शुक्रवार, 12 मई 2017

जौनसार बावर - बदलते परिवेश में पारंपरिक त्यौहारों और आजिविका की सार्थकता

हर व्यक्ति के जीवन में मेलों ठेलों और त्योहारों का बहुत महत्व होता है। मेले और त्यौहार किसी भी सभ्यता और क्षेत्र के अतीत को जानने का उत्तम साधन होते हैं। पहाड़ा के जीवन में पैर-पैर पर आने वाली मुश्किलों,  तनाव और पीड़ा को भुलाने का साधन भी यही मेले ठेले और बार त्यौहार होते हैं। दुनिया भर के अलग-अलग समाज अपनी क्षेत्रीय मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार प्रत्येक साल के दौरान पड़ने वाली कुछ ख़ास तारीखों को मेलों ठेलों और बार-त्यौहारों का आयोजन करते है। भारत जैसे बड़े देश में साँस्कृतिक, सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं के चलते हर क्षेत्र और समाज के पारंपारिक उत्सव मनाने के अपने-अपने तौर तरीके हैं। हालांकि देश का शहरी क्षेत्र भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुका है जिसकी वजह से यहाँ त्यौहारों का स्वरुप बदल गया है लेकिन ग्रामीण समाज अभी तक इसी बहाने अपने अतीत की मान्यताओं और परंपराओं को निभाते हुए अपने पारंपारिक उत्सवों को मनाने की कोशिश करता है। भले ही रोजी रोटी के लिए विस्थापित होने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का एक बड़ा तबका और उसकी भावी पीढी शहरीकरण के प्रभाव में आकर अपनी जड़ों से कट गयी हो लेकिन बहुत से प्रवासी अभी भी अपने क्षेत्रीय मेलों-ठेलों और तीज-त्यौहारों के माध्यम से अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की कोशिश में रहते है।  

पूरे भारत में दिवाली कार्तिक माह के दौरान पड़ने वाली अमावस्या के दिन मनाई जाती है लेकिन उत्तराख़ण्ड की राजधानी देहरादून के जन-जातीय इलाके जौनसार बावर के बहुत से गावों के साथ-साथ पूरे महासू क्षेत्र, जिसमें हिमाचल के सिरमौर जिले का भी एक बड़ा हिस्सा शामिल है, यह ठीक एक माह बाद मार्गशीष महीने के दौरान पडने वाली अमावस्या के दिन मनाई जाती है। मौसमी विविधताओं और उंचाई वाले इन ईलाकों में फ़सलों की देरी से आमद को भी इस एक माह बाद मनाए जाने वाली दिवाली का एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। इसी महासू क्षेत्र का बाशिन्दा होने के चलते मुझे भी अपने यहाँ मनाए जाने वाले मेलों ठेलों और बारों-त्योहारों का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। हालांकि मेरे अपने गाँव में यह पारंपारिक पर्व अब नहीं मनाया जाता लेकिन मेरे पडौस के गाँव काँड़ोई-भरम के लोग अभी भी तीन दिन तक चलने वाले इस त्यौहार को बड़े चाव और धूमधाम से मनाते हैं। ख़ेती-बाड़ी और पशु पालन जैसे पारंपरिक पेशों से जुड़े  ख़त भरम के सीधे और सरल लोग मेरे पसंदीदा लोगों में से एक है। इनसे मेरे लगाव का एक कारण इनका पारंपरिक त्यौहारों के प्रति लगाव व चाह भी है। जलसा-पसंद कांडोई-भरम के लोगों के बारे मे हमारे क्षेत्र में एक कहावत प्रसिद्ध है कि "कांडोई का नाणसेऊ, होईसे का भूख़ा", जिसका मतलब यह है कि कांडोई के निवासी, जिन्हे नाणसेऊ कहा जाता है, उल्लास के भूखे होते हैं। ऐसे लोगों के साथ किसी मेले, जलसे या त्यौहार में शिरकत करना अपने आप में एक अनूठे और अद्भुत आनन्द की प्राप्ति जैसा है। इसिलिए मैं पिछले कई सालों से बूढी दिवाली के दौरान हर हाल में इन लोगों के बीच होने की कोशिश करता हूँ। दूर शहर में नौकरी करते हुए पहाड़ के पर्वों में शिरकत करना, वो भी तब जब आपके पर्वों और त्यौहारों के लिए आपके दफ्तर की ओर से कोई अवकाश निर्धारित न हो, अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती होती है।

क्योंकि देश भर में मनाए जाने वाली दिवाली का पर्व इस बार 30 अक्टूवर को था तो मेरा अन्दाजा यह था कि हमारे क्षेत्र में मनाएं जाने वाली बूढी दिवाली 30 नवंबर की रात के अन्तिम पहर से शुरु होगी। पिछले कई सालों से  मेरी यह कोशिश रहती है कि अपने दो चार पहाड़ प्रेमी मित्रों को साथ लेकर चला जाए ताकि वो भी हिमालय के इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के इस अनूठे रंग से वाकिफ़ हो सके। इस बार भी कुछ हम ख़्याल दोस्तों से साथ चलने की बात हुई थी। तय यह था कि 29 नवंबर रात को दिल्ली से निकला जाएगा और 30 नवंबर को गाँव पहुँचा जाएगा लेकिन इस तय शुदा कार्यक्रम में तब ख़लल पड़ा जब 27 तारीख़ को एक रिश्तेदार से यह मालूम हुआ कि बूढी दिवाली तो 29 नवंबर की देर रात से शुरु है। अन्तिम समय में मालूम पड़े इस तारीख़ी फ़ेर बदल ने मेरे सारे कार्यक्रम को सांसत में डाल दिया। साथ चलने को राजी हुए दोस्तों से जब एक दिन पहले चलने की बात की तो उन्होने असमर्थता जताई। कोई साथी न होने के बावजूद भी मैने अकेले ही जाने का मन बना लिया ।  क्योंकि मुझे 29 तारीख को दिल्ली में ही एक जरुरी काम था और इस काम से फ़ारिग होते-होते मेरा आधा दिन खर्च हो जाना था। आधे दिन के बाद दिल्ली से कांडोई-भरम, जहाँ मुझे दिवाली के मेले में शामिल होना था, वहाँ पहुँचने के लिए मेरे पास केवल 12 घंटे थे। इतने समय में दिल्ली से कांडोई-भरम का सफ़र तभी संभव था जब आपके पास व्यक्तिगत वाहन हो। या फ़िर कम से कम विकासनगर से कोई व्यक्तिगत वाहन की व्यवस्था हो। दिल्ली से केवल अकेले के लिए वाहन लेकर जाना अपने आप में बहुत बड़े खर्चे का काम है, लिहाजा विकासनगर में एक मित्र  से वाहन उपलब्ध करवाने की गुजारिश की गई।  

29 नवंबर को लगभग 2  दिल्ली से विकासनगर तक पहुँचने के लिए हरियाणा रोड़वेज की बस ली गयी और वाया यमुना नगर होते हुए पाँवटा साहिब का रुख किया गया। पाँवटा साहिब से विकास नगर लगभग 25 किलो मीटर की दूरी पर है। समय के प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए मैंने मित्र से दरख़्वास्त की कि यदि वह वाहन को पाँवटा साहिब पहुँचवा दे तो मेरी मेले में समय रहते पहुँचने की गुंजाईश और ज्यादा बढ जाएगी। नेक दिल मित्र नें हामी भर दी और अपने ड्राईवर से गाड़ी पाँवटा साहिब बस अड्डे पर ख़ड़ी करवा दी। 2 बजे दिल्ली का चलकर तीन बसें बदलते हुए लगभग साढे आठ बजे रात पाँवटा साहिब पहुँचना हो पाया।  

पाँवटा साहिब से बाद बाकी के सफ़र के लिए मेरे सामने एक सशक्त स्पोर्ट्स यूटीलिटी व्हिकल ख़ड़ा था। मेरी बूढी दिवाली के जलसे में शिरकत करने की संभावनाएं अब प्रबल हो गयी थी। रात गहरा रही थी लेकिन जानदार और शानदार वाहन हाथ में आते ही मेरी ख़ुशी और आत्मविश्वास दोनो चरम पर थे।  बिना देर किए मैंनें पाँवटा से आगे की ओर कूच कर लिया। पाँवटा का यमुना पुल पार कर ही रहा था कि तभी मित्र प्रशान्त का फ़ोन आ गया। प्रशान्त और केप्टन चेतन को मेरे आने की ख़बर पहले से थी। पता चला कि अभी वो दोनो पास में ही मेरे रास्ते में पड़ने वाले कस्बे हर्बटपुर के एक रेसंत्रा में बैठे है और मेरा इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली से निकलने के बाद रास्ते भर जल्दबाजी के चलते पानी पीने तक का ख़्याल नही रहा। फ़िल वक्त मेरा प्यास के मारे गला सूख रहा था और मुझे मामूली सी भूख़ भी लग रही थी। अगले बीस मिनट में हर्बटपुर का वह रेस्टोरेंट मेंरे सामने था जहाँ प्रशान्त और केप्टन चेतन मेरा इंतजार कर रहे थे।

अगले एक घंटे के दौरान प्रशान्त और केप्टन चेतन के साथ गपबाजी के अलावा मेरा गला और तबियत दोनो तर हो चुके थे। थोड़ी बहुत जो भूख़ लगी थी वो उस अल्प आहार की भैंट चढ गई जो साथ के साथ परोसा जा रहा था। लगभग साढे दस बजे के आस पास मैने दोनो दोस्तों से विदा ली, पास ही के पेट्रोल पंप से डीजल भरवाया और  पहाड़ों पर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

हर्बटपुर से लेकर पहाड़ पर स्थित जिस गाँव में मुझे पहुँचना था वहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। मेरे पास सीमित समय था। अमावस की अंधेरी रात में उस सुनसान सड़क पर सफ़र करना, जो ऊँचे पहाड़ों, गहरी खाईयों और जंगलों के बीच से गुजर रही हो, मुझे रोमाँचित कर रहा था। ठीक 11 बज कर 3 मिनट मैनें कालसी गेट पार किया और अगले तीन घंटों के दौरान रास्तें में पड़ने वाले पानी के धारों पर अपना गला गीला करने के अलावा लगातार चलता रहा।

रात का अंतिम पहर पार कर जब दो बजने को हो रहे थे, मैं कांडोई गाँव के सामुदायिक आँगन में था जहांँ तब तक लोग एकत्र होने शुरु हो गए थे। दिवाली के उपलक्ष में निकाले जाने वाले मशाल जलूस के लिए आँगन में ख़ड़े युवा गीत गाते हुए माहौल बनाने में लगे हुए थे। एक परिचित की नजर मुझ पर पड़ी तो वो मुझे बाँह से पकड़ कर अपने घर ले गए। फ़टाफ़ट पीना-खाना किया गया। ठीक ढाई बजे मशाल जलूस के साथ पारंपारिक गीतों पर कांड़ोई के नाणसेऊ मय अपने मेहमानों के झूमकर नाचने लगे। इस मेले में यही वह मौका था जो मेरी स्मृतियों को सदैव रोमांचित करता है। मुझे भी मेरे परिचित ने एक मशाल मुहैया करवा दी थी।   बहुत से नव युवक थे जो इस मौके पर फ़ोटो शूट और विडियोग्राफ़ी कर रहे थे। लेकिन मुझे इसके लिए फ़िलहाल फ़ुरसत नहीं थी। मेरे पास मशाल थी, मैं तो बस ढोल की थाप पर गाए जा रहे पारंपरिक गीतों से लय ताल मिलाते हुए झूमना चाहता था। मशाल जलूस गाँव के उपर वाले हिस्से में बने सामुदायिक आँगन से चलकर जब तक गाँव के निचले छोर पर बने दूसरे सामुदायिक आँगन तक पहुँचा तब तक मैं मय साथियों के पसीने से तर बतर हो चुका था।

उसके बाद फ़िर से पंक्तिबद्ध गीतों का दौर चला जो सुबह रात खुलने के साथ खत्म हुआ। सुबह एक बार फ़िर गाँव के निचले आँगन से, जहाँ रात के अंतिम पहरसे गीत गाए जा रहे थे, एक जलूस की शक्ल में वापिस उसी आँगन की ओर चल दिया जहाँ से रात मशाल जलूस शुरु हुआ था।
एक दिन पहले दिल्ली से लेकर कांड़ोई तक लगातार दौडने और रात भर जागने के कारण मुझे अब जोर की नींद आ रही थी। थकान इतनी थी कि मैं किसी परिचित के घर जाने की बजाय उपर सड़क में खड़ी गाड़ी में जाकर पड़ते ही सो गया।

नींद खुली तो तेज रफ़्तार रात के बाद का सुस्त दिन लगभग आधा गुजर चुका था। दिन के तीन बज रहे थे और भूख़ के मारे बुरा हाल हो रहा था। मैं अब सड़क से नीचे गाँव में नहीं जाना चाहता था क्योंकि वहाँ जाने के बाद मेरे परिचित लोग मुझे फ़िर उस दिन लौटने नहीं देते जबकि मुझे एक दूसरे गाँव कुनुवा जाना था। गाड़ी से बाहर निकला तो सामने एक छोटी सी दुकान दिखाई पड़ी। मैंने वहाँ जाकर बिस्कुट के दो पेकेट लिए और गाड़ी अगले गाँव कुनुवा की ओर दौड़ा दी। थोड़ा आगे चलने के बाद सड़क के किनारे पानी के धारे के पास गाड़ी रोकी और ताजा पानी के साथ भरपेट बिस्कुट खाए। आगे कुनुवा की ओर जाते वक्त सडक के नजदीक पड़ने वाले गाँवों ठारठा और पिंगुआ में भी दिवाली के दूसरे दिन का जश्न चरम पर था। हर गाँव की भांति इन गाँवो में भी युवक एवं युवतियां सामुदायिक आँगन में पंक्तिबद्ध होकर गीत गा रहे थे और नृत्य कर रहे थे। गाड़ी किनारे खड़ी कर मैं भी थोड़ी देर सड़क के किनारे खड़ा होकर उनको  देखता रहा और फ़िर आगे कुनुवा गाँव की और बढ गया।   

कुनुवा में मुझे प्रदीप के घर जाना था। कुनुवा ख़त भरम का सबसे ऊँचाई पर बसने वाला गाँव है। देवदार के जंगल से सटे इस गाँव में एक जमाने के दौरान इस वक्त तक बर्फ़ गिर जाया करती थी लेकिन इस बार तो इस पूरे इलाके में सावन से लेकर अब तक आसमान ने एक बूँद भी नहीं बरसायी है। प्रदीप मेरे गाँव के स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा का छात्र है प्रदीप के घर जाने के कारण के बारे में अगली बार विस्तार से लिखूंगा। 

जब मैं कुनुवा गाँव में पहुँचा तो सूरज ढलने को हो चुका था। गाँव के आँगन में स्वांग कर रहे जोग़टों का नाच चल रहा था। मैने एक युवक से प्रदीप के बारे में पूछा तो उसने झट से प्रदीप को सामने कर दिया।  प्रदीप अपने एक छोटे भाई और इकलौती दस वर्षीय बहन के साथ मेरे गाँव हटाल में रहकर स्कूल पढते हैं जबकि प्रदीप के दो बड़े भाई इलाहबाद में प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी करने के लिए गए हुए हैं। प्रदीप के घर पर उसकी दादी, उसकी माँ और उसके दो पिताजी रहते हैं। प्रदीप के बड़े पिताजी गाय, बैल और बकरियों की देखभाल करते हैं जबकि छोटे वाले पिताजी पास ही के गाँव में शिक्षा मित्र है जो स्कूल के बाद और छुट्टियों के दौरान गाँव में खेती बाड़ी और घर के रोजमर्रा के काम सम्हालते हैं। हाड़-तोड़ मेहनत के बाद प्रदीप का परिवार प्रदीप, उसके भाईयों और बहन को बेहतर शिक्षा दिलवाना चाहता है। शिक्षा मित्र के तौर पर मिलने वाली थोड़ी सी तनख़्वाह के अलावा बच्चों पर खर्च करने के लिए आय के साधन खेत की उपज और पालतू पशु है। आय के इन्हीं स्रोतों के सहारे प्रदीप का परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने देख रहा है। अपने  दो बच्चों को इलाहबाद और तीन बच्चों को घर से अलग रख कर किराए का कमरा लेकर पढाना आर्थिक रुप से कितना  मुश्किल है, सोचा जा सकता है। लेकिन फ़िर भी प्रदीप के परिवार की प्राथमिकता अपने सभी बच्चों को पढा लिखा कर उन्हे सरकारी मुलाजिम बनता हुए देखने की है। वे जानते है कि पहाड़ पर आने वाले समय में पारंपारिक श्रम के सहारे पेट पालना दिन ब दिन मुश्किल होता जाएगा। बेमौसमी सब्जियों, फ़लों, जैविक खेती और उत्कृष्ट पशुपालन के लिए एक आदर्श क्षेत्र होने के बावजूद भी ये लोग नहीं चाहते कि इनकी भावी पीढियाँ अपने पुश्तैनी पेशों से जुड़ी रहें। ख़ेती बाड़ी और पशुपालन को आधुनिक और उन्नत बनाने हेतु वैज्ञानिक प्रयासों के प्रति सरकार की उदासीनता नें पहाड़ के इस समृद्ध पेशे की दुर्गत बना डाली है। क्षेत्र की ऐसी परिस्थितियाँ केवल यहाँ के बाशिन्दों के लिए ही घातक नहीं है, पहाड़ की उस परिस्थितिकी के लिए भी घातक है जिसके नाम पर दिल्ली देहरादून से लेकर पेरिस तक सेमिनार आयोजित किए जाते हैं और तथाकथित कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की एक अच्छी ख़ासी भीड़ पल रही है।  

कुनुवा गाँव में प्रदीप का घर सामुदायिक आँगन के पास ही था। चाय पीने के बाद आँगन का रुख किया गया जहाँ स्थानीय लोग इस मेले में आए मेहमानों के साथ गीत गाते हुए पंक्तिबद्ध होकर नृत्य कर रहे थे।  थोड़ी देर रुकने के बाद, लगभग सात बजे के आस पास मैंने प्रदीप को थकान और नींद हवाला दिया और वापिस उसके साथ उसके घर लौट आया। बेवक्त खाए गए बिस्कुट के कारण भूख लगभग खत्म थी। लेकिन फ़िर भी मैनें थोड़ा- बहुत खाना खाया और सो गया। सुबह उठा और भादों में उनसे फ़िर आने का वादा कर अपने अगले पड़ाव चकराता की ओर चल दिया।

कुनुवा से निकलने के बाद मेरा अगला पड़ाव लीला का गाँव च्यामा था। लीला का गाँव  जौनसार में लाखामण्डल के नजदीक पड़ता है। लीला पंत नगर विश्व विद्यालय से कृषि विज्ञान में डाक्ट्रेट की पढाई कर रही है। वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद लीला मेरी बहुत अच्छी मित्र है। वो  मेरे लिखे हुए को पढती है और मेरा लिखा हुआ अपने पिताजी को भी पढाती है।  लीला ने मुझसे कई बार कहा था कि वो मुझे अपने पिता जी से मिलवाना चाहती है। पिछले दिनों उससे बात हुई तो पता चला कि वो भी बूढी दिवाली के दौरान अपने घर जा रही है।

मेरे पास अभी पूरा दिन बाकी था और मुझे लीला के गाँव जाने के अलावा चकराता में केप्टन चेतन से भी मिलना था। चकराता से लाख़मण्डल को जा रहे सड़क मार्ग पर  ग्वासा पुल के नजदीक केप्टन चेतन का होटल है। जंगलात चौकी पहुँच कर केप्टन चेतन को फ़ोन किया तो पता चला कि वो फ़िलहाल अपने होटल में हैं। 

अगले आधे घंटे बाद मैं केप्टन चेतन के पास था। केप्टन चेतन भारतीय सेना में अधिकारी थे, स्वैछिक अवकाश लेकर आए इस युवा ने अपने पिता और भाई के साथ होटल का कारोबार सम्हाला। मेहमान नवाजी में दक्ष चेतन ने उन्नत और आधुनिक सूचना तकनीक को माध्यम बना कर देश भर के पहाड़ प्रेमी पर्यटकों को अपने इस होटल की ओर आकृषित किया है। यही वजह है कि उनका यह छोटा सा होटल हमेशा सभ्य पर्यटकों से आबाद रहता है।   

भीमकाय काले रंग की चट्टानों को चीर कर उतरते एक हिम युगीन गदेरे के अवशेष के एक ओर पहाड़ी शैली में बने इस भव्य होटल के बगल में केप्टन चेतन की कच्चे फ़र्श वाली साधारण सी रिहायशगाह है। मैं वहीं जाकर पसर गया। मैं पिछले दो दिनों से नहाया नहीं था। कांडोई में दिवाली की रात को धूल भरे आँगन में नाचते गाते हुए मैं पूरा का पूरा धूल से सना पड़ा था। मैने चेतन से नहाने के लिए गर्म पानी की फ़रमाईश की तो उसने तुरन्त गर्म पानी उपलब्ध करवा दिया। गुसलखाने से नहाकर बाहार निकला तो टेबल पर रख़ा लजीज नाश्ता मेरा इंतजार कर रहा था।

नाश्ता करने के दौरान और उसके बाद हमने ख़ूब गप्पें लड़ाई। पर्यावरण को लेकर संवेदनशील रहने वाले केप्टन चेतन की चिन्ताएं पहाड़ के नदी-गदेरों और जंगलों में बेतरतीबी से फ़ैल रहे प्लास्टिक कचरे को लेकर है। केप्टन चेतन अक्सर आस पास के स्कूल के बच्चों साथ मिलकर गाँवो और सड़क किनारे उग आयी बस्तियों, जंगलों और गदेरों से प्लास्टिक कूड़ा एकत्र कर उसे डंप करते रहते है। लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में चेतन का यह प्रयास ऊँट के मुँह में जीरे जैसा है। हमारी बातचीत का सिलसिला काफ़ी देर तक चलता रहा। मुझे लीला और उसके परिवार से मिलने के लिए उसके गाँव की ओर निकलना था। मैंने चेतन से विदा ली और दूर तक फ़ैली विहंगम क्वाँसी घाटी की सर्पीली सड़क पर नीचे की ओर उतरने लगा।

इस रास्ते पर तकरीबन पन्द्रह साल बाद मेरा जाना हो रहा था। मुझे इस रास्ते में पड़ने वाले गांवों, छोटे टोलों और मंजरों के बारे मे कोई विशेष जानकारी नहीं थी।  लीला के जिस गाँव च्यामा मुझे जाना था मैं उसके बारे में अनभिज्ञ था। दोपहर पार हो चुकी थी ऐसे में लीला के गाँव कैसे पहुँचा जाए, इसी उधेड़ बुन में मुझे अपनी एक पुरानी मित्र दीपा याद हो आई जो आजकल इसी क्षेत्र के विभिन्न गाँवों में ग्रामीणो के साथ जीविकोपार्जन के क्षेत्र में काम कर रही है। दीपा को फ़ोन किया तो पता चला कि वो अपनी टीम के साथ उसी तरफ़ के एक गाँव मिंडाल में है जिस तरफ़ से मैं जा रहा था। जिस वक्त मैने दीपा को फ़ोन किया उस वक्त वो अपनी टीम के साथ एक गाँव में ग्रामीणों के लिए चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्यस्त थी। जब मैनें दीपा से लीला के गाँव चलने की गुजारिश की तो उसने इस शर्त पर हामी भर दी कि वो अपना काम खत्म होने के बाद ही वहाँ चल पाएगी । दीपा द्वारा बताए गए नियत स्थान दाँवा पुल पर मैं उन लोगों का इंतजार करने लगा। दिन ढलने को हो रहा था कि तभी दीपा और उसके सहकर्मी वहाँ पहुँच गए और मैं उन लोगों के साथ-साथ लीला के गाँव की ओर चल पड़ा।

हम जब लीला के गाँव च्यामा पहुँचे तब तक अच्छी खासी शाम होने को थी। लीला का गाँव मुख्य सड़क से थोड़ा सा उपर की ओर हट कर एक ताजा खुदे संपर्क मार्ग से जुड़ा है। गाँव में जहाँ सड़क की हद खत्म हो रही थी मैने वहाँ गाड़ी किनारे खड़ी की और लीला को फ़ोन मिला दिया। जब लीला को मैने यह कहा कि मैं तुम्हारे गाँव में ख़ड़ा हूँ तो उसे एक बार को तो इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन जब मैने उससे कहा कि वो फ़टाफ़ट सड़क पर पहुँचे, तब जा कर उसे यकीन आया। कुछ ही देर में चहकती हुई लीला सड़क की ओर आती हुई नजर आने लगी। लीला से मेरी यह पहली मुलाकात थी। सहज और सरल ह्र्दय लीला नें बड़ी गर्मजोशी के साथ हमारा इस्तकबाल किया। वो बहुत खुश नजर आ रही थी।

जनजाति क्षेत्र होने के कारण हाल वक्त तक जौनसार बावर के अधिकतर युवाओं की प्राथमिकता और ध्येय स्नातक स्तर की सरकारी नौकरी हासिल करना होता है। यहाँ ऐसे बिरले ही युवा होंगे जो उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपना हुनर आजमाने की सोचते होंगे। मुझे लगता है कि लीला जौनसार बावर की पहली लड़की होगी जो कृषि विज्ञान में डाक्ट्रेट करने जा रही है।

लकड़ी और पत्थर की जुगलबन्दी से बना लीला का पुश्तैनी घर बहुत ही सुन्दर था। सारे महासू क्षेत्र में थोड़े बहुत बदलावों के अलावा एक समय इसी प्रकार के घर मिलते थे। लेकिन जब से जंगल सरकार नें अपने कब्जे में ले लिए तथा सीमेंट सरिया इस क्षेत्र में.पहुँचने लगा तब से यहाँ के बाशिन्दों नें इस शैली के मकानों को बनाना लगाभग बन्द ही कर दिया है। लीला ने अपने घर पर सबसे पहले हमारा परिचय अपनी दादी से करवाया। लीला की दादी एक ख़ुशदिल और खूबसूरत महिला है। उसके बाद लीला के भाई-बहन और उनकी माँ से मिलना हुआ। उस वक्त लीला के पिता जी घर पर नही थे। लीला परिवार के सभी लोगों से मेरा परिचय अपने अन्दाज में करवा रही थी। लीला के गाँव में भी बीत चुके कल दिवाली का मेला था। जब तक चाय बनकर तैयार हुई, लीला ने तब तक हमारे सामने अखरोट परोस दिये। लीला मुझे अपने पिताजी से मिलवाने हेतु बहुत उत्सुक्त थी। चाय पीते पीते लीला दो बार अपने पिताजी को जल्दी घर पहुँचने के लिए फ़ोन कर चुकी थी। थोड़ी देर बाद लीला के पिता जी भी पहुँच गए। 

लीला के पिताजी से मिलने की मेरी भी दिली तमन्ना थी। हमारे जौनसार में आज भी अभिभावको़ का एक बडा तबका अपनी लडकियों के हुनर और इच्छाओं को दरकिनार कर उनके विवाह की जल्दबाजी में रहता हैं। ऐसे में लीला के पिता का अपनी बिटिया को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित और प्रोहत्साहित करना उनकी प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। जातिवाद और लैंगिक रुढियों में जकडे इस क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति से मुलाकात अपने आप में एक सुखद एहसास था। ऐसे अभिभावक का होना अपने आप में खुशकिस्मती है। जौनसार के समाज और परंपराओं को लेकर काफी देर तक बातचीत करने के बाद मैने लीला के परिवार से विदा ली और आगे बढ गया।

अगला पड़ाव लाखा मण्डल था। शाम को यहाँ दीपा और उसके सह कर्मियों से उनके काम काज को लेकर लंबी बातचीत हुई।

दीपा समग्र आर्थिक विकास परियोजना,एटी इंडिया (एप्रोप्रियेट टेक्नोलॉजी इंडिया) व द हंस फाउंडेशन द्वारा वित्तीय सहयोग से संचालित एक परियोजना के लिए बतौर परियोजना प्रबंधक काम कर रही है।  पिछले वर्ष जुलाई से दीपा अपने विशेषज्ञ सहकर्मियों के साथ कृषि, पशुपालन और बागवानी के क्षेत्र मे चकराता की इस घाटी में कार्यरत हैI इनकी इस परियोजना का उद्देश्य जौनसार के इस क्षेत्र के 60 गांवों में काश्तकारों व उत्पादकों के साथ डेरी, मधुमक्खी पालन व सब्जी एवं बागवानी विकास हेतु रोजगारपरक गतिविधियाँ आयोजित कर उन्हें सतत आर्थिक व सामाजिक विकास प्रक्रिया से जोड़ना है I परियोजना, ए.टी इंडिया के मूल उद्देश्य “पर्यावरण से उद्यमिता विकास” को लेकर  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से  3200 परिवारों के साथ काम कर रही है I इनके द्वारा संगठित 103 स्वयं सहायता समूहों और 67 उत्पादक समूहों के माध्यम से प्रस्तावित गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं। इन्होने हाल तक 1262 स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष रूप से शामिल किया हैं I इनके द्वारा साथ के साथ स्वयं सहायता समूहों में लघु बचत के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे महिलाएं आत्म निर्भर बनें और सामाजिक रूप से भी उनकी स्थिति में सुधार आये I


इस परियोजना के तहत डेयरी विकास एवं पशुपालन को बेहतर आर्थिकी का माध्यम बनाने के लिए भी ग्रामीणो को प्रेरित किया जा रहा है जिससे वे पशुपालन का दोहरा लाभ प्राप्त कर पायेंI पशुपालन खेती के लिए तो सहयोगी हैं ही यदि दुग्ध उत्पादन की मात्रा बढे तो दूध बेचकर भी आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है I उत्पादक समूह से जुड़े उत्पादकों को कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से उन्नत नस्ल की गाय या भैंस की प्रजाति विकसित करने हेतु क्षेत्र के युवाओं को उत्तराखंड लाइव स्टॉक डेवलपमेंट  बोर्ड द्वारा 4 माह का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे वे भविष्य में क्षेत्र के उत्पादकों को अपनी सेवाएं प्रदान कर स्वयं के लिए भी रोज़गार के अवसर पैदा कर पायेंI इन लोगों को भरोसा है कि जल्द ही इस क्षेत्र की महिलाएं उन्नत पशुपालन से उत्पन्न दूध को प्रस्तावित दुकान के माध्यम से बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर पाएंगीI   

कृषि, पशुपालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी की उन्नत और आधुनिक तकनीकों और जानकारी से लेस समग्र आर्थिक विकास परियोजना की यह टीम और इनकी यह संकल्पना पहाड़ के परंपरागत अर्थ तंत्र को पुनर्जीवित करने  का काम कर सकती है। अगर यह लोग अपने मिशन मे सफल होते है तो इस क्षेत्र का सांस्कृतिक और सामाजिक ताना बाना, जो नौकर परस्त शिक्षा प्रणाली के चलते अपनी पहचान खोने की कगार पर पहुँच चुका है, अपनी सार्थकता साबित कर सकता है। जौनसार बावर का हर त्यौहार किसी दैवीय योग से नही बल्की पशुपालन और कृषि जैसे पारंपारिक व्यवसायों से जुड़ा हुआ है। ऐसी परियोजनाएं यदि अपने उद्देश्य में कामयाब हो जाती है तो लोग अपने पारंपरिक व्यवसायों के आधुनिक और उन्नत हो जाने से अपनी जड़ो से जुड़े रहेंगे और क्षेत्र के पारंपारिक त्यौहार, रिति रिवाज भी अपने मूल रुप के साथ बचे रहेंगे। लेकिन यह तभी स़भव होगा जब क्षेत्र के राजनीतिक और सामाजिक अगुआ समग्र आर्थिक विकास परियोजना के इन दक्ष कर्मियों का सहयोग करेंगे। 

इस प्रकार की योजनाएं इस क्षेत्र के लिए ही नही बल्की पूरे जौनसार बावर के निवासियों के लिए वरदान साबित हो सकती है। ऐसी ही परियोजनाएं लीला, प्रदीप या उसके जैसे युवाओं को पढ लिख जाने के बावजूद भी अपने पारंपारिक जीविकोपार्जन के प्रति गौर करने को प्रेरित कर सकती है। ऐसी परियोजनाओं की उपलब्धि यह होगी कि जौनसार बावर के युवा महानगरों की भीड़, भागदौड़ और प्रदूषण, जिसकी हालिया उपलब्धि अनेकों जानलेवा बीमारियां है, की बजाय जीवन यापन के लिए गाँव की शांत और साफ सुथरी आबो हवा को चुन सकते हैं।  लेकिन वर्तमान में जौनसार बावर की बड़ी समस्या जनप्रतिनिधियों की ठेकेदार मानसिकता है। राजनीतिक मूल्यों मे हो रही लगातार गिरावट के चलते आबाद हुई मुफ्तखोरी की लत ने भी क्षेत्र के लोगों को काहिल बना दिया है।  'हम क्या हासिल कर सकते हैं' की बजाय 'मुझे क्या मिलेगा' जैसी मानसिकता के चलते इस परियोजना के कर्मियों को क्षेत्र में काम करने में कठिनाईं हो सकती है क्योंकि यहाँ  सरकार की तरफ से गरीब गुरबों और दलितों की तरफ आने वाली हर ईमदाद यहाँ के अधिकतर अर्द्ध शिक्षित ठेकेदार जन प्रतिनिधि, नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों की मिली भगत से कागजों में ही ठिकाने लगा देते हैं। मैं जौनपुर रवाँई और बावर जौनसार के ऐसे बहुत से तथाकथित किसानों को जानता हूँ जो फाईलों में फसल उगा कर सरकार की तरफ से मिलने वाले अनुदान और ईनाम ईकराम देहरादून में ही कागजी खेल खेलकर झटक लेते है। ऐसे में इस परियोजना की सफलता को लेकर अभी से किसी नतीजे पर पहुँचना अपने आप में जल्दबाजी होगी। 

अगले रोज अल सुबह आर्थिक विकास परियोजना की परियोजना प्रबंधक दीपा और उसके सहकर्मियों को उनकी मेहमान नवाजी का शुक्रिया अदा करते हुए विदा ली और बर्नीगाड़ के रास्ते उस भरोसेमन्द वाहन पर सवार होकर वापसी की राह पकड़ ली जो खराब से खराब रास्ते को आसान तथा आरामदायक बनाता है और किसी बुज़ुर्ग की तरह रोज सुबह सफर शुरू करने से पहले जरूरी हिदायतों के साथ-साथ सीट बेल्ट नजर अंदाज करने या दरवाज़ा खुला रहने जैसी ग़लतियों पर डपट भी देता है।

-सुभाष तराण

10 टिप्‍पणियां:

  1. यात्रा-वृतांत को लिखने में दिन-ब-दिन निखार आ रहा है सुभाष जी, प्रवाह बना रहे ।

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  3. सुभाष जी पूरा आलेख पढ़ा - यात्रा वृतांत के रूप में - शुरू से आखिर ऐसा लगा जैसे मैं मीनस के रस्ते - इशाली और गोरा घाटी से लाखामंडल होते हुए आपके साथ चीड देवदार की खुशबू, पांवों में रेतीला लेकिन चमकीला कीचड लिए - त्योहारों की उत्सवधर्मिता के साथ यहाँ डेस्क टॉप पर आ चिपका हूँ . आपने कम्मल लिखा पढ़ा तो पढ़ता ही चला गया .मजा आया. सुंदर प्रभाव पूर्ण.,

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  4. गजब, बेहतरीन यात्रा वृतांत, इतना लंबा पढ़ने का आदी नहीं हूं, फि‍र भी थोड़ा छोड़ छोड़ कर पढ़ता रहा। इस तरह के वृतांत आने वाले समय के लि‍ए धरोहर साबि‍त होंगे। शुभकामनाएं

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  5. क्या रफ़्तार थी यात्रा और कहानी में । सच कहूं तो शुरू में ऐसा लगा जासूसी कहानी पढ़ रहा हूँ , जब तक आप गांव नही पहुच गए । समय की कमी और पहुंचने की ललक साफ दिखी ।
    नयी जगह की जानकारी और त्योहार के बारे में मालूमात तो है ही ।
    दुःख बस इसी बात पे है कि वहाँ की समस्याएं जस के तस वैसे ही है बल्कि बढ़ ही गईं है , जो शायद जानबूझ कर किया जा रहा है ।
    धन्यवाद इतने सुंदर लेख के लिये ।

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  6. बहुत बढ़िया सुभाष जी हमारे हिमाचल से सटा होने के कारण मुझे वृतांत रिचक लगा ।

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  7. a little too much of appreciation! Loved reading the whole article, though not much of a reader. Keep up the good work and make us read...All the very best!

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  8. The luminosity of the festival is felt reading every portion of the article that describes how meaningful an event can be. A lot indicating and educating story. Thanks for sharing your experience

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  9. जौनसार बाबर की सेर करवा दी आपने । रोमांच युक्त यात्रा रही आपकी, उम्मीद है आगे भी रोमांच रहेगा।

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  10. बहुत बडिया यात्रा वृतान्त लिखा है भाई पढना शरू किया तो लम्बा लेख होने के वावजूद भी पूरा पढे़ बिना नही रह सका और मैं स्वयं उस क्षेत्र का निवासी होने के नाते मुझे आपके यात्रा वृतान्त समझने में भी कोई दिक्कत नही हुई !पढ़ते वक्त लग रहा था कि मैं स्वयं उन पगडंडियों पर चल रहा हूँ !!
    भाई आप ऐसी व्यस्तता भरी जिन्दगी में भी अपने पहाड के त्यौहार के समय निकाल लेते हो उसके लिये आपको सलाम करता हूँ!!

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