कलकत्ते
के लिऐ जाने वाली रेल राजधानी के कूपे में दफ्तर के बक्से को बर्थ के नीचे ठूंस कर
दम लेने को बैठा ही था कि मोहन सिहं रावत का फोन आ गया। मोहन सिहं रावत महादेवी सृजन
पीठ, रामगढ में शोध अधिकारी है और वहाँ होने वाली साहित्यिक गतिविधियों का संचालन करते
हैं। उनसे बात हुई तो मालूम पड़ा कि महादेवी सृजन पीठ, रामगढ, 27-28 अप्रैल को अमृतलाल
नागर के जन्मशती वर्ष के उपलक्ष में एक साहित्यिक गोष्ठी आयोजित करने जा रहा है जिसमे
साहित्यिक अभिरूचि रखने वाले रचनाकारों को बुलाया जा रहा है। कार्यक्रम मे निमंत्रण
के अलावा उन्होने मुझे मंगलेश दा को अपने साथ रामगढ तक लाने की व्यवस्था का जिम्मा
भी सौंप दिया । नौकरी के सिलसिले में दिल्ली से निकलना हो ही रहा था। लेकिन खुशी इस
बात की थी कि महादेवी सृजन पीठ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की तारीखें मेरे लौट आने
के बाद की थी।
महादेवी
सृजन पीठ द्वारा आयोजित कार्यक्रम की तारीखों के दौरान मंगलेश दा को मुंबई जाना था।
वे महादेवी सृजन पीठ के निमंत्रण मिलने से पहले ही मुंबई में आयोजित होने वाले साहित्यिक
सम्मेलन में शामिल होने की हामी भर चुके थे। अब जाने वाला मैं अकेला ही था। गोष्ठी
की नियत तिथी से एक रोज पहले मैने दिल्ली से काठगोदाम के लिए रात को निकलने वाली रानीखेत
एक्सप्रेस से रवानगी ली। काठगोदाम तक के सफर के बाद रामगढ तक के सफ़र के लिए मोहन सिहं
रावत एक दिन पहले ही बता चुके थे कि देहरादून से आने वालों का एक जत्था भी रामगढ की ओर
रवाना हो रहा है, लिहाजा अगली सुबह उस जत्थे का इंतजार कर मैं भी उन सबों के साथ पीठ
द्वारा उपलब्ध वाहन में लद कर रामगढ पहुँच जाऊँ। रेलवे की समय सारणी के अनुसार जहाँ
दिल्ली से चली रानीखेत एक्सप्रेस को सुबह पाँच बजे काठगोदाम पहुँचना था वहीं देहरादून
वाली गाड़ी के काठगोदाम पहुँचने का समय सात बजे का था। रेलवे के तयशुदा समय के अनुसार
मुझे देहरादून से काठगोदाम पहुँचने वाली गाड़ी से कम अस कम एक घंटा पहले वहाँ पहुँच
जाने का भरोसा था, सो मैं बे फिक्र होकर सो गया।
अगले
सुबह लगभग छ: बजे के आस पास जब नींद खुली तो मालूम पड़ा कि अपनी रेल तो अभी मुरादाबाद
ही पहुँच पायी है। हड़बड़ाहट की स्थिति में मैंने वक्त की नजाकत को देखते हुए देहरादून
से चले जत्थे में शामिल साथी को फोन किया। पता चला कि उनकी गाड़ी भी देर से चल रही है
और उनके भी लगभग नौ बजे के आसपास काठगोदाम पहुँचने की संभावनाएं हैं। खुद को साथ ले
चलने की गुजारिश करते हुए मैने उन्हे अपना ताजा हाल बंया कर डाला। उन्होने भरोसा दिया
कि मेरा हर हालत में इंतजार किया जाएगा। मुरादाबाद के बाद रानीखेत एक्सप्रेस जैसे-तैसे
रुकती-पड़ती अगले चार घंटों में काठगोदाम लग पायी।
स्टेशन
पर उतरते ही देहरादून से चले साथी को फोन किया तो पता चला कि वे लोग तो रामगढ के लिए
निकल चुके हैं। साथी से इंतजार न करने का कारण पूछा तो वे कहने लगे कि पीठ में आयोजित
होने वाले कार्यक्रम के शुभारंभ के अवसर पर राज्य सरकार के एक मंत्री और स्थानीय विधायक
पधार रहे हैं और हमारे जत्थे के साथ आए एक लेखक महोदय को वहाँ जाकर मंच संचालित करना
है। इसलिए उनके पास इंतजार का समय नही था। दोनो गाड़ियों के काठगोदाम पहुँचने का अंतराल
बहुत मामूली सा था लेकिन मेरी समझ मे यह अच्छी तरह से आ गया था कि आगे चलने वालों के
लिए रास्तों में पीछे छूटे हुए को साथ ले चलने की बजाय राजनेताओं की मौजूदगी में मंच
के संचालन की ज़िम्मेदारी ज्यादा मायने रखती है। खैर, दुनियां में सवेंदनशीलता के अपने-अपने
मापदण्ड है। ख़ुद की खिसियाहट पर तस्सली का मरहम लगाते हुए मैं अब स्टेशन के बाहर ख़ड़े
टैक्सी वालों से रामगढ पहुँचने के लिए सार्वजनिक परिवहन की मालूमात करने लगा।
रामगढ
कुमाऊँ के सुदूर जिला मुख़्यालयों को जाने वाली मुख्य सड़कों से हटकर है। रामगढ जाने
के लिए इस बे वक्त समय में सार्वजनिक परिवहन की गुंजाइश न के बराबर थी। घंटे भर क़ी
मशक्कत के बाद थक हार कर रामगढ में रहने वाले अपने एक मित्र को फोन कर अपनी ताजा स्थिति
से अवगत करवाया।
दस
मिनट भी नही गुजरे होंगे, सामने एक चमचमाती कार आकर खड़ी हो गयी और ड्राईवर ने बा-अदब पूछा,
'आप
पृथ्वी सर के गेस्ट है?'
लेखन
के इस शगल ने भले ही जीवन में सोशल मीडिया से लेकर आम जीवन तक ट्रोलों, आलोचकों और
गरियाने वालों की एक बड़ी भीड़ खड़ी कर दी हो लेकिन इसी लेखन के चलते मुझे दोस्तों का
जो शानदार जखीरा हासिल हुआ है वो मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है। दुनिया का बड़ा
से बड़ा ईनाम ईकराम भी मेरे दोस्तों के इस जखीरे के आगे फीका है। मैने अपनी गुजर चुकी
उम्र में कभी कल्पना नही की थी कि कभी मेरे वैचारिक दृष्टिकोण के चलते कोई भला मानुस
मुझे हवाई जहाज के बिजनेस क्लास की टिकट मुहैया करवा देगा। लगभग हर सप्ताहंत के दौरान
दिल्ली से पहाड़ की तरफ निकलते ही ऐसे दोस्तों को कहने भर की देर होती है, उनकी दो पहिया
और चार पहिया गाड़ियाँ मय चने-चबैने के जहाँ के लिए कह दिया जाय, वहाँ खड़ी मिल जाती
है। यह मेरी खुश किस्मती है कि मेरे ऐसे ही शुभ चिंतकों की बराय मेहरबानी से हिंदोस्तान
भर के किसी भी शहर, कस्बे और गाँव में रहने और खाने के इंतजाम आसानी से हो जाया करते
है।
आधे
गुजर चुके दिन के बाद रामगढ पहुँचा तो पृथ्वी को इंतजार में बैठा पाया। सबसे पहले चाय
पी। उसके बाद नाई से हजामत करवाई और पंच स्नान कर महादेवी सृजन पीठ की ओर प्रस्थान
किया।
पीठ
के बाहर सबसे पहले मिलने वाला व्यक्ति कुमांऊ का ख्यातिलब्ध रचनाकार डाक्टर अनिल कार्की
था।
सभी
आमंत्रित मेहमानों के खाने और ठहरने की व्यवस्था एक होटल में की गयी थी। पीठ परिसर में
अनिल के माध्यम से संदीप तिवारी से परिचय हुआ। मूल रुप से फ़ैजाबाद, उत्तरप्रदेश के
रहने वाले संदीप नैनीताल में रहकर पीएच डी कर रहे हैं। हम तीन लोगों ने मिलकर एक झुण्ड
बना लिया और मेजबानों द्वारा उपलब्ध कराए गए होटल के एक कमरे पर काबिज हो गये।
मित्र
पृथ्वी और उसका परिवार शुद्ध शाकाहारी है, बावजूद इसके उसने रात के लिए हमारे मन पसन्द
ख़ाने की व्यवस्था करवा दी थी। पृथ्वी चाहता था कि हम भी उसके घर चले लेकिन
अपनी तामसिक भोजन प्रवृति के चलते मैने उससे सुबह उसके घर आने की कह कर रात होटल में
ही ठहरने की इजाजत मांग ली।
रात
खाने पीने के बाद कविताओं का दौर शुरु हुआ। अनिल की फ़रमाईश पर संदीप नें स्व रचित कविताएं
सुनाई। लड़का क्या कविताएं कहता है । कमाल! संदीप की 'वाह पेसेंजर' शीर्षक वाली कविता नें तो मन ही मोह लिया। दो भागों वाली यह कविता अपने आप में दुनियां भर के
शहरों को गाँव कस्बों से जोड़ती पेसेंजर गाड़ियों का समाज शास्त्र है। कविता का कुछ अंश आपके लिए प्रस्तुत हैः
काठ की सीट पर बैठ के जाना
वाह पसिन्जर जिंदाबाद
बिना टिकस के रायबरेली
बिना टिकस के फ़ैज़ाबाद
हम लोगों की चढ़ी ग़रीबी को सहलाना
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।
हाथ में पपेरबैक किताब
हिला-हिलाकर चाय बुलाना
रगड़ -रगड़ के सुरती मलना
ठोंक -पीटकर खाते जाना
गंवई औरत के गंवारपन को निहारना
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।
तुम भी अपनी तरह ही धीरे
चलती जाती हाय पसिन्जर
लेट-लपेट भले हो कितना
पहुंचाती तो तुम्ही पसिन्जर
पता नहीं कितने जनकवि से
हमको तुम्हीं मिलाती हो
पता नहीं कितनों को जनकवि
तुम्हीं बनाते चली पसिन्जर
बुलेट उड़ी औ चली दुरन्तो
क्योंकि तुम हो खड़ी पसिन्जर
बढ़े टिकस के दाम तुम्हारा क्या कर लेगी ?
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।
छोटे बड़े किसान सभी
साधू, संत और सन्यासी
एक ही सीट पे पंडित बाबा
उसी सीट पर चढ़े शराबी
चढ़े जुआड़ी और गजेंड़ी
पागल और भिखारी
सबको ढोते चली पसिन्जर
यार पसिन्जर तुम तो पूरा लोकतंत्र हो !!!!!
सही कहूँ ग़र तुम न होती
कैसे हम सब आते जाते
बिना किसी झिकझिक के सोचो
कैसे रोटी- सब्जी खाते
कौन ख़रीदे पैसा दे कर 'बिसलरी'
उतरे दादा लोटा लेकर
भर के लाये तजा पानी
वाह पसिन्जर ...................
तुम्हरी सीटी बहुत मधुर है
सुन के अम्मा बर्तन मांजे
सुन के काका उठे सबेरे
इस छलिया युग में भी तुम
हम लोगों की घड़ी पसिन्जर
सच में अपनी छड़ी पसिन्जर
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।
भले कहें सब रेलिया बैरनि
तुम तो अपनी जान पसिन्जर
हम जैसे चिरकुट लोगों का
तुम ही असली शान पसिन्जर
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।
गाँव गाँव में रोक रहे हैं
फिर भी न घबराए पसिंजर
मस्त चाल में नागिन जैसे
चलते न शरमाए पसिंजर
दिल अपना खुश हो जाता है
जब-जब मुंह बिचकाए पसिंजर
गठरी लाठी चना-चबैना
दूध दही ले जाए पसिंजर
मरने पर जब ऊपर जाऊँ
नरक में भी मिल जाए पसिंजर।
अगले
रोज अपने पहाड़ी स्वभाव के अनुरुप अनिल सुबह ही जाग गया और नहा धोकर हमे भी जगाने लगा।
अनिल के हुड़दंग मचाने से मेरी नींद तो उचट गयी लेकिन संदीप के कान पर जूँ तक न रेंगी।
अनिल की इस हुड़दंग ने गर्मियों के दौरान रामगढ की सर्द सुबह में नींद का मजा किरकिरा
कर दिया । नींद से गया तो मैं भी गुसलखाने के हवाले हो गया। नहा धोकर लौटा
तो अनिल को कमरे से नदारद पाया लेकिन संदीप अब भी लंबी ताने सो रहा है। मैं चाय की
तलब के मारे कमरे से निकल कर नीचे रेस्टोरेंट की तरफ निकल आया।
सीढियां
उतरने को हुआ तो सामने गीता दीदी नजर आयी। वो भी चाय के लिए ही निकली थी। हम चाय के
लिए रेसंत्रा में आ गये। दीदी ने रेसंत्रा में पहले से विराजमान दिल्ली से आए साहित्यिक
सूरमाओं से परिचय करवाया। जब तक चाय बनकर तैयार हुई तब तक मय केमरे के अनिल भी आ गया।
चाय पीते-पीते ही अनिल फिर से गायब हो गया। मुझे मालूम था कि प्रकृति प्रेमी अनिल आस पास में पहाड़ की सुबह
के विभिन्न दृश्यों को मय पंखेरुओं के कैद करने में व्यस्त होगा। मैने दीदी से पृथ्वी
के घर जाने का रास्ता जानना चाहा। एक रोज पहले दीदी और बेटा गोलू भी पृथ्वी के
मेहमान थे। उन्होने मुझे गोलू से कहकर अपनी गाड़ी से नीचे मुख्य सड़क तक छुड़वा दिया।
गोलू ने मुख़्य सड़क के बाद का रास्ता मुझे मुँह जुबानी समझा दिया।
एक
जीप कद रास्ता मैदानी ईलाकों के रईसों की आलिशान आरामगाहों, स्थानिकों के घर-मकानों,
बागीचों को जोड़ता, खेतों से होता हुआ आगे बढा जा रहा था। तकरीबन पंद्रह मिनट पैदल चलने
के बाद मैं बादाम के बागीचे के बीचोंबीच स्थित पृथ्वी के घर पर था। पृथ्वी ने मुझे
देखा तो भौंचक्का रह गया। पृथ्वी ने मेरा परिचय लक्ष्मी से करवाया। मेरी जानकारी में
पृथ्वी दुनिया का ईकलौता ऐसा आदमी है जो अपने नाम के साथ अपनी पत्नी का नाम जोड़ कर
लिखता है। हम लोग बातचीत कर ही रहे थे कि इतनी देर में कमल दा कैमरा गले में लटकाए
सीढियां उतरते दिखे।
अगला
पड़ाव नाश्ते की टेबल था।
भरपेट
नाश्ता करने के बाद मैने और कमल दा ने लक्ष्मी से विदा ली और पृथ्वी के साथ महादेवी
सृजन पीठ की ओर लौट आए।
यह
गोष्ठी का अंतिम दिन था। अनिल के सुझाव पर हमारी राय यह कायम हुई कि आज की रात उसके
साथ नैनीताल में गुजारी जाएगी। कार्यक्रम के समापन के बाद हमने पृथ्वी से विदा
ली और अनिल की मोटर साईकिल पर सवार होकर नैनीताल की तरफ हो लिए। रामगढ का मेरा यह तीसरा
चक्कर था। अनिल कहने लगा कि वह मुझे चाय बागान के रास्ते लेकर जाएगा। मेरे लिए यह नई
लेकिन एक शानदार ड्राईव थी। अनिल मुझे रास्ते में पड़ने वाली जगहों के बारे में विस्तार
से बताते जा रहा था। नैनीताल पहुँचने को हुए तो अनिल ने मोटर साईकिल किनारे रोककर सामने
शहर के बाद के उतरते पहाड़ की ढलान पर उधड़ी जमीन से निकलती पानी की धार को दिखाते हुए
कहा,
'दाजी,
यह देखो, नैनीताल की झील के पानी के कम होने का कारण।'
थोड़े
आगे बढे तो उसने मेरा नैनीताल के श्मशान से परिचय करवाया। अपने अंदाज में कहने लगा,
'दाजी, अपना गिर्दा अब यहाँ रहता है।'
'दाजी, अपना गिर्दा अब यहाँ रहता है।'
जरा
सा आगे बढते हुए उसने पक्की कब्रगाहों की ओर ईशारा किया और कहने लगा,
'यह कब्रगाहें पहले विश्वयुद्ध के दौरान की है।'
'यह कब्रगाहें पहले विश्वयुद्ध के दौरान की है।'
नैनीताल
में अनिल की रिहायशगाह पहुँचते-पहुँचते अच्छी खासी शाम हो चुकी थी। अनिल का घर नैनीताल
कालेज परिसर के बिलकुल करीब में है। उसने अपने घर का दरवाजा खोला तो मैं हक्का बक्का
रह गया। सिवाय किताबों के भारी भरकम जखीरे के बाकी सब कुछ बिखरा पड़ा था। मुख्य दरवाजा
पार करते ही कोने में दो कुर्सिया एक निकले कद की टेबल के पीछे दुबकी पड़ी थी। जबकि
टेबल मय लेपटॉप के बहुत से इलेक्ट्रिक उपकरणों को बेतरतीबी के साथ अपने उपर लादे हुए नजर आ रहा था।
एक तरफ पड़ा ईकलौता सोफा अपनी सलवटों और उधड़े रोगन को छुपाते हुए खुद को सभ्य दर्शाने
की कोशिश कर रहा था। चार बाई छ: का दीवान, बिस्तर और कंबल समैत बाकियों की अपेक्षा थोड़ा
सा अनुशासित मालूम पड़ रहा था। कमरे के एकदम बीच में एक झाड़ू धोखे से मारे गये किसी
बहादूर योद्धा की तरह धराशायी पड़ा था। दूसरे कमरे की भी कमोवेश यही स्थिति थी। किताबें
यहाँ भी करीने से रखी हुई थी। आगे रसोई थी जहाँ अधिकतर बर्तन भगदड़ में मारे गए नीरिहों की तरह औंधे मुँह गिरे पड़े थे।
बगल में गुसलखाने की स्थिति बाकी घर की अपेक्षा बेहतर थी। अनिल के इस घर की एक बड़ी
खासियत उसके घर का चबूतरेनुमा आंगन है जहाँ से एक नजर में लगभग पूरे नैनीताल
को मय झील के देखा जा सकता है। बकौल अनिल उसे यह घर इसिलिए बहुत प्रिय है।
बहरहाल, मौके का मुयायना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि एक लेखक का घर ऐसा ही होना चाहिए जिसमे हर जीव को आने जाने की छूट हो। रचनाकार तो प्रकृति का साधक होता है, उसे अपने मामले में दीन दुनिया से परे का होना चाहिए।
बहरहाल, मौके का मुयायना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि एक लेखक का घर ऐसा ही होना चाहिए जिसमे हर जीव को आने जाने की छूट हो। रचनाकार तो प्रकृति का साधक होता है, उसे अपने मामले में दीन दुनिया से परे का होना चाहिए।
जब
तक मै अनिल के घर बाहर की सरसरी पड़ताल कर फारिग हुआ वह चाय बनाकर ले आया। चाय बिलकुल
उसके व्यक्तित्व की तरह थी। एकदम लाजवाब।
चाय
से फारिग हुए तो मैने अनिल से अपने जानकारों मिलने की ईच्छा जताई। समय थोड़ा था, लेकिन
मन था कि नैनीताल के सभी जानकारों से मिला जाय। फोन पर मालूमात का सिलसिला शुरु किया
तो अधिकतर नंबर या तो बंद मिले या कवरेज क्षेत्र से बाहर। केवल विनीता से बात हो पायी।
एक अन्य मित्र रजनीश से बात हुई तो पता चला कि वो शहर मे नही हैं, मैने जब उसे अपने
नैनीताल में होने की खबर दी तो वे मुझे अपने घर हो आने को बोल गये। अनिल को घर पर ही छोड़कर मैं पहले विनीता से मिलने निकल पड़ा। शहर में
नया होने के चलते मैने विनीता से गुजारिश की कि वो मुझे मित्र रजनीश के द्वारा दिए
गये पते पर उसके घर तक ले चलें। हम दोनो रजनीश के घर पहुँचे ही थे कि अनिल का
फोन आ गया। कहने लगा, मित्र के घर से जब निकलो तो सीधे मस्जिद के पास आ जाना।
रजनीश
के घर चाय पीकर हमने उसके परिवार से विदा ली और सीधे मस्जिद के एक छोर पर बनी चाय की
दुकान पर आ गये जहाँ अनिल और संदीप अपनी मित्र मंडली के साथ बैठकी जमाएं हुए थे।
यहीं पर अनिल ने भारती से मेरा परिचय करवाया । अनिल भारती के व्यक्तित्व को लेकर पहले
भी जिक्र कर चुका था। अनिल ने बताया था कि जब उसे नैनीताल पुलिस ने सत्यापन के नाम
पर थाने पर तलब किया तो इस खबर सुन कर थाने में सबसे पहले पहुँचने वाली शख्सियत भारती
ही थी।
काफी
देर की गप्पबाजी के बाद संदीप और उसके दोस्तों से विदा ली गयी और हम चारो लोग वहाँ
से बस अड्डे की ओर रवाना हो गये जहाँ हमे महेश दा से मिलना था।
नैनीताल
की शाम अब गहरा कर रात हो चुकी थी। महेश दा से मुलाकात के बाद विनीता, भारती और
महेश दा से विदा लेकर अनिल और मैं उसके घर की ओर हो लिए।
घर
में घुसते ही अनिल खाना बनाने की तैयारी में जुट गया। गोश्त को धोया गया, प्याज कटी और कई किस्म के पारंपरिक हिमालयी मसालों पर सिलबट्टा खड़खड़ाने लगा। एक दक्ष खानसामे की
तरह थोड़ी सी देर में अनिल ने सलाद समैत सब कुछ सजा बजा कर टेबल पर तैयार कर दिया।
नैनीताल
के शांत और शीतल वातावरण में गीत बात के साथ खाने पीने का दौर शुरू हुआ। अनिल के पसंदीदा
जन कवि केसरी धर्मराज थापा सहित अनेकों नेपाली लोक गायकों को चाव के साथ सुना गया।
मेरी यह एक मात्र उपलब्धि है कि मुझे अपनी दूधबोली और हिंदी के अलावा नेपाली भी बहुत
अच्छे से समझनी और बोलनी आ जाती है। लोक संगीत के इस जश्न में अनिल की मेहमान नवाजी
ने चार चाँद लगा दिए।
अगले
रोज वापसी थी। अनिल अल सुबह मुझे छोड़ने बस अड्डे तक आया। बस अड्डे पहुँचे तो सामने
बस तैयार खड़ी थी। बस चलने को हुई तो अनिल ने आत्मीयता के साथ मुझे गले लगाया और अपने
घर की ओर पलट गया।
बहुत अच्छा लिखा है जो तुम लिखते हो हमेशा पर जब भी यात्राओ पर लिखो स्थानीय जानकारी वो कुछ भी जो तुम्हे रुचिक लगे जरूर लिखने की कोशिश करना।जैसे गिर्दा के बारे में जरा सी बात,कब्रो के बारे में चैबागं के बारे में,लिखते तो मजा आ जाता
जवाब देंहटाएंदीदी, मैं जगह और लोगों को समझने के मामले में थोड़ा सुस्त रफ़्तार जीव हूंँ, स्थानीय जानकारी के लिए मुझे समय चाहिए होता है। क्योंकि प्रवास का समय बहुत थोड़ा था, सो, जो देख़ा, सो लिख़ा।
हटाएंबहुत अच्छा लिखा है जो तुम लिखते हो हमेशा पर जब भी यात्राओ पर लिखो स्थानीय जानकारी वो कुछ भी जो तुम्हे रुचिक लगे जरूर लिखने की कोशिश करना।जैसे गिर्दा के बारे में जरा सी बात,कब्रो के बारे में चैबागं के बारे में,लिखते तो मजा आ जाता
जवाब देंहटाएंसुभाष जी कलम से करामात कर देते हो, सजीव वर्णन से दृश्य आंखों के सामने तैरने लगते हैं ऐसे लगता है जैसे वृतांत नहीं किया कोई दृश्य सामने चल रहा है ।
जवाब देंहटाएंलिखते रहिये!
आपने पढा, धन्यवाद नेगी जी
हटाएंभाई सुभाष जी आपने अपनी लेखनी के द्वारा जो यात्रा वृत्तांत बताया वो बहुत सहज और सुंदर है ।।। आपने यात्रा के हर पड़ाव की जानकारी बहुत खूबसूरती ये व्यक्त की है ।।।।
जवाब देंहटाएंबस ऐसा ही अपना भी किस्सा है दादा, जब भी घर की तरफ होता हूँ, यूँ ही दोस्तो की महफ़िले जमती हैं,डेबिट क्रेडिट दुनिया दारी सब भूल जाता हूँ, पढ़ते हुए खुद को जी रहा था, और पृथ्वी दा, अनिल दा तो हैं ही लाजवाब!! ये ही चीज तो है हमारे पास, और हमे घमंड है इस पर..
जवाब देंहटाएंशानदार , पूरी पिक्चर आँखों के सामने आ गई ।
जवाब देंहटाएंपहले शुरू में लगा कोई पूरानी यात्रा की कहानी है । लेकिन पृथ्वी, अनिल नाम पढे तो तब जाना ।
अनिल जी की वाल में ये वाली कविता कभी पढ़ी नही थी ।
कभी मौका लगा तो आप लोगों के दर्शन भी हो जाएंगे
बेहतरीन..! मेरे लिए लगभग सब अनजाने हैं, सिर्फ मंगलेश जी और आपको छोड़कर । पर फिर भी पढ़ कर मजा आ गया
जवाब देंहटाएंमज़ा आ गया।।
जवाब देंहटाएंआभासी यात्रा कराने के लिए धन्यवाद, बहुत अच्छा लेख है भाईसाहब ।
जवाब देंहटाएंजिंदाबाद..
पढने के लिए शुक्रिया दोस्तों,
जवाब देंहटाएंबेहतरिन सुन्दर वर्णन किया है भाई सुभाष जी...
जवाब देंहटाएंU describe it very well.. intersting..
जवाब देंहटाएंBahut hi badhiyan varnan chitaran , aur prastutikaran
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