैंची जाएगी और फ़िर उसमे भूसा भरा जाएगा। 

गाहे बगाहे मेहर चन्द भाई मुझे जल क्रिड़ा के आनन्द का महत्व बताते तो मेरा मन बल्लियों उछल जाता लेकिन पिताजी की चेतावनी याद आते ही मेरी हालत गठबंधन वाली सरकार जैसी हो जाती। एक दिन मेहर चन्द भाई की बातों और उनके हुनर से प्रभावित होकर मैं मुगल शहजादे सलीम की तरह घर वालों की तमाम चेतावनियों को दर-किनार कर उनके साथ छोटी नदी की तरफ़ निकल गया। भाई मेहरचन्द के नेतृत्व में तैराकी सीख़ने का सत्र शुरु हुआ।  लेकिन छोटी नदी में पानी कम होने और पथरीले होने की बजह से मेहर चन्द भाई मुझे तैरना नहीं सिखा पा रहे थे। उनका कहना था कि जब तक पानी  इंसान के डूबने लायक ना हो तब तक इंसान तैरना नहीं सीख सकता। सो, तय यह हुआ कि बगल में जो बड़ी नदी है वहीं जाकर वह मुझे तैरना सिखायेंगे।  

बगल में बह रही नदी टौंस काफ़ी बड़ी है। मेहरचन्द भाई छुट्टी के दौरान अक्सर इसी नदी के किनारे अपनी भैंसों  को लेकर आते रहते थे। गर्मियों के दौरान तेज धूप से पहाड़ों पर जमी बर्फ़ बड़ी तेजी से पिघलने एवं मिट्टी के कटाव के कारण नदी के पानी का स्तर बढा हुआ और मट-मैला होता है।  बड़ी नदी में पहुँचते ही अभ्यास के लिए उचित जगह की तलाश की गई। जगह ऐसी खोजी गई जो नदी की मुख्य धारा से अलग एक चट्टान की आड़ में पानी को एक तालाब का रुप दे रही थी। वहाँ पानी लहरों के रुप मे आता और इसी तरह वापस चला जाता। यहाँ पानी ज्यादा गहरा तो नहीं था लेकिन 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के डूबने के लिए काफ़ी था। एक योग्य प्रशिक्षक की तरह मेहर चन्द भाई ने कई बार प्रयोगात्मक तरीके से चट्टान पर से कूद कर नदी के उस तालाबनुमा हिस्से को आर पार कर तैराकी के प्रति मेरे आत्मविश्वास को लबालब कर दिया। मेहर चन्द भाई के तैरने के तरीके को देख कर मेरे मन में उनके लिए वही भाव थे जो महाभारत काल में अर्जुन के द्रोणाचार्य के लिए रहे होंगे। एक आदर्श गुरु की तरह कुछ आवश्यक निर्देश जारी कर उन्होने मुझे चट्टान पर चढा दिया। डर और रोमाँच के मिले जुले माहौल ने मेरी दशा उस फ़िदाईन के जैसी थी जिसे खुद में बंधा बम फ़ोड़ना था।  भाई मेहर चन्द का ईशारा पाते ही मैनें आँखें बन्द कर छ्लाँग लगा दी।  

पानी में पहुँचते ही मेरा मस्तिष्क मेहर चन्द भाई के सारे दिशा निर्देशों पर अमल कर रहा था, लेकिन एक चूक हो गई। पानी में डूबते ही सांस रोकना भूल गया, नतीजा यह रहा कि पहली बार पानी का फ़ेफ़ड़ों से परिचय होने लगा। तैरना न जानने के कारण डूबते हुए जब नीचे जमीन में मेरे पैर लगते और मैं छटपटाते हुए झटका देकर पानी में से क्षण भर के लिए उपर निकलता तो किनारे खड़ा मेहर चन्द भाई रोते चिल्लाते हुए सुनाई और दिखाई देता। आत्मविश्वास जो कुछ क्षण पहले सर से उपर निकलने को हो रहा था, अब पैरों से भी नीचे प्रतीत होने लगा। हाथ पैरों पर से काबू जाता सा मालूम हो रहा था। जहाँ थोड़ी देर पहले हमारी प्राथमिकतायें तैरना सीखने और सीखाने की थी, वहीं अब जान के लाले पड़ते मालूम हो रहे थे। 

मानो तभी जैसे कोई चमत्कार हुआ। किसी ने मुझे बालों से पकड़ा और पानी से उपर निकाल लिया। यह मेहर चन्द भाई की बड़ी बहन रुक्मणी थी। मेरे होश आते-जाते मालूम हो रहे थे। पानी मेरे फ़ेफ़ड़ों में भर गया था।  किनारे पर मेहर चन्द भाई दहाड़े मार कर रो रहे थे। रुक्मणी बहन मुझे एक बड़े से पत्थर पर लिटा कर मेरे फ़ेफ़ड़ो से पारंपारिक तरीके से पानी निकालने लगी। थोड़ी सी ही देर में सब कुछ सामान्य हो गया। सामान्य इसलिए हो गया था क्योंकि इस बात का किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए कि सुभाष नाम का कोई प्राणी इधर नदी की तरफ़ कभी देखा या सुना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जितने भी इंसान को भावनात्मक रुप से भयादोहन के तरीके हमे मालूम थे, हम दोनों ने रुक्मणी बहन पर इस्तेमाल किए। और अंततः रुक्मणी बहन हमारी इस बात से सहमत हो गई थी  कि यदि वह इस बात का किसी से भी जिक्र करेगी, तो हम दोनों उनके मुँह से यह बात निकलते ही मर चुके होंगे। रुकमणी बहन से भरोसा हासिल हो जाने के बाद हम दोनो के चेहरे पर कुछ ऐसे ही भाव थे जैसे फ़ाँसी की सजा पाए कैदियों के चेहरे पर राष्ट्रपति भवन से सजा माफ़ी का फ़रमान जारी होने के बाद होते है। उस भल-मानस दयालू युवती रुक्मणी बहन की वजह से आज मैं इस दुनिया में हूँ, अन्यथा कभी न पढे जाने वाला इतिहास हो गया होता। दुर्भाग्यवश, उस के कुछ ही दिनों पश्चात रुक्मणी बहन की किसी असाध्य रोग की चपेट मे आने से अकाल मृत्यु हो गयी। जीवन के मुश्किल समय में ईश्वर को तो नहीं हाँ, रुक्मणी बहन को जरुर याद करता हूँ।

सुना है भाई मेहर चन्द अब बड़ी-बड़ी मूँछें रखते हैं और उत्तर प्रदेश सरकार के किसी महकमे में सहायक विकास अधिकारी हो गये हैं। 

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