पिछले साल सर्दियों की बात है, देहरादून में गीता दीदी की किताब 'मल्यों की डार' का विमोचन था। उन्होंने बुलावा भेजा
था, सो जाना बहुत ज़रूरी था। आनन फ़ानन छुट्टी ली गयी और फिर एक रोज पहले लगभग आधी
गुजर चुकी सर्द रात को दिल्ली से देहरादून के लिए बस पकड़ी गयी। देर रात से लेकर सुबह
तक के सर्द सफर से जूझने के बाद धूप से सराबोर देहरादून के ख़ुशगवार दिन से मुलाक़ात
हुई।
किताब
के विमोचन समारोह में शामिल होने के बाद मैं अपने गाँव की ओर निकलना चाहता था लेकिन
पहाड पर वीरान होते गाँवो की बसासत के लिए 'पलायन एक चिंतन' को मुहीम के रूप में चलाने
वाले मित्र रतन सिंह असवाल और विजयपाल रावत नें जब अगले दिन उत्तरकाशी के सुदूर क्षेत्र
फ़तेह पर्वत चलने की पेशकश की तो मैंने तुरंत से हामी भर दी।
फ़तेह
पर्वत मेरे लिए बचपन से ही आकर्षण का विषय रहा है। जिस टौंस नदी के किनारे मेरा गाँव
है उसकी एक सहायक नदी रूपिन फ़तेह पर्वत से होकर गुज़रती है। बचपन के दौरान बडे-बूढ़ों
से सुनी गयी हिम-मानव येति की काल्पनिक कहानियाँ और पशुपालकों की जीवटता के सच्चे क़िस्से
अब भले ही समृति पटल पर धुँधले हो चुके हो लेकिन वे मुझे आज भी रोमांचित करते है। मुझे
यह अच्छी तरह से याद है कि इन किस्से-कहानियों का स्रोत फ़तेह पर्वत का यही क्षेत्र
था।
विश्व
पटल पर बह रही नदियाँ पानी ही बहा कर नही लाती, वे आदी काल से सभ्यताओं और संस्कृतियों
के एक दूसरे तक पहुँच बनाने का एक माध्यम भी रही है। संपूर्ण हिमालय की तलहटियों से
दुरूह तिब्बत की ओर जाने वाले सभी व्यापारिक मार्ग ऐसी ही नदियों की वजह से वजूद में
आ पाये थे। आज संचार और परिवहन के अत्याधुनिक साधनों नें दुनिया भर के एक बडे तबके
को भले ही बहुत क़रीब ला दिया हो लेकिन एक जमाने में नदियों नें समन्दर और समन्दर ने
सारी दुनिया को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया।
क्योकि
फ़तेह पर्वत के लिए एक रोज बाद निकलना था इसलिए ज़रूरी पारिवारिक कारणों के चलते मैने
उसी दिन शाम को हरबर्टपुर जाना तय किया। लेकिन हम ख्याल मित्रों के आग्रह पर उस रात
देहरादून में ही पडाव डाला गया। यह मेरा सौभाग्य था कि उस शाम मुझे पलायन एक चिंतन
के साथियों के साथ पहाड की जीवन चर्या को लेकर राय शुमारी
संभव हो पायी।
क्योकि
मित्र रतन सिंह और विजयपाल की प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में किसी नौकरशाह से मुलाक़ात
पहले से तय थी इसलिए मैं अल-सुबह ही हरबर्टपुर के लिए निकल पडा। यह पहले से ही तय था
कि अगली मुलाक़ात दोपहर के आस पास यमुना पुल पर होगी। रतन सिंह और विजयपाल वाया मसूरी
और मैं वाया विकास नगर होते हुए लगभग दो बजे के आस पास यमुना पुल पर फिर एक साथ हो
लिए।
यमुना
पुल के मछली भात की शानदार खुराक के बाद जौनसार और जौनपुर की सीमा बनाती यमुना के किनारे-किनारे
आगे का सफर शुरू किया गया। सफर के दौरान सडक के दूसरी ओर उपर में जहाँ जौनसार के भव्य
गाँव नजर आते हैं वहीं निचले क्षेत्र में बंजर और वीरान हो रहे खेड़े मंज़रों को भी
नजर अंदाज़ नही किया जा सकता। इस ओर के क्षेत्र, जहाँ हम सडक के मार्ग से जा रहे थे,
जो यमुना पुल के बाद जौनपुर और फिर आगे जाकर रंवाई हो जाता है, उस पूरे क्षेत्र में
एक जमाने के खेड़े-मंज़रों ने अब बेतरतीबी और अव्यवस्थित क़स्बों की शक्ल अख़्तियार
कर ली है। आधुनिक भारत के अर्द्ध शिक्षित बाज़ार सामाजिक तौर पर व्यक्तिगत नफ़े और
सार्वजनिक नुक़सान के जीते जागते उदाहरण है। यमुना घाटी के इन खेड़े-मंज़रों की सीमित
खेती बाड़ी में अब अनाज की बजाय कंकरीट के भीमकाय मकान उगाए जा रहे है। यमुनोत्तरी
मार्ग पर पडने वाले इन क़स्बों पर जहाँ आपको उगलियों पर गिने जाने वाले ठेकेदारों-साहूकारों
की बेतरतीब बनी भव्य अट्टालिकाएं देखने को मिलती है वहीं बडी मात्रा में खेती और पशुपालन
से विमुख स्थानीय श्रम जीवियों की भावी पीढ़ियाँ आपको इन बाज़ारों में बेमक़सद भटकती
मिल जाएगी। यदि आप साथ के साथ एक नजर बगल में बह रही यमुना पर बनाए रख पाएँ तो कई स्थानों
पर लोग डाइनामाइट के भयानक विस्फोटक कर मछलियों का अवैध शिकार करते नजर आ जाएँगे। पिछली
बार कंसेरू में हुई गोष्ठी के दौरान जब इस रास्ते से गुज़रते हुए नौगाँव से थोडा पहले
गंगाणी के पास नदी में डाइनामाइट का धमाका हुआ तो मैं भी मय साथियों के गाडी को किनारे
खड़ा कर तमाशाई भीड का हिस्सा हो गया। थोडी देर में एक युवक हमारे पास आया और एक हाथ
में डाइनामाइट की छड़ और दूसरे हाथ में डेटोनेटर लहराते हुए कहने लगा,
'सौ रूपये में दो फ़ायर, जितनी मछली मिलेगी, आपकी क़िस्मत, नदी में फ़ायर झौंकने और मछली पकड़ने का ज़िम्मा मेरा।'
'सौ रूपये में दो फ़ायर, जितनी मछली मिलेगी, आपकी क़िस्मत, नदी में फ़ायर झौंकने और मछली पकड़ने का ज़िम्मा मेरा।'
डाइनामाइट
की छड़ को देख कर मैं सिहर गया। अतीत में घटी एक दुर्घटना याद हो आयी जब इसी तरह से
मछली मारने के चक्कर में मेरे एक बचपन के मित्र का हाथ आधी बाज़ू समेत उड़ गया था।
मैं उसे अपने अतीत की घटना से अवगत करवाना चाहता था लेकिन वो मुझे अनसुना कर वहाँ खड़े
दूसरे लोगो के मुख़ातिब हो गया।
नौगाँव
पहुँचते-पहुँचते शाम होने को थी। अब पुरोला की ओर जाने के लिए यमुना पार कर कमल नदी
के किनारे-किनारे आगे बढ़ना था। हम नौगाँव बाज़ार पार कर नीचे यमुना पर बने पुल पर
पहुचे तो नजर यकायक यमुना के रौखड पर गयी जहाँ जमीन को उधेड़ने वाली एक भारी भरकम मशीन
मय ट्रैक्टरों और ट्रकों के खनन में जुटी हुई थी। इस खनन के बारे में पता करना बेमानी
था क्योकि सरकार यह क़बूल चुकी है कि नदियों की सफ़ाई होते रहनी चाहिए। इसलिए
शायद नौगाँव में यमुना के रौखड पर यह सफ़ाई अभियान भी सरकार के ईच्छानुरूप चल रहा होगा।
बहरहाल हम कमल नदी के किनारे आगे बढ़े तो रास्ते में पडने वाले गाँवो के उपजाऊ खेतों में मटर के ताज़ा उगे अंकुर शाम के पटल पर एक और रंग बिखेर रहे थे। पुरोला पार करते-करते धुँधलका हो गया था लेकिन फिर भी लाल चावल के लिए मशहूर रामा सेराँई घाटी के सीढीदार खेतों की दूर तक फैली श्रंखलाएँ, चाँदनी के टिमटिमें उजाले में साफ़ नजर आ रही थी। साफ़ आसमान में चाँद के पुर-शबाब होने पर यह सबकुछ विहंगम लग रहा था। मौके की नज़ाकत सबसे पहले शौक़िया फ़ोटोग्राफ़र मित्र रतन सिंह ने भाँप ली। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरत-फुरत अपना केमरा निकाल लिया। हम भी सडक किनारे बैठ कर तबियत से इस नज़ारे की नजर फरोशी करने लगे और जितना हो सका, इन नज़ारों को अपने जेहन में समेट लिया और आगे बढ गये।
रात जरमोला के डाक बंगले में गुज़ारने के बाद अगले रोज आगे का बाकी बचा सफर शुरू किया गया।
अगला
पडाव मोरी था।
उत्तरकाशी
जिले की इस अंतिम तहसील की सीमाएँ जहाँ गृह प्रदेश के जिला देहरादून की त्यूनी तहसील
से लगती हुई है वहीं यह तहसील राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल के जिला शिमला और किन्नौर से
भी अपनी सीमाएँ साझा करती है। लगे हाथ मोरी में चाय के दौरान हमने ढाबे वाले से लगभग
दो किलो वज़नी रैनबो ट्राऊट का सौदा कर डाला। सनद रहे कि समान भौगोलिक परिस्थिति वाले
पड़ौसी प्रदेश हिमाचल के मनाली तथा इस ऊँचाई के अन्य क्षेत्रों में ट्राऊट मछली का
उत्पादन और शिकार वहाँ की सरकार द्वारा स्थानीय निवासियों के कल्याण हेतु एक परियोजना
के तहत किया जा रहा है। लेकिन यहाँ इस तरह की योजनाओं से परहेज़ किया जाता है। मोरी
से बिथरी जाने के लिए भाड़े पर जीप का इंतज़ाम किया गया। हर की दून तक पहुँच मार्ग
में स्थित होने के कारण मोरी से नैटवाड तक का रास्ता तो थोडा बहुत ठीक है लेकिन नैटवाड
से बिथरी तक का रास्ता बस रास्ता भर है। स्थानिकों के हितो की दुहाई देते हुए ठेकेदार
जन प्रतिनिधियों के मुनाफ़े को मद्देनज़र रखकर हाल के वर्षों में बनी ये सड़के नव आगंतुकों
के लिए एक जोखिम भरा अनुभव हो सकती है लेकिन पर्वत के इन वाशिन्दो के लिए, जो हाल के
वर्षों तक इन मैराथन रास्तों को क़दम दर कदम नापते थे, यह नाम मात्र की सड़के किसी
वरदान से कम नही है और अब इन सड़कों पर सफर करना इनकी दिनचर्या का एक हिस्सा भर है।
नैटवाड
में भारी भरकम नाश्ता करने के बाद हम बिथरी की ओर हो लिए। गोविन्द वन्य पशु अभयारण्य
की सीमा पर स्थापित बैरियर पर खड़े जंगलात के मातहत नें नज़र भर कर हमारी गाडी की जामा
तलाशी ली। यहाँ से फ़ारिग़ होकर थोडा आगे बढ़ते ही टोंस का उद्गम स्थल नैटवाड का गाँव
आ गया। यह गाँव भले ख़स्ता हाल हो किन्तु ग्राम देवता के मन्दिर का जिर्णोदार तस्सली
बख़्श किया गया है। सरसरी तौर पर इस गाँव की स्थिति देख कर इस नतीजे पर बडी आसानी के
साथ पहुचा जा सकता है कि जन सरोकारो की बजाय मठों-मस्जिदों और मन्दिरों की खैर ख्वाही
को अपना दीनों-ईमान समझने वाले जन प्रतिनिधि समाज को किस ओर लेकर जाना चाहते हैं।
टोंस
के अस्तित्व को अविरल जल राशी प्रदान करने वाली उसकी सहायक नदियाँ रूपिन और शुपिन यहाँ
अस्तित्वविहीन हो जाती है। जहाँ शुपिन हर की दून ओर से आती है वहीं रूपिन फ़तेह पर्वत
की घाटी से। नैटवाड से हम लोग उबड-खाबड़ सडक पर रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ने लगे।
लगभग ५ किलोमीटर के बाद सडक ने रूपिन का किनारा छोड़कर फ़तेह पर्वत पर उपर की और बढ़ना
शुरू कर दिया। रूपिन के किनारे किनारे आगे बढ़ते हुए जहाँ स्थानीय वातावरण में उगने
वाले पेड़ एव वनस्पतियाँ बहुतायत में नजर आ रहे थे वहीं फ़तेह पर्वत पर उपर की ओर बढ़ते
हुए एक छत्र चीड नजर आ रहा था। थोडा आगे बढ़ने के बाद इस दुर्गम मार्ग पर गाँव बस्तियों
के आस पास को छोड़कर लगभग सारा क्षेत्र जंगल विहीन नजर आता है। लेकिन यह देखकर अच्छा
लगा कि आस पास दिखने वाले गाँवो के अधिकतर खेतों में पारम्परिक फसलों की जगह सेब के
बाग़ीचे लगाए जा रहे है। नैटवाड से लगभग दो घंटे की रोमांचकारी ड्राइव के बाद हम बिथरी
गाँव में थे।
दिन के तकरीबन दो बजने को हो रहे थे। आसमान साफ़ था और चटक धूप खिल रही
थी लेकिन सडक के किनारे लगे नल का पानी, जो बेमक़सद जमीन पर बह रहा था, बर्फ़ बनकर
जम गया था। वातावरण में हल्की धूल मालूम हो रही थी। गाडी से उतरते ही गाँव के नौनिहालों
नें बडे कौतूहल के साथ हमारा इस्तक़बाल किया। हमे जिन सज्जन के घर जाना था, उनके बारे
में मालूमात की गयी तो पता चला कि वो लकड़ियाँ काटने जंगल गये है। बहरहाल, गाँव के
सामुदायिक आँगन में, जो ग्राम देवता के मन्दिर के सामने था, आसन जमा लिए गये। हम में
से कुछ लोग जो आस्थावान थे, उन्होंने ग्राम देवता के दर्शन कर भेंट-पूजा की और जो कुछ
मेरे जैसे नास्तिक थे वे बिथरी गाँव की प्रकृतिक छटा को निहारने में ध्यानमग्न हो गये।
थोडी
देर में हमारे इर्द गिर्द बच्चो के साथ साथ कुछ युवाओं और बुज़ुर्गों का जमावड़ा लग
गया। बावजूद सर्द मौसम के जहाँ कुछ एक गिने चुने युवा आधुनिक जींस और जैकेट पहने नजर
आ रहे थे, वहीं बाकी के लोग, जो अपनी दिन चर्या में व्यस्त थे, जिनमें महिलाएँ, बच्चे
और बुज़ुर्ग सभी शामिल थे, अपनी पारंपरिक वेशभूषा में देखे जा सकते थे। यहाँ के बाशिन्दों
के रहन सहन से आधुनिकता अभी कोसों दूर है। गाँव में सामुदायिक नल के लिए बनी पानी की
टंकी और स्कूल की जर्जर सरकारी इमारत के अलावा इस गाँव में सरिए- सीमेंट का इस्तेमाल
नगण्य है। पारंपरिक तरीक़ों से बने घर-मकान को देखकर ही इनकी जीवटता और जूझारूपन का
अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे इस ऊँचाई पर मानव सभ्यताओं नें खुद के अस्तित्व को
बरक़रार रखा। यह बात दीगर है कि देश और दुनियाँ भर के सेठों के कारख़ानों से उगले जा
रहे धुँए और सरकार की साहूकार परस्त नीतियाँ इन ईलाकों को जल्द ही मानव विहीन कर देगी।
मामूली से परिचय के बाद ये युवा हम से घुल मिल गये। जब उन्हे पता चला कि हमें अमुक
व्यक्ति से मिलना है तो उन्होंने हमे जंगल की ओर ले चलने का सुझाव दे डाला।
हम 4 बजे के आसपास, लगभग १० हज़ार फ़िट की ऊँचाई पर स्थित इस गाँव से उपर देवदार के जंगल
की ओर जा रहे थे। थोड़ी सी चहलक़दमी हमे धार के दूसरी ओर ले गयी। वहाँ का नज़ारा बहुत
दिलकश था। हम लोग धार को छोड़ते हुए एक कटोरे के आकार के मैदान, जो एक प्रकृतिक तालाब
का अवशेष है, के उस छोर पर विस्मृत होकर खड़े थे जहाँ उपर की ओर भरे पूरे नीले आसमान
के अलावा देवदार के हष्ट पुष्ट जंगल से पहले सेब के बाग़ीचों की एक भरपूर श्रंखला विद्यमान
थी और नीचे नदी घाटी तक पालतू पेड़ों के जत्थों के बीच नजर आ रहे गाँव और वृक्ष विहीन
नंगी ढलाने मौजूद थी। सामने नजर आ रहे रूपिन पास के ग्लेशियरों से होकर आती सर्द किन्तु
नम हवा ने दिलो दिमाग़ को तरो ताज़ा कर दिया था। मामूली सी दूरी पर देवदार के पेड़ों
की अनुशासित भीड बर्फ़ की सुफ़ैदियों के माध्यम से अपने ईलाके की तसदीक़ कर रही थी।
थोडी देर ही सही, हम वहाँ बैठ कर प्रकृति के उस वास्तविक रूप मे शामिल थे जो पहाड पर
सृजन के लिए उत्तरदायी है।
कुछ
देर बाद हम नीचे उस इकलौती सडक की ओर उतरने लगे जो आगे मसरी गाँव की ओर बढ़ी जा रही
थी। बाग़ बाग़ीचों को देखकर मुझे लग रहा था कि यह स्थानीय वाशिन्दो की मिल्कियत होगी
लेकिन फिलहाल में ही मित्र बने एक स्थानीय युवक ने हमे बताया कि यहाँ नजर आ रहे बाग़ानों
का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगों का है। ख़रीदारों के बारे में जब मालूमात की गयी तो
पता चला कि इस गाँव के अलावा नीचे नदी से लेकर उपर फ़तेह पर्वत की चोटी तक के तमाम
राजस्व ग्रामों की कृषि तथा चारागाह ज़मीनों का बडा हिस्सा बाहार से आए लोगो को बेचा
जा चुका है। यह जानकारी स्तब्ध करने वाली थी।
नीचे सडक पर पहुचे तो देखा कि सडक के साथ लगे एक फ़सली रकबे पर जेसीबी ताज़ा कटे बाँज के पेड़ों की जड़ो को जमीन से उखाड़ कर अलग कर रही है। ताज़ा उधेड़ी गयी जमीन पर तकरीबन दो मीटर व्यास तक की मोटाई के उम्र दराज़ बाँझ के कई पेड़ टुकड़ों में कटे यहाँ वहाँ बिखरे पडे थे। हमारे कुछ पूछने से पहले ही यह मालूम हो गया कि यह फ़सली रक़बा क्षेत्र के पूर्व में रह चुके परगना अधिकारी की ख़रीदी हुई मिल्कियत है। यही नही, उत्तरकाशी के जिला अधिकारी रह चुके एक आई ए एस अधिकारी ने भी थोडा सा आगे जाकर सडक से लगता हुआ कई नाली जमीन का एक बेहतरीन टुकड़ा ख़रीद लिया है।
इन
मसले पर और बातचीत हुई तो पता चला कि मोटा मोटी तौर पर फ़तेह पर्वत के इस ईलाके का
एक बडा फिसद बाहार से आए व्यापारियों, व्यवसायियों और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों
तथा कारकूनो की मिल्कियत हो गया है। सरकार की अनदेखी और प्रशासन की ढुलमुल नीतियों
के चलते स्थानीय वाशिन्दों ने फ़तेह पर्वत की सम्रद्धि के प्रतीक पारम्परिक व्यवसाय
पशु पालन और खेती बाड़ी से विमुख होकर अपनी ज़मीनें धडाधड औने-पौने में बेचना शुरू
कर दिया है। भविष्य में क्या होगा, यह कोई जानना ही नही चाहता। बस, सबको पैसा चाहिए।
उत्तरकाशी जिले की मोरी तहसील के अंतर्गत आने वाले, देश के इस पहाडी भू भाग के सीमान्त
क्षेत्र की मेहनतकश सभ्यता की वर्तमान पीढी अपनी जमीन से लगभग बे-दखली की कगार पर है।
सरकारी महकमों के समर्थन से पैसे और पहुँच वाले रूसूखदार स्थानीय वाशिन्दो की ज़मीनों
पर फलोद्यान और अपने लिए अय्याशगाहें विकसित करने में लगे हुए है जबकि स्थानिक प्रत्येक
की महत्वकांक्षाएं शहर की ओर मुँह बाए खड़ी है।
दिन
भर के थकाऊ सफर के बाद रात में बिथरी गाँव के ज्येन्द्र सिंह के बिना खिड़की के घर
पर पडाव डाला गया। रात में दिशा शौच जाने के लिए शौचालय का रास्ता पूछा तो पता चला
कि जंगल में होकर आना पड़ेगा।
झाड़ू
के साथ देश के प्रधान मन्त्री का प्रसिद्धि पा चुका चित्र पोस्टर के रूप में इस गाँव
तक पहुँच चुका है लेकिन लगभग दो सौ से भी ज्यादा परिवारों के गाँव बिथरी में सरकारी
स्कूल के अलावा दो और घरों में शौचालय बने हुए है। मंगल अभियान से गौरवान्वित होने
वाले देश के इस गाँव ने अभी तक बिजली का बल्ब नही देखा है। अब ऐसे में गाँव वालो के
साथ दिल्ली और देहरादून से होने वाली घोषणाओं पर बात करना ही बेमानी लग रहा था। मेहमान
के मायने क्या होते है यह इनसे बेहतर कोई और शायद ही परिभाषित कर सकता होगा। बिथरी
गाँव के जयेन्द्र सिंह और उसके परिवार की मेहमान नवाजी ने दिल खुश कर दिया।
बेहतर
जीवन यापन के लिए जीवों में पलायन एक प्रकृति सम्मत प्रक्रिया है। स्वास्थ्य पलायन
मानव सभ्यताओं के विकास के लिए जरूरी है लेकिन किसी भी क्षेत्र के स्थानीय वाशिन्दो
को मामूली लालच और राष्ट्रहित की दुहाई देकर, कभी किसी बाँध परियोजना के लिए तो कभी
किसी कारखाने के लिए और कभी फ़तेह पर्वत जैसे क्षेत्रों में रूसूखदारों के व्यक्तिगत
हित के लिए, सारे नियम क़ानूनों को ताक पर रख कर उन्हे उनकी पुश्तैनी बसासतों से बेदख़ल
करना सरासर अन्याय है। सरकार के इसी रवैये के चलते शहरों के फुटपाथ आबाद रहते है।
भोले
भाले और साधारण सोच वाले इंसानों को भारी भरकम कानून और अमीर परस्त नीतियाँ कभी समझ
में नही आ सकती। उदाहरण के लिए एक तरफ जहाँ कानून यह बताता है कि दलित की जमीन किसी
स्वर्ण के नाम हस्तान्तरित नही हो सकती लेकिन बावजूद इसके बिथरी गाँव सहित पहाड पर
दलितों की पुश्तैनी और पट्टों के तहत हासिल जमीनों की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है।
एक ओर कानून गंगा और उसके जैसी अनेकों नदियों के किनारों पर मानकों के तहत पर्यटन के
व्यवसाय के माध्यम से रोज़ी रोटी कमाने वाले हज़ारों कामगारों को पर्यावरण का हवाला
देकर उन्हे बेरोज़गार कर देता है लेकिन वहीं दिल्ली में कल्चर फ़ेस्ट के नाम पर गंध
की गाद से बजबजाती मृत प्राय यमुना के किनारे पर स्वयंभू आर्ट आफ लिविंग के रवि शंकर
को उसके राजनीतिक रूसूख के दम पर ३५ लाख लोगो की भीड एकत्र करने की छूट दी जाती है।
इसमे कोई दो राय नही है कि देश के जन साधारण के लिए उसका क्षणिक लाभ सर्वोपरि होता
है जिसे कानून के तहत नियन्त्रित किया जाना चाहिए लेकिन दुख तब होता है जब सरकार और
प्रशासन में शामिल दूर दृष्टाओं की सोच कानून को दरकिनार कर आम जनता के बजाय उनके निजी
हितो तक सीमित हो जाती है।
अगले रोज निकलते वक़्त जयेन्द्र सिंह को अपना फोन नंबर देकर उसे दिल्ली आने का निमन्त्रण दिया और पलायन की कगार पर पहुचे कई पहाडो को पार करता हुआ देर रात तक अपने गाँव आ गया।
बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंShaandar lekh Bhai Saab!!!!!
जवाब देंहटाएंसुन्दर अति सुन्दर!💐
जवाब देंहटाएंसुन्दर अति सुन्दर!💐
जवाब देंहटाएंसुन्दर वर्णन....
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